सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है।
भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक स्थितियां एवं अंतर्विरोध इस उपन्यास का केंद्रीय विषय हैं। घर-परिवार और समाज में स्त्रियों की स्थिति, पुरुष सत्ता द्वारा उनका दमन और क्रमश: उभरती स्त्री चेतना केंद्रीय विषय में गुंथे हुए हैं। प्रेम उनका प्रिय विषय है, इसलिए प्रेम कथा में इस सबको खूबसूरती से पिरोया गया है।प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान से कथा शुरू होती है। शुरूआती पृष्ठों में ही 'साला चमार कहीं का। आकर बैठ गया है सर पर', 'ब्राह्मण होकर आरक्षण का पक्ष ले रहा है तू? एक दिन यही आरक्षण तेरे सामने खड़ा होगा भूत की तरह', और 'मैं हर लड़की के, हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ता हूं, लड़ूंगा' जैसे वाक्यों से पाठक का सामना होता है और संकेत मिल जाता है कि यह कैसी लड़ाई का मैदान है।
समवय लड़के-लड़कियों में निश्छल दोस्ती, प्रेम, ईर्ष्या, झगड़े सब स्वाभाविक हैं। गरीब परिवारों में कोचिंग जाते बच्चे बेहतर भविष्य का सपना हैं। सपनों के अलग-अलग धरातल हैं। कोई परिवार ब्राह्मण है और कोई दलित। गरीबी बराबरी का मंच नहीं है। जाति की ऊंच-नीच उसे घोर असमान बनाती है।
प्रेम ऐसे बंधन नहीं देखता। वह असमान मंच पर पेंगें मारता झूलता रहता है। शुरू-शुरू में जो झटके आसानी से झेल जाता है प्रेम, वही खुरदुरी जमीन पर पैर रखते ही कभी जातीय ठोकर खाता है और कभी पुरुष के दम्भ की। कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ दलित तृप्ति और ब्राह्मण अभुनव का प्रेम इसी नियति को प्राप्त होता है। 'हर लड़की का सम्मान करता हूं' कहने वाला अनुभव अपने भीतर भरे पाखण्ड को स्वीकार तो करता है लेकिन पितृसत्ता का चोला नहीं फेंक पाता। उसका प्रेम इसी बात से सूख जाता है कि तृप्ति आईएएस परीक्षा में पास हो गई लेकिन वह रह गया।
कथा सुखांत नहीं है लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी से अधिक एक पुरुष से छली गई तृप्ति स्वाभिमान के मोर्चे पर मजबूत होती है। तमाम जिल्लत से मुक्त होने के लिए उसके पिता ने आत्महत्या का जो रास्ता चुना, वह तृप्ति का भी रास्ता बंद कर गया था लेकिन तृप्ति फिर खड़ी होती है। उसका फिर से संकल्पबद्ध होना, अफसर बन गए अनुभव के साथ संयोगवश हो गई भेंट के प्रतिरोध में ही जैसे सम्भव होता है। पुरुष दम्भ से वह ताकत ग्रहण करती है और आंसू पोछकर अगले समर के लिए कमर कसती है। यह उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है।
कथा तृप्ति और अनुभव के प्रेम के इर्द-गिर्द एकरेखीय नहीं रहती। तृप्ति की बहन सीमा के वैवाहिक जीवन की भयावह स्थितियां स्त्रियों के व्यापक दर्द को स्वर देती हैं, जिसमें पत्नी से बलात्कार का विमर्श भी शामिल है। उसके भाई अंशुल की कहानी और अनुभव के पिता के दफ्तर के हालात जातीय नफरत और राजनीति के विरोधाभासों की पोल खोलते हैं। सुधांशु और कनिका का प्रेम और पारिवारिक द्वंद्व भी हमारे ही समाज का आईना है। इस तरह उपन्यास व्यापक संदर्भ और फलक ग्रहण करता है।
प्रतिभा का कवि पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है- बीच-बीच में प्रयुक्त किए गए कवितांश, अध्यायों के शीर्षक और प्रत्येक किस्से की शुरूआत और अंत में दी गई शायरी इसका प्रमाण है। भाषा जरूर 'थोड़ा सा रोमानी हो जाएं' वाली छूट लेती है, जिसमें पहाड़ और नदी को भी साथ ले लिया गया है।
बढ़िया उपन्यास है और खूब पठनीय। प्रतिभा से भविष्य में और अच्छे उपन्यासों की उम्मीद बंधती है।
-नवीन जोशी, 15 अगस्त 2026, लखनऊ।
(उपन्यास- कबिरा सोई पीर है', रचना- प्रतिभा कटियार, प्रकाशक- लोकभारती, प्रयागराज।)
