Monday, August 31, 2026

‘पूरा पहाड़ मेरे लेखन का हिसाब मांगता है’- विद्यासागर नौटियाल

दिसम्बर 1957 में इलाहाबाद में हुए वृहद लेखक सम्मेलन के दैरान हुए कुछ रोचक प्रसंग सुनाते हुए शेखर जोशी जी एक यह किस्सा भी सुनाते थे- उस सम्मेलन के कहानी सत्र की अध्यक्षता यशपाल जी को करनी थी। उसकी पूर्व संध्या पर बाहर से आए कुछ लेखक बातचीत कर रहे थे। तभी विद्यासागर नौटियाल ने,  जो तब बनारस विश्वविद्यालय के छात्र थे, कुछ आक्रोश से कहा कि मैं तो यशपाल जी से पूछूंगा कि उन्होंने पर्वतीय नारी को लेकर इस तरह की (उत्तराधिकारकहानी की ओर इशारा था) कहानियां क्यों लिखीं। बनारस से ही आए वाचस्पति गैरोला भी वहां बैठे थे। अगले दिन सम्मेलन के दौरान नौटियाल जी तो कुछ नहीं बोले, लेकिन वाचस्पति ने खड़े होकर पूछ लिया कि अध्यक्ष महोदय, आपने पर्वतीय नारी की मान-मर्यादा के विरोध में कहानियां क्यों लिखीं? यशपाल जी ने कहा कि मैं अपने वक्तव्य में इसका जवाब दूंगा और बाद में उन्होंने दिया भी, कि मैंने जो देखा और महसूस किया, उसे लिखा है, आदि-आदि। लेकिन जवाब सुनने के लिए नौटियाल वहां रुके थे न वाचस्पति। इस पर खूब चुहल हमने की थी। बहुत बाद में वर्तमान साहित्यके यशपाल विशेषांकमें नौटियाल जी ने याद भी किया है कि उस दिन गैरोला जी मेरी ही बातों से उत्तेजित हो गए थे।

1958 में विद्यासागर नौटियाल 25 वर्ष के युवक थे, छात्र थे, भैंस का कट्याजैसी प्रसिद्ध कहानी लिख चुके थे और उनके भीतर एक आग जलती रहती थी। (टिहरी के स्कूली दिनों से ही वे अपने नाम के साथ दुर्वासाभी जोड़े रहते थे और कल्पनाके लिए भैंस का कट्या इसी उपनाम के साथ भेजी गई थी, लेकिन प्रकाशन पूर्व पत्र लिखकर दुर्वासाहटवा दिया था।) उस उम्र में यशपाल जी की वह कहानी उन्हें आपत्तिजनक लगी हो, यह अस्वाभाविक नहीं था। (वैसे, वे यशपाल जी की रचनाओं के प्रशंसक थे हालांकि उनकी कुछ रचनाओं में पहाड़ी नारी के चित्रण से वे सहमत नहीं होते थे। मनुष्य के रूपपर उन्होंने इस आशय की टिप्पणी भी लिखी थी)

पहाड़ की नारियों की स्थितियों और संघर्षों को लेकर वे ताउम्र अत्यंत संवेदनशील और आक्रामक मुद्रा में रहे। उनकी कई कहानियों के केंद्र में पहाड़ की स्त्रियां हैं, उनका अपार कष्टों भरा जीवन है, शोषण-दमन है और सांकेतिक विद्रोह भी। (जीवन भर समर्पित वामपंथी बने रहने और कई आंदोलनों में शिरकत और जेल की सजा काटने के बावजूद वे कहानियों में आरोपित विद्रोह या क्रांति के पक्षधर नहीं थे।) मुख्यत: पहाड़ की नारी के जीवन पर केंद्रित उनकी कई कहानियां फट जा पंचधारनाम से संकलित हैं। उनके उपन्यासों में भी पर्वतीय स्त्री की दारुण जीवन स्थितियां अत्यंत संवेदनशीलता और आकोश के साथ चित्रित हुई हैं। उन्होंने लिखा भी है- “पहाड़ के मर्दों के मुकाबले मुझे पहाड़ की नारी अधिक आकर्षित करती रही है। उसकी आंतरिक वेदना। प्रम्थ्यू अनबंध की तरह पेन पेन फॉरएवर’, जन्म से मृत्यु तक की वेदना।”      

74 वर्ष पूरा कर लेने पर अपनी कहानियों के एक बड़े संग्रह (मेरी कथा यात्रा, वाणी प्रकाशन, 2008) की लम्बी भूमिका लिखते हुए वे बताते हैं- “मैंने पर्वतीय नारी को अनेक रूपों में देखा है। खेतों-खलिहानों में, घासिया रकबों में, पहाड़ों की चोटियों और उनकी वादियों में, बस्तियों-वीरानों में, नदी-नालों के आसपास, घरों के अंदर और ज़िंदगी की ज़द्दोज़हद में जुटी हुई औरत। चरागाहों में ग्वालिन बनीं बेटियां, बनैले खूंखार जानवरों से भी ज़्यादा खतरनाक आदमियों की करतूतों, हरकतों का मुकाबला करती हुईं। औरत, जिसे खुद अपने ही जन्मदाता मां-बाप गाय-भैंस की तरह, गोरू की तरह बेचने को बेचैन रहते हैं। अपनी बीमार भैंस को ज़िंदा रखने के लिए सरकारी जंगल में पतरौल के सामने घास की तरह बिछ जाने पर मजबूर घसियारिन। बंधुआ शूद्रा, जिसका अपनी देह पर भी अपना हक नहीं होता। औरत जिसे राजनेताओं की शह पर नारी देह के थोक व्यापारी अपने दलालों के मार्फत बहुत बेरहमी के साथ हिंदुस्तान भर में फैले हुए वेश्यालयों की तरफ घसीटते-धकेलते रहते हैं। मजबूर नारी की उन छवियों को अपनी रचनाओं में उतारने की कोशिश करता रहा।”

वे यह भी मानते हैं कि “यह सिर्फ पहाड़ की नहीं, पूरे देश की तस्वीर है। लेकिन मैं अपनी रचनाओं को पहाड़ से बाहर नहीं निकाल सका, चूंकि मुझे बाहर के क्षेत्रों और उनके इतिहास की, उनके भूगोल की, संक्षेप में उनके परिवेश की पूरी जानकारी नहीं रहती। आधी-अधूरी जानकारियों को मैं अपनी रचनाओं का आधार नहीं बनाना चाहता। मैंने जिस पहाड़ पर कहानियां लिखी हैं उसकी घाटी से चोटी तक की सदियां मेरे भीतर बसी हुई हैं।”

फट जा पंचधारउनकी बहुचर्चित कहानी रही है। अब शायद ही उसकी कोई याद भी करता हो। हिंदी समाज अपने रचनाकारों को बहुत जल्दी भुला बैठता है। यह आत्म-श्लाघा और आत्म-प्रचार का शर्मनाक दौर है। खैर, ‘फट जा पंचधारकी शूद्र नायिका रक्खी नौटियाल जी की बहुत सारी नारी पात्रों की प्रतिनिधि प्रवक्ता लगती है। उनकी अधिकतर कहानियों में स्त्रियां चुपचाप अत्याचार सहन करती हैं। घासकहानी की नायिका जंगल में पतरौल के सामने घास की तरह बिछने को मजबूर है क्योंकि उसे अपनी बीमार भैंस को बचाने के लिए जंगल से घास काटकर ले जाना बहुत ही जरूरी है। मूक बलिदान’, ‘अपनी पारी मौन’, ‘सोना’, ‘समय की चोरी’, माटीवालीऔर उस चिड़िया के बोलकहानियों में भी जो नारी पात्र अत्याचारों को चुपचाप सहती आती हैं, उनकी ओर से भी रक्खी ही चीखती है।

पहाड़ के कुछ हिस्सों में बहुपति प्रथा रही है। सबसे बड़ा भाई जिसे ब्याह कर लाता है, बाकी भाइयों की भी वह पत्नी हो जाती है। फट जा पंचधारकी एक लड़की जब ब्याह करके ससुराल आई, तब उसका सबसे छोटा पति (वैसे, देवर) वीर सिंह उसकी गोद में खेलने लायक है। जब तक वह जवान होता है, वह बूढ़ी हो जाती है। ठाकुर वीर सिंह शूद्र परिवार की जवान रक्खी को अपने घर ले आता है। वीर सिंह के परिवार और बिरादरी में तूफान उठना स्वाभाविक है। वीर सिंह कुछ समय तक सबका विरोध झेलते हुए भी रक्खी को साथ रखे रहता है लेकिन कुछ समय पंचायत के दबाव में और सम्पत्ति वंचित होने के भय से उसे त्याग देता है। तब वह विद्रोह कर देती है और अपनी सारे दुख-अपमान बताते हुए चीखती है। कहानी के अंत में रक्खी की यह फुफकार पाठक के मन में लम्बे समय तक गूंजती रहती है- “मैं चाहती हूं कि पंचधार फट जाए। भूकम्प का एक झटका आए, तगड़ा भूचाल और इस पहाड़ का जोड़-जोड़ हिल उठे। पंचायत के तप्पड़ से यमुना माई के फाट तक के ढंगारों, ढलानों में बेशुमार गहरी, चौड़ी-चौड़ी दरारें पड़ जाएं और पंचधार खण्ड-खण्ड हो जाए। भूख, नंगेपन और तिरस्कार के नुकीले कांटों की सेज पर टिके मेरे अपंग शरीर में अब ज़्यादा दम नहीं, पर इस गुफा में बैठकर में उसी भूचाल का इंतज़ार कर रही हूं। मैं उसी दिन को देखने के लिए ज़िंदा हूं।” यहां लेखक स्त्री जाति के साथ ही नहीं, दलितों के पक्ष में भी पुरजोर खड़ा है। यह स्त्री और दलित दोनों के पक्ष में लेखक की प्रतिबद्धता बताता है और उनकी कई रचनाओं में दिखाई देता है। (इस कहानी को पढ़ते हुए 1975 में प्रकाशित गोपाल उपाध्याय का उपन्यास एक टुकड़ा इतिहासबरबस याद आता है। उसमें भी अछूत युवती और ब्राह्मण युवक की ऐसी ही कहानी है। उसमें दलित चंदी देवी का विद्रोह और लम्बा संघर्ष दर्ज़ हुआ है। वह उपन्यास तब लिखा गया था जब हिंदी में दलित विमर्श या दलित साहित्य का नाम भी नहीं सुना गया था। यह उपन्यास भी लगभग अलक्षित रह गया)।

परी देश की कहानियांकी बिंदो भी बहुत सशक्त चरित्र है। वह प्यार और शादी का झांसा देकर उसका देह-भोग करने वाले पर्यटक को, जो इस कथाकार का नैरेटर है और हिंदी कहानियों में धंधा करके आजीविका कमाने वाली पहाड़ी लड़कियों का वर्णन पढ़कर नैनीताल आया है, हाथ में हंसिया लेकर ललकारती है- “पैसे तूने मेरी गाय के दूध के दिए हैं। मेरे उस दूध के पैसे, जिसे कुछ महीनों बाद वह पिएगा जो इस वक्त मेरे पेट में है, उसकी कीमत कौन चुकाएगा? पानी तक नहीं मांग पाओगे, यहीं टुकड़े-टुकड़े करके रख दूंगी। देखूं तू कैसे जाता है।” यह कहानी उन हिंदी कहानीकारों पर भी टिप्पणी है जो पहाड़ की लड़कियों की ऐसी-वैसी छवि पेश करते थे। इस लेख के प्रारम्भ में बताया गया किस्सा याद कीजिए।

बिकती बांदों के सपनेशीर्षक संस्मरण में नौटियाल जी गढ़वाल की उन महिलाओं के दर्द का विस्तार से उल्लेख है जो खरीदी-बेची जाती थीं- “सामंती समाज में औरत और पशु के साथ एक जैसा व्यवहार था। दोनों का दर्जा समान होता था। औरत को पशु की तरह बेचा या खरीदा जा सकता था। ... बेटी अविवाहित हो चाहे विवाहित, उसकी कीमत मायकेवाले ही तय करेंगे। तय करेंगे और रकम प्राप्त भी करेंगे। वह धनराशि बेटी नहीं ले सकती...।” यह दर्द बड़ी संवेदनशीलता से उनकी रचनाओं में आता रहा।

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नौटियाल जी ने देश और विदेश भी कम नहीं घूमे। अपनी युवावस्था के आठ साल उन्होंने बनारस में बिताए। उत्तर प्रदेश विधान के निर्वाचित सदस्य के रूप में वे लखनऊ भी काफी रहे, यात्री एवं समाज-अध्येता वे हमेशा ही रहे और ऐसा नहीं है कि पहाड़ से इतर क्षेत्रों के जन-जीवन पर उन्होंने कहानियां नहीं लिखी हों; लेकिन जिसे उनके अर्थों में जाननाकहा जाएगा, वैसा उन्होंने पहाड़ को ही जाना। “उसकी घाटी से लेकर चोटी तक की सदियां मेरे भीतर बसी हुई हैं”, यह केवल दावा नहीं हैं, अतिरेकी या आलंकारिक वक्तव्य भी नहीं है। पहाड़ की, विशेष रूप से गढ़वाल की ऊंची-ऊंची चोटियों, घाटियों, नदियों, गांवों-बस्तियों, वीरानों-बुग्यालों को जिसने दसियों बार अपने लम्बे-लम्बे डगों से नापा हो, जिसने किशोरावस्था से ही सामंतशाही का विरोध करते हुए वहां की जेलें देखीं हों, जिसने बुग्यालों के घुमंतू गूजरों, बंधुआ वन श्रमिकों से लेकर टिहरी बांध के विस्थापितों तक के लिए जमीनी संघर्ष किया हो और जिसने आज़ाद भारत में भी (कम्युनिस्ट होने के कारण) लम्बी जेल काटी हो, ऐसा साहित्यकार हिंदी में कहां मिलेगा! (राहुल सांकृत्यायन, देवेंद्र सत्यार्थी एवं अज्ञेय के जीवन-संदर्भ दूसरे हैं।)

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विद्यासागर नौटियाल का जन्म 29 सितम्बर 1933 को गुलाम देश के भीतर अंग्रेजों की सरपरस्ती में पनपती टिहरी रियासत की सामंती जकड़न में हुआ था। उनके जन्म से तीन वर्ष पूर्व रंवाई के यमुना तट पर तिलाड़ी में निहत्थे किसानों पर रियासती पुलिस ने गोलियां चलाकर एक और जलियांवाला बाग नरसंहार कर डाला था। टिहरी राजशाही के विरुद्ध प्रजामंडल के आंदोलनकारी सक्रिय थे, जिनका क्रूर दमन किया जाता था। स्कूली दिनों में ही किशोर विद्या सागर प्रजामंडलियों के सम्पर्क में आ गए और बाकायदा उसके प्रदर्शनों में शामिल होने लगे थे। शिकायत मिलने पर उन्हें कॉलेज और हॉस्टल से निकाल दिया गया था। 15 अगस्त 1947 को देश के आज़ाद होने पर भी टिहरी रियासत में राजशाही जारी रही। तब टिहरी की आज़ादी के लिए आंदोलन और तेज हुआ। 18 अगस्त 1947 को प्रजामण्डल के कई आंदोलनकारियों के साथ विद्यासागर नौटियाल भी गिरफ्तार कर लिए गए। तब उनकी उम्र 13 वर्ष की थी। लम्बे आंदोलन और त्याग के बाद प्रजामण्डलियों ने टिहरी को राजशाही से 1948 में आज़ाद कराया, कुछ समय वहां प्रजामण्डल का राज रहा और फिर 1949 में टिहरी भी भारत का अभिन्न अंग बनकर उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा हुआ।

प्रजामण्डल में ही विद्यासागर नौटियाल कम्युनिस्टों के सम्पर्क में आए और फिर आजीवन कम्युनिस्ट बने रहे। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके वे 1952 में काशी विश्वविद्यालय पहुंचे और करीब आठ साल वहां रहे। वहीं उनका सम्पर्क त्रिलोचन शास्त्री, विष्णु चंद्र शर्मा, केदारनाथ सिंह, रामदरश मिश्र, विश्वनाथ त्रिपाठी, ठाकुर प्रसाद सिंह, नामवर सिंह, शिव प्रसाद सिंह, आदि से हुआ। कॉलेज के दिनों से ही साहित्य की ओर प्रवृत्त नौटियाल जी ने वहीं भैंस का कट्यासमेत कुछ और कहानियां लिखीं। कुछ भी लिखने की सोचते ही उनके भीतर रचा-बसा पहाड़ बोलने लगता था। उस पहाड़ में भी टिहरी राजशाही और उसके क्रूर दमन की यादें हावी हो जातीं। किसी साहित्यिक पत्रिका में छपने वाली उनकी पहली कहानी (1954) भैंस का कट्याप्रकटत: पहाड़ के जनजीवन में मनुष्यों और पशुओं के बीच के मानवीय रिश्तों की कहानी है लेकिन वास्तव में वह टिहरी के सामंती शासन को जनता की चुनौती के रूप में लिखी गई है। इस कहानी ने उन्हें चर्चित कथाकार बना दिया था।

काशी विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहते हुए एक बार तीन-चार छात्रों के साथ उन्हें भी कुलपति आवास में रात को चौकसी के लिए बुलाया गया था, क्योंकि वहां चोर-डकैत सक्रिय हो गए थे। उस बारे में वे लिखते हैं- “एक रात ऐसा हुआ कि कमरे में सब के सो जाने के बाद मैं नहीं सो पाया। उस रात मेरे दिमाग में वे डाकू घूमने लगे, जिनमें से एक को महेंद्रवीं के छात्रों ने भेलूपुर पुलिस के हवाले कर दिया था। मैंने अचानक अपनी कॉपी खोल ली। उसके खुलते ही मैं बनारस के भेलूपुर थाने के बजाय अपने टिहरी शहर के थाने में जा पहुंचा। मैं अपने शहर में वहां बह रही भिलंगना नदी के तट पर और अपने कॉलेज के आहाते में घूमने लगा। कॉलेज एक टीले पर था और उसके नीचे पहाड़ी के तल पर मेहतरों की बस्ती थी। मैंने देखा कि मेरे कॉलेज के लड़के ऊपर से नीचे की बस्ती पर बेवजह पत्थर फेंक कर खुद पीछे की ओर भाग आते हैं। उन बरसते पत्थरों के कारण बस्ती के निवासियों के दिलों में हरदम एक आतंक छाया रहता है। बाकी लड़कों का उस ओर ध्यान ही नहीं जाता था लेकिन मैं अपने मन में ऐसा आतंक महसूस करने लगा जैसे वे पत्थर खुद मेरे घर पर बरसाए जाने लगे हों। अब एक अरसे बाद रात के मौके पर मैं उन शरारती छात्रों की हृदयहीन कार्रवाई की इंदराजी करने लगा था।” (मेरी कथा यात्रा)

यह प्रसंग बताता है कि नौटियाल जी पहाड़ से बाहर रहने पर भी अपने पहाड़में ही रहते थे और यह भी कि बचपन से ही उनकी पक्षधरता स्पष्ट थी। वे दीन-हीन-सताए गए लोगों के साथ खड़े थे। कम्युनिस्ट वे कुछ नेताओं के प्रभाव में ही नहीं बने थे, सामाजिक स्थितियों के कारण वह विचारधारा और पक्षधरता उन्होंने आत्मसात कर ली थी।

पहाड़ से बाहर जा पड़े पर्वत-पुत्रों को आम तौर पर पहाड़ की याद नराईया खुद’ (नॉस्टेल्जिया) के रूप में आती है - शीतल हवा-पानी, जंगल-पक्षी-पर्यावरण और अपने परिवार एवं संगी साथियों की पीड़ादायक स्मृति। पहाड़ के बहुत सारे रचनाकारों के लेखन में यह नराईया खुदकम-ज़्यादा आती रहती है। शैलेश मटियानी और शेखर जोशी जैसे पहाड़ी जनजीवन के कटु यथार्थ के चितेरे लेखक भी किन्ही भावुक क्षणों में उसका तनिक उल्लेख अपनी रचनाओं में कर पड़ते हैं। लेकिन नौटियाल जी को अपने लेखन में कतई खुदनहीं लगती थी, यद्यपि वे बार-बार कहते हैं कि अपने लेखन को मैं पहाड़ से बाहर नहीं ले जा पाता।

तो, उन्हें कैसे पहाड़ की खुदलगती थी? उन्हीं के शब्दों में- “मैंने पहाड़ को हमेशा आदमी से जोड़कर देखा है। जिस रचना में आदमी मौजूद नहीं, उस पहाड़ से मेरा कोई सबंध नहीं। विकट पहाड़ पर जीने की कोशिश में घोर संघर्षों में जुटे हुए लोग। उन संघर्षों में सोच-विचार कर उस तरह शामिल होने की किसी को फुर्सत नहीं होती, जैसी योजना बनाकर कोई राजनेता या उच्च अधिकारी फोटोग्राफरों के सामने दिखावटी वृक्षारोपण करने के लिए पहले से खोदे गए गड्ढों के अंदर अपने कर-कमल ले जाने का ढोंग करते फिरते हैं। अब लगता है कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पाया। पूरा पहाड़ मुझसे मेरे लेखन का हिसाब मांगता नज़र आने लगता है। क्या मुझे उन सब पर लिखने के लिए और पिचहत्तर साल मिल सकते हैं?” (मेरी कथा यात्रा)

1960 में वे अपने पहाड़लौट आए, लिखने के लिए नहीं, बल्कि पूरावक्ती (फुलटाइमर) कम्युनिस्ट कार्यकर्ता बनकर। काशी में जो पहाड़ याद आता था, अब उसे जीना था। लिखना पीछे छूटता गया और वे गांव-गांव की खाक छानने लगे। सड़कें बहुत कम थीं। (बचपन से उन्हें बहुत पैदल चलने की आदत थी। अपने संस्मरण दलित जीवन-एक विचारणीय समस्याकी शुरुआत उन्होंने इस तरह की है- “सन 1942 में नौ वर्ष की उम्र में सौ मील दूर कसेड़ी-बंगाण के घनघोर जंगलों से पांच दिन तक पैदल चलकर, रिंगाली और राढ़ी के डांडों की मशहूर चढ़ाइयां पार करता हुआ मैं टिहरी पहुंचा था”)।  वैसे भी, गांवों तक जाने और लोगों से मिलने-बात करने के लिए पैदल ही चलना होता था। एक पहाड़ की तलहटी से शिखर तक, फिर उधर से नीचे उतर कर दूसरे पहाड़ के शिखर तक। इन्हीं पहाड़ी शिखरों-घाटियों में गांव बसे होते हैं। बीच-बीच में छोटे-छोटे पहाड़ी कस्बे। जंगलों में वन श्रमिक हैं, उनकी समस्या सुननी है, उन्हें संगठित होने के लाभ और तरीके समझाने हैं। गांवों में पटवारी-पेशकार के सताए सीधे-सादे-गरीब ग्रामीण हैं। कुछ समय ऋषिकेश में अड्डा जमाकर मोटर मजदूर संघ के कार्यकर्ता बन गए तो ड्राइवर-कंडक्टरों के साथ कच्ची-संकरी सड़कों की धूल फांकी। घोड़े-खच्चर वाले मजदूरों के काम से दौड़ना। सड़क मजदूरों की गैंग का दर्द सुनना, जिनका शोषण करने में ठेकेदार कोई कसर न छोड़ता। पटवारी-पुलिस से भिड़ना। अपने मालीदेवल गांव तो कभी-कभी जा पाना होता था। पत्नी से बात तक न हो पाती थी। रात पहुंचे तो सुबह निकल लिए क्योंकि पीपलकोटी में वन-श्रमिकों के साथ कुछ समस्या हो जाने का संदेश मिल गया है। मजदूर क्या थे, बंधुआ जैसे थे। उनका साथ देना है।

फिर 1962 में गिरफ्तार कर लिए गए क्योंकि चीनी हमला हो गया था और कम्युनिस्ट दुश्मन मान लिए गए थे। 1964 तक जेल में रहे। रिहाई के बाद फिर वही सिलसिला। फिर पार्टी ने चुनाव लड़वाया। कभी हारे भी लेकिन 1980 में देवप्रयाग से कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक निर्वाचित हुए। अब अपने क्षेत्र से लखनऊ तक की दौड़ होने लगी। इस सब में लिखना पीछे छूटता गया। बनारस में जो कहानियां अधूरी रह गई थीं, वे दिमाग से ही नहीं, कागजों में भी गायब हो गईं। विद्यासागर नौटियाल नाम का कहानीकार गुम हो गया।

कोई पच्चीस बरस बाद भैंस का कट्याका कहानीकार कुनमुनाया। कागज-पत्तर छाने गए, पत्रिकाएं तलाश की गईं, जिनमें कहानियां छपीं थीं। कुछ मिलीं, कुछ कागज मिले, कुछ स्मृति से दोबारा लिखी गईं और एक कथा संग्रह तैयार हुआ- टिहरी की कहानियां’ (1984)। फिर लिखने और छपने ने गति पकड़ी। भीम अकेला’ (1989), सूरज सबका है (1997), ‘उत्तर बायां है (2003), ‘यमुना के बागी बेटे(2006), ‘झुण्ड से बिछड़ा’ (2008), ‘स्वर्ग दिदा पाणि-पाणि’ (2010) ‘मेरा जामक वापस दो’ (2012)’ जैसे उपन्यास, ‘मेरी कथा यात्रा’ (2008) जैसे कुछ कहानी संग्रह और बागी टिहरी गाए जा’ (2007) जैसे संस्मरणों की किताबें आईं। (यह पूरी सूची नहीं है, बल्कि ये मेरे पढ़े हुए हैं।)

इन शीषकों से और उनकी अधिकसंख्य कहानियों के नामों (भैंस का कट्या, फट जा ओ  पंचधार, खच्चर फगणू नहीं होते, सुच्ची डोर, यह बामणपन टूटे, महाराज काफूशाह का आत्मघात, ताऊजी की याद, कुंवारीधार बोलेगी, कुदरत की गोद में, धाध, अभाजा, आदि) से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इनका परिवेश कहां का है। पहाड़ ही उनकी रचनाओं के केंद्र में है। उसका सौंदर्य नहीं, उसके लोग, विशेष रूप से नारियां। जिन कहानियों की कथा या परिवेश पहाड़ का नहीं है, उनमें भी नौटियाल जी का पहाड़ किसी न किसी बहाने कूद आता है और वह बिना प्रसंग नहीं होता। टिहरी राजशाही के खिलाफ जंग, उसके दमन और टिहरी बांध से विस्थापन व संघर्ष के प्रसंग तो कई रचनाओं में बार-बार आ जाते है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए वे बताते हैं- “अनेक लोगों की समझ में नहीं आता कि अपनी अधिकांश रचनाओं में मैं इतिहास की इस घिसी-पिटी घटना का बार-बार उल्लेख क्यों करने लगता हूं। सवाल यह है कि उस दौरान जनता द्वारा सहन की गई ज़्यादतियों की अनदेखी कैसी की जा सकती है। उनको आज नहीं लिखा जाएगा तो कब लिखा जाएगा? कौन लिखेगा? पहाड़ के ही नहीं, खुद टिहरी रियासत के अंदर जन्मे मेरे समकालीन रचनाकारों को इन तथ्यों की कोई जानकारी ही नहीं है।” (मेरी कथा यात्रा)। यह बड़बोलापन नहीं है, बरसों बरस वे उस सब के बीच रहे-जूझे हैं।  

हिमाच्छादित पर्वत शिखरों की स्वर्णिम आभा उनकी रचनाओं में एक छलावे या विपदा के रूप में प्रस्तुत होती है। उत्तर बायां हैउपन्यास के अंतिम पृष्ठों में चांदी गांव का एक प्रसंग आता है। जब कभी साफ-धुले आसमान की रात में जोन’ (चांदनी) खिलती है तो गांव वालों को सामने का चांदीकांठा पहाड़ सोने की तरह दमकता दिखता है। वे सोचते हैं कि वहां जाकर सोना बटोर लाएं। पूरा का पूरा पहाड़ सोने का है। वहां तक जाना है और जो हाथ आए बटोर लाना है। सोना ही सोना। फिर न गरीबी रहेगी न कोई कष्ट। वे नहा-धोकर, पूजा-पाठ करके चांदीकांठा की ओर जाने की तैयारी करते हैं। उन्होंने सोना लाद लाने के लिए घिल्डे’ (खाद, घास वगैरह पीठ पर ढोने के लिए शंक्वाकार बड़ी टोकरी) तैयार कर रखे हैं। सारा गांव तैयार हो रहा है लेकिन तभी “घने, काले बादलों के खोल से बाहर निकल आने वाला वह जोनलुप्त हो जाता है और चांदीकांठा फिर अंधकार में डूब जाता है। जोन के इस तरह के ठग्गू व्यवहार के लोग अब आदी हो गए हैं। उन्हें जोन से अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है ... आकाश में घूमने वाले कुछ दुष्ट ग्रह जोन को चांदी के आकाश में पूरी तरह से, ठीक से चमकने नहीं देते।”

पहाड़ के स्वर्णिम शिखर पहाड़ के लोगों के लिए ठग्गू हैं। पहाड़ का सौंदर्य छलावा है। सोना यानी कष्ट एवं गरीबी दूर करने के संसाधन सिर्फ सपना हैं। इस सपने को दुष्ट ग्रहों ने हर लिया है। इन दुष्टों से लड़ना होगा, ऐसा वे शब्दों में लिखते नहीं लेकिन पाठकों को संदेश मिल जाता है।

उत्तर बायां हैउपन्यास ऊंचे पहाड़ी बुग्यालों (वृक्ष विहीन घास के पठार) में विचरण करते घुमंतू जाति के गूजरों, पालसियों, खडवालों के जीवन, रीति-रिवाजों, कष्टों, शोषण, सपनों और संघर्षों का प्रामाणिक औपन्यासिक आख्यान है। यह सब नौटियाल जी का अपना बहुत देखा-जाना हाल है। इस निर्मम सच्चाई तक पहाड़ के बहुत सारे निवासियों और रचनाकारों की पहुंच ही नहीं रही है।

यमुना के बागी बेटे’, नाम से ही स्पष्ट है, तिलाड़ी के यमुना तट (रंवाईं क्षेत्र) पर 1930 के नरसंहार के बाबत है। इस घाटी के सीधे-सरल ग्रामीण मामूली खेती और पशुपालन से अपना गुजारा करते थे। जल, जंगल, जमीन यानी समस्त संसाधनों पर टिहरी रियासत का कब्जा था। दरबार की इजाजत के बिना गांव वाले जंगल में प्रवेश नहीं कर सकते थे, पशु नहीं चरा सकते थे। वे दरबार में गुहार लगाने गए तो उनसे कहा गया कि अपने जानवरों को पहाड़ से नीचे खाई में धकेल दो। अत्याचार और दमन की पराकाष्ठा के बाद रंवाल्टे (रंवाई के रहवासी) शांतिपूर्ण आंदोलन पर उतारू हुए तो टिहरी दरबार की फौज ने उन्हें तिलाड़ी के मैदान में घेरकर उस समय गोलियों से भून डाला, जब वे सभा के लिए वहां जुटे थे। उपन्यास की छोटी सी भूमिका में नौटियाल जी ने लिखा है- “मेरा जन्म एक जंगलाती परिवार में हुआ था। यमुना घाटी का अन्न, जल व वायु मेरे बचपन की हिफाजत करते रहे। अपने जन्म से तीन साल पहले घटित तिलाड़ी कांड की दारुण कथाएं मेरे दिल को एक भारी पत्थर के मानिंद दबाती लगती थीं। उस अनोखे प्रतिरोध की यह गाथा शायद उन चंद देशवासियों के किसी काम आ सके, जो विपरीत व विकट परिस्थितियों के बावजूद जल, जंगल और जमीन पर वनवासियों और रहवासियों के अधिकारों की लड़ाई आज भी जारी रखे हैं।”

नौटियाल जी ने टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी क्षेत्र का चप्पा-चप्पा कई बार पैदल छाना है। ऐसी ही दो दिन तक चली एक लम्बी यात्रा को आधार बनाकर उन्होंने भीम अकेलाउपन्यास लिखा। उपन्यास के आवरण में यह यात्रा वृतांत जैसा ही है। लेखक के साथ उसका पूरा परिवेश, स्मृतियां, पहाड़ों की कई मुश्किलें भी साथ चलती हैं। लिखते हुए नाना स्मृतियों और किस्सों की उनकी पोटली खुलती जाती है। छोटे कलेवर के इस उपन्यास का विस्तार बड़ा है। शेखर जोशी जी ने इसे जातीय स्मृतियों का अद्भुत दस्तावेजकहा था।  

पहाड़ी गांवों में बाघ (वास्तव में तेंदुआ या गुलदार) का आना और पालतू पशुओं का शिकार करना नई बात नहीं है। झुंड से बिछड़ाउपन्यास में अकेली निस्सहाय बुढ़िया शांति की गाय को बाघ मार डालता है, लेकिन इसमें एक इसी बाघ का आतंक न होकर कई-कई बाघों के आतंक की कहानी है। राज दरबार बाघ है। बांध बनाने वाली कम्पनी बाघ है। पटवारी-पेशकार बाघ हैं। बाघ अपने चिह्नित शिकार को झुण्ड से अलग करके दौड़ाता और मार देता है। इस व्यवस्था में भी हम कई तरह अकेला करके, एकता को छिन्न-भिन्न करके, दौड़ा-दौड़ा करके मारे जाते हैं। एकजुट लोगों को अलग-अलग कर दो, अकेला कर दो, चुप करा दो और इस तरह उनको मार दो। छोटी सी कहानी के कई आयाम हैं और पहाड़ के जनजीवन की अनेक परतें तो खुलती ही हैं।

मात्र 140 पृष्ठों के उपन्यास सूरज सबका हैमें तो जैसे पूरे पहाड़ की आत्मा है - उसकी इतिहास-कथाएं हैं, दंत कथाएं हैं, जीवन-पद्धति है, उसके दंश हैं, जातीय स्मृतियां हैं, संस्कृति है, कुछ अचर्चित नायक हैं और नौटियाल जी की अनोखी लेखन शैली है। वैसे, उनकी रचनाओं में कोई विशेष शिल्प नहीं होता, लेकिन यहां शिल्प विशिष्ट है और हावी है। छोटे-छोटे वाक्य लिखना उनकी शैली रही है लेकिन यहां दो-दो, तीन-तीन शब्दों के वाक्य भी हैं। वाक्य क्या हैं, जैसे एक मकान की चिनाई है। सचमुच, एक पहाड़ी मकान चिना जा रहा है यहां और नन्हीं छुन्ना की आंखों से देखा जा रहा है या उसे बताया जा रहा है- “दोनों किवाड़ नीचे की तरफ देहली से जुड़े हैं। एक बाईं ओर जुड़ा है, एक दाहिनी ओर। किवाड़ों के ऊपर पटाव हैं। एक मोटा तख्ता। नीचे देहली, ऊपर पटाव। जब आदमी देहली पर खड़ा होता है तो, उस समय पटाव उसके सर के ठीक ऊपर होता है। सीढ़ी पर खड़ी हैरान छुन्ना ऊपर की ओर देखती है। उसे देहली के ऊपर किवाड़, किवाड़ों के ऊपर पटाव दिखाई देता है। उसे सिर्फ पटाव दिखाई देता है। वह नहीं देख पाती कि पटाव के ऊपर भी एक दीवार चिनी गई है। उस दीवार के ऊपर लकड़ी की कड़ियां हैं, कड़ियों के ऊपर पटेले - पेड़ों की शाखों के छोटे-छोटे टुकड़े। खूब घने बिछे हुए।” कथा फिर इतिहास में जाती है। लेखक पहाड़ के दो नामचीन इतिहासकारों से उद्धरण भी देने लगता है। फिर डूबती टिहरी की गूंज उठती है और सामंती दौर के जिक्र तो आते ही हैं। समीक्षक उन पर आरोप लगा सकते हैं कि वे उपन्यास के नाम पर सब कुछ गड्ड-मड्ड कर देते हैं लेकिन पहाड़ के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

पहाड़ के इनसान ही नहीं, उसके भूगोल एवं प्रकृति की नौटियाल जी की समझ देखनी हो तो स्वर्ग दद्दा, पाणि-पाणिउपन्यास पढ़ना चाहिए। यह पहाड़ की कठोर चट्टानों के भीतर छुपे मीठे पानी की खोज के बहाने पुरखों के जीवट, समाजिक हितों के प्रति उनके समर्पण, बदलते समाज की टुच्ची और विभेदकारी प्रवृत्तियों, विकास के नाम पर सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार और प्रकृति के अंधाधुंध दोहन की कथा है। जिस पुरखे ने जीवन दांव पर लगाकर कठोर चट्टानों के बीच मीठे पानी का धारा बनाया था, बाद में उसी के वारिसों को अछूत बताकर उस पानी से वंचित कर दिया जाता है। तब सरकार हरिजनों के कल्याणकी जो योजना बनाती है, उससे उनके घरों तक पानी पहुंचाने के बहाने सरकारी धन की लूट ही नहीं होती, बल्कि पानी के मूल स्रोत को समृद्ध बनाने वाले देवदार के घने जंगल का भी सफाया कर दिया जाता है। नतीजतन धीरे-धीरे पानी ही सूख जाता है। आजकल पहाड़ के गांवों में चल रही बहुप्रचारित नल से जलयोजना की असलियत नौटियाल जी ने बहुत पहले बता दी थी।         

बचपन और किशोरावस्था में विद्या सागर नौटियाल ने टिहरी राजशाही के जुल्म देखे और उनके खिलाफ प्रजामंडल आंदोलन में शामिल रहे। 1990 के दशक में वे टिहरी बांध से विस्थापित होने वाले हजारों लोगों में शामिल थे। उसके खिलाफ वर्षों वे आंदोलन में शामिल रहे। अंतत: विवश होकर अपना गांव-घर डूबने के लिए छोड़कर उन्हें भी देहरादून विस्थापित होना पड़ा। पहाड़ के आम जन की अनेक विपदाओं के साक्षी रहने के अलावा वे इन त्रासदियों के भी भुक्तभोगी रहे। विस्थापन और टिहरी के साथ एक सभ्यता के डूबने पर लिखे गए उनके संस्मरण मार्मिक तो हैं ही, योजनाकारों की विकास-दृष्टि पर सवाल भी खड़ा करते हैं। उन्होंने पहाड़ पर खूब लिखा और जो भी लिखा, प्रामाणिक लिखा। उसमें पहाड़ का रोमानी या पर्यटकी चित्र आ ही नहीं सकते थे।  

एक और प्रसंग बताए बिना यह आलेख पूरा नहीं होगा। 1980 के दशक में नौटियाल जी पूरी तरह टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन में जुटे हुए थे। वे पूर्ण समर्पित कम्युनिस्ट थे और पार्टी के पुराने सदस्य थे। कम्युनिस्ट पार्टी टिहरी बांध के समर्थन में इसलिए थी क्योंकि उसके निर्माण के लिए सोवियत संघ भारत सरकार के साथ हुए एक समझौते के तहत धन दे रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी ने आपत्ति की कि वे क्यों पार्टी की राय के विपरीत बांध बनने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना था कि मैं बांध से विस्थापित पहाड़ के आम जन के हित में लड़ना जरूरी समझता हूं। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। नौटियाल जी की प्रतिक्रिया थी कि एक सच्चा कम्युनिस्ट आजीवन कम्युनिस्ट रहता है। उसे कम्युनिस्ट होने से कैसे निकाला जा सकता है? यह उनकी पहाड़ के प्रति अटूट प्रतिबद्धता थी। पहाड़ के लिए उन्होंने पार्टी लाइन का खुला विरोध कर दिया था। यही उनका सच्चा कम्युनिस्ट होना था। बाद में पार्टी ने ही अपना रुख बदला और नौटियाल जी को फिर पार्टी में शामिल कर लिया।      

आज नौटियाल जी हमारे बीच नहीं हैं (निधन 16 फरवरी 2012) किंतु उनका पहाड़ और भी लुटा-पिटा हुआ है। अलग राज्य बन जाने के बाद भी वहां सरकारें, विकास, पर्यटन, आदि-आदि सिर्फ छलावा और ठग्गू हैं। पर्वत शिखरों के चमकदार सोने पर दुष्ट ग्रहों का आतंक और भी पसर गया है।

- नवीन जोशी

('बनास जन 88' के विद्यासागर नौटियाल विशेषांक में प्रकाशित, 2026)  

   

                      

                                     

 

 

 

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