सोशल मीडिया पर भारत सरकार किस प्रकार शिकंजा कसे हुए है, इसके विवरण चौंकाने वाले हैं।
वर्ष 2026 में मार्च से जुलाई तक सरकार ने फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पोस्ट/रील वगैरह ब्लॉक करके के 1,95, 000 (एक लाख पचानब्बे हजार) आदेश जारी किए। इसी बीच जंतर मंतर पर जेन जी का आंदोलन चरम पर था।
यूं समझिए कि प्रत्येक 68 सेकेंड पर एक आदेश जारी हुआ। रोजाना का औसत बैठता है- 1275 आदेश।
और, एक आदेश से एक बार में सैकड़ों व्यक्तियों यानी यूजर्स की पोस्ट/ रीलें हटवाई गईं।
ये आदेश मुख्यत: गृह मंत्रालय से आए। कानून है कि आदेश जारी होने के तीन घण्टे के भीतर सामग्री ब्लॉक हो जानी चाहिए। ये कम्पनियां तीन घण्टे क्या, आदेश जारी होते ही स्वत: सामग्री ब्लॉक कर देती हैं।
इस वर्ष की तुलना में पिछले वर्ष 2025 में ऐसे आदेश काफी कम थे। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच में मात्र छह आदेश प्रतिमास जारी किए गए थे। Indian Express ने आज यानी 18 अगस्त 2026 के अखबार में सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारियों के आधार पर इसकी विस्तार से खबर छापी है।
इस खबर में बताए गए तथ्य सरकार के भय, उसकी सेंसरशिप और उसके अहंकार को स्पष्ट करते हैं। एक उच्चाधिकारी ने बताया कि जैसे-जैसे आंदोलन व्यापक होता गया, वैसे-वैसे पोस्ट ब्लॉक करने के आदेश बढ़ते गए।
मार्च से जुलाई के पांच महीनों में सबसे अधिक 1,00,000 (एक लाख) आदेश इंस्टाग्राम पर रील/पोस्ट ब्लॉक करने के लिए जारी किए गए। फेसबुक को 80,000 (अस्सी हजार) और यूट्यूब को करीब 15 हजार आदेश दिए गए।
सोशल मीडिया पर जिस सामग्री को ब्लॉक करने को कहा गया (आई टी कानून की धारा 79-3-बी के आधार पर) , उनमें मुख्य रूप से जेन जी आंदोलन, सरकार की आलोचना, पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने की निंदा और पश्चिम बंगाल चुनाव से सम्बद्ध सामग्री रही। राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था को कारण बताकर पोस्ट ब्लॉक करने वाले आदेश (आई टी एक्ट की धारा 69-ए) इसमें शामिल नहीं हैं।
गृह मंत्रालय का एक पोर्टल है 'सहयोग' नाम से। इसी पोर्टल पर ये आदेश जारी होते हैं। यह पोर्टल इसी उद्देश्य से बनाया गया है, जिस पर केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय/विभाग सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री को ब्लॉक करने के आदेश जारी करते हैं।
कायदे से इन सोशल साइटों के स्वामित्व वाली कम्पनियों (फेसबुक और इंस्टाग्राम का स्वामित्व मेटा का है और यूट्यूब गूगल का) को सरकार के आदेशों की समीक्षा करनी चाहिए कि किस आधार पर सामग्री ब्लॉक करने को कहा गया है, वह कितना उचित या अनुचित है, उसे अपना पक्ष रखना चाहिए। लेकिन ये ऐसा नहीं करते।
मेटा भारत में यूजर्स को बताता भी नहीं है कि उनकी सामग्री सरकार के आदेश से ब्लॉक कर दी गई है। दूसरे देशों में वह यूजर्स को बता देता है।
मेटा ने सहयोग पोर्टल के साथ ऐसी तकनीकी व्यवस्था कर ली है कि आदेश जारी होते ही उस पर अमल हो जाता है। उस पर मेटा का कोई अधिकारी विचार करना तो दूर, उसे देखता भी नहीं। आदेश जारी होते ही सामग्री स्वत: ब्लॉक हो जाती हैं।
भारत के अलावा दूसरे देशों में मेटा ऐसा नहीं करता। उसके अधिकारी अन्य सरकारों के आदेशों पर विचार करते हैं, सरकार को अपने तर्क पेश करते हैं और संतुष्ट होने पर ही पोस्ट ब्लॉक करते हैं।
भारत के आई टी कानून में ऐसी कोई बंदिश नहीं है कि सरकार का आदेश आते ही सामग्री तत्काल ब्लॉक कर दी जाए। मेटा के अधिकारी भारत सरकार आंख मूदकर मान लेते हैं। शायद उससे कोई तर्क-वितर्क करना नहीं चाहते।
भारत में 60 करोड़ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये करीब 10 करोड़ पोस्ट रोजाना डालते हैं। इस तरह भारत सोशल मीडिया कम्पनियों के लिए सबसे बड़ा और विशाल बाजार है। यहां वह सरकार से कोई पंगा क्यों लेना चाहेगा?
आपको याद होगा कि हाल ही में मेटा के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग को भारत सरकार ने तलब किया था। वे दिल्ली आकर उच्चाधिकारियों के सामने पेश हुए थे।
- नवीन जोशी, 18 अगस्त 2026