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Friday, December 07, 2018

ताकि जनता आपस ही में लड़ती रहे


जनता के बीच वैमनस्य और झगड़े-फसाद का एक और मोर्चा खोल दिया गया है. मुजफ्फरनगर में कुछ दलितों ने एक हनुमान मंदिर पर कब्जा कर लिया. पुजारी को भगा दिया और स्वयं वहां सेवा करने लगे. इस तरह के कुछ और प्रयासों की खबर मिली है. अब ब्राह्मण गुस्से में हैं कि हमारे देवता और पुजारियों के साथ बदसलूकी की गयी. पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हुई है. राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ की सहारनपुर ईकाई ने मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी से मिल कर इलाके के पांच सौ मंदिरों की सुरक्षा करने की मांग की है.

अभी कुछ समय पहले अम्बेडकर मूर्तियों की सुरक्षा में सिपाही तैनात थे. अब हनुमान प्रतिमाओं और पुजारियों की रखवाली सिपाही करें तो क्या आश्चर्य! इस देश को बनाने में जीवन लगा देने वाले नेताओं की जाति आज के समाज-तोड़ू नेताओं ने खोज ली. अब देवताओं की बारी है. समाज में कुछ न कुछ विवाद छिड़े रहने चाहिए. मार-काट होती रहनी चाहिए.

नेताओं के पास और कुछ करने को है भी नहीं. आजादी के इतने साल बाद भी देश में गरीबी है तो वे क्या करें! उनकी गरीबी तो कबके दूर हो चुकी. जनता हमेशा रोटी, कपड़े और मकान के लिए रोती रहती है. सारे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और जो जाते हैं उन्हें कैसी पढ़ाई नसीब होती है. पढ़-लिख कर भी युवाओं को रोजगार नहीं मिलता तो नेता क्या करें. कितनी तो योजनाएं चला रखी हैं. शहर स्मार्ट हो रहे हैं. न वहां अवैध कब्जे हैं, न अतिक्रमण, न अवैध निर्माणों से रास्ते बंद. सस्ता-सुलभ सार्वजनिक परिवहन नहीं है. बिजली-पानी संकट बढ़ता जा रहा. प्रदूषण के मारे सांस लेना मुहाल है. जनता का ऐसा रोना नेताओं की समझ में नहीं आता. उन्हें तो कोई समस्या नहीं होती.

गांवों को खुशहाल और विकसित बनाने के लिए कितना कुछ किया गया है. किसानों के संताप दूर करने के लिए ढेरों जतन किये जा चुके. फिर भी वे आत्महत्या कर रहे हैं तो नेताओं का क्या दोष. महिलाएं सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने की बजाय अत्याचार-बलात्कार का हल्ला मचाये रहती हैं. दलितों और पिछड़ों को समाज में बराबरी चाहिए. नहीं मिलती तो नेता क्या करें. कानून तो बना ही दिये हैं. इलाज के अभाव में हजारों बच्चे हर साल मरते हैं, यह उनकी किस्मत है. कानून व्यवस्था के मामले में राम राज्य है फिर भी विरोधी चिल्लाते रहते हैं कि सरकार का रसूख खत्म हो चुका. इन तमाम बहानों से चहुँ ओर अशांति और उपद्रव फैलाने की साजिशें हो रही हैं. भ्रष्टाचार के आरोप लगाये जा रहे हैं.

सीधी-सादी जनता इस दुष्प्रचार से भ्रमित हो सकती है. उसका ध्यान इस ओर नहीं जाना चाहिए. इसलिए जनता के हाथों में रंग-रंग की पताकाएं पकड़ा दी गयी हैं कि जाओ धर्म-धर्म खेलो. बेरोजगार युवाओं को उकसाया गया है कि हिंदू-मुस्लिम की साँप-सीढ़ी खेलो. जाति-जाति का पाठ पढ़ो. मन्दिर बनाने के लिए नारे लगाओ. दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति पर गर्व करना सीखो.

गौ माता को जनता के सारे जरूरी मुद्दों के आगे कर दिया गया है. गोरक्षक सड़कों पर निकल पड़े हैं. उनकी निगाह कचरा खाती गायों पर नहीं है. फसलों को नुकसान पहुँचाती गायों को वे नहीं देखते. वह बवाल करने और किसी की भी जान लेने का बहाना बन गयी है. एक पुलिस इंसपेक्टर की हत्या उतना गम्भीर मामला नहीं है, जितना गाय का मारा जाना.  

इस तरह भय-भूख-बेरोजगारी, वगैरह मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं. वर्षों पुरानी यह कहानी फिर दोहराई जा रही है.  

(सिटी तमाशा, 8 दिसम्बर, 2018)