Monday, March 11, 2019

जिनके पिया परदेस बसत हैं: लखनऊ में कुमाऊंनी होली की यादें


आपको अपने बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियों में ले चलता हूँ.
-‘हरदा, आज पुन्यू हो गई पूस की कहते हुए गौर्दा आ धमकते, हम रोटी खा कर बैठे ही होते.
खाना पकाते समय बाबू मिट्टी के एक छोटे कुण्डे में कोयले रखते जाते, वही तापते हुए मैं पढ़ता और बाबू हुक्का गुड़गुड़ाते होते.
-“आओ गौरी दत्त, मैं अभी याद ही कर रहा था कि तुम आते होगे, लो हुक्का पीओ,” गौर्दा हुक्के की एक-दो फूक लगा कर उठ जाते- चलता हूँ, अभी विश्वम्भर दत्त जी को भी बुलाना है, आप आओ
लखनऊ की कैण्ट रोड पर सिंचाई भवन के पीछे की कैनाल कॉलोनी के सर्वेण्ट क्वार्टर पहाड़ियों से भरे थे, ज्यादातर कुमाऊंनी. वहां सारे तीज-त्योहार पहाड़ी गांवों की तरह ही मनाए जाते थे. घुघुती त्यार, फुलदेई, सब, और, होली तो गजब ही झकझोर होती थी. कुमाऊं में पूस की पूर्णिमा से होली गाने की परम्परा है. सो, कैनाल कॉलोनी में भी उसी रात से होली गाना शुरू कर दिया जाता था.
खड़ी होली :
गौर्दा की कोठरी में बिछे गद्दों पर ओढ़-आढ़ कर बैठे चार-पांच होल्यार होली गायन की शुरुआत करते. बाबू बहुत मंद्र स्वर में होली लगाते – ‘तुम संतन के हितकारी हरी , तुम…. गज और ग्राह लड़े जल भीतर, लड़त-लड़त गज हारो हरी…, गज के प्राण बचायो हरी….तुम संतन के…’
दिन भर दौड़-भाग की नौकरी से थके वे चंद होल्यार उस रात जल्दी उठ जाते. वसंत पंचमी से गौर्दा की कोठरी भरने लगती और उसमें युवकों की भागीदारी भी होने लगती, होली गायन आधी रात तक चलता. मनोरथ जी होली लगाते – ‘शिव के मन माहिं बसे काशी…, आधी काशी में बामण बनिया, आधी काशी में संन्यासी..युवकों को सावधान किया जाता – ‘एक बोल रे, एक बोलया अब दो बोल, हाँ!
शिवरात्रि से होली की यह बैठक कोठरी से बाहर खुले और बड़े अहाते में आ जाती. चंदा किया जाता, दरियां बिछती, चाय और आलू के गुटकों का इंतजाम होता. हम बच्चे उबले आलू छीलते, चाय के गिलास बटोरते-धोते और होली में भाग लगाना भी सीखते- हो रही जै-जै कार जग में, जनम भयो यदुनंदन को…’और शिव जी चले गोकुल नगरी…’ आहा, क्या होली थी! शिव जी भिक्षुक का रूप धर कर गोकुल जा रहे हैं. हाथ में चिमटा, और कांधे में झोली लटकाए घर-घर भिक्षा मांग रहे हैं. यशोदा माई के दरवाजे पर भिक्षा की पुकार लगा रहे हैं. यशोदा माई मोतियों भरा थाल ले आई हैं लेकिन भिक्षुक को यह भिक्षा नहीं चाहिए, तो क्या चाहिए उसे ? ‘दरश कन्हैया को मांगे हरी, शिव जी चले गोकुल नगरी…’ युवकों की टोली सम पर उत्साह से चीखती – ‘तक्का होई धो, धोई हो!
एकादशी को सुबह कपड़ों में रंग के छींटे डाले जाते और रात की महफिल अबीर-गुलाल से लाल और जोश से जवान हो उठती, बाबू अपनी पसन्दीदा होली से बैठक की शुरुआत करते – ‘एकादशी चीर, अबीर-गुलाल, द्वादशी रंग रचो है…’ इस दिन पहाड़ के गांवों में चीर बांधी जाती है और रंग खेलना शुरू हो जाता है. लखनऊ के उस मुहल्ले में चीर नहीं बांधी जाती थी लेकिन अबीर-गुलाल खूब चलने लगता. चीर बांधने से जुड़ी कई होलियां मैंने बाद में सुनी लेकिन बाबू की यह होली और कहीं नहीं सुनने को मिली. अफसोस कि आगे के बोल अब याद नहीं. कुमाऊंनी होली के अब तक देखे संग्रहों में भी यह होली नहीं मिली, खैर
एकादशी से पुन्यूं तक कैनाल कॉलोनी का वह अहाता भर उठता. घोड़ा अस्पताल, पुराना डाकखाना, दारुल-शफा, हैवलक रोड, जाने किस-किस मुहल्ले से होल्यार जुटने लगते. अनुशासित बुजुर्ग होल्यारों पर छलकते जोश वाले युवकों की टोली भारी पड़ने लगती, एक कोने में सिमटे बुजुर्ग होली लगाते – ‘हर फूलों से मथुरा छाय रही…’ तो युवकों का कोना अधैर्य दिखाता- -इस ब्योपारी को नींद बहुत हैलगाओ न! बुजुर्ग मुस्कराते और डांट भी लगाते – ‘अरे अभी से बिछौना बिछाओगे तो छलड़ी तक क्या करोगे, रे?’
सयानों की होली चलती रहती और ज्यादा बेचैन युवक धीरे से उठकर अहाते के बाहर मैदान में आ जाते. शराब का चलन उन दिनों उतना नहीं था लेकिन अत्तर की चिलम या बीड़ी खूब चलती थी. होली के लिए पहाड़ी गांवों से वह काली बट्टी बड़े आग्रह से मंगाई जाती. अत्तर की फूक के बाद युवकों की टोली मैदान में झोड़ा गाने-नाचने लगती – ‘देवानी लौंडा द्वारहाटौ को, त्वीले धारो बोला..हुड़का बजता, कई बार एक साथ तीन-चार हुडुके. झोड़ा गाने-नाचने वाले इतने हो जाते कि घेरे के भीतर घेरा बनता. अहाते में जब सयाने मंद्र स्वरों में गा रहे होते – ‘श्याम मुरारी के दर्शन को जब विप्र सुदामा गए हो लला…’ तब अहाते से सटे मैदान में हुड़कों की तालों के साथ झोड़ा तार सप्तक में गूंजने लगता – ‘खोलि दे माता खोल भवानी, धरम किवाड़ा…’ थोड़ी देर बाद गौर्दा मनाने आते – ‘चलो रे, होली मत बिगाड़ोचलो-चलो.
युवकों की टोली दबे विद्रोह के साथ भीतर आकर होली की बैठक में शामिल हो जाती और जैसे उनको मनाने के लिए ही धर्म सिंह होली लगाते – ‘मन मारी, तन मारी, दिल को गुसैयां, कैसे रहूंगी मन मारी…, हाथ में गडुवा, कान में धोती, नाणा चली, हां-हां नाणा चली, हो-हो नाणा चली, दिल को गुसैंया, कैसे रहूंगी मन मारी.यह युवकों की पसंदीदा होलियों में एक थी जिसमें उन्हें शब्दों के थोड़ा हेर-फेर से अश्लील इशारे करने और गाने का मौका मिल जाता था. वैसे, ये चौपद होलियां थीं, जिन्हें गाना और लौटाना आसान नहीं होता था, लेकिन वहां चौपद होलियां गाने के उस्ताद हुआ करते थे. मेरी स्मृति में आज भी कई ऐसी होलियां गूजती हैं- धनुष-बाण प्रभु जी के हाथ में, चौकस है तो लछिमन भाई, लंका की तैयारी’… ‘आवन कहि गए, अजहुं न आए, ऊधो श्याम मुरारी…’, ‘बूंद जो बरसे गुलाब की, चादर मोरी भीजै रे, रे रतनारे नैना…’ आदि-आदि.
ऐसा नहीं था कि युवकों को ही होली की मस्ती चढ़ती थी. सयाने इसमें चार हाथ आगे रहते. बस, वे दिनों का लिहाज करते थे. द्वादशी-त्रयोदशी से बूढ़े जवान होने लगते और चतुर्दशी-पूर्णिमा को उनकी जवानी और उन्मुक्तता सीमाएं तोड़ने लगती थी. फिर वे कोई लिहाज नहीं करते थे. युवकों-बच्चों के ही सामने वे इशारे कर-कर के, डोल-डोल कर के गाने लगते- अरे, हां रे, गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे, चल कहो तो यहीं रम जाएं, गोरी…’ और तेरे नैन रसीले यार बालम, प्रीत लगा ले नैनन की…’ और अरे, हां रे, जिठानी तुम्हरो देवर हमसे ना बोले…’ और बाजूबंद भुली ऐ छै पलंगै में…’ और चल उड़ि जा भंवर तोको मारूंगी…’ और तू तो करि ले अपनो ब्याह देवर, हमरो भरोसो झन करियो…’ और अरे हां, रे गोरी, चादर दाग कहां लागो…’ और भी जाने कितनी होलियां जिनमें गोरी की स्यूनी-डंडिया से लेकर अंगुली-बिछिया तक हर अंग और उसके वस्त्र व जेवर-विशेष का वर्णन पूरी उन्मुक्तता या कहिए कि उछृंखलता के साथ होता था. कुछ होलियों में तो स्त्री-पुरुष के अंतरंग शारीरिक सबंधों का आंखों देखा हाल तक होता – ‘जब रसिया पलंगा पर आए, चणकत है दुश्मन खटिया, शहर सितो जागो रसिया..भरी महफिल में इन्हें गाने में युवक भले संकोच कर जाते या मुंह छुपा कर हंसते मगर बुजुर्ग न केवल रस ले-ले कर गाते बल्कि स्वर को सप्तम तक पहुंचा कर अश्लील इशारे करने में भी संकोच न करते.
होलियों की विलम्बित तालों की एकरसता से ऊब कर बीच-बीच में कुछ गायक बंजारेलगाते जिनकी लय-ताल अपेक्षाकृत द्रुत व चपल होती – ‘गई-गई रे असुर तेरी नारि मंदोदरि, सिया मिलन गई बागै मेंऔर अरे, कह दीजो रघुनाथ भरत से कह दीजो…’ इन बंजारों में नृत्य की लय भी होती और कुछ लोग खड़े होकर हाव-भाव के साथ झूमते हुए भी गाते.
इन महफिलों में कुछ होल्यार होली लगाने वालेहोते यानि वे लीडगायक होते, कुछ उसे उठाने वालेहोते यानी वे उसी लय-ताल पर होली के बोल लौटाते. ये सुर-ताल के अच्छे जानकार होते, बाकी भाग लगाते, गाने वालों की दो टोलियां बन जाती, होली लगाने वाले की एक टोली और लौटानेवाले की दूसरी टोली. ढोलक बजाने वाले की खास जगह होती, वह अक्सर बीच में बैठता, महफिल बड़ी हो जाने पर दो ढोलकिए भी होते. मंजीरे और लोटे तो कई बजते.
 मुझे कैनाल कॉलोनी की उन होलियों के एक ढोलक वादक की बहुत अच्छी याद है. उनका नाम नरोत्तम था, नरोत्तम बहुगुणा. वे होली गाते नहीं थे, सिर्फ ढोलक बजाते थे. ऐसी ढोलक कि होल्यारों को मजा आ जाता. नरोत्तम जी की ढोलक होली जमा देती थी. वे आंख बंद करके बहुत आनंद से बजाते. अक्सर ढोलक के ऊपर दोहरे हो जाते. ऐसा लगता जैसे सो रहे हों. सिर्फ उनके हाथ हरकत करते और बिल्कुल झुकी गरदन ताल के साथ हिलती जाती.
छलड़ी के दिन होल्यारों की टोली रंग खेलते और गाते-बजाते कैनाल कॉलोनी से डायमण्ड डेरी, हैवलक रोड, घोड़ा अस्पताल और कभी-कभी दारुल शफा तक जाती. हर घर के सामने होली गाते और आशिष देते- गाऊं-खेलूं-देऊँ अशीष, हो-हो होलक रे. इनरा नानातिना, नाती-पोथा जी रूं लाक्षे बरी (लाख सौ बरीस) हो-हो-होलक रे…’ इनमें किसी के लड़के-लड़की का ब्याह होने, किसी के घर संतान हो जाने जैसी आशिषें भी शामिल होतीं रिश्तों के हिसाब से मजाकिया आशिष भी दी जाती. उस शाम को कुछ ही होल्यार मिलते और गाते – ‘होली खेली-खाली मथुरा को चले, आज कन्हैया रंग भरे…’ और इस तरह होली का समापन हो जाता.
 उसके बाद की शामें हमारे लिए सन्नाटा भरी और उदास होतीं.
ये स्मृतियां 1965 से 1980 के दौर की हैं. बाद में ये बैठकें बिखर गईं. पुरानी पीढ़ी रिटायर होकर पहाड़ लौट जाती रही और नई पीढ़ी का मिजाज बदलता रहा. प्रवास का स्वरूप बदला और जीवन शैली भी. लखनऊ में बसा कुमाऊं का लोकधीरे-धीरे लोप हो गया. जाहिर है होली भी वैसी नहीं रह गई. हमारे लखनऊ में अब लोक-होली की बैठकें दुर्लभ ही हैं.
बैठी होली :
सन 1975 के बाद मेरा सामना लखनऊ की दूसरी तरह की बैठीहोली से हुआ जो तबला-हामोनियम-मंजीरे या उलटे लोटे पर सिक्कों की संगत में गाई जाती हैं. कुमाऊंनी होलियों के आम तौर पर दो प्रकार बताए जाते हैं- खड़ी होली और बैठीहोली. खड़ी होली वास्तव में लोक-होली है जो खड़े होकर, गोल घेरे में नाचते हुए गाई जाती हैं और बैठ कर भी.बैठीहोली शास्त्रीय होली है. शास्त्रीय राग-रागिनियों में बंधी हुई और नागर समाज में में ज्यादा प्रचलित है. खड़ी होली में बेसुरे-बेताले भी जोर-शोर से भाग लगा ले जाते हैं लेकिन बैठी होली के लिए राग-ताल का ज्ञान और गायन-निपुण होना जरूरी है.
लखनऊ के पहाड़ियों के भद्र लोकसे परिचय होने के बाद मैंने ये बैठी होलियां भी खूब देखी-सुनीं. वसन्त पंचमी और शिवरात्रि के आस-पास से ये बैठकें भी बढ़ जाती हैं. चार-छह अच्छे गायकों की अपनी टोलियां होती हैं जिन्हें होली गवाने के शौकीन अपने घर बुलाते हैं. एक-एक रात की बाकायदा बुकिंग होती है, एकादशी से छलड़ी के बीच ये गायक एक रात में दो-दो तीन-तीन घरों में भी निमंत्रित होते हैं. चार-छह लोग भी तबला-हारमोनियम लेकर बैठ जाते हैं और गायन शुरू हो जाता है. आम तौर पर गायकों से ज्यादा श्रोता होते हैं,
खड़ी यानी लोक होलियों की बैठकें जहां अब दुर्लभ हैं वहीं इन बैठी यानी शास्त्रीय होलियों का सिलसिला बना हुआ है. लखनऊ के विभिन्न मुहल्लों में ऐसी बैठकें खूब होती हैं. अच्छी बात यह कि नई पीढ़ी ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया है, गिरिजा शंकर पंत लखनऊ के नामी होली गायक थे. चतुरानंद जोशी, चंद्र शेखर पंत, गिरीश शाह, बचीराम जोशी, कैलाश जोशी, ललित मोहन जोशी और जगदीश चंद्र जोशी लखनऊ के अच्छे होली गायकों में गिने जाते थे. गिरिजा जी के पुत्र नीरज पंत नई पीढ़ी के उतने ही अच्छे गायक हैं. उनके साथ श्रीधर बिष्ट, चंद्र शेखर, नवीन त्रिपाठी, मनोज जोशी, आदि की अच्छी टोली है.
इन होलियों को सुनने का अलग आनंद है. हाल के वर्षों में मैंने इस युवा टोली से बहुत सुंदर होली गायन सुना है जो आश्वस्त करता है कि लखनऊ में कुमाऊंनी होली के शास्त्रीय स्वरूप की परम्परा ठीक-ठाक बनी हुई है. नीरज हारमोनियम सम्भालते हुए जब गाते हैं- बरसत रंग फुहार, सखी बरसाने चलो, कांधे अबीर-गुलाल की झोली, कर कंचन पिचकारी. ग्वाल-बाल सब श्याम संग, राधे अंगना के पार, कर सोलह श्रृंगार, सखी बरसाने चलो..और चटक-मटक रसवंती डगर चली, भरी भीड़ दई मोरी बैंया झटक…’ या श्रीधर जब डूब कर सुनाते हैं – ‘कैसी धूम मचाई बिरज में, आज ग्वालन के संग, तेरो री ललन घनश्याम…’ तो कमरे में अद्भुत वातावरण बन जाता है जिसमें संगीत तो होता ही है, होली का पूरा राग-रंग भी सब पर तारी हो जाता है. गुमानी की प्रख्यात होली मोहन मन ल्हीनो, मुरली नगीना सों…’ भी यहां खूब चाव से गाई-सुनी जाती है. अल्मोड़ा वाले तारी मास्टर (तारा दत्त पाण्डे) की होलियों के कैसेट यहां कई घरों में सुरक्षित हैं और सुने जाते हैं. सोशल मीडिया के इस जमाने में लखनऊ के विभिन्न परिवारों की होली बैठकों के वीडियो आप यू-ट्यूब पर देख सकते हैं.
बैठी होली की शास्त्रीयता में छेड़खानी, चुटकियां और श्रृंगार के अतिरेक कम नहीं होते. बचीराम जी को, जिन्हें सब बचदा कहते थे, मैंने कई बार अपने दंत विहीन मुंख से गाते सुना है – ‘खेलत गेंद गिरी जमुना में…, तैं मेरी गेंद चुराईअंगिया बीच देखो कन्हाई, एक गई दो-दो पाई…’ तब सारे होल्यार ऐसे आनंदित और रस-सिक्त होते जैसे कि जयदेव का गीत-गोविंदसामने ही मंचित हो रहा हो. तब तबले और हारमोनियम को अपनी खैर मनानी पड़ती. वह होल्यार ही क्या जो बचदा जैसा रसिक न हो! अब यह होल्यार-होल्यार पर निर्भर है कि वह राह रोकने’, ‘बैंया मरोड़नेऔर अंगिया भिगोनेतक सीमित रहता है या इससे ज्यादा स्वच्छंदता लेता है!
बैठी होली की ये बैठकें जम जाएं तो भोर तक चलती हैं और राग भैरवी के साथ इनका समापन होता है. कुमाऊं परिषद की लोकप्रिय रामलीला में हारमोनियम के उस्ताद प्रकाश चंद्र तिवारी उर्फ प्रभु चच्चा अपने भारी गले से क्या खूब भैरवी सुनाते थे. गिरिजा शंकर पंत के जमाने में भैरवी पर भैरवी का दौर चलता था, भले ही आंगन में धूप आ जाए!
बैठी होली की एक खासियत उसकी ताल-मात्राएं भी हैं. लखनऊ के कई अच्छे तबला वादक इन होली बैठकों में समपर गच्चा खा जाते रहे, अच्छी-खासी ताल पर चल रहा गायक अचानक दो अतिरिक्त मात्राओं की गलियों में कहां भटक कर सम पर लौटा, वह समझ ही नहीं पाता. चौदह की बजाय सोलह मात्राओं की यह ताल कुमाऊंनी शास्त्रीय होलियों में कहां से आ गई, यह संगीत के विद्वान ही बता सकते हैं लेकिन लखनवी कुमाऊनियों ने यह विशेषता बचा रखी है.
महिला होली :
लखनऊ का शायद ही कोई मुहल्ला या कॉलोनी होगी जहां ड्राइंग रूम के सोफे-साफे किनारे खिसका कर भरी दोपहर कुमाऊंनी महिलाओं की होली बैठक न जमती हो. ढोल-मंजीरे की धमक-झमक के साथ परवान चढ़ती गायकी के बीच कॉमिकल इण्टरवलकी तरह स्वांग यानी ठेठर भी चल रहे हैं. प्रौढ़ा हेमा दी भरी महफिल में अपने ही जेठ की नकल उतार रही हैं कि रात देर से घर लौटने पर नाराज जेठानी को कमरे के एकांत में वे कैसे मनाते हैं. महफिल में जेठानी भी मौजूद हैं जो शर्म से लाल और हंसी से गोल हुई जा रही हैं.
-‘कैसे-कैसे, हेमा दी? फिर से बताना तो!गदगद हो कर अनुनय करती हैं युवतियां. लाड़ से गरियाती हैं बूढ़ियां- इस हेमा को तो जरा भी शर्म नहीं, रे!
हर होली में नए-नए स्वांग रच लाती हैं औरतें, स्वांग करने, गाने-बजाने में पारंगत महिलाओं की इन बैठकों में बड़ी मांग रहती है. पुरुष काम पर गए होते हैं, इसीलिए दिन के एकांत में खूब जमती हैं कुमाऊंनी महिलाओं की होली. गोमती पार के इलाके हों या हुसेनगंज-सुंदरबाग के पुराने मकान या राजाजीपुरम-आलमबाग और जानकीपुरम-विकास नगर की कॉलोनियां, महिलाओं ने अपनी होली बैठकों की रौनक कतई कम नहीं होने दी है. वहां लोक सांस्कृतिक रंग पूरी मस्ती में होता है. एकादशी से छरड़ी तक तो होली की धूम-धमाल मची रहती है. होली गाई जाती है, होली नाची जाती है और होली एक्टकी जाती है. महिलाओं पर घर गृहस्थी से लेकर सामाजिक परम्पराओं तक के निर्वाह का जो भारी जिम्मा रहता है, उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप होली जैसे अन्तरंग पर्वों पर उनकी स्वतंत्रता अपने शिखर पर होती है. होल्यार महिला कामकाजी हो तो छुट्टी लेने में कोई गुरेज नहीं होता.
पुरुषों की बैठकों की तरह यहां भी शुरुआती होलियों का स्वरूप भक्तिभाव वाला होता है जिनमें वन को जाते राम-सीता-लखन को देख कर महिलाएं व्यथित होती हैं- वन को चले दोनों भाई, इन्हें समझाओ री माईया भभूत रमाए जोगी शिव अथवा गणेश की वंदना होती है, धीरे-धीरे होलियों पर श्रृंगार रस चढ़ने लगता है. बागों में
फूल ही नहीं खिलते, मन में भी मंजरियां फूलने लगती हैं. पर्वतीय महिलाओं की बहुत पसंदीदा होली है- आयो नवल वसंत सखी ऋतुराज कहाए, चम्पा जो फूली टेसू जो फूले, फूल ही फूल सुहाए, कामिनी के मन मंजरि फूली, वा बिच श्याम सुहाए....
और, जब मौसम की तपन व वसंत के उन्माद के साथ कामिनियों के मन में मंजरियां फूलने लगती हैं तो भीतर का राग-रंग मचल-मचल कर बाहर फूटने लगता है. ढोलक पर उंगुलियों की थाप तेज हो जाती है, मंजीरे के बोलों में चूड़ियों की खनक भी घुलने लगती है. हाथों की तालियों के साथ अंगुलियों व आंखों के इशारे भी महफिल के इस-उस कोने तक उड़ने लगते हैं- ऐसो अनाड़ी चुनर गयो फाड़ी हंसि-हंसि दे गयो गारी, मोहन गिरधारी…’
गिरधारी का नाम तो बहाना है, महफिल में ही अपने-अपने राधा-गिरधारी बन जाते हैं- तुम हो ब्रज की सुन्दर गोरी, मैं मथुरा को मतवारो, गोरी प्यारो लगो तेरो झनकारो…’ और फिर ऐसे में रंग डालने में क्या लिहाज! मलत-मलत नैना लाल, सुनो जी नंद लाल, किनने डारो नयन में गुलाल. सास को पूत, ननद जी को भैया, दय्या मो पे उनने ही डालो गुलाल.या- कामिनियां भर-भर मारत रंग, अपने-अपने महल से उतरी, अपने पिया के संग…’
धीरे-धीरे कामिनियों की महफिल पूरे रंग में आ जाती है. आंखों के इशारे हाथों की शैतानियों तक पहुंच जाते हैं और रूप-लावण्य की बोलियां शारीरिक रस-कथाओं का रूप लेने लगती हैं- या बृजदेश निगोड़ा, तकत मोरी चोली का डोरा, मो सो कहत चलो री कुंजन में, तनक-तनक सा छोरा.
यहां तक आते-आते बैठक में भाभी-ननद और प्रौढ़ाओं के अलग-अलग कोने बन जाते हैं जहां होली के बोलों का रस अलग-अलग ढंग से लिया-बहाया जाता है- उठता जोबन थमता नाहीं, खबर मंगा दो बालम की..या- इस व्यौपारी को नींद बहुत है, सेज सजा दे नथ वाली, झुकि आयो शहर में व्यौपारी…’ इसी मस्ती में स्वांग करने वाली महिलाएं नई उन्मुक्तता लेकर आती हैं जहां, अभिनय, कल्पना, रचना और शैतानियों का पिटारा बूढ़ियों-किशोरियों को समान रूप से जवान बना देता है.
मूलत: होलियां बृज की हैं मगर पर्वतीय सामाजिक स्थितियों और संस्कृति ने न केवल उनका रूपान्तरण किया है, बल्कि नई रचनाएं भी की हैं. नौकरी के लिए पुरुषों के सामूहिक पलायन ने पहाड़ी होलियों में बिरह, रोमांस और पीड़ा का अजब कौतुक व संयोग भर दिया है- सजना घर आवै फागुन मेंया जिनके पिया परदेस बसत हैं, उनकी नारी सोच भरे.होली में अकेली औरत के झमेले भी कम नहीं. देवर की आंखों के इशारे समझ वह ताना मारती है- तू तो कर ले अपनो ब्याह देवर, हमरो भरोसो झन करियो.
प्रवास में यानी लखनऊ के अपेक्षाकृत स्थायित्व भरे जीवन में पहाड़ की जैसी स्थितियां नहीं हैं लेकिन वह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत लखनऊ की महफिलों में खूब झलकती है. सिर्फ होली का आनन्द ही नहीं, मस्ती और धमाल ही नहीं, बैठक बिना आशीर्वाद के पूरी नहीं होती. आशिषने के लिए छलड़ी के दिन का इंतजार सम्भव नहीं. इसलिए जिस दिन जिसके घर होली गाई उसी दिन आशिष भी गा दिए कि बरस-बरस होली, बरस-बरस फाग खेलो. जीते रहो और रंग भरो. इस घर का मुखिया जीवे, बाल वृन्द बढ़ें, पांचों देव दाहिने रहें और वसंत इस घर की देहरी पर उतरता रहे.
लखनऊ की पहाड़ी महिलाओं में होलियों के प्रति इतना ज्यादा उत्साह है कि उनकी बाकायदा मंडलियां तैयार हो गईं हैं. ललिता पंत का कुमाऊंनी होलियों का संकलन कई महिलाओं के हाथ में दिखाई देता है. कई शौकीन महिलाओं ने हल्द्वानी व अल्मोड़ा से होली पुस्तकें मंगवा रखी हैं और कई ने अपनी निजी डायरी में होली गीतों का संकलन कर रखा है.
इन महफिलों का खान-पान भी चर्चा का विषय रहता है. किसी के आलू के गुटुक और भांगे की चटनी चर्चित है तो कोई लखनवी चाट का ठेला लगवा लेती हैं. गुझिया तो ठैरी ही, अपने हाथ की बनाई भी और बाजार से ब्राण्डेड वाली भी! कोई दीवाली का पकवान सिंगलहोली में खिलाने के लिए जानी जाती है. कहीं बैठक देर शाम तक चलती है तो खाने के लिए पुरुष भी आमंत्रित होते हैं, बहरहाल, खाना-पीना चाहे जितना शानो-शौकत वाला हो, उससे होली के आनंद का मूल्यांकन नहीं होता. बैठक तो वही अव्वल, जहां होली जमजाए!
तो, यह वसंत, यह होली, यह बैठकें, यह उन्मुक्तता जी रौ लाख सौ बरीस!


Sunday, March 10, 2019

देश तो सेना के सुरक्षित हाथों में है, मोदी ने अपनी जिम्मेदारियाँ कैसे निभाईं?



नवीन जोशी

स्वराज अभियानके जुझारू नेता योगेंद्र यादव ने शनिवार को भाजपा के एक पोस्टर की फोटो ट्वीट की थी. पोस्टर में मोदी हैं तो मुमकिन हैनारे के साथ नरेंद्र मोदी, अमित शाह और कुछ अन्य भाजपा नेताओं के साथ वायु सेना के विंग कमाण्डर अभिनन्दन वर्धमान की बड़ी सी फोटो लगी है. ट्वीट में योगेंद्र यादव चुनाव आयोग से पूछते हैं- क्या इसकी अनुमति दी जा सकती है? राजनैतिक पोस्टरों में एक सेवारत सैनिक की तस्वीर? यदि नहीं, तो क्या आप इसके खिलाफ कार्रवाई करेंगे?’

अभिनंदन वर्धमान वही जाँबाज वायु सैनिक हैं जिन्होंने पिछले दिनों बालाकोट हमले के बाद पाकिस्तानी जवाबी कार्रवाई में उसके एफ-16 विमान को गिराया था. उस हमले में खुद उनका मिग विमान ध्वस्त हुआ और उन्हें पाकिस्तानी सीमा में उतरना पड़ा. शुरुआती तनातनी के बाद पाकिस्तान ने सदिच्छा और वार्ता की पहल दिखाते हुए उन्हें भारत को सौंप दिया था.

योगेंद्र यादव के ट्वीट के क्रम में कई और पोस्टर सामने आने जिनमें भाजपा ने सैनिकों, सैन्य प्रतीकों और बालाकोट के आतंकवादी ठिकानों पर वायु सैनिक हमले का श्रेय लूटने का पूरा प्रयास किया है. दिव्य मराठीअखबार का एक पूरे पेज का विज्ञापन है जिसमें नरेंद्र मोदी के वृहदाकार चित्र के ऊपर दो युद्धक विमान उड़ान भर रहे हैं. साथ में अटल बिहारी बाजपेयी समेत कई भाजपा नेताओं की छोटी तस्वीरों के साथ मोदी जी गरज रहे हैं- सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा.

एक और फोटो भाजपा के जुलूस के आगे चल रहे एक रथ के सामने के पोस्टर का है. नरेंद्र मोदी की फोटो के नीचे युद्ध के लिए कूच करती हमारी सेना की टुकड़ी की तस्वीर है. लिखा है- सौगंध मुझे इस मिट्टी की...” पोस्टर पर ताण्डव करते भगवान शिव भी विराजमान हैं. एक और पोस्टर में संगीन लगी बंदूक ताने (सम्भवत: ) एक आतंकवादी की छाया है और ललकारते हुए मोदी जी कह रहे हैं- “हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी, बस जगह तुम्हारी होगी.

योगेंद्र यादव ने बहुत उचित और प्रासंगिक सवाल उठाया. अगले दिन राजदीप सरदेसाई ने अपने एक ट्वीट में ऐसे ही एक पोस्टर के साथ चार, दिसम्बर 2013 को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा सभी राजनैतिक दलों को जारी एक नोटिस की प्रत्ति नत्थी की. इसमें  कहा गया है कि” (तत्कालीन) रक्षा मंत्री ने आयोग का ध्यान दिलाया है कि कुछ राजनैतिक दल, नेता और उनके प्रत्याशी अपनी चुनाव प्रचार सामग्री में सैन्य बलों की तस्वीरों का उपयोग कर रहे हैं. उन्होंने आयोग से इस पर उचित निर्देश जारी करने की अपेक्षा की है.”

निर्वाचन आयोग आगे लिखता है कि “सशस्त्र सेनाएँ हमारी सीमाओं, देश की सुरक्षा और राजनैतिक प्रणाली की संरक्षक हैं. लोकतंत्र में वे सर्वथा गैर-राजनैतिक एवं निष्पक्ष रहती हैं. इसलिए यह आवश्यक है कि राजनैतिक दल अपने चुनाव अभियानों में सेनाओं का उल्लेख करने में अत्यंत सावधानी बरतें. आयोग की राय है कि राजनैतिक दल अपने चुनाव अभियान, विज्ञापनों और भाषणों या अन्य किसी सामग्री में सेना प्रमुख या फौजों या सैन्य कार्यक्रमों की तस्वीरों का  उपयोग नहीं करें.’’

इस पुराने नोटिस को फिर से जारी करने का अर्थ सीधा-सीधा यही है कि कुनाव आयोग राजनैतिक दलों को निर्देश दे रहा है कि वे चुनाव अभियान में सेना का इस्तेमाल नहीं करें. 

क्या नरेंद्र मोदी और भाजपा सुन रहे हैं. वे हाल के सैन्य अभियानों का जिस तरह अपने चुनाव प्रचार में इस्तेमाल कर रहे हैं वह अनैतिक, अमर्यादित और चुनाव अयोगों के निर्देशों के विपरीत है. यह सुरक्षा बलों का अनर्थकारी राजनैतिक इस्तेमाल है. खेद का विषय है कि इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे बड़े गुहगार हैं अब वे अपनी प्रत्येक चुनावी  सभा में बालाकोट हमले, अभिनंदन की वापसी और सेनाओं के शौर्य को अपनी हिम्मत बताकर पेश कर रहे हैं.  

भाजपा 2019 के आम चुनाव के लिए हमारी सेनाओं के शौर्य, बालाकोट पर सर्जिकल स्ट्राइक, विंग कमाण्डर अभिनंदन की सकुशल वापसी और आतंकवादियों एवं पाकिस्तान को सबक सिखाने की गर्जना को ही मुख मुद्दे बना रही है. मोदी है तो मुमकिन हैइसी लिए कहा जा रहा है. अभी और भी ऐसे नारे, पोस्टर, गीत, तथा अन्य प्रतीक सामने आएंगे. भाजपा लोकतांत्रिक चुनाव नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद, देशभक्ति, और फौज के राजनैतिक इस्तेमाल से राजनैतिक युद्ध जीतने की तैयारी में है.

यह उसी दिन निश्चित हो गया था जब पुलवामा में सीआरपीएफ की बटालियन पर हमला हुआ और चालीस जवान शहीद हुए. देश भर में गम और गुस्सा भड़काना लाजिमी था.  हमारी सेना बहुत समय से कश्मीर और अन्यत्र भी पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों से सतत युद्ध लड़ रही है. हर हफ्ते हमारे जवान शहीद होते हैं. पुलवामा का हमला सैनिकों पर सबसे बड़ा घातक हमला था. चुनाव का समय न होता तो तिरंगे में लिपटे शहीदों के शवों को ससम्मान विदा करने के बाद कई दिन तक शहर-शहर-गली-गली पाकिस्तान के खिलाफ जहर उगलते और युद्धोन्माद फैलाते छोटे-छोटे जुलूस नहीं निकल रहे होते. ऐसे जुलूस तब तक निकलते रहे और टीवी चैनल भी गरजते रहे जब तक कि भारतीय वायु सेना ने बालाकोट के आतंकवादी ठिकाने पर हमला नहीं कर दिया. उसके बाद विजय जुलूस निकाले गये. क्या यह कहने की जरूरत है कि युद्धोन्माद और बदले की कार्रवाई के लिए सायास राजनैतिक वातावरण बनाया गया था?

सायास नहीं होता तो हमारे बड़बोले प्रधानमंत्री 26 फरवरी की तड़के बालाकोट पर हमले के दिन ही चुरू की अपनी सभा में “सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की/मैं देश नहीं मिटने दूंगा/ मैं देश नहीं झुकने दूंगाकी गर्जना बार-बार नहीं करते. सेनाओं के लिए देश के आम जन में जो सम्मान भाव है, उसका भावुक राजनैतिक इस्तेमाल उसके बाद से वे और उनके सभी नेता हर रोज कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि वायु सेना ने बालाकोट आतंकी शिविर पर हमला देश के लिए नहीं, मोदी और भाजपा के लिए किया है. गोया देश सेना के नहीं, मोदी के सुरक्षित हाथों में है.

यही नहीं, मोदी समेत भाजपा के बड़े नेता यह भी बार-बार दोहरा रहे हैं कि यूपीए के शासन में जब भी बड़े आतंकी हमले हुए, तब हमारी सेनाएँ जवाबी हमला करना चाहती थीं लेकिन मनमोहन सरकार ने उन्हें अनुमति ही नहीं थी. वे सन 2016 में उरी पर हुए आतंकवादी हमले के बाद की गई सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हमले को देश और सेना की नहीं, भाजपा और मोदी की बहादुरी के रूप में पेश कर रहे हैं. गृह मंत्री राजनाथ सिंह तो कह रहे हैं कि दो नहीं, तीन सर्जिकल स्ट्राइक की गई हैं लेकिन तीसरी के बारे बताऊंगा नहीं.        

यह भी गौर करना जरूरी है कि पुलवामा आतंकी हमले और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक से पहले मोदी और उनकी पार्टी कई नकारात्मक्ताओं से घिरी हुई थी. तीन राज्यों में भाजपा सत्ता खो चुकी थी. यूपी जैसे बड़े राज्य में सपा-बसपा का गठबंधन उनके लिए कठिन चुनौती बना. किसानों की नाराजगी भारी पड़ रही थी. भाजपा के भीतर दलित नेताओं का गुस्सा फूट रहा था. गठबंधन के साथी बड़ा दवाब बना रहे थे और कुछ साथ छोड़ चुके थे. विपक्ष एकजुट होने की कोशिशों में लगा था. 2014 के बड़े-बड़े वादों का हिसाब भी कई कोनों से मांगा जा रहा था. बेरोजगारी बढ़ने के आंकड़े डरावने हो रहे थे. राहुल गांधी ने राफेल विमान सौदे की गड़बड़ियों की तोप सीधे मोदी की तरफ तानी हुई थी.

यह विपरीत माहौल आम चुनाव में मोदी की बड़ी चुनौती बनने जा रहा था. फिलहाल हमारी सेना की बहादुरी और देश प्रेम का जज्बा उनके बचाव को आ गया है. तत्काल वे लाभ में दिखाई देते हैं लेकिन यह कवच कितने दिन उनकी आड़ बना रहेगा कहना मुश्किल है. यह अवश्य है कि वे इसी के पीछे छिप कर चुनावी युद्ध लड़ने की पूरी कोशिश करेंगे.

नरेंद्र मोदी अपने हाथ लगे तुरुप का बहुत शातिराना इस्तेमाल कर रहे हैं. विपक्ष का कौशल इसमें है कि वह कितनी जल्दी और किन मुद्दों से उन्हें लड़ाई के खुले मैदान में खींच लाते हैं. विपक्ष और सिविल सोसायटी का दायित्व है कि वे जनता को बताएँ कि देश मोदी के नहीं, सेना के हाथों में सुरक्षित है. नरेंद्र मोदी को तो जनता ने कुछ और ही जिम्मेदारियाँ दी थीं. उसे उन्होंने कितना निभाया?     


Saturday, March 09, 2019

मीडिया ने विश्वनीयता गँवा कर लोकतंत्र पर वार किया है.



भारतीय मीडिया की मुख्य धारा के बड़े वर्ग ने पिछले पाँच साल में अपनी विश्वसनीयता बहुत ज्यादा गँवाई है. हमारे मीडिया का मूल चरित्र वैसे तो कम-ज्यादा सत्तामुखी पहले से रहा है. इसके बावजूद सरकारों और प्रभावशाली नेताओं को कटघरे में खड़े करने की जरूरी जिम्मेदारी भी खूब निभाई जाती रही. कभी किसी घराने ने कुछ मुद्दे दबाने या विमर्श बदलने की कोशिश की भी तो दूसरे घरानों के मीडिया या फिर छोटे-छोटे जुझारू पत्रों ने पत्रकारिता का  झण्डा बुलंद रखा.

दूर न जाएँ तो यूपीए के शासन में, विशेषकर उसके दूसरे दौर में मीडिया ने बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार के मामले खूब उछाले. मंत्रियों के इस्तीफे हुए और जांच बैठीं. मीडिया के शोधों और तथ्यपरक रिपोर्टों का ही नतीजा था कि मामले अदालतों तक पहुँचे. सरकार के खिलाफ सख्त फैसले भी आये. सन्‍ 2014 में अगर नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार यूपीए शासन के घोटालों  पर मुख्य रूप से केंद्रित था, तो उसमें मीडिया की बड़ी भूमिका थी.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में भाजपा की बड़ी जीत के बाद मीडिया बदलने लगी. मोदी की टीम ने जिस तरह सघन चुनाव प्रचार किया, जो खूबसूरत सपने दिखाये और देश तथा सरकार की कार्यसंस्कृति में बड़े बदलाव की जो उम्मीद जगाई उसने भाजपा के पक्ष में लहर पैदा कर दी. जनता ने उन्हें भारी बहुमत दिया. स्वाभाविक था कि मीडिया उन्हें अपने वादे पूरे करने के लिए, बदलाव लाने के लिए कुछ समय देता. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और मीडिया को अपना प्रमुख दायित्व निभाने का अवसर आया हमने पाया कि उसकी भूमिका बदली हुई है.

मीडिया में यह परिवर्तन दो तरह का है. पहला, भाजपा और आरएसएस की हिंदुत्व और राष्ट्रवादी लहर में उसका भी बहते जाना. भाजपा के बहुमत से सत्तारूढ़ होते ही सवर्ण प्रधान हमारे मीडिया ने भीतर से पहना हुआ भगवा चोला खुलेआम ऊपर से धारण कर लिया. कुछ अपनी मूल-प्रकृति से सवर्ण-हिंदू हैं जिनके संस्कार भाजपा के उभार के साथ उनके कर्म में खिल आये. सत्ता-मुखापेक्षियों को स्वभावत: इस लहर ने अपने रंग में रंग लिया. हमारा मीडिया अपनी भूमिका में इतना कट्टर हिंदू पहले नहीं था. 1990 में भाजपा के राम मंदिर अभियान से 1992 के बाबरी मस्जिद ध्वंस तक के दौर भी मीडिया के एक हिस्से की हिंदू-कट्टरता देखने को मिली थी.

दूसरी तरह का परिवर्तन पत्रकारिता के मूल्यों के क्षरण का है. जिस मीडिया का मूल कर्तव्य जनता और विपक्ष की आवाज बनना है, वह क्रमश: सत्ता की भाषा बोलने लगा. मीडिया कर्मियों की पहली दीक्षा में यह घुट्टी की तरह पिलाया जाता था कि सत्ता-प्रतिष्ठान के पास अपने प्रचार के लिए विपुल साधन होते हैं. वह जब चाहे, जैसे चाहे अपनी बात मीडिया में प्रचारित करवाने में पूर्ण सक्षम होता है. इसलिए मीडिया को सबसे पहले जनता और प्रतिपक्ष की आवाज बनना चाहिए.  पत्रकार का पहला दायित्व प्रतिपक्ष होना है. यही उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता का आधार है.

मोदी के सत्ता सम्भालने के बाद मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा यह दायित्व भूलता गया. मोदी को उनके बड़े-बड़े वादे याद दिलाना, नोटबंदी की भयानक मार, गोरक्षा के बहाने मुसलमानों पर जहाँ-तहाँ हो रहे हमले, धर्मनिरपेक्ष ताकतों का दमन, सिविल सोसायटी और संघर्षरत संगठनों पर पाबंदियाँ, तरह-तरह के उग्र हिंदू संगठनों की उद्दण्डता, संवैधानिक संस्थाओं का चरित्र बदलने के लिए संघी घुसपैठ, विश्वविद्यालयों, विज्ञान तथा इतिहास संस्थानों की स्वायत्तता पर हमले, अल्पसंखय्कों में भय का वातावरण, येन-केन-प्रकारेण हर चुनाव जीतने की अलोकतांत्रिक तिकड़में, बढ़ती महंगाई, घटते रोजगार, आर्थिक मोर्चे पर कुछ बड़ी असफलताएँ, किसानों से वादाखिलाफी, जैसे कितने ही मुद्दे हैं जिन पर मीडिया को मोदी सरकार को कटघरे खड़ा करना चाहिए था.

सवाल पूछने और शोध करके तथ्य जनता के सामने रखने की बजाय मीडिया का बड़ा हिसा इन मुद्दों को भुलाता या सत्ता पक्ष के कोण से प्रस्तुत करता रहा. किसी पत्रकार ने ये जरूरी मुद्दे उठाने की कोशिश की भी तो उसे प्रताड़ित किया गया. मीडिया घरानों पर दवाब बनवा कर ऐसे पत्रकारों को निकलवा दिया गया. उदाहरण के लिए ईपीडब्ल्यू के तत्कालीन सम्पादक परंजय गुहा ठाकुर्ता, पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार शर्मा के प्रकरण और एडीटीवी मालिकों के यहाँ छापों का उल्लेख किया जा सकता है. अमित शाह के बेटे जय शाह की सम्पत्ति मोदी राज के एक  साल में हजारों गुणा बढ़ जाने की खबर रातोंरात दबा दी गयी. द वायरजैसी साइट ने इस खबर को नहीं हटाया तो उसे डराने के लिए एक अरब रु का मानहानि मामला दायर कर दिया गया. जो नहीं डरे उनकी वजह से आज भारतीय मीडिया की साख बची हुई है लेकिन बाकी ने इसे रसातल को पहुँचाने में कोई कसर अब भी नहीं छोड़ी है.

मीडिया का यह वर्ग सिर्फ भाजपा और मोदी का भौंपू ही नहीं बना रहा उसने भाजपा-संघ की प्रचार मशीनरी के वशीभूत होकर विपक्ष को दबाने और उसे जनता की नजरों में गिराने का अभियान भी चलाया. देश की हर समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू और उनका परिवार दोषी ठहराया जाने लगा. जब राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को सीधे ललकारने लगे तो उन्हें पप्पूसाबित करने में मीडिया के इस धड़े ने बड़ी रुचि दिखाई. गोदी मीडियाविशेषण ऐसे ही नहीं जन्मा.

हाल में पुलवामा में आतंकवादी हमले के बाद तो मीडिया के इस वर्ग ने अति ही कर दी. ऐसा युद्धोन्माद फैलाया जैसे कि सारा देश पाकिस्तान से आर-पार की जंग चाहता है. बालाकोट पर सेना के हमले की ऐसी-ऐसी कवरेज की कि दर्शक भी उकता गये.

सोशल मीडिया पर मीडिया के इस रवैए की निंदा के साथ ही उसके बहिष्कार की अपीलें पहली बार  दिखाई दीं. ऐसी एक टिप्पणी थी- “सबको पता था कि अभिनंदन भाई शाम को बॉर्डर पर पहुँचेंगे. मीडिया सुबह से वहीं खड़ा है. गर चंद मिनटों के लिए आज शहीद सिद्धार्थ वशिष्ठ और विक्रम सहरावत के अंतिम संस्कार को भी दिखा देते तो उन वीर परिवारों का भी सम्मान बढ़ जाता.”

मशहूर टीवी एंकर रवीश कुमार ने अपील की कि इस देश में लोकतंत्र को बचाना है तो अगले दो-ढाई महीने टीवी न्यूज चैनल देखना बंद कर दीजिए.... इन्होंने हमारे देश को बरबाद करने का ठेका लिया हुआ है... ये सबसे बड़े नेता के पैर की जूती बन गये हैं...”

अवकाश प्राप्त वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी अनिल स्वरूप ने अंग्रेजी में शालीन लेकिन मारक ट्वीट किया- “क्या यह विडम्बनात्मक नहीं है कि हम ईडियट बॉक्सको कोसते रहते हैं फिर भी बहुत सारा समय टीवी के सामने बैठे रहते हैं जबकि हमारे पास ऐसा न करने का विकल्प मौजूद है. मैंने कुछ महीने पहले यह विकल्प चुना और अब मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. अब मुझे पता चल रहा है कि देश वास्तव में  क्या जानना चाहता है. टीवी चैनलों को विशुद्ध जहर उगलते क्यों देखें?”

हमारा मीडिया इतना बड़ा एकरतफा भौंपू, इतना अविश्वसनीय, इतना एकपक्षीय और निंदनीय पहले नहीं था. विश्व  भर में उसकी साख पर बट्टा लगा.  पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों के खिलाफ जनता के गुस्से और गम को उचित ढंग से कवर करने की बजाय टीवी चैनलों ने अपने एंकरों को फौजी वर्दी पहना कर पाकिस्तान  पर जुबानी तोपें दागना शुरू कर दीं. वे युद्धोन्माद फैलाने के अहर्निश अभियान में जुट गये. मारो-काटो, गुलाम कश्मीर पर कब्जा कर लो, लाहौर तक घुस जाओ, जैसी चीखें तथाकथित सैन्य विशेषज्ञ और निष्पक्षविश्लेषकही नहीं, उनसे बढ़-चढ़ कर स्वयं एंकर करते रहे.

इन चैनलों के सामने बैठे हुए यह मानना मुश्किल हो गया कि हम समाचार चैनल देख रहे हैं. लगता रहा कि  अंधराष्ट्रवाद के भौंपू बज रहे हैं. विंग कमाण्डर अभिननदन की वापसी के बाद ये भौंपू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में भारत की पाकिस्तान पर जीत के गुणगान में बदल गये. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री  इमरान खान की सदाशयता, बातचीत करने की उनकी पेशकश और शांति के उनके संदेश को तनाव कम करने की उनकी मंशा की बजाय मोदी के भय के परिणाम के रूप में पेश किया जाने लगा. अंतराष्ट्रीय सम्बंध, राजनय, पड़ोसी देश से बेहतर रिश्ते बनाने की आवश्यकता, आदि की कोई गुंजाइश नहीं रखी गयी. बालाकोट पर हमले के मनगढ़न्त और फर्जी वीडियो पेश किये गये. उन पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही बताया गया.
आम चुनाव सामने हैं और हमारी सेनाओं के शौर्य को बेशर्म तरीके से प्रचार-रैलियों में भुनाया जा रहा है, मीडिया सवाल उठाने की बजाय उसे ही चुनावी मुदा बनाने में लगा है..

पूरे पाँच साल बहुमत की सरकार चलाने वाला प्रधानमंत्री बिना एक भी सम्वाददाता सम्मेलन को सम्बोधित किये अगला चुनाव लड़ने जा रहा है. मनमोहन के मौन पर तंज कसने वाले मोदी और गोदी मीडिया आज अपने प्रधानमंत्री की प्रेस-उपेक्षा पर बिल्कुल मौन है. हमारी मीडिया में इतनी साख और ताकत नहीं बची कि वह उनसे सवाल कर सके. इसके उलट, बिना किसी मुलाकात के प्रायोजित एकालाप को इण्टर्व्यूकह कर गदगद भाव से छापा-दिखाया जा रहा है. कतिपय रीढ़ वाले पत्रकार इसकृपासे भी वंचित हैं. उनके हिस्से ट्रॉल-आर्मीकी गालियाँ और धमकियाँ हैं.

भारतीय मीडिया में इस समय आवश्यक विमर्श और असहमति की जगह अत्यंत सीमित हो गयी है. लोकतंत्र के लिए यह बहुत अशुभ है. इससे निकलना आसान नहीं होगा. नखलिस्तानों की तरह यहाँ-वहाँ कुछ हरियाली जरूर  दिखाई देती है. डिजिटल प्लेटफॉर्म भी कुछ सम्मान बचाये हुए हैं. इन्हीं से आशा है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है.
                                            
 https://thefreepress.in/2025-2/   

09 फरवरी, 2019
            

   

   

Friday, March 08, 2019

ज़फर रिजवी से हमें बहुत कुछ सीखना है



राजधानी लखनऊ के एक पुराने मुहल्ले में मेवे बेच रहे कश्मीरी युवकों की बेवजह पिटाई करने वाले भगवाधरी गुण्डों की खूब भर्त्सना हुई और होनी चाहिए. किंतु जफर रिजवी की चर्चा या सराहना लगभग गायब है  जिसने उन्हें बचाने की हिम्मत की. जफर ने गुण्डों से कड़क कर सवाल किया - 'काहे मार रहे हो भाई, काहे?... कोई मामला है तो पुलिस को बुलाओ.....'

जफर पुलिस के आने तक वहाँ डटा रहा. उसके साहस से कश्मीरियों की जान बची. हमलावर पुलिस की पकड़ में भी आ गये. वह हस्तक्षेप न करता तो पता नहीं क्या होता.  यह नागरिकता-बोध और आवश्यक हस्तक्षेप अब विरल हो चला है. वक्त ऐसा ला दिया गया है कि अगर कोई किसी दाढ़ी वाले या कश्मीरी मुसलमान को पीट रहा हो तो राह चलते चार और लोग उस पर हाथ आजमाने लगते हैं. बिना मामला समझे-बूझे वे भीड़ का हिस्सा बन जाते. बचाने वाले को भी नहीं छोड़ते.

'शरीफ' नागरिक इसलिए कुछ बोलते नहीं. जो हो रहा है, होने दो और चुपचाप अपना रास्ता लो, बच-बचा कर घर पहुँचो. अपने बच्चों को भी यही सिखा रहे हैं. किसी लफड़े में पड़ने की जरूरत नहीं. यह वारदात मीडिया में  दिन भर छाई रही लेकिन सबने कश्मीरी मुसलमानों की पिटाई करने वालों को ही बार-बार दिखाया. यह बड़ी न्यूज वैल्यूथी. 

बचाने वाले का वीडियो महत्त्वपूर्ण नहीं समझा गया और उसे काट दिया. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में जफर की बाइट है. वह गुण्डों को निडर होकर रोक रहा है. बाद में पिटने वाले कश्मीरियों ने भी बताया कि एक राहगीर ने उन्हें बचाया. अच्छा होता और राहगीर भी उसका साथ देते. शुरुआत में गुण्डों को रोकने के बाद जफर भी पीछे हट गया था. उसकी आशंका गलत नहीं.

मुसलमान और दलित आज भीड़-हिंसा के निशाने पर हैं तो रोकने-टोकने वालों का मनोबल बढ़ाना बहुत जरूरी है. जिन जिम्मेदार नेताओं को  इन गुण्डों को टोकना, बरजना चाहिए था, जिन्हें हिदायत देनी चाहिए थी कि खबरदार कोई ऐसा नहीं करे, वे मौन हैं. इसलिए व्यापक नागरिक समाज की जिम्मेदारी है कि कहीं भी ऐसा होते देखते ही हस्तक्षेप करें. टोकें और सवाल करें. पुलिस बुलाएँ. आस-पास तमाशा देखते लोगों से भी कहें कि हस्तक्षेप करें. तमाशा देखने का समय यह नहीं है. जफर से हम सभी को प्रेरणा और हिम्मत लेनी चाहिए. उसका गुणगान होना चाहिए. पीटने वाले नेता बनने के लिए ही हमला कर रहे थे. प्रचार उनका नहीं बचाने वाले का हो.

जिस लखनऊ में बहुत प्राचीन कश्मीरी मोहल्लाहो, वहाँ यह हमला बताता है कि विघटनकारी ताकतें कितनी बेलगाम हो चुकी हैं. सर्दियों के इन दिनों में कश्मीरी शॉल, फिरन, मेवे, वगैरह बेचने वाले शहर-दर-शहर घूमते हैं. अपने बचपन से हमने उन्हें इस तरह रोजगार करते देखा है. कंधे पर भारी बोझ लादे वे मुहल्ले-मुहल्ले फेरी लगाते हैं. कई परिवारों का उनसे पुराना लेन-देन है, अपनापा है. महादेवी वर्मा के मार्मिक संस्मरण 'सिस्तर का वास्ते' को कौन भूल सकता है, जैसे रवींद्र नाथ ठाकुर की कहानी 'काबुलीवाला' नहीं भुलाई जा सकती. ये इंसानियत के सच्चे किस्से हैं, ऐन हमारे जीवन में रोजमर्रा शामिल.

इन्हें आतंकवादियों से जोड़ना आतंकवाद की आग में घी डालना है. ऐसा करने वाले और उन्हें शह देने वाले कश्मीर को भारत से और भी दूर करते जा रहे हैं. अच्छी बात यह कि इस मामले में पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की. मार खाने वाले कश्मीरी फिर मेवे बेचने लगे हैं. लखनऊ के बहुत सारे लोग उनके साथ खड़े हुए. यह भरोसा और संग-साथ बना रहे. इस खतरनाक समय में बोलना और साथ खड़े रहना जरूरी है.

  

                         



Friday, March 01, 2019

युद्धोन्माद की नहीं, विवेक की जरूरत है



जाँबाज विंग कमाण्डर अभिनन्दन को पाकिस्तान ने सकुशल लौटा दिया है. इस सद्भावना का स्वागत होना चाहिए. इससे सीमा के आर-पार तनाव कम होने की आशा है लेकिन टीवी के पर्दे पर ज्यादातर एंकर और विशेषज्ञ अब भी युद्धोन्मादी बने हुए हैं. उनकी चीखें और खोखली गर्जनाएँ अबोध जनता को उकसा रही हैं. वे मुँह की तोपों से पाकिस्तान को नेस्तनाबूद किये दे रहे हैं. शांति और संयम की बात करने वालों को गालियाँ देने से लेकर पाकिस्तान की गोद में बैठा देशद्रोही बताया जा रहा है. यह राजनीति ही नहीं, पत्रकारिता का भी बेहद गैर-जिम्मेदाराना दौर है.

काफी लम्बे समय से हमारी सेना, विशेष रूप से कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ रही हैं. लगभग हर हफ्ते हमारे बहादुर सैनिक शहीद होते हैं. पुलवामा में जो हुआ वह किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी था. पूरा देश गम और गुस्से में रहा. बदले की कारवाई की मांग होती रही. फिर बदले की कार्रवाई भी कर दी गयी.. पाकिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई की. सीमा पर तनाव है. इसे कम और खत्म करने के लिए राजनीति और मीडिया दोनों मंचों पर संयम और विवेक बरते जाने की जरूरत है.

आज की दुनिया राजा-महाराजाओं वाली पुरानी दुनिया नहीं है जब किसी छोटे-से मसले पर दो देश एक-दूसरे पर रातोंरात आक्रमण कर देते थे. हारने वाले देश पर कब्जा कर लिया जाता था. आज सीमित युद्ध की भी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है. जापान से पूछिए या अफगानिस्तान से या ईरान-इराक से या फिर फलस्तीन-इसरायल से. क्या युद्धों से उनकी समस्याओं का समाधान हो गया?

हमारी मुख्य लड़ाई आतंकवाद से है. पाकिस्तान उनका शरणदाता है लेकिन क्या आतंकवाद को सिर्फ युद्ध से खत्म किया जा सकता है? आतंकवाद पूरी दुनिया की विकराल समस्या बनी हुई है. अमेरिका जैसे शक्तिशाली और दादा देश ने सब करके देख लिया. आतंकवाद से निपटना सैनिक कार्रवाई के अलावा और अभी बहुत कुछ की मांग करता है.

युद्धोन्मादी आखिर सोचते क्या है? जैसे सड़क पर किसी की भीड़-हत्या से गोरक्षा हो जा रही है, वैसे ही आतंकवाद का सफाया हो जाएगा? सीमा पार की बात छोड़िए, ऐन कश्मीर में आतंकवादी हमारे लोकतंत्र, देश की सुरक्षा, आर्थिक प्रगति और सेना के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं. पाकिस्तान से हम एकाधिक युद्ध लड़ और जीत चुके. सतत लड़ ही रहे हैं. समाधान हुआ या समस्या विकराल होती गयी?

दुनिया के विभिन्न भू-भागों में सीमित युद्ध लड़े जा रहे हैं. इन्हें विकराल पूर्ण युद्धों में बदलने से रोकने के लिए निरंतर प्रयत्न हो रहे हैं. यही मान कर कि इससे समस्या हल नहीं होगी, मानव जाति भयानक विनाश अवश्य झेलेगी. युद्ध के विरुद्ध व्यापक स्तर पर आवाज उठती रही हैं. उठनी ही चाहिए. मनुष्य की विकास-यात्रा लड़-भिड़ कर खत्म हो जाने का इतिहास नहीं है.

दुनिया आज जहाँ पहुँची है, वह शांति, प्रेम, संयम और भाईचारे के रास्ते पहुँची है. सेनाओं की भूमिका भी आज युद्ध करने से ज्यादा अपनी ताकत और तैयारी से युद्ध टालने की रणनीति में है. लड़ाई का विरोध करने का अर्थ कायरता नहीं है. शांति और संयम की बात करना सेनाओं का मनोबल गिराना कैसे हो गया? यह गद्दारी कैसे हो गयी?

सेनाओं को अपना काम करने दीजिए. ऐसा वातावरण बनाने में मदद कीजिए जिसमें बुद्धि-विवेक से फैसले लिए जा सकें, भावातिरेक और उकसावे में मत आइए.  

(सिटी तमाशा, नभाटा, 02 मार्च, 2019)