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Wednesday, November 15, 2017

सीडी युद्ध का वास्तविक शिकार कौन?


भारत की चुनावी राजनीति की पतन गाथा को आगे बढ़ाने के वास्ते एक और सेक्स-सीडी एवं चार वीडियो-क्लिप जारी कर दिये गये हैं. इस बार गुजरात के पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के तेज-तर्रार नेता हार्दिक पटेल को लपेटने की कोशिश हुई है जो आसन्न गुजरात विधान सभा चुनाव में भाजपा के प्रबल विरोधी और कांग्रेस-समर्थक के रूप में सामने आए हैं. सोशल मीडिया पर वायरल हुए अलग-अलग वीडियो में हार्दिक पटेल को महिलाओं  के साथ मस्ती करतेदिखाया गया. पटेल ने इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए पलटवार किया है कि भाजपा गुजरात की महिलाओं का अपमान कर रही है. जनता 22 साल के लड़के का नहीं, 22 साल के विकास का वीडियो देखना चाहती है, अगर कुछ हुआ है तो. प्रमुख युवा दलित नेता जिग्मेश मेवानी ने हार्दिक के पक्ष में ट्वीट किया है कि यह किसी की निजता में दखल है. मैं हार्दिक के साथ हूं. वैसे, पटेल कुछ दिन पहले ही आशंका व्यक्त कर चुके थे कि उनके खिलाफ कोई फर्जी सीडी जारी की जा सकती है.
गुजरात में चुनाव प्रचार चरम पर है. भाजपा वहां कई तरफ से घिर गयी है. कांग्रेस से उसे खास भय नहीं था लेकिन पटेलों, पिछड़ों और दलितों के विरोध में डट जाने और कांग्रेस के पक्ष में दिखने से वह काफी परेशान है. पहले उसने पाटीदार आंदोलन में फूट डालने की कोशिश की. नेताओं को खरीदने के आरोप भी उस पर लगे. अब पटेलों के सबसे प्रभावशाली नेता के खिलाफ ये वीडियो सामने आये हैं.
सत्ता की राजनीति में यह घिनौनी प्रवृत्ति की तरह उभरा है. जब भी किसी पार्टी को जन-मुद्दों का जवाब नहीं सूझता या किसी ताकतवर विरोधी को पटकनी देनी होती है तो मीडिया की मार्फत जनता का ध्यान भटकाने के लिए कहीं से एक सनसनी सामने ला दी जाती है. सेक्स-सीडी से ज्यादा सनसनीखेज हमारे यहां और क्या हो सकता है? घोर अनैतिक हो चुकी राजनीति का यह बड़ा हथियार माना जाने लगा है. विकास के मुद्दे पर शुरू हुआ गुजरात का चुनाव प्रचार सेक्स सीडी के घटिया स्तर तक बेवजह नहीं आ गिरा है.
इस मामले में अधिकसंख्य पार्टियों का दामन साफ नहीं है. हाल ही में जब लालू यादव की पार्टी राजद ने नीतीश कुमार की नशाबंदी नीति को निशाना बनाते हुए एक शराब व्यवसायी-नेता के साथ मुख्यमंत्री की सेल्फी जारी की तो जवाब में बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से लालू-पुत्र और हाल तक उप-मुख्य्मंत्री रहे तेजेश्वरी यादव का वह फोटो जारी कर दिया जिसमें वे एक लड़की के साथ बीयर की बोतल लिए खड़े हैं. निशाना तेजेश्वरी थे, उस अबोध लड़की का चरित्र-हनन भी किसी को दिखा क्या?
छत्तीसगढ़ के एक मंत्री की सेक्स सीडी प्रसारित करवाने की साजिश के आरोप में पत्रकार और कांग्रेसी विनोद वर्मा की रातोंरात गिरफ्तारी अब भी सुर्खियों में है. सन 2008 में तत्कालीन भाजपा महासचिव संजय जोशी की सेक्स सीडी ने कम हंगामा नहीं मचाया था. उस समय आरोपों के घेरे में नरेंद्र मोदी भी थे, राजनीति में तेजी से उभरते संजय जोशी से जिनकी कतई नहीं बनती थी. 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी की सेक्स सीडी जारी हुई तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. 2012 में कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिघवी की सेक्स सीडी ने हंगामा खड़ा किया था. 2016 में कर्नाटक के शिक्षा मंत्री को इसी कारण इस्तीफा देना पड़ा था.
कुछ और पीछे देखें तो 1978 का वह काण्ड याद आता है जब जनता पार्टी की सरकार के उप-प्रधानमंत्री एवं कद्दावर नेता जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम की एक महिला के साथ अंतरंग क्षणों की तस्वीरों ने सनसनी फैलाई थी. तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था, लेकिन मेनका गांधी के सम्पादन में सूर्यापत्रिका ने वे तस्वीरें छापी थीं. निशाना जगजीवन राम थे, मार किस पर पड़ी?
ये सभी ऐसे मामले हैं जिनमें किसी महिला ने सम्बंधित नेता पर यौन-उत्पीड़न जैसा कोई आरोप नहीं लगाया. न पहले न बाद में. राजनेताओं पर महिलाओं का शारीरिक शोषण करने के आरोप खूब लगते रहे हैं. मदद मांगने आयी महिला को फंसाने या किसी युवती को उठवा लेने के कई किस्से आज के नेताओं के चरित्र का कच्चा चिट्ठा खोलते आए हैं. यहां हम सिर्फ उन मामलों का जिक्र कर रहे हैं जिनमें सम्बंधित महिला ने नेता पर आरोप नहीं लगाया. अगर वे सच्ची सीडी या तस्वीरें हैं तो सिर्फ यही बताती हैं कि जो कुछ हुआ है वह दो वयस्क व्यक्तियों की रजामंदी से हुआ है, जिस पर किसी तीसरे को आपत्ति करने का अधिकार नहीं है. सीडी बनाई गयी है तो किसी ने साजिशन उनकी निजता का उल्लंघन किया है और उसका इरादा कतई नेक नहीं हो सकता.
नेताओं को बदनाम करने के लिए ऐसी फर्जी सीडी भी खूब बनायी जाती हैं. टेक्नॉलॉजी ने इसे बहुत आसान बना दिया है. मीडिया भी ऐसी चीजों को अति-उत्साह से उछालता है. नेहरू-युग में शायद ही कोई अखबार रहा हो जिसने सिगरेट पीते अपने प्रधानमंत्री की तस्वीरें छापी हों, जबकि नेहरू खूब सिगरेट पीते थे. आज सेक्स सीडी के मामले भी बिना असली-फर्जी जांचे प्रसारित किए जा रहे हैं.
राजनैतिक साजिशकर्ताओं से लेकर मीडिया तक यह नहीं देखते कि यह किसी की निजता में अनावश्यक दखल है, उससे ज्यादा महिलाओं का अपमान है और जनता का ध्यान जरूरी मुद्दों से भटकाने की बड़ी राजनैतिक साजिश है. विरोधी को नुकसान पहुंचाने के लिए महिलाओं का अनैतिक इस्तेमाल किया जा रहा है. मीडिया भी इस अपमान का बड़ा हिस्सेदार है. आश्चर्य और दुख तब और बढ़ जाता है जब साजिशकर्ता या आरोप लगाने वाले दल की महिला नेताओं को भी इसमें अपना अपमान नहीं दिखाई देता. उनकी तरफ से आपत्ति करना तो दूर, वे स्वयं आरोप लगाने वालों की पंक्ति में जोश-खरोश के साथ शामिल रहती हैं. 1978 में  सुरेश राम और एक लड़की के नग्न चित्र छापने में मेनका गांधी को कोई संकोच नहीं हुआ था.
गुजरात में जारी हार्दिक पटेल के वीडियो असली हैं या नकली, यह महत्वपूर्ण नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि जब सत्तारूढ़ पार्टी मैं विकास हूंके नारे के साथ मैदान में है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरदार पटेल के समकक्ष स्थापित करने की कोशिश की जा रही है तब विरोध में खड़े एक पटेल नेता की छवि को ध्वस्त करने के लिए ऐसी साजिश की जरूरत किसे और क्यों पड़ रही है? क्या विकास का मुद्दा अब चुनाव जिताने वाला नहीं रहा? यह भी कि महिलाओं को इस तरह कब तक अपमानित किया जाता रहेगा?
    

(प्रभात खबर, 16 नवम्बर, 2017)

Tuesday, October 31, 2017

राजनीति का वर्चुअल संग्राम


सोशल मीडिया अभियानों से उभरी मोदी और शाह की भारतीय जनता पार्टी अब सबसे ज्यादा चिंतित दिखाई देती है, खासकर गुजरात चुनावों के सिलसिले में, तो सोशल मीडिया ही से. ट्विट्वर पर राहुल गांधी के फॉलोवरों और रिट्वीट की संख्या तेजी से बढ़ने की जैसी प्रतिक्रिया भाजपा नेताओं में हुई वह इसी चिंता का द्योतक है.  जब राहुल ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्सकहा तो उन्हें सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रानिक मीडिया में खूब चर्चा मिली. मोदी की एक गुजरात यात्रा की सुबह जब राहुल ने ट्वीट किया कि आज होगी आसमान से जुमलों की बारिशतो इसे रिट्वीट और लाइक करने वालों का आंकड़ा सोशल मीडिया पर मोदी की लोकप्रियता तक पहुंच गया.

जवाब में राहुल पर तरह-तरह के तंज कसे गये, कहा गया कि यह इसी मकसद से बनाई गयी टीम तथा बोट’ (स्वचालित ऐप ) का काम है.  इसके प्रत्युत्तर में राहुल ने अपने पालतू कुत्ते का वीडियो ट्वीट करते हुए व्यंग्य किया कि इसके पीछे पिडीहै. यह जवाबी ट्वीट भी खूब रिट्वीट हो रहा है.

सोशल मीडिया में भाजपा पर यह प्रत्याक्रमण अचानक नहीं हुआ. नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत तमाम भाजपा नेताओं ने पिछले तीन-चार सालों में बड़े नियोजित ढंग से राहुल गांधी की जो पप्पू-छविप्रचारित की, उन पर जो मजाकिया किस्से और चुटकुले सोशल मीडिया पर प्रचारित किये, उनसे राहुल की अगम्भीर एवं नासमझ राजनैतिक नेता और लल्लू-टाइपछवि बन गयी. इसके लिए कुछ हद तक खुद राहुल भी दोषी रहे. इधर कुछ समय से कांग्रेस और स्वयं राहुल गांधी की ओर से इस छवि को तोड़ने की पुरजोर कोशिश हुई. अमेरिका के विभिन्न शहरों में पिछले दिनों हुई उनकी सभाएं और टीवी-वार्ताएं, जिनकी काफी सराहना हुई, इसी अभियान का हिस्सा थीं. राहुल ने भी मोदी की तरह अपनी सोशल मीडिया टीम बनाई है, जो उनकी छवि सुधारने के अभियान में लगी है.

गुजरात में राहुल की हाल की सभाओं और नव सृजन यात्राओंमें जुटी भारी भीड़ और सोशल मीडिया में उसकी व्यापक चर्चा ने भी राहुल की छवि सुधारने का काम किया है. बहुत सी टिप्पणियों में कहा  रहा है कि लगता है राहुल का कायाकल्प हो रहा है. ट्विटर पर उनके फॉलोवर और रिट्वीट इसी दौरान बढ़े और बढ़ाये गये. जाहिर है भाजपा की नजर इस पर शुरू से रही होगी. अमित शाह ने अपनी एक सभा में युवकों से यूं ही अपील की नहीं की होगी कि वाट्स-ऐप की हर बात पर पूरा भरोसा मत करो, अपना दिमाग लगाओ. सोशल मीडिया को अपना बड़ा हथियार बनाने वाली पार्टी के अध्यक्ष की इस अपील ने उस समय चौंकाया था. अब लगता है कि ऐसा क्यों कहा गया था.

सोशल मीडिया ही नहीं, सार्वजनिक सभाओं तथा चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में भी लगता है कि राहुल ने भाजपा, विशेष रूप से मोदी को जैसे को तैसाकी तर्ज पर जवाब देने की रणनीति बना रखी है. जीएसटी के लिए गब्बर सिंह टैक्सजैसा जुमला गढ़ना ठीक मोदी के अंदाज में है. नये-नये नारे और जुमले गढ़ने में मोदी माहिर हैं जिन पर खूब तालियां बजती हैं और सोशल मीडिया पर भी वे ट्रेण्ड करते रहते हैं. जैसे, अभी हाल में अहमदाबाद आईआईटी के छात्रों से उन्होंने कहा कि मैं आईआईटीयन तो नहीं, लेकिन टीयन अवश्य हूं’. उन्होंने चायवालाके लिए टीयन शब्द गढ़ा.  तो, राहुल ने भी इधर उसी अंदाज में मोदी पर हमले शुरू किये हैं. दो दिन पहले ही उन्होंने कहा कि मोदी जी ने देश की अर्थव्यवस्था पर दो-दो टॉरपीडो चला दिये- नोटबंदी और जीएसटी.

राहुल ने द्वारिका और चोटिला के मंदिरों में दर्शन एवं पूजा-पाठ किये. आदिवासियों के नृत्य-गीतों में भी शामिल हुए. जातीय समूहों को कांग्रेस की तरफ खींचने के लिए वे खासी मेहनत कर रहे हैं. ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर को कांग्रेस में शामिल कराया. पाटीदार आंदोलन के प्रमुख नेता हार्दिक पटेल को साथ लाने के लिए सौदेबाजी काफी आगे बढ़ चुकी है. भाजपा को कमजोर करने का हर मौका वे गुजरात में भुना लेना चाहते हैं, जैसा भाजपा ने अन्य राज्यों में कांग्रेस के साथ किया.

गुजरात में भाजपा वैसे भी बचाव की मुद्रा में है. 2104 के बाद वह पहली बार किसी राज्य में वादाखिलाफी और सत्ताविरोधी रुझान का सामना कर रही है. राहुल की नयी रणनीति स्वाभाविक ही उसके लिए चिंता का कारण होगी. चिंता इस कारण ज्यादा होगी कि देश की आर्थिक स्थितियां और कुछ राज्य के जातीय हालात आज उसके विपरीत हैं. नोटबंदी के कारण और जीएसटी की दरों में तनिक राहत मिलने के बावजूद व्यापरियों का बड़ा तबका नाराज है. बेरोजगारी से युवा वर्ग परेशान है. पटेलों के व्यापक आंदोलन ने गुजरात में भाजपा सरकार को लम्बे समय से तंग कर रखा है. 1985 के बाद से पटेल भाजपा का बड़ा वोट बैंक रहे हैं लेकिन अब खिलाफ हैं. अमित शाह के बेटे की कम्पनी के रातों-रात फलने-फूलने की हाल की खबर भी भाजपा की छवि के विपरीत गई है. इन हालात में राहुल की तरफ खिंचती भीड़ और सोशल मीडिया में उनकी आक्रामक रणनीति भाजपा नेताओं के माथे पर बल डालने के लिए काफी है.

भाजपा की चिंता यह नहीं होगी कि वह गुजरात विधान सभा का चुनाव हार सकती है. राजनैतिक प्रेक्षक और स्वयं कांग्रेस भी, यह नहीं मानते कि भाजपा गुजरात में हार जाएगी. नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कम होने के बावजूद चुनाव जीतने के लिए अभी पर्याप्त लगती है. फिर, राहुल के सोशल मीडिया में छा जाने मात्र से कांग्रेस चुनाव जीत जाएगी, यह मानना दिवास्वप्न ही होगा. मगर भाजपा यह कतई नहीं चाहेगी कि उसका वोट प्रतिशत और विधायकों की संख्या पहले से कम हो जाए. उधर कांग्रेस पूरा जोर लगा रही है कि भाजपा के किले में बड़ी से बड़ी सेंध लगे ताकि मोदी का तिलिस्म टूटे और कांग्रेस की वापसी का रास्ता खुले. भाजपा की सीटें जितनी कम होंगी,  2019 की लड़ाई उसके लिए उतनी कठिन होगी. गुजरात का यही प्रमुख चुनाव-संग्राम है.

नरेंद्र मोदी जिस तरह सघन चुनाव-प्रचार में जुटे हैं, गुजरात के लिए विकास योजनाओं की घोषणाओं की जैसी झड़ी उन्होंने और उनके मुख्यमंत्री ने लगाई है, वह इसी कारण है. कांग्रेस का चुनाव जीतना तो दूर, राहुल का सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना भी उन्हें मंजूर नहीं. निकट भविष्य में कभी भी कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सम्भालने जा रहे राहुल के लिए यह कड़ा इम्तहान है.
चुनावी मैदान से पहले एक वर्चुअल संग्राम सोशल मीडिया पर लड़ा जाना है. हम उसी का मुजाहिरा कर रहे हैं.     

 (प्रभात खबर, 01 नवम्बर, 2017)