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Tuesday, August 08, 2017

सोच को स्वाइन


पीजीआई, मेडिकल कॉलेज और दूसरे बड़े सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में स्वाइन-फ्लू के लक्षणों वाले मरीज अन्य रोगियों-तीमारदारों की भीड़ में जिस तरह घूम रहे हैं, उसे देखते हुए अचम्भा नहीं होना चाहिए कि यह खतरनाक रोग ऐन राजधानी में सबसे ज्यादा फैल रहा है. पीजीआई और मेडिकल कॉलेज का प्रशासन ऐसे मरीजों को भीड़ से अलग करने या कम से कम मास्क लगाने की हिदायत देने की भी चिंता न करे तो क्या कहा जाए? जनता का एक वर्ग इतना सचेत नहीं है, मगर इन संस्थानों के कर्ता-धर्ता ? स्वाइन-फ्लू के मरीज अस्पतालों की भीड़ में संक्रमण फैला रहे हैं. डॉक्टर और अस्पताल कर्मचारी सबसे ज्यादा संक्रमित हो रहे हैं, यह तथ्य भी प्रशासन को चौंकाता नहीं. आइसोलेशन वार्ड बनाकर क्या होगा, जब ओपीडी से ही रोग फैल रहा हो? सरकार और प्रशासन बचाव के सुझाव देते विज्ञापन देकर जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, उन सुझावों पर स्वयं अमल नहीं करते.
बिजली विभाग जिस तरह ट्रांसफॉर्मर लगाता है और जो उसके सुरक्षा मानक हैं, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है. वे कहीं भी सड़क किनारे, फुटपाथ पर, किसी पार्क के कोने में यूं ही रखे देखे जा सकते हैं. अक्सर उनसे दुर्घटनाएं होती हैं. ट्रांसफॉर्मर छोड़िए, जिस तरह बिजली कर्मचारी बिना पर्याप्त उपकरणों के लाइन पर काम करते हैं, वह बेहद गैर-जिम्मेदाराना है. बिजली कर्मचारियों (आम तौर पर दिहाड़ी वाले) की करण्ट से और सफाई कर्मचारियों की सीवर की जहरीली गैस से होने वाली मौतें बहुत पुराना सिलसिला हैं. आज तक उनकी सुरक्षा के सामान्य उपाय भी किसी सरकार, बिजली विभाग और नगर निगम के जिम्मेदारों ने नहीं किये. हर मौत के बाद गुस्सा फूटने पर कुछ अश्वासन और थोड़ा मुआवजा, बस. असल में यह लापरवाही आपराधिक है. ऊपर से नीचे तक सबको पता है कि यह जानलेवा काम है और चंद सुरक्षा उपाय जिंदगी बचाएंगे, तब भी कोई हलचल नहीं होती.
खुले मैनहोल, सड़कों के गड्ढे और रोड डिवाइडर जरा-सी दुर्घटना में जानलेवा साबित होते हैं. गड्ढों और मैनहोल में से झांकती टहनियां, जो किसी जागरूक नागरिक का काम होता है, आपको सावधान कर दें तो ठीक वर्ना तो बीच सड़कों पर मौत का सामान सजा ही है. रोड-डिवाइडर सरिया-कंक्रीट से इतने मजबूत बनाये जाते हैं जैसे कि बांध की दीवार हो. कोई उनसे टकराया तो मरेगा या हाथ-पैर तो तुड़वा ही बैठेगा. एक पुराने इंजीनियर बता रहे थे कि रोड-डिवाइडर मामूली गारे से बनाये जाने चाहिए ताकि कोई टकराये तो डिवाडर टूटे, मनुष्य और उसके वाहन की दुर्गति न हो. मगर यहां चिंता यह है कि मनुष्य मर जाए तो कोई बात नहीं, डिवाडर सुरक्षित रहना चाहिए.
गैर-जिम्मेदारियां हममें किस कदर भर गयी हैं, सोच कर ही सिहरन होती है. बिजली की हाई-टेंशन लाइन के ठीक नीचे तक अपने मकान का छज्जा बढ़ाते वक्त यह ख्याल तो आता ही होगा कि यह कितना खतरनाक है. एक दिन अचानक वही लाइन घर के एक युवक की जान ले लेती है. गुस्साई जनता बिजली विभाग के खिलाफ नारे लगाते हुए सड़क जाम करती है. जिला प्रशासन मुआवजा देकर मामला शांत कराता है. सब मान लेते हैं कि हादसा था और हादसे होते रहते हैं!
इलाज के लिए अस्पताल जाइए और खतरनाक बीमारी लेकर घर लौटिए. जान बचाने के लिए खून चढ़वाइए और जानलेवा हेपटाइटिस-बी या सी से संक्रमित हो जाइए, यह हमारे यहां कितना आम हो गया है. जन-स्वास्थ्य के प्रति ऐसी घोर लापरवाही आपराधिक तथा अक्षम्य होनी चाहिए. अफसोस कि कहीं कोई हलचल नहीं.  (नभाटा, 5 अगस्त, 2017)  



Friday, July 21, 2017

आत्मघाती लापरवाहियों से घिरे हम


ट्रॉमा सेण्टर में आग लगना हादसा हो सकता है लेकिन जब यह पता चलता है कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने गम्भीर रोगियों के बेहतर इलाज के वास्ते बने इस सेण्टर के लिए अग्नि-शमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र ही नहीं लिया था तो कैसी प्रतिक्रिया होती है? और, जब यह पता चलता है कि राजधानी की कई नयी इमारतें इसी लापरहावी से बनी हैं, तब? अनेक बार निजी भवन निर्माताओं को इसके लिए कटघरे में खड़ा किया जाता है लेकिन बहुत-से सरकारी निर्माण ही इसकी अनदेखी किये चले जा रहे हैं. ताज्जुब होता है कि जिम्मेदार सरकारी विभाग और बड़े स्वायत्तशासी संस्थान ऐसा कैसे कर सकते हैं? आग की चेतावनी वाले देने वाले जो अलार्म सिगरेट के धुंए से भी चीख उठने चाहिए थे, वे आग लगने और पूरी इमारत में धुंआ भर जाने पर भी मुर्दा पड़े रहे. अगर उनकी देख-रेख नहीं करनी थी तो लगाने की औपचारिकता ही क्यों की गयी?    
भ्रष्टाचार ही की तरह क्या आत्मघाती लापरवाहियां भी हमारी पहचान बन गयी हैं? हमारे चरित्र में यह शामिल हो गया है कि बेहद जरूरी सावधानियां भी नहीं बरती जाएंगी? जान-माल की सुरक्षा के अति-आवश्यक उपाय नहीं किये जाएंगे? ट्रॉमा सेण्टर की आग बहुत भयावह नहीं थी मगर हो सकती थी. वार्डों में धुंआ भर गया तो खिड़कियों के शीशे तोड़ने पड़े. अग्नि-शमन मानकों का पालन किया गया होता तो ऐसी नौबत नहीं आती. हादसे बार-बार नहीं होते लेकिन जब होते हैं तभी पता चलता है कि उनसे बचने के पर्याप्त उपाय कितने महत्त्वपूर्ण होते हैं.
स्वास्थ्य विभाग राजधानी में मच्छर-जनित रोगों की रोकथाम के उपायों के तहत जब विभिन्न विभागों-संस्थानों के परिसरों की जांच कर रहा है तो उसे जगह-जगह डेंगू मच्छर के लार्वा मिल रहे हैं. जब हम सुनते हैं मेडिकल कॉलेज, लखनऊ विश्वविद्यालय, सचिवालय परिसर और राजभवन कॉलोनी में भी खतरनाक मच्छर के लार्वा पाये गये तो हैरत ही ,बहुत दुख भी होता है. क्या इन संस्थानों-विभागों में यह सब देखने वाला, इसके लिए जिम्मेदार कोई है ही नहीं? पद होंगे, उन पर तैनाती भी होगी, वेतन-भत्त्ते और सुविधाएं भी ली जा रही होंगी लेकिन उत्तरदायित्व निभाने के मामले में घोर उदासीनता. ऐसे में जानलेवा बीमारियों के साल-दर-साल बढ़ते जाने पर क्या स्यापा करना. विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों और जनता की लापरवाहियों से सारे शहर में वैसे ही जल-भराव रहता है, गंदगी बीमारियों को न्योता देती रहती है, उसके लिए किसे और कितना कोसा जाए.
मनुष्य की जिंदगी की कोई कीमत हमारे यहां नहीं रही, जबकि उसे सर्वोपरि होना चाहिए. मनुष्य को जीने के लिए बेहतर जीवन-स्थितियां मिलें, उसकी जान की रक्षा में कोई कसर न रह जाए, ऐसे हालात हमारे यहां कैसे बनें, जबकि शासन-प्रशासन से लेकर सामान्य जन तक की चिंता में यह शामिल ही नहीं है. पंद्रह मंजिली रिहायशी इमारत बनाने वाला बिल्डर आपातकालीन स्थितियों के लिए आवश्यक दोतरफा सीढ़ियां नहीं बनाता. इससे बचने के लिए उसे विकास प्राधिकरण से लेकत अग्नि-शमन विभाग तक को रिश्वत देना मंजूर है. अब भूकम्प आये या आग लगे, उसमें रहने वाले कैसे बचें? सैकड़ों व्यक्तियों की जान कितनी सस्ती बना दी गयी है?
सरकारी विभागों और बड़े संस्थानों ने भी प्राइवेट बिल्डरों वाला रवैया अपना लिया है. ट्रॉमा सेण्टर के हादसे ने यह साबित कर दिया है. आखिर हालात कैसे बदलेंगे? सरकारें भी इस तरफ उदासीन हैं. (नभाटा, 22 जुलाई, 2017)