इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी की भूमिका पर जो सख्त टिप्पणी की है, उससे सभी आला प्रशासनिक अधिकारियों की आंखें खुलनी चाहिए। उनमें आईएएस में आते समय ली गई अपनी शपथ का मान रखने का विवेक जागना चाहिए, जैसा कि अदालत ने कहा है।
उम्मीद कम ही है। पहले भी ऐसे कई मौके आ चुके हैं जब आला अधिकारियों को अपनी शपथ की याद दिलाई गई थी। अब यह शपथ भी वैसी ही हो गई है जैसी कि मंत्रियों-मुख्यमंत्त्री पद की शपथ हो गई है। शपथ कुछ और काम कुछ।
गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी मेधा रूपम ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को बिना सबूत राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) में गिरफ्तार करने का आदेश दिया था। जाहिर है यह आदेश उन्होंने सरकार के कहने पर जारी किया होगा।
अदालत के अनुसार इस अधिकारी ने अपने विवेक या दिमाग का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया और एनएसए में बंद करने के आदेश दे दिए। अदालत ने अपना आदेश 2 सितम्बर को सुना दिया था लेकिन पूरा लिखित आदेश कल जारी हुआ।
हाई कोर्ट के दो जजों, जस्टिस अतुल श्रीधरन एवं जस्टिस अचल सचदेव, की पीठ का कहना है कि आकृति चौधरी पर नोएडा के मजदूरों, जो पहले से हड़ताल पर थे, को भड़काने का कोई सबूत नहीं है। जिलाधिकारी की जिम्मेदारी थी कि वे आकृति पर लगाए गए पुलिस के आरोपों की भलीभांति जांच करतीं और तय करतीं कि क्या उसके खिलाफ एनएसए जैसी अत्यंत सख्त धारा लगाने के लायक कोई सबूत हैं या यह निराधार है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने जिलाधिकारी के माध्यम से अपनी शक्ति का मनमाना और अनुचित इस्तेमाल कराया। जजों ने अपने फैसले में यहां तक सख्त टिप्पणी की अगर उच्चाधिकारी ऐसे ही आदेशों पर आंख मूंदकर पालन करते रहे तो उत्तर प्रदेश 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' में बदलकर रह जाएगा।
'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' जॉर्ज ऑर्वेल के मशहूर उपन्यास '1984' से निकला मुहावरा है, जिसका तात्पर्य ऐसे राज्य से है जहां हर कोई हर वक्त सत्ता की सतत निगरानी में रहता और जहां किसी तरह का प्रतिरोध घोर दमन का कारण बनता है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि जब सरकारी अधिकारी और पुलिस अपनी शपथ के अनुरूप काम करते हैं तो राज्य की कृतज्ञ जनता उन्हें ऐसे ऊंचे आसान पर बैठाती है जिससे ईश्वर को भी ईर्ष्या हो। लेकिन जब-जब वे अपनी शपथ के विपरीत आचरण करते हैं, तब जनता उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी औजार के रूप में देखती है। इससे उनके प्रति गुस्सा और नफरत पैदा होते हैं और नागरिक असंतोष फैलता है।
अदालत ने उपर्युक्त जिलाधाकारी को उपहास का पात्र बताते हुए उसकी सेवा पुस्तिका में अदालत की नाराजगी दर्ज़ करने का आदेश दिया है। आदेश में यह भी है कि इस जिलाधिकारी के वेतन से काटकर पांच लाख रुपए आकृति चौधरी को बतौर मुआवजा दिया जाए।
आदेश में लिखा गया है कि '... जो अधिकारी नागरिकों की स्वतंत्रता व नागरिक अधिकारों का बिना पर्याप्त कारण के और बिना जांच पड़ताल किए, दमन करते हैं, उनके गलत कामों को कुछ सही करते हुए यह अदालत कड़े आदेश जारी कर सकती है।
अदालत ने राज्य का यह दावा गलत पाया कि आकृति को 12 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया, जबकि आकृति के पेश किए इस तथ्य को सही पाया कि उसे 11 अप्रैल को ही गिरफ्तार करके अवैध हिरासत में रखा गया था। सरकार के पास अपने दावे को साबित करने के लिए एक भी प्रमाण नहीं है।
नोएडा में जब मजदूर वेतन वृद्धि की मांग के लिए हड़ताल कर रहे थे तो सरकार ने सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया था। उन पर अशांति फैलाने से लेकर हत्या का प्रयास करने तक के आरोप तक लगाए गए। इनमें से अधिकसंख्य लोगों को जमानत मिल गई है।
नोएडा मामले में ही आकृति चौधरी पर एनएसए लगाया गया था। लखनऊ से पत्रकार, लेखक-अनुवादक और सामाजिक कार्यकर्ता सत्यम वर्मा को भी गिरफ्तार करके नोएडा ले जाया गया और उन पर एनएसए लगाया गया। आकृति के खिलाफ कोर्ट ने एनएसए लगाने को गलत पाया और इस धारा को रद्द कर दिया। सत्यम के मामले में अभी सुनवाई होनी बाकी है।
अदालती आदेश के बावजूद आकृति जेल से बाहर नहीं आ सकी है क्योंकि सरकार ने उसके विरुद्ध 11 अलग-अलग मुकदमे दर्ज़ किए हैं। पांच मामलों में उसकी जमानत हो गई है। छह मामलों में अभी सुनवाई होनी है। स्पष्ट है कि सरकार प्रतिरोध करने वालों को प्रताड़ित करने के लिए ही ढेर सारी एफआईआर लिखवाती है।
बहरहाल, उपर्युक्त जिलाधिकारी के खिलाफ हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां महत्त्वपूर्ण है। कारण यह कि आईएएस अधिकारियों को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त होती है। अगर वे सरकार के अनुचित आदेशों का पालन करने से इनकार कर दें तो उन्हें अधिकतम कुछ समय के लिए निलम्बित ही किया जा सकता है। नौकरी जाने का कोई खतरा नहीं होता।
पुराने समय में ऐसे कई उदाहरण हैं जब वरिष्ठ अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों की नियम विरुद्ध बात मानने से इनकार किर दिया था। प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के निजी सचिव रहे पूरन चंद्र पाण्डे, जो लखनऊ के जिलाधिकारी भी रहे थे, ने इस लेखक को एक बार बताया था कि पंत जी अपने एक परिचित का कोई काम मुझसे करवाना चाहते थे। नियमानुसार वह काम नहीं किया जा सकता था। मैंने मना कर दिया।
बाद में पंत जी ने दो-तीन बार फिर जोर दिया लेकिन मैंने नहीं किया। फिर उन्होंने कहा- अच्छा, यह बताओ कि यह काम कैसे होगा। मैंने कहा- मुझे हटा दीजिए या छुट्टी पर भेज दीजिए और किसी दूसरे अधिकारी से करा लीजिए। इसके बाद पंत जी ने मुझसे उस काम का कभी कोई जिक्र नहीं किया।
अब ऐसे अधिकारी दुर्लभ हैं। अपनी अनेक महत्वाकांक्षाओं के कारण अधिकतर अधिकारी नेताओं को खुश करने के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं। उनकी शपथ के कोई अब मायने नहीं रहे।
- न जो, 08 सितम्बर 2026 (Indian Express में आज प्रकाशित हाई कोर्ट के विस्तृत आदेश पर आधारित)

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