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Monday, October 12, 2026

ना द तिवारी जीते जी अप्रासंगिक बना दिए गए थे

(नारायण दत्त तिवारी का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। उन्हें याद करना शुचिता, शालीनता, नैतिकता और मर्यादा की राजनीति को याद करना है, जिसकी जगह आज की राजनीति में समाप्त हो चुकी है। आज 13 अक्टूबर 2026 को पूर्णांनद तिवारी सेवा संस्थान ने लखनऊ में उनका शताब्दी समारोह आयोजित किया था। उसी अवसर पर इस लेख की याद आई, जो नारायण दत्त तिवारी के 66वें जन्म दिन पर, 18 अक्टूबर 1991 को 'स्वतंत्र भारत’ अखबार में तनिक इस क्षोभ के साथ लिखा गया था कि क्या बदलती हुई राजनैतिक परिस्थितियों में नारायण दत्त तिवारी जैसे योग्य, अनुभवी, शालीन और मर्यादित राजनीति करने वाले की यही नियति होगी कि वह हाशिए पर ही रहने को विवश होगा! इस क्षोभ का कारण यह था कि राजीव गांधी की हत्या के बाद जो राजनैतिक स्थितियां बन रही थीं, उनमें तिवारी जी का नाम प्रधानमंत्री पद के सम्भावित नामों में शीर्ष पर था किंतु चुनावी पराजय ने उनके साथ क्रूर छल कर दिया। स्वयं उनके संकोचों और अपने लिए निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण न करने की उनकी मर्यादा  की भूमिका इसमें कम नहीं थी - नवीन जोशी।)


सन 1991 में नारायण दत्त तिवारी का जन्मदिन विजयादशमी को पड़ ज़रूर रहा है लेकिन राजनीति में उनकी लंका-विजय अभी दूर है। मई 1991 में जब राजीव गांधी के दृश्य से अचानक उठ जाने और सोनिया गांधी के मंच पर न आने से कांग्रेस और उसके नेताओं को अपने कायाकल्प का अवसर मिला है, तब नारायण दत्त तिवारी हाशिये पर खड़े हैं। यह उनका राजनीतिक वनवास तो शायद नहीं है, लेकिन वे राजमहल या राजधानी की चारदीवारी के भीतर भी नहीं है। जिस नारायण दत्त तिवारी का कद कांग्रेस के किसी भी वर्तमान नेता से छोटा नहीं है, लस्त-पस्त पड़ी और पुनः खड़ी हो पाने की कोशिश करती हुई कांग्रेस पार्टी को उनकी कितनी जरूरत महसूस हो रही है?

थोड़ा सा पीछे जाएं, इसी मई-जून में, जब राजीव गांधी की निर्मम हत्या के सदमे से उबरते हुए कांग्रेस पार्टी शेष चुनावों का सामना करने के लिए खड़ी हो रही थी और केन्द्र में उसके सत्तारूढ़ होने की संभावनाएं लग रही थीं, तब भावी प्रधानमंत्री के लिए जो दो-चार नाम उछल रहे थे रहे थे, उनमें नारायण दत्त तिवारी का नाम सबसे ज्यादा चमकदार लग रहा था। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के चिढ़ाने पर (कि तिवारी जी राजीव गांधी का सबसे अच्छा विकल्प हैं) जो नारायण दत्त तिवारी यह कहते थे कि प्रधानमंत्री बनने का सपना मेरे सोच से भी परे है, 1991 की जून में वही समर्पित सिपाही केन्द्र की शिखर-सत्ता का गणित लगाने लगा था। स्थितियों ने इतनी तेजी से पलटा खाया था और यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि तिवारी जी जैसे शालीन, विद्वान, अनुभवी, निर्विवाद और समर्पित कांग्रेसी का नाम भावी प्रधानमंत्री के रूप में लिया जाए। लेकिन इससे पहले कि कांग्रेस की दूसरी ताकतें तिवारी जी को नेपथ्य में धकेलने की कोशिश करतीं, खुद तिवारी जी के उत्तर प्रदेश में और उनके खास चुनाव क्षेत्र नैनीताल में ही किस्मत ने उनसे छल किया। चुनाव परिणाम की उस रात तिवारी जी सचमुच बहुत उदास थे। अपनों से ही पराजित वे चुपचाप हाशिये पर आ गए। आज अपना जन्मदिन वे इसी उदासी को पोछते हुए मना रहे हैं।

लेकिन यह उपयुक्त बहाना है यह विचार करने का कि आज की राजनीति में नारायण दत्त तिवारी जैसे शालीन और विद्वान नेताओं की क्या यही नियति है कि जब-जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब-तब वे हाशिये पर पड़े उपेक्षित महसूस करते रहेंगे? आज जो कांग्रेसी यह दहाड़ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की दुर्गति इसलिए हुई कि उसने मुलायम सिंह की अलोकप्रिय सरकार का साथ दिया और इसके लिए सारा दोष प्रकारान्तर से तिवारी जी पर थोप रहे हैं, वे यह क्यों भूल जा रहे हैं कि उस दौरान कांग्रेस तिवारी जी से कैसा सलूक कर रही थी। विधानसभा में विपक्ष के नेता की हैसियत वाले नारायण दत्त तिवारी को केन्द्रीय नेतृत्व ने कैसे असमंजस में डाल रखा था, समर्थन वापस लेना है या नहीं लेना है? सच तो यह है कि केन्द्र के स्तर पर राजीव गांधी और उनकी मित्र मण्डली दूसरा ही खेल खेल रही थी और उ. प्र. में कांग्रेस असमंजसों में झूल रही थी। इसी खेल का नतीजा था कि मुलायम सिंह ने चुपके से विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी और तिवारी जी को पत्ता तक नहीं चला। तब उनके साथ कैसा सलूक हो रहा था?

क्या नारायण दत्त तिवारी की त्रासदी यह है कि राजनीति करने की उनकी शैली गुलाम नबी आजाद या कल्पनाथ राय और के. के. तिवारी वाली नहीं है? क्या वीर बहादुर सिंह की कांग्रेसी शैली के प्रादुर्भाव के बाद तिवारी-शैली अप्रासंगिक हो जाती है? अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्दी को अनर्गल प्रलाप और दहाड़ से पटकनी न देने के कारण क्या तिवारी जी राजनीति के अखाड़े में पहलवान नहीं रह जाते? क्या संसदीय कौशल, वाकपटुता, राजनैतिक चातुर्य, अध्ययनशीलता की परम्परा पर चलने के कारण ही वे आज की राजनीति में 'मिस फिट' हो जाते हैं? 'मिस फिट' नारायण दत्त तिवारी कभी नहीं रहे और आज भी, यदि वे लोकसभा का चुनाव न हारे होते, तो उनकी उपेक्षा करना संभव नहीं था। सच तो यह है कि उन्होंने अपने व्यक्तित्व को संकरे कपड़ों में छुपाकर रखा और यह कांग्रेस की आज तक की संस्कृति की तकाजा था। आज तक कांग्रेस में एक ही नेता हो सकता था और बाकी सारी प्रतिभाओं को कार्यकर्ता बनकर रहने की मजबूरी थी। इसलिए नारायण दत्त तिवारी ने अपने को ‘अदना सिपाही’ बनाकर ही रखा। कभी-कभी लगता है कि वे कांग्रेस में जरूरत से ज्यादा दबकर रह रहे हैं और अपने को उन्होंने कभी 'एसर्ट' नहीं किया। लेकिन जिस-जिस ने कांग्रेस में खुद को 'एसर्ट' करना चाहा, वह क्या कांग्रेस में रह पाया? हेमवती नंदन बहुगुणा जनता पार्टी में आने पर कहा करते थे कि इंदिरा गांधी अपने कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों और दूसरे नेताओं को बीच-बीच में उखाड़-उखाड़ कर देखती रहती हैं कि कहीं कोई जड़ तो नहीं पकड़ रहा है। राजीव गांधी के समय तक यह कांग्रेस की संस्कृति रही है कि वहां सबका कद काट-काट कर छोटा किया जाता रहा, ताकि कोई नेता (प्रधानमंत्री/कांग्रेसाध्यक्ष) के कद तक न पहुंच जाए। आप नारायण दत्त तिवारी पर यह आरोप लगा सकते हैं कि वे अपनी ऊंची बढ़ती शाखाओं को खुद ही कतरते रहे और आज तक कांग्रेस के दीवानखाने में जानबूझकर एक 'बोनसाई' की तरह जमे रहे। उन्होंने न हेमवती नंदन बहुगुणा की राह पकड़ी, न विश्वनाथ प्रताप सिंह की और कमलापति त्रिपाठी की राह जाते भी वे नहीं दिखाई देते।

नारायण दत्त तिवारी के पिता कोई गोविन्द बल्लभ पंत नहीं थे, इसलिए यह निर्विवाद है कि उन्होंने जो भी राजनीतिक शिखर छुए, वह उनकी मेहनत, संघर्ष और लगन की निजी कमाई है। आज जब कि कांग्रेस को नेहरू वंशवाद के अभिशाप से मुक्ति मिली है (कांग्रेसियों को सोनिया गांधी का बड़ा आभार मानना चाहिए कि वे राजनीति में नहीं जा रही हैं) और कांग्रेस को अपनी नर्सरी में प्रतिभाओं की पौधशाला उगाने का पूरा मौका है, तब भी क्या नारायण दत्त तिवारी खुद ही 'बोनसाई' बने रहने की मजबूरी से मुक्त नहीं होंगे? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनर्जीवन और खुद नारायण दत्त तिवारी के लिए यह लखटकिया सवाल है। सवाल यह भी है कि यदि आज कांग्रेस में पी. वी. नरसिंह राव का वर्तमान सच हो सकता है, तो नारायण दत्त तिवारी का भविष्य सच क्यों नहीं हो सकता?

पिछले एक साल से ‘चिंतन’ की छोटी-बड़ी गोष्ठियों में कभी-कभी अधकचरी बहसों को भी अत्यंत गम्भीरता से सुनते हुए नारायण दत्त तिवारी को देखकर लगता है कि वे कम से कम हताश नहीं है। सक्रिय तो वे हैं ही। यह उनकी अध्ययनशील प्रवृत्ति का विस्तार होने के साथ-साथ राजनीति में ऐसी ही प्रवृत्तिवाली पीढ़ी तैयार करने का दीर्घकालीन प्रयास भी हो सकता है। लेकिन कांग्रेस में और यहीं उत्तर प्रदेश में एक पीढ़ी है जो अब नारायण दत्त तिवारी से निराश और ऊबती दिखाई देती है। यह पीढ़ी उनसे किसी हंगामा मचाऊ राजनीति की उम्मीद नहीं करती और इसके बिना राजनीति को व्यावहारिक नहीं मानकर अपना अलग रास्ता चुन रही है। इस बार की विदेश यात्रा से लखनऊ लौटने पर तिवारी जी ने जो कहा वह भी सक्रिय राजनीति की दृष्टि से उत्साहवर्धक नहीं है। उपचुनाव लड़ने की बाबत पूछने पर उनका जवाब था कि मैं अब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश की आर्थिक बेहतरी के लिए काम करना चाहता हूँ। उधर पहाड़ में भी उनकी लोकप्रियता गिरी है। चुनाव हारना अलग बात है और पुराने विश्वस्त लोगों का भरोसा खोना अलग बात। नैनीताल क्षेत्र में तिवारी जी के संघर्ष के दिनों के कई साथी अब उनकी तरफ से उपेक्षा महसूस करते हैं और जो नए लोग उनके इर्द-गिर्द जमा हुए हैं, वे चेहरा दिखाऊ ही ज्यादा है। स्वयं तिवारी जी जानते हैं कि इस चुनाव में ही बहेड़ी के कुछ मतदान केन्द्रों पर उनका कोई कार्यकर्ता एजेन्ट के रूप में मौजूद नहीं था।

उनकी कार्यप्रणाली के आलोचक भी कम नहीं हैं। उन्हें 'न्यू डेहली तिवारी' और 'नथिंग डूइंग तिवारी' कहने वाले लोग भी हैं। खुद तिवारी जी ने एक बार मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली जाते हुए लगभग खीझकर कहा था कि उत्तर प्रदेश का कुछ नहीं किया जा सकता, यहां काम का माहौल ही नहीं है। लेकिन उनकी कार्यक्षमता और कार्यकुशलता के कई किस्से आप सचिवालय के अधिकारियों से सुन सको हैं। उन्होंने आज तक किसी अफसर से अप्रिय नहीं बोला और अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी को मित्र ही माना। उनके राजनैतिक जीवन की अब तक की चादर बेदाग कही जा सकती है। वे कभी किसी विवाद में नहीं फंसे और उन पर कोई आरोप नहीं लगा। कुल मिलाकर उनका राजनैतिक भागफल खूब बड़ा है, जिसे कोई नकार नहीं सकता। उनकी योग्यता निर्विवाद है- किसी भी पद के लिए।

लेकिन यह स्वयं नारायण दत्त तिवारी पर निर्भर है कि कांग्रेस के वर्तमान हालात में वे अपने लिए कौन सा रास्ता चुनते हैं। दलीय राजनीति से ऊपर उठकर देश के लिए काम करने का संत भाव अपनाते हैं या बीस वर्ष पुराने जोश से अखाड़े में कूदते हैं या फिर लगभग निर्लिप्त भाव से 'जेहि विधि राखे राम' का बस इंतजार ही करते हैं। आज 1991 के जन्म दिन पर इस सवाल का जवाब शायद वे अपने भीतर टटोल रहे हों।

- न जो, 13-10-2026