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Saturday, December 01, 2018

सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का जिम्मेदार कौन?


एक समाचार के अनुसार बीते गुरुवार को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने श्रावस्ती के एक प्राथमिक विद्यालय में कक्षा दो की छात्रा से अपनी हिंदी किताब से एक पाठ पढ़ कर सुनाने को कहा. वह ठीक से पढ़ नहीं सकी. इस पर मुख्यमंत्री ने शिक्षिका को फटकार लगायी और नसीहत दी कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दें.

सम्भवत: मुख्यमंत्री ने हमारी शिक्षा-प्रणाली की असलियत उजागर करने वाली असर रिपोर्ट नहीं देखीं. प्रथमनामक स्वैच्छिक संस्था की प्रत्येक वर्ष जारी होने वाली यह रिपोर्ट देश के विभिन्न राज्यों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई और व्यावहारिक ज्ञान के सर्वेक्षण पर आधारित होती है. इसकी खूब चर्चा भी होती है. शायद ही आज तक किसी राज्य सरकार या केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान देकर शिक्षा-प्रणाली को गुणवत्तापूर्ण बनाने पर ध्यान दिया हो.

सन 2013 की असररिपोर्ट में यह सामने आ गया था कि उत्तर प्रद्श के सरकारी स्कूलों में पांचवीं में पढ़ने वाले 43 प्रतिशत बच्चे दूसरे दर्जे का हिंदी-पाठ नहीं पढ़ पाते. गणित और अंग्रेजी का हाल तो बहुत ही बुरा है. मुख्यमंत्री जी को श्रावस्ती में जो दिखा वह कोई नयी बात नहीं है.

सन 2017 में असररिपोर्ट के लिए बिजनौर और वाराणसी में 14 से 18 साल के बच्चों का सर्वेक्षण किया गया जो स्कूली शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं. इन शिक्षित बच्चों में बिजनौर के 71.2% और वाराणसी के 76.4% बच्चे  ही कक्षा दो का हिंदी पाठ पढ़ पाते हैं. सरल भाग का सवाल क्रमश: 34.7% और 37.4% बच्चे ही कर सके. अंग्रेजी का सरल वाक्य (व्हाट इज टाइम, जैसा) क्रमश: 44% और 49.5% बच्चे पढ़ सके. घड़ी देख कर सिर्फ आधे बच्चे समय बता सके.

हाँ, मोबाइल इस्तेमाल करने में हमारे बच्चे काफी आगे पाये गये. बिजनौर में 14 से 18 वर्ष के 81% प्रतिशत लड़के और 68% लड़कियां मोबाइल इस्तेमाल करते हैं. वाराणसी में यह प्रतिशत 77 और 70 है. इण्टरनेट के प्रयोग में ये बच्चे काफी पीछे हैं.

यहां यह बता देना ठीक रहेगा कि इस सर्वेक्षण में  केरल के बच्चे बहुत आगे पाये गये. वहां हिंदी पाठ, अंग्रेजी वाक्य पढ़ पाने और घड़ी देख सकने वाले बच्चों का प्रतिशत 90 से ऊपर रहा. जाहिर है केरल की सरकारों ने स्कूलों में पढ़ाई को गम्भीरता से लिया है.

असरकी इन रिपोर्टों का हवाला हमने यहां इसलिए दिया कि मुख्यमंत्री ने श्रावस्ती की शिक्षिका से कहा कि वह बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दे. शिक्षिक-शिक्षिकाओं को बहुत ध्यान और जिम्मेदारी से पढ़ाना चाहिए, यह तो आवश्यक है लेकिन उत्तर प्रदेश में पूरी शिक्षा-प्रणाली का जो हाल है उसके लिए सरकारें उत्तरदाई हैं. प्राथमिक शिक्षा और स्कूलों का तो बहुत बुरा हाल है. इस पर अनेक बार लिखा-कहा जाता रहा है. इस व्यवस्था को शिक्षक नहीं सुधार सकते. उसके लिए सरकारों को संकल्प बद्ध होना होगा. इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी.

यहां यह भी याद दिलाना आवश्यक है कि कुछ समय पहले अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों, आदि के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जाए. सरकार ने इसमें असमर्थता जता दी. मंत्रियों-विधायकों के बच्चे निजी स्कूलों में क्यों पढते हैं? आईएएस अफसर अपने बच्चों के लिए अलग से आलीशान स्कूल क्यों बनवा रहे हैं? वे सरकारी स्कूलों को सुधारने में अपनी क्षमता क्यों नहीं लगाते?

क्या सरकारें ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? बच्चों के साथ यह भेदभाव कौन कर रहा है? क्या यह संविधान का मखौल नहीं है?   

(सिटी तमाशा, 1 दिसम्बर, 2018)