Friday, September 04, 2015

ये चराग जल रहे हैं-7/ थैंक-यू, छंगा मास्साब. थैंक-यू.


बप्पा श्री नारायण वोकेशनल इण्टर कॉलेज, लखनऊ में कक्षा नौ और दस के अपने अध्यापक श्री राम मिश्र उर्फ छंगा मास्साब को मैं हमेशा ही याद करता हूँ. उनका उदाहरण भी दिया करता हूँ. शिक्षक दिवस पर ही उन्हें याद करने का मतलब नहीं है. सोचता था कि उनके बारे मैं लिख कर आज के शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों को बताऊं कि ऐसे भी शिक्षक होते थे. आज फेसबुक पर वह घड़ी आई. आप भी इसे पूरा पढ़ें तो अपने परिचित शिक्षकों को फॉरवर्ड करें.

मैं पहाड़ के भुस्स गांव से पढ़ने के लिए लखनऊ लाया गया था. गांव में स्कूल बहुत दूर था. रिश्ते में भिनज्यू (फूफा जी) नन्दाबल्लभ तिवाड़ी मुझे घर पर ही पढ़ाते थे. बहुत सख्त लेकिन गणित और हिंदी के बहुत बढ़िया मास्टर. कान उमेठते तो प्राण तक सिहर जाते लेकिन उनका ऋणी हूँ. मेरी खूबसूरत हैण्डराइटिंग भी उन ही की देन है. उन ही की रखी मज़बूत नींव का नतीज़ा था कि मैं लखनऊ के बप्पा श्री नारायण बेसिक एवं नर्सरी इंस्टीट्यूट में सीधे कक्षा तीन में भर्ती कर लिया गया हालांकि अंग्रेज़ी का भी आता नहीं था.

लखनऊ लाने की ज़िद चूंकि भाई साहब (पूरन दाज्यू) ने की थी इसलिए मुझे पढ़ाने का ज़िम्मा भी उनका था. वे दफ्तर जाने से पहले सुबह और आने के बाद शाम को मेरी खूब रगड़ाई करते. कंचे-पिन्नी और पतंगबाजी में ज़ल्दी ही उस्ताद हो चुके इस पहाड़ी बालक को उन्होंने अंग्रेज़ी भी सिखाने में कोई कसर नहीं रखी. बाकी विषयों में सर्वाधिक और अंग्रेजी में अनुग्रहांक (ग्रेस मार्क्स) पाकर कुछ कक्षाएं पार हुईं. छठी-सातवीं तक अंग्रेजी में पास-मार्क्स भी आने लगे तो कक्षा में पहला-दूसरा स्थान भी मिलने लगा.

नौवीं कक्षा में अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले क्लास टीचर श्री राम मिश्र ने क्लास के होशियार लड़के से पहला पाठ पढ़कर पूरी क्लास को सुनाने को कहा. वोरल्ड और क्नोलेडगे जैसे उच्चारण सुन कर उनका दिमाग चकराया. मैं हिंदी की तर्ज़ पर ही अक्षर-अक्षर जोड़ कर अंग्रेजी शब्द पढ़ता था. इन शब्दों से पहले पाला पढ़ा न था. क्लास में खूब हंसी हुई और मास्साब ने जोर-जोर से डांटा ही नहीं आठवीं के रिजल्ट पर शंका भी जाहिर कर दी. रोने के अलावा और क्या किया जा सकता था!

इण्टरवल में सारा फ्रस्टेशन गेंदताड़ी में उतारा. सींकिया हाथों से पूरा जोर लगाकर साथियों को ऐसी गेंद चिपकाई कि उनके बदन में लाल-लाल निशान पड़ने लगे. खेल चल ही रहा था कि जोशी-जोशी की पुकार हुई. मैदान के कोने से मास्साब पुकार रहे थे. वही, अंग्रेजी वाले मास्साब. वे एक खाली क्लास में ले गए. सभी विषयों में अव्वल नम्बर लाने वाला लड़का अंग्रेजी में फिसड्डी क्यों है, यह जान चुकने के बाद उनका निर्देश मिला कि रोज स्कूल की छुट्टी के बाद फौरन घर नहीं जाना है, क्लास ही में बैठे रहना है.

फिर शुरू हुई अंग्रेजी की अतिरिक्त पढ़ाई. हर रोज़ स्कूल की छुट्टी के बाद. मास्साब उस समय जिस भी क्लास में होते, चॉक से सफेद हाथ लिए मेरी क्लास में चले आते. सामने बैठा कर एक घण्टा मेरी क्लास चलती. ग्रामर, वर्ड-मीनिंग, ऑपोजिट, एक्टिव वॉइस-पैसिव वॉइस, डायरेक्ट-इनडाइरेक्ट नरेशन, वगैरह-वगैरह. कभी-कभी इण्टरवल में भी बुला लेते.
छुट्टी होते ही लड़के चिल्लाते- अबे जोशी, ज़ल्दी भाग, छंगा आ जाएगा. कई दफा मैं भागा भी. मास्साब को पता था कि हम कहां कबड्डी खेल रहे होंगे या कहां आइस-पाइस चल रही होगी. वे मुझे वहीं से पकड़ ले आते और पढ़ाते. मैं मन ही मन चिढ़ता, उन्हें कोसता, कि कहां छंगा के चक्कर में फंस गया.

हां, मास्साब को सब लड़के छंगा कहते थे. उनके एक हाथ के अंगूठे में एक और अंगुली-सी निकली थी, इसलिए. छंगा मास्साब का पूरा शरीर हलके-हलके कांपता था और आवाज लड़खड़ाती थी. बोलते तो उनके मुंह से थूक के छीटे निकलते. जोश में पढ़ाते समय तो और भी ज़्यादा. मैदान से छुपन-छुपाई की चीखें उठतीं और मेरा किशोर मन उधर ही भागने लगता. मास्साब मेरे मन को भी पकड़ लाने की कला जानते थे. कांपते हाथों के इशारों, लड़खड़ाती जुबान और थूक के छीटों के बीच मेरी एक्स्ट्रा क्लास, छुट्टियों को छोड़कर, पूरे दो साल चली. धीरे-धीरे मेरा भी मन लगने लगा और उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी.

यू पी बोर्ड का 1971 का हाई स्कूल का रिजल्ट आया तो हमारे कॉलेज में दो लड़कों को फर्स्ट डिवीजन मिली. पहले स्थान पर हरि शंकर शुक्ल और दूसरे स्थान पर नवीन चंद्र जोशी. हम दोनों के नाम स्कूल के बोर्ड पर लिखे गए.

मैं गर्मियों की छुट्टी से पहाड़ से लौटा तो मार्क्स शीट लेने के लिए कॉलेज गया. छंगा मास्साब जैसे मेरी ही राह देख रहे थे. बिना कुछ बोले वे मेरा हाथ थाम कर स्कूल बोर्ड के पास ले गए. अपने कांपते हाथ की अंगुली उन्होंने मेरे नाम की तरफ उठाई. उनका चेहरा अद्भुत रूप से दमक रहा था और आंखों में कुछ तरल सा भी तैर रहा था.

तभी किसी साथी ने मुझे पुकारा और मैं मास्साब से हाथ छुड़ा कर उसकी तरफ दौड़ गया. फिर मास्साब से मेरी कभी भेंट नहीं हुई. इण्टर करने के लिए मैं पड़ोस के केकेसी चला गया था.

आज सोचता हूँ कि मैं कितना नाशुक्रा निकला. उन्हें एक टुकड़ा मिठाई खिलाना तो दूर, उनके पैर भी नहीं छुए. तब इतना भी ख्याल नहीं आया था कि उनको थैंक-यू ही कह दूं. थैंक-यू कहना आपने क्यों नहीं सिखाया था, मास्साब! लेकिन क्या उन्हें थैंक-यू की ज़रूरत थी?

तब कम से कम मैंने ट्यूशन और कोचिंग के नाम भी नहीं सुन रखे थे. यह तो वर्षों बाद समझा कि उन्होंने मेरे लिए क्या किया.

पता नहीं उस दिन वे कितनी देर स्कूल बोर्ड के सामने खड़े फर्स्ट डिवीजन के नीचे लिखे मेरे नाम को देखते रहे होंगे. मेरी थैंक-यू या मिठाई क्या उन्हें शिक्षक होने का वह सुख-संतोष दे सकते थे जो मैंने उस दिन उनके चहरे की दमक में देखे थे?

तो भी थैंक-यू, सर. थैंक-यू अ लॉट. आप थे तो इस अंग्रेजीदां दुनिया में अपनी भी ठीक-ठाक कट  गई.


Thursday, August 27, 2015

हमारे अस्पताल, डॉक्टर और बेचारे मरीज


चंद रोज़ पहले लखनऊ मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेण्टर की लिफ्ट में फंस कर एक मरीज की मौत हो गई और दो डॉक्टर बेहोश हो गए. उस महिला मरीज को अस्पताल ही के एक वार्ड से ट्रॉमा सेंटर इसलिए ले जाया जा रहा था कि उसे ज़्यादा सघन चिकित्सा की ज़रूरत थी. वह तो उसे नहीं मिली लेकिन ट्रॉमा सेण्टर की लिफ्ट में कई घण्टे फंसे रहने पर मौत ज़रूर हासिल हो गई. उससे दो रोज़ पहले आगरा मेडिकल कॉलेज में वेंटीलेटर पर रखे गए दो शिशुओं की मृत्यु इस कारण हो गई कि बिजली चली गई थी और वेण्टीलेटर को बिजली आपूर्ति का वैकल्पिक इंतज़ाम नहीं हो सका. लोहिया अस्पताल, लखनऊ का एक डॉक्टर इन दिनों इसलिए जेल में है क्योंकि उसने 24 साल के एक युवक का एक निजी अस्पताल में ले जाकर इतनी लापरवाही से ऑपरेशन किया कि उसकी मुख्य धमनी कट गई और एक प्रतिभाशाली युवक का दुखद अंत हो गया. यह खबर भी बिल्कुल ताज़ा है कि मेडिकल कॉलेज के पास की एक पैथॉलॉजी और ब्लड बैंक नाबालिगों का खून पांच-पांच सौ रुपए में खरीद कर बेचता था और प्रशासन के छापे में पता चला कि उसके पास रक्त की आवश्यक जांचें (जिनमें हेपेटाइटिस बी, सी और एचआईवी जैसे घातक संक्रमण शामिल हैं) करने के उपकरण तक नहीं थे.
सरकारी अस्पतालों की बदहाली, बेरुखी, अमानवीय व्यवहार और चिकित्सा को धन्धा बना रहे डॉक्टरों के कारनामे अक्सर सामने आते रहते हैं. नर्सिंग होम के नाम पर चल रही चिकित्सा-दुकानों के दहला देने वाले किस्से भी पढ़ने-सुनने को मिलते हैं. अब यह बहुत आम हो गया है कि सरकारी अस्पताल हो या निजी नर्सिंग होम, मरीज की मौत पर तीमारदार खूब हंगामा करते हैं. उनका आरोप होता है कि गम्भीर मरीज को लम्बे समय तक देखने डॉक्टर नहीं आए या डॉक्टर ने लाहरवाही की या मरीज की मौत हो जाने के बाद भी रुपए वसूलने के लिए उसे आईसीयू में रखे रहे. अस्पताल में तोड़-फोड़ और डॉक्टरों से दुर्व्यवहार और मारपीट की खबरें भी अक्सर ही आती हैं. इसी कारण कई बार डॉक्टर हड़ताल करते हैं जिसका नतीज़ा भी मरीज और तीमारदार ही भुगतते हैं. डॉक्टर और तीमारदारों का टकराव बढ़ता जा रहा है. यह पवित्र पेशा सामान्य बनती जा रही इस धारणा से बदनाम हो रहा है कि यह ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाने का व्यवसाय बन गया है.
अस्पतालों की बदहाली और डॉक्टरों की लापरवाहियों के ढेरों किस्सों के बावज़ूद सच यह है कि अस्पतालों-डॉक्टरों के बिना जनता का काम नहीं चलता. इलाज़ के लिए उन्हें उन्हीं के पास जाना होता है. शोषण और लापरवाहियों के मामलों की तुलना में हज़ारों गुना किस्से ऐसे होते हैं जब डॉक्टरों ने मरीज़ों की जान बचाई, कई बार चमत्कारिक ढंग से और अनेक बार सम्पूर्ण समर्पण से. ऐसे डॉक्टर भी कम संख्या में नहीं हैं जो मरीज़ों के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहते हैं लेकिन जनता और मीडिया में इनकी चर्चा कम ही होती है. एक गड़बड़ मामला तमाम अच्छाइयों को दबा देता है.
इस दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई की जड़ें हमारी चिकित्सा व्यवस्था में ही हैं. सरकारों ने कभी जन स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता में नहीं रखा. स्वास्थ्य नीति के तहत साल-दर-साल नए-नए अस्पताल बनाए जाते हैं, डॉक्टरों और पैरा-मेडिकल स्टाफ की तैनाती की जाती है, मुफ्त में कुछ जांचें और दवाइयां देने के ऐलान होते रहते हैं लेकिन यह कभी सुनिश्चित नहीं किया जाता कि यह पूरा तंत्र सेवा और समर्पण भाव से काम करे. इसके लायक स्थितियां भी बनाने की चिंता नहीं की जाती.
पहली गड़बड़ यह है कि चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार दूर-दराज इलाकों तक नहीं किया गया. बड़े अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, सुपर स्पेसिलिटी संस्थानों का केंद्र राजधानियां और बड़े शहर ही रहे. आज भी ग्रामीण इलाकों में जो प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं वे सामान्य मरीजों की ज़रूरतें भी पूरी नहीं करते. अक्सर वहां डॉक्टर, स्टाफ और दवाएं तक उपलब्ध नहीं रहते. यह विडम्बना ही है कि इन स्वास्थ्य केंद्रों की तुलना में आम ग्रामीण झोला छाप डॉक्टरों के पास ज़्यादा जाता है जो उसे और ज़्यादा बीमार ही बनाते हैं. नतीज़ा यह कि शहरों के अस्पताल दूर-दराज तक के मरीजों से भरे रहते हैं. वहां हमेशा डॉक्टरों, स्टाफ, जांच सुविधाओं से लेकर बिस्तर तक की कमी पड़ जाती है. दिल्ली का एम्स देख लीजिए या लखनऊ-चंडीगढ़ के पीजीआई, वहां रेलवे स्टेशनों की तरह भीड़ आखिर क्या साबित करती है? डॉक्टर चाह कर भी हर मरीज पर उतना ध्यान नहीं दे सकते जितनी जरूरत होती है. अनुपलब्ध डॉक्टरों, बरामदों तक में बेहाल पड़े मरीजों, खराब मशीनों, टूटे स्ट्रेचर-बेड, चिड़चिड़े स्टाफ जैसी ज़्यादातर शिकायतें मरीजों के इसी बढ़ते बोझ का नतीजा नहीं हैं क्या?
सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की इस चरमराती व्यवस्था ने दूसरी बड़ी बीमारी पैदा की. हर शहर और कस्बे कुकुरमुत्तों की तरह नर्सिंग होम खुल गए. सरकारी अस्पतालों से आज़िज़ मरीजों से ये नर्सिंग होम भरने लगे जहां आम तौर पर डॉक्टर जरूरत के अनुसार ठेके पर बुलाए जाते हैं और बाकी समय पैरा मेडिकल स्टाफ के नाम पर अप्रशिक्षित कर्मचारी मरीजों की जान से खेलते हैं. उन्हें सामान्य मेडिकल हाईज़ीन का भी ज्ञान नहीं होता. इन नर्सिंग होमों में जटिल ऑपरेशन तक बिना अत्यावश्यक प्रॉटोकॉल अपनाए (जैसे बेहोश करने से पहले की आवश्यक सघन जांच-पड़ताल) कर दिए जाते हैं और अत्यंत महत्वपूर्ण पोस्ट-ऑपरेटिव केयर के लिए दक्ष मेडिकल स्टाफ मौजूद नहीं होता. अनेक बार इसी कारण मरीज की जान चली जाती है. तीमारदार नहीं समझते कि ऑपरेशन के बाद किस तरह संक्रमण हो जाते हैं और वे कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं. वे स्वाभाविक ही सारा दोष डॉक्टर के सिर मढ़ते हैं. यहीं यह प्रश्न भी उठता है कि निरंतर खुल रहे निजी मेडिकल कॉलेजों से कैसे डॉक्टर तथा पैरा-मेडिकल स्टाफ पास होकर निकल रहे हैं?
डॉक्टरी के पवित्र पेशे को धन कमाऊ धंधा बना देने वाले और मरीजों की जान से खेलने वाले डॉक्टर संख्या में नगण्य होंगे. मीडिया में इन ही की करतूतें उछलती हैं और समस्त डॉक्टर समुदाय बदनाम हो रहा है. एक विशेषज्ञ डॉक्टर ने चंद रोज पहले मुझसे कहा कि अब तो मरीज को छूने में डर लगने लगा है. ऐसा नहीं है कि सेवा भाव और समर्पण से काम करने वाले डॉक्टर धन नहीं कमा पाते लेकिन लिप्सा का कोई अंत नहीं होता. यह बात जितनी नेताओं-अफसरों के लिए सही है उतनी ही डॉक्टरों के लिए भी.
स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की असली कवायद चिकित्सा सुविधाओं को दूर-दराज के इलाकों की जनता तक पहुंचाने से ही हो सकती है. बड़े शहरों में सुपर स्पेसिलिटी चिकित्सालयों की भी ज़रूरत है लेकिन सामान्य इलाज़ की मुकम्मल व्यवस्था सुदूर गांवों-कस्बों तक पहुंचाए बिना बड़े अस्पताल अराजकता और अव्यव्स्था के अड्डे बने रहेंगे, निजी नर्सिंग होमों का धंधा चमकता रहेगा और डॉक्टर-तीमारदार विवाद भी बढ़ते जाएंगे. हर प्रदेश में दो-दो, चार-चार एम्स खोल दीजिए तो भी हालात नहीं सुधरने वाले क्योंकि हमारी बहुत बड़ी आबादी में मरीज बेशुमार हैं. उन्हें जरूरी और संतोषजनक इलाज अपने निकटतम क्षेत्र में मिलना चाहिए. विशेषज्ञ चिकित्सा और सलाह के लिए ही वे बड़े अस्पताल आएं.
फिलहाल यह दूर की कौड़ी लगती है क्योंकि हमारी सरकारें इस दिशा में सोच ही नहीं रहीं. जन स्वास्थ्य और सस्ती एवं सुलभ चिकित्सा उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं. लेकिन क्या उनसे इतनी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि किसी मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेण्टर की लिफ्ट में फंस कर मरीज की मौत न हो, नवजात शिशुओं की जान बचा रहे वेण्टीलेटरों को निर्बाध बिजली मिलती रहे, बिजली जाने के कारण जरूरी ऑपरेशन टालने न पड़ें, आईसीयू में ऑक्सीजन का पर्याप्त भण्डार मौज़ूद हो और मरीज की जान बचाने के लिए चढ़ाया जा रहा खून उसे जानलेवा बीमारी न दे दे? क्या यह इतना मुश्किल है? क्या नर्सिंग होम के लिए बने नियमों का पालन करवाना सरकार व प्रशासन के लिए असम्भव है?
और, डॉक्टर खुद सोचें कि जब शॉपिंग मॉलनुमा विशाल अस्पताल नहीं थे और चिकित्सा विज्ञान भी इतना उन्नत नहीं था तब डाक्दर बाबू को जनता भगवान की तरह क्यों पूजती थी. आज चिकित्सा विज्ञान की चमत्कारिक प्रगति के बावज़ूद वे अपना सम्मान क्यों नहीं बचा पा रहे.
(तनिक सम्पादित होकर 'नव भारत टाइम्स' में 26 अगस्त 2015 को प्रकाशित)

Sunday, March 01, 2015

ये चराग जल रहे हैं-6/ लखनऊ में खड़ी होली की वे अविस्मरणीय बैठकें




चलिए, आज आपको अपने बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियां में घुमा लाता हूँ. ये यादें उन होली बैठकों की हैं जो पहाड़ के सुदूर गावों ही की तरह लखनऊ के कई मुहल्लों में जमती-झमकती थीं और अब स्मृतियों ही में बची हैं.
-“हरदा, आज इतवार हो गया पूस काकहते हुए गौर्दा आ धमकते. हम रोटी खा कर बैठे ही होते. खाना पकाते समय बाबू मिट्टी के एक छोटे कुण्डे में कोयले रखते जाते. वही तापते हुए मैं पढ़ता और बाबू हुक्का गुड़गुड़ाते.
 -“आओ गौरी दत्त, मैं अभी याद ही कर रहा था कि तुम आते होगे. लो हुक्का पीओ.” गौर्दा हुक्के की एक–दो फूक लगा कर उठ जाते- चलता हूँ, अभी विश्वम्भर दत्त जी को भी बुलाना है. आप आओ.” गौर्दा माने गौरी दत्त सनवाल, जो अब वृद्धावस्था में पंतनगर (खुर्रमनगर) में रहते हैं.
लखनऊ की कैण्ट रोड पर सिंचाई भवन के पीछे की कैनाल कॉलोनी के सर्वेण्ट क्वार्टर पहाड़ियों से भरे थे, ज़्यादातर कुमाऊंनी. वहां सारे तीज-त्योहार पहाड़ी गांवों की तरह ही मनाए जाते थे. घुघुती त्यार, फुलदेई, सब, और होली तो गज़ब ही झकझोर होती थी. कुमाऊं में पूस के पहले इतवार से होली गाने की परम्परा है. सो, कैनाल कॉलोनी में भी उसी रात से होली गाना शुरू कर दिया जाता था.
गौर्दा की कोठरी में बिछे गद्दों पर ओढ़-आढ़ कर बैठे चार-पांच होल्यार होली गायन की शुरुआत करते. बाबू बहुत मंद्र स्वर में होली लगाते- ‘तुम संतन के हितकारी हरी, तुम..., गज और ग्राह लड़े जल भीतर, लड़त-लड़त गज हारो हरी......, गज के प्राण बचायो हरी....तुम संतन के ...
दिन भर दौड़-भाग की नौकरी से थके वे चंद होल्यार उस रात परम्परा की शुरुआत कर ज़ल्दी उठ जाते. वसंत पंचमी से गौर्दा की कोठरी भरने लगती और उसमें युवकों की भागीदारी भी होने लगती. होली गायन आधी रात तक चलता. मनोरथ जी होली लगाते- शिव के मन माहिं बसे काशी..., आधी काशी में बामण बनिया, आधी काशी में संन्यासी..युवकों को सावधान किया जाता- एक बोल रे, एक बोलया अब दो बोल, हाँ!
शिवरात्रि से होली की यह बैठक कोठरी से बाहर खुले और बड़े अहाते में आ जाती. चंदा किया जाता, दरियां बिछती, चाय और आलू के गुटकों का इंतज़ाम होता. हम बच्चे उबले आलू छीलते, चाय के गिलास बटोरते-धोते और होली में भाग लगाना भी सीखते- हो रही जै-जै कार जग में, जनम भयो यदुनंदन को... और शिव जी चले गोकुल नगरी... आहा, क्या होली थी! शिव जी भिक्षुक का रूप धर कर गोकुल जा रहे हैं. हाथ में चिमटा, और कांधे में झोली लटकाए घर-घर भिक्षा मांग रहे हैं. यशोदा माई के दरवाजे पर भिक्षा की पुकार लगा रहे हैं. यशोदा माई मोतियों भरा थाल ले आई हैं लेकिन भिक्षुक को यह भिक्षा नहीं चाहिए. तो क्या चाहिए उसे? ‘दरश कन्हैया को मांगे हरी, शिव जी चले गोकुल नगरी...युवकों की टोली सम पर उत्साह से चीखती- तक्का होई धो, धोई हो! 
एकादशी को सुबह कपड़ों में रंग के छींटे डाले जाते और रात की महफिल अबीर-गुलाल से लाल और जोश से जवान हो उठती. बाबू अपनी पसन्दीदा होली से बैठक की शुरुआत करते- एकादशी चीर, अबीर-गुलाल, द्वादशी रंग रचो है... इस दिन पहाड़ के गांवों में चीर बांधी जाती है और रंग खेलना शुरू हो जाता है. लखनऊ के उस मुहल्ले में चीर नहीं बांधी जाती थी लेकिन अबीर-गुलाल खूब चलने लगता. चीर बांधने से जुड़ी बहुत सी होलियां मैंने बाद में सुनी लेकिन बाबू की गाई यह होली और कहीं नहीं सुनने को मिली. अफसोस कि आगे के बोल अब याद नहीं. कुमाऊंनी होली के अब तक देखे संग्रहों में भी यह होली नहीं मिली. खैर.
एकादशी से पुन्यूं तक कैनाल कॉलोनी का वह अहाता भर उठता. घोड़ा अस्पताल, पुराना डाकखाना, दारुल-शफा, हैवलक रोड, जाने किस-किस मुहल्ले से होल्यार जुटने लगते. अनुशासित बुज़ुर्ग होल्यारों पर छलकते जोश वाले युवकों की टोली भारी पड़ने लगती. एक कोने में सिमटे बुज़ुर्ग होली लगाते- हर फूलों से मथुरा छाय रही...तो युवकों का कोना अधैर्य दिखाता- इस ब्योपारी को नींद बहुत है... लगाओ न! बुज़ुर्ग मुस्कराते और डांट भी लगाते- अरे अभी से बिछौना बिछाओगे तो छलड़ी तक क्या करोगे, रे?’ सयानों की होली चलती रहती और ज़्यादा बेचैन युवक धीरे से उठकर अहाते के बाहर मैदान में आ जाते. शराब का चलन उन दिनों उतना नहीं था लेकिन अत्तर की चिलम या बीड़ी खूब चलती थी. होली के लिए पहाड़ी गांवों से वह काली बट्टी बड़े जतन से लाई और सुरक्षित रखी जाती थी. अत्तर की फूक के बाद युवकों की टोली मैदान में झोड़ा गाने-नाचने लगती- देवानी लौंडा द्वारहाटौ को, त्वीले धारो बोला.. हुड़ुका बजता, कई बार एक साथ तीन-चार हुड़ुके. झोड़ा गाने-नाचने वाले इतने हो जाते कि घेरे के भीतर घेरा बनता. अहाते में जब सयाने मंद्र स्वरों में गा रहे होते- श्याम मुरारी के दर्शन को जब विप्र सुदामा गए हो लला... तब अहाते से सटे मैदान में हुड़कों की तालों के साथ झोड़ा तार सप्तक में गूंजने लगता- खोलि दे माता खोल भवानी, धरम किवाड़ा...’ थोड़ी देर बाद गौर्दा मनाने आते- चलो रे, होली मत बिगाड़ो... चलो-चलो.
युवकों की टोली दबे विद्रोह के साथ भीतर आकर होली की बैठक में शामिल हो जाती और जैसे उनको मनाने के लिए ही धर्म सिंह होली लगाते- मन मारी, तन मारी, दिल को गुसैयां, कैसे रहूंगी मन मारी..., हाथ में गड़ुवा, कान में धोती, नाणा चली, हां-हां नाणा चली, हो-हो नाणा चली, दिल को गुसैंया, कैसे रहूंगी मन मारी.यह युवकों की पसंदीदा होलियों में एक थी जिसमें उन्हें शब्दों के थोड़ा हेर-फेर से अश्लील इशारे करने और गाने का मौका मिल जाता था. वैसे, ये चौपद होलियां थीं, जिन्हें गाना और लौटना आसान नहीं होता था. लेकिन वहां चौपद होलियां गाने के उस्ताद हुआ करते थे. मेरी स्मृति में आज भी कई ऐसी होलियां गूजती हैं- धनुष-बाण प्रभु जी के हाथ में, चौकस है तो लछिमन भाई, लंका की तैयारी’, ‘आवन कहि गए, अजहुं न आए, ऊधो श्याम मुरारी...’, ‘बूंद जो बरसे गुलाब की, चादर मोरी भीजै रे, रे रतनारे नैना....आदि-आदि. 
ऐसा नहीं था कि युवकों ही को होली की मस्ती चढ़ती थी. सयाने इसमें चार हाथ आगे रहते. बस, वे दिनों का लिहाज़ करते थे. द्वादशी-त्रयोदशी से बूढ़े जवान होने लगते और चतुर्दशी-पूर्णिमा को उनकी जवानी और उन्मुक्तता सीमाएं तोड़ने लगती थी. फिर वे कोई लिहाज़ नहीं करते थे. युवकों-बच्चों के ही सामने वे इशारे कर-कर के, डोल-डोल कर के गाने लगते- अरे, हां रे, गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे, चल कहो तो यहीं रम जाएं, गोरी...और तेरे नैन रसीले यार बालम, प्रीत लगा ले नैनन की...और अरे, हां रे, जिठानी तुम्हरो देवर हमसे ना बोले... और बाजूबंद भुली ऐ छै पलंगै में...और चल उड़ि जा भंवर तोको मारूंगी...और तू तो करि ले अपनो ब्याह देवर, हमरो भरोसो झन करियो...और अरे हां, रे गोरी, चादर दाग कहां लागो...और भी जाने कितनी होलियां जिनमें गोरी की स्यूनी-डंडिया से लेकर अंगुली-बिछिया तक हर अंग और उसके वस्त्र व जेवर-विशेष का वर्णन पूरी उन्मुक्तता या कहिए कि उछृंखलता के साथ होता था. कुछ होलियों में तो स्त्री-पुरुष के अंतरंग शारीरिक सबंधों का आंखों देखा हाल तक होता- जब रसिया पलंगा पर आए, चड़कत है दुश्मन खटिया, शहर सितो जागो रसिया.. भरी महफिल में इन्हें गाने में युवक भले संकोच कर जाते या मुंह छुपा कर हंसते मगर बुज़ुर्ग न केवल रस ले-ले कर गाते बल्कि स्वर को सप्तम तक पहुंचा कर अश्लील इशारे करने में भी संकोच न करते.
होलियों की विलम्बित तालों की एकरसता से ऊब कर बीच-बीच में कुछ गायक बंजारेलगाते जिनकी लय-ताल अपेक्षाकृत द्रुत व चपल होती- गई-गई रे असुर तेरी नारि मंदोदरि, सिया मिलन गई बागै में और अरे, कह दीजो रघुनाथ भरत से कह दीजो...’ इन बंजारों में नृत्य की लय भी होती और कुछ लोग खड़े होकर हाव-भाव के साथ झूमते हुए भी गाते. घोड़ा अस्पताल कॉलोनी के नर सिंह बंजारे गीत गाने मे उस्ताद थे. वे ढोलक भी अच्छी बजाते थे.
इन महफिलों में कुछ होल्यार होली लगाने वालेहोते यानि वे लीडगायक होते. कुछ उसे उठाने वाले होते यानी वे उसी लय-ताल पर होली के बोल लौटाते. ये सुर-ताल के अच्छे जानकार होते. बाकी भाग लगाते. गाने वालों की दो टोलियां बन जाती. लगानेकरने वाले की एक टोली और लौटानेवाले की दूसरी टोली. ढोलक बजाने वाले की खास जगह होती. वह अक्सर बीच में बैठता. महफिल बड़ी हो जाने पर दो ढोलकिए भी होते. मंजीरे और लोटे तो कई बजते. मुझे कैनाल कॉलोनी की उन होलियों के एक ढोलक वादक की बहुत अच्छी याद है. उनका नाम नरोत्तम था, नरोत्तम बहुगुणा. वे होली गाते नहीं थे, सिर्फ ढोलक बजाते थे, ऐसी ढोलक कि होल्यारों को मजा आ जाता. नरोत्तम जी की ढोलक होली जमा देती थी. वे आंख बंद करके बहुत आनंद से बजाते. अक्सर ढोलक के ऊपर दोहरे हो जाते. ऐसा लगता जैसे सो रहे हों. सिर्फ उनके हाथ हरकत करते और बिल्कुल झुकी गरदन ताल के साथ हिलती जाती. अक्सर होली गायन पूरा हो जाने के बाद भी उनका ढोलक वादन चलता रहता और जब वे जोर बजाना बंद करते तो महफिल से कई स्वर उठते- “वाह, नरोत्तम, वाह!”
छलड़ी के दिन होल्यारों की टोली रंग खेलते और गाते-बजाते कैनाल कॉलोनी से डायमण्ड डेरी, हैवलक रोड, घोड़ा अस्पताल और कभी-कभी दारुल शफा तक जाती. हर घर के सामने होली गाते और आशिष देते- गाऊं-खेलूं-देवूं अशीष, हो-हो होलक रे. इनरा नानातिना, नाती-पोथा जी रूं लाक्षे बरी (लाख सौ बरीस) हो-हो-होलक रे...इनमें किसी के लड़के-लड़्की का ब्याह होने, किसी के घर संतान हो जाने जैसी आशिषें भी शामिल होती. रिश्तों के हिसाब से मजाकिया आशिष भी दी जाती. इनमें ज़्यादातर घर ऐसे होते जिनकी “घरवाली” पहाड़ के गांव में ही रहती थी. लेकिन यदि किसी बरस होली में किसी की घरवाली लखनऊ आ जाती तो उस घर के आगे होली गाने, नाचने और आशिष देने की रंगत और ही हो जाती. उस देहरी पर “आज को वसंत” कुछ ज़्यादा ही उल्लास से बुलाया जाता. खैर, उस शाम को कुछ ही होल्यार मिलते और गाते- होली खेली-खाली मथुरा को चले, आज कन्हैया रंग भरे...और इस तरह होली का समापन हो जाता. उसके बाद की शामें हमारे लिए सन्नाटा भरी और उदास होतीं.
ये स्मृतियां 1965 से 1980 के दौर की हैं. बाद में ये बैठकें बिखर गईं. पुरानी पीढ़ी रिटायर होकर पहाड़ लौट जाती रही और नई पीढ़ी का मिज़ाज़ बदलता रहा. प्रवास का स्वरूप बदला और जीवन शैली भी. लखनऊ में बसा कुमाऊं का लोकधीरे-धीरे लोप हो गया. जाहिर है होली भी वैसी नहीं रह गई. शास्त्रीय (बैठी) होली की बैठकें तो आज भी यहां खूब जमती हैं, लेकिन हमारे लखनऊ में अब लोक (खड़ी) होली की बैठकें दुर्लभ ही हैं.