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Tuesday, May 23, 2017

दलित राजनीति में नयी सुगबुगाहट


दलित राजनीति के मोर्चे पर इस समय सबसे ज्यादा हलचल और अगर-मगर हैं. भारतीय राजनीति का यह अध्याय नये सिरे से लिखा जाने वाला तो नहीं? दलितों के एकजुट समर्थन के सहारे चार बार यूपी की सत्ता हासिल करने वाली बहुजन समाज पार्टी बिखराव के दौर से गुजर रही है. कांग्रेस की अखिल भारतीयता का अपहरण करने में लगभग कामयाब हो चुकी भारतीय जनता पार्टी दलितों का राष्ट्रव्यापी समर्थन पाने की जीतोड़ कोशिश में है और दलित राजनैतिक नेतृत्व में बन रहे निर्वात में भीम सेना की हुंकार गूंज रही है. राजनीतिक प्रेक्षकों, पार्टियों और नेताओं के कान खड़े हैं. बसपा और भाजपा नेतृत्व के माथे पर स्वाभाविक ही चिंता की रेखाएं है.
पहले थोड़ा भीम सेना के बारे में. कोई दो साल पहले नौकरी की तलाश में भटकते दो युवकों, विनय रत्न और चंद्रशेखर ने तय किया कि उन्हें अपने दलित समाज की उन्नति के लिए कुछ सार्थक कदम उठाने चाहिए. शिक्षा ही सबसे अच्छा रास्ता सूझा. सो, सहारनपुर के फतेहपुर भादों गांव में एक पाठशाला खोली गयी. दलित बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के लिए. यह कारवां तेजी से बढ़ा. बताते हैं कि आज पश्चिम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और शामली जिलों में ऐसी 350 पाठशालाएं हैं. अभियान सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रहा. कुएं से पानी पी लेने जैसे मुद्दों पर दलित उत्पीड़न, महिलाओं पर अत्याचार और भेदभाव के कई मुद्दे भी उठने लगे. इस तरह भीम सेना बनी. पाठशालाओं के साथ सदस्यता बढ़ती गयी. उत्पीड़न के खिलाफ आवाज दबायी जाने लगी तो वह और जोर से उठने लगी. पिछले दिनों शब्बीरपुर में सवर्णों के हाथों एक दलित युवक की मौत के विरोध को प्रशासन ने दबाया तो वह भड़क उठा. उसके नेताओं पर नक्सली होने तक के आरोप लगे. भीम सेना एक आह्वान पर जंतर-मंतर पर बड़े और आक्रामक प्रदर्शन ने देश का ध्यान खींचा है.
भीम सेना के प्रदर्शन की अनुगूंज कोई तीन दशक पहले कांशीराम के ऐसे ही प्रदर्शनों की याद दिलाती है, जिनसे अंतत: बहुजन समाज पार्टी का जन्म हुआ था. इस प्रदर्शन में सवर्ण-विरोध और भाजपा-संघ विरोधी स्वर भी बहुत मुखर हुए. भीम सेना का कोई राजनैतिक कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है लेकिन उसमें दलितों को आकर्षित करने वाले राजनैतिक चुम्बक के संकेत देखे जा सकते हैं. गुजरात में पटेलों और महाराष्ट्र में मराठों के हालिया प्रदर्शनों के तेवर भी इसमें देखे गये.
2014 के लोक सभा चुनाव में पूरे सफाये और उत्तर प्रदेश के हाल के विधान सभा चुनाव में बहुत बड़ी पराजय के बाद मायावती बहुजन समाज पार्टी को बचाये रखने का रास्ता ही खोज रही थीं कि भीम सेना ने उनकी नींद उड़ा दी है. दलित नेतृत्व कहीं और उभरना उन्हें क्यों मंजूर होगा. सहारनपुर जिले में दलित अत्याचार की बड़ी वारदात के बावजूद शांत बैठी मायावती मंगलवार को भागी-भागी सहारनपुर गयीं तो सिर्फ इसलिए कि बीते रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर भीम सेना के आह्वान पर हजारों दलितों की भीड़ जमा हो गयी थी. चिंता की लकीरें भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के माथे पर भी देखी जा रही हैं. दोनों की परेशानी के बड़े कारण हैं और उनका तात्कालिक महत्त्व भी है.
बाबा साहेब आम्बेडकर की वैचारिकी और क्षेत्रीय दलित नेताओं के आंदोलन ने स्वतंत्रता-आंदोलन के समय से महाराष्ट्र में चाहे जितनी लहरें उठायीं हों, सत्ता की राजनीति से दलित सशक्तीकरण का प्रयोग कांशीराम ने ही सफल करके दिखाया. बामसेफऔर डीएस-4’ के आंदोलनों से होते हुए 1984 में बहुजन समाज पार्टी बना कर कांशीराम ने सम्पूर्ण दलित, बल्कि बहुजन समाजको राजनीतिक रूप से गोलबंद किया. वे दलित-वंचित जातियों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि उनकी दयनीय हालत के लिए सवर्ण मानसिकता वाले राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं और इसे बदलने के लिए उन सबका बहुजन समाज पार्टी को सत्ता तक पहुंचाना जरूरी है. कांशीराम की आवाज पंजाब और महाराष्ट्र जैसे दलित बहुल राज्यों में क्यों कर अनसुनी रही, यह अलग विश्लेषण की मांग करता है लेकिन उत्तर प्रदेश के दलित समाज ने बसपा को सिर-आंखों पर बैठाया.
पिछले दो-ढाई दशक से यूपी और राष्ट्रीय स्तर पर भी मायावती की राजनैतिक चमक-धमक इसी दलित- समर्पण की देन रही मगर 2014 और 2017 के चुनावों ने साबित कर दिया कि वे दलित समाज की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं. उनकी अपनी उपजाति के जाटवों को छोड़ दें तो बाकी दलित जातियां बसपा से छिटकी हुई हैं. बल्कि, भीम सेना के उभार में नये जाटव नेतृत्व के उभार के संकेत मिल रहे हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन की लहर ने 2014 में दलित वोटरों को नरेंद्र मोदी की तरफ झुकाया तो 2017 के विधान सभा चुनाव में वे मायावती से मोहभंग के कारण भाजपा की अप्रत्याशित भारी विजय का कारण बने. नरेंद्र मोदी के लखनऊ में बाबा साहेब की अस्थियों के सामने मत्था टेकने, दलित बस्तियों में बौद्ध भिक्षुओं की यात्राओं, अमित शाह प्रभृति का दलित बस्तियों में खाना खाने और बड़े पैमाने पर दलितों-पिछड़ों को टिकट देने की भाजपाई रणनीति ने यूपी फतह करा दी. अब इसी प्रयोग को भाजपा दूसरे राज्यों में दोहराने जा रही है, खासकर वहां जहां जल्दी ही विधान सभा चुनाव होने है.
नरेंद्र मोदी का कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा भी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का दलित-आधार बनाने और उसे मजबूत करने की मांग करता है. कभी अविजित मानी जाने वाली कांग्रेस की अखिल भारतीयता के पीछे दलित-मुस्लिम जनाधार मुख्य हुआ करता था. इसी जनाधार के खोते जाने से कांग्रेस हाशिए पर जाती रही और आज भाजपा को अपनी अखिल भारतीयता पर पक्की मोहर लगाने के लिए ही दलित समर्थन की सबसे ज्यादा जरूरत है.
इसलिए भीम सेना का एकाएक उभार पर भाजपा चौकन्नी है. योगी सरकार बनने के दो महीने में ही पश्चिम यूपी के दलित उत्पीड़न काण्ड और उससे उपजा भीम सेना का आक्रोश भाजपा के लिए बड़ा सिर दर्द बन सकता है. उसके ध्यान में निश्चय ही है कि तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में दलित वोट कितने महत्वपूर्ण हैं. एक मात्र बड़ा राज्य जहां अभी कांग्रेस सत्ता में है और जिसे भाजपा उससे छीन लेना चाहती है, उस कर्नाटक में दलित अभी कांग्रेस के साथ दिखते हैं. यह समीकरण वह तोड़ना चाहती है.  मतलब यह कि भाजपा के एजेण्डे में दलित अभी सबसे ऊपर हैं.
भाजपा की मुश्किल यह भी है कि उसके और उससे जुड़े संगठनों के मूल चरित्र में बड़ा बदलाव लाये बिना उसका दलित-हितैषी चेहरा विश्वसनीय नहीं बन सकता. दलित-प्रेम के तमाम नारों, अभियानों और कार्यक्रमों के बावजूद आये दिन होने वाले दलित-उत्पीड़नों से उसका दामन दागी बना रहता है.

बहरहाल, दलित समाज इस समय राजनैतिक नेतृत्वहीनता की स्थिति में है. भीम सेना के उभार में वे एक नई उम्मीद देख सकते हैं. ऐसा हुआ तो बसपा और हाशिये पर जाएगी एवं भाजपा की उम्मीदों को झटका लग सकता है. (प्रभात खबर, 24 मई, 2017) 

Monday, April 17, 2017

कांशीराम ने अपना घर छोड़ा था, मायावती ने उनके मूल्य छोड़ दिये

                                                        
अपने भाई आनंद कुमार को बहुजन समाज पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पार्टी में अपने बाद नम्बर दो की हैसियत देने के लिए मायावती की काफी आलोचना हो रही है. विरोधी दल ही नहीं, दलित आंदोलन से जुड़े कई पुराने नेताओं ने भी इस कदम के लिए उनकी आलोचना की है.
बसपा मुखिया मायावती ने शुक्रवार को अम्बेडकर जयंती पर लखनऊ में आयोजित रैली में यह घोषणा की. उन्होंने यह शर्त जरूर रखी है कि आनंद कुमार कभी विधायक, सांसद, मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. हाँ, वे अपना रियल एस्टेट बिजनेस चलाने और घर वालों को राजनीति में लाने के लिए स्वतंत्र होंगे.
विपक्षी नेता इस कारण आलोचना कर रहे हैं  कि अब तक मायावती खुद दूसरे दलों पर परिवारवाद को बढ़ाने का आरोप लगाती रही हैं.
कांशीराम के पुराने साथियों और कई दलित नेताओं ने इसलिए उनकी निंदा की है कि कांशीराम ने दलित आंदोलन के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए अपने परिवार से सारे सम्पर्क तोड़ लिये थे. कांशीराम ने मायावती को अपना राजनैतिक वारिस बनाया था और उनसे अपने काम को आगे ले जाने की उम्मीद की थी.  
इस प्रसंग में यह जानना समीचीन होगा कि दलित आंदोलन को व्यापक रूप देने और बामसेफएवं डीएस-4’ जैसे संगठनों के जरिए बहुजन समाज पार्टी को खड़ा करने वाले कांशीराम का अपने परिवार और सम्पति के बारे में क्या सोचना था और उन्होंने किया क्या था.
सन 1978 में बामसेफ’ (बैकवर्ड एण्ड माइनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लॉई फेडरेशन) को संगठन का औपचारिक रूप देने के बाद कांशीराम ने पुणे में अपनी नौकरी छोड़ दी थी और पूरी तरह दलित आंदोलन के लिए समर्पित हो गये. तभी उन्होंने तय कर लिया था कि अब अपने परिवार से भी कोई ताल्लुक नहीं रखेंगे. उन्होंने कई प्रतिज्ञाएं कीं और अपने घर वालों को बताने के लिए लम्बी चिट्ठी लिखी थी.
दलित मामलों के अध्ययेता प्रोफेसर बदरीनारायण ने अपने पुस्तक कांशीराम: लीडर ऑफ दलित्समें एक उद्धरण दिया है जिसमें कांशीराम की बहन सबरन कौर के हवाले से बताया गया है कि कांशीराम ने कभी घर न लौटने, खुद का मकान न बनाने और दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के घरों को ही अपना घर मानने की शपथ ली थी. उन्होंने अपने सम्बंधियों से कोई नाता नहीं रखने, किसी शादी, जन्म दिन समारोह, अंत्येष्टि, आदि में भाग न लेने और बाबा साहब अम्बेडकर का सपना साकार करने तक चैन से न बैठने की कसम खायी थी.
कांशीराम की चिट्ठी पढ़कर माता बिशन कौर बहुत परेशान हुईं थीं और बेटे को मनाने पुणे भागीं. उन्होंने कांग्रेस के एक दलित विधायक की बेटी से कांशीराम का विवाह तय रखा था. दो महीने तक साथ रह कर वे कांशीराम को मनाती रहीं.  फिर हार कर बहुत दुख के साथ वापस लौट आईं.
बाद की घटनाएं गवाह हैं कि कांशीराम ने अपनी  सारी कसमें निभाईं. राखी बांधना तो दूर, वे अपनी बहन की शादी में भी शामिल नहीं हुए. न ही उसकी अचानक मृत्यु पर गये. बड़े बेटे होने के बावजूद वे अपने पिता की चिता को अग्नि देने नहीं गये. सम्पत्ति अर्जित करने का तो सवाल ही नहीं था. नौकरी छोड़ने के बाद वे अपने बकाया भत्ते लेने भी दफ्तर नहीं गये थे.
कांशीराम का पूरा जीवन दलितों की आजादी और उनके अधिकारों के लिए जबर्दस्त संघर्ष और त्याग का उदाहरण है. मायावती से भी उन्होंने ऐसी ही अपेक्षा की थी, जब यह कहा था कि मेरी दिली तमन्ना है कि मेरी मृत्यु के बाद मायावती मेरे कामों को आगे बढ़ाएंगी.
मायावती ने भी अपने शुरुआती दौर में दलित आंदोलन के लिए कम संघर्ष नहीं किया. कांशीराम ने यूं ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था. बदरीनारायण की उसी किताब में कांशीराम को एक जगह यह कहते उद्धृत किया गया है- “मायावती ने उत्तर प्रदेश में सायकिल से घूम-घूम कर जिस तरह बहुजन समाज पार्टी का संदेश जनता तक पहुंचाया है उसे मैं कभी नहीं भूल सकता, वह भी ऐसे समय में जबकि बसपा के चुनाव जीतने के आसार दूर-दूर तक नहीं थे. इस लड़की ने बुलंदशहर से बिजनौर तक सायकिल चलायी और लगातार मेरे साथ बनी रही. अगर उसने इतनी मेहनत नहीं की होती तो मैं बसपा को इतना आगे ले जाने में सफल नहीं हुआ होता.”    
मायावती कांशीराम का बहुत सम्मान करती रही हैं. बीमारी के लम्बे दौर में मायावती ने उनकी बहुत सेवा की. जब कांशीराम के परिवार ने उनके इलाज एवं देखभाल का जिम्मा जबरन खुद लेना चाहा तो अदालत ने भी मायावती ही का साथ दिया था. कांशीराम की चिता को अग्नि मायावती ने ही दी थी.
यह सब देखते हुए दलित समाज का मायावती से यह अपेक्षा रखना कि वे कांशीराम के पदचिह्नों पर चलेंगी, अस्वाभाविक नहीं है.
सन 2017 की मायावती वही नहीं हैं जिसकी तारीफ के पुल कांशीराम बांधते थे. सायकिल चलाकर दलित समाज में घुलना-मिलना वे कबके छोड़ चुकीं. अब उनके पास आलीशान बंगले हैं. वे ऊंची चहारदीवारियों के भीतर रहती हैं. उन पर अपार दौलत जमा करने के आरोप लगते रहते हैं.
मायावती के भाई आनंद कुमार पर भी बेहिसाब कमाई करने के आरोप हैं. उनके खिलाफ जांच चल रही है. नोटबंदी के बाद उनके खाते में बड़ी रकम जमा होने की खबरें आई थीं. उसी भाई को, जो बताते हैं कि बसपा का प्राथमिक सदस्य तक नहीं था, बहुजन समाज पार्टी का दूसरे नम्बर का मुखिया घोषित करके मायावती ने स्वाभाविक ही आलोचनाओं को न्योता दिया है.

कांशीराम के जीवन मूल्य बताते हैं कि वे इस फैसले को कतई पसंद नहीं करते.  

(http://hindi.firstpost.com/politics/kanshi-ram-leave-his-family-for-dalits-and-his-aim-mayawati-bsp-anand-kumar-pr-24058.html)

Monday, April 10, 2017

मायावती : राजनैतिक बियाबान या मिशन की ओर वापसी?


उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव परिणामों के विश्लेषण का एक दौर गुजर जाने के बाद जो कतिपय प्रश्न महत्वपूर्ण बने रह गये हैं उनमें एक बहुजन समाज पार्टी और उसकी एकछत्र नेत्री मायावती के बारे में है. दलितों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिए कांशीराम ने सत्ता की जिस राजनीति को अनिवार्य माना था, क्या उसी राजनीति के विद्रूप ने दलित आंदोलन और बसपा को त्रासद अंत तक ला दिया है? बसपा के सामने अब सिर्फ राजनैतिक बियाबान है या मायावती सम्पूर्ण दलित समाज को एक बार फिर राजनैतिक रूप से एकजुट करने में समर्थ होंगी? क्या उनमें इसकी क्षमता और दृष्टि है?
अपनी पराजय के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में छेड़-छाड़ की साजिश को जिम्मेदार ठहरा कर मायावती ने प्रकट रूप में अपनी अपरिपक्वता ही का परिचय दिया. क्या वे इसके वास्तविक कारण तलाशने का प्रयास भी कर रही हैं? क्या उन्हें लगता है कि कुछ रणनीतिक भूलें हुई हों? क्या दलित आंदोलन के मूल मिशन से भटकने के जो आरोप लगे हैं, उनमें कुछ सच्चाई हो सकती है?
बसपा छोड़ने वाले कई नेता मायावती पर तरह-तरह के आरोप लगाते रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर, वह भी काडर स्तर से नेतृत्व के प्रति शिकायत और असंतोष के स्वर पहली बार उठ रहे हैं. बसपा के कुछ नेता और खासकर कार्यकर्ता स्वीकार करने लगे हैं पार्टी अपने मूल उद्देश्य और एजेण्डे से भटक गयी.  इसीलिए उसकी दुर्गति हुई.
कहा जा रहा है कि बहुजन समाज पार्टी को बहुजन की बजाय सर्वजन की पार्टी बना दिया गया. सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों को बहुत महत्व दिया गया. दलित, विशेष रूप से गैर-जाटव दलित जातियां उपेक्षित रह गईं. पार्टी के पुराने, समर्पित नेताओं की उपेक्षा की गयी.
दलित अध्ययेता और राजनैतिक चिंतक इस बारे में काफी समय से मायावती को सचेत करते रहे हैं. 2007 में पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आयी बसपा जब 2009 के लोक सभा चुनाव में अपेक्षित सीटें नहीं जीत सकीं तब दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने  मायावती के लिए पांच बातेंशीर्षक से एक छोटा लेख लिखा था. उसमें एक सवाल यह था कि “किसकी सलाह पर मायावती ने इतने व्यापक पैमाने पर ब्राह्मणों को उच्च पदों पर बैठा दिया? क्या दलित सरकार का कोई स्पष्ट दलित एजेण्डा है? अभी हाल में प्रदेश के महाविद्यालयों में 85 प्रिंसिपल नियुक्त किये गये जिसमें एक भी दलित नहीं है.”  उन्होंने चेतावनी दी थी कि “इन बातों पर बसपा फौरन विचार नहीं करती तो आगामी विधान सभा चुनावों में उसे विपक्ष में बैठना पड़ेगा, वह भी मुख्य विपक्षी दल के रूप में नहीं, बल्कि तीसरे या चौथे पायदान पर.”
आज लोक सभा में बसपा का एक भी सदस्य नहीं. प्रदेश विधान सभा में मात्र 19 विधायकों के साथ वह तीसरे पायदान पर है.
2007 में पूर्ण बहुमत पाने वाली बसपा 2012 में अपनी सत्ता बचा नहीं सकी थी. उसी साल अमेरिका की केलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रदीप छिब्बर और राहुल वर्मा ने बसपा की राजनैतिक रणनीति और चुनावी प्रदर्शन पर अध्ययन किया. उन्होंने लिखा था कि “2009 से विभिन्न राज्यों के विधान सभा चुनावों में बसपा का प्रदर्शन खतरनाक गिरावट के संकेत देता है और लगता नहीं कि वह 2007 जैसा प्रदर्शन दोहरा पाएगी.”  इसके कारणों की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा था कि “एक तो बसपा में बाहर से आये ऐसे नेताओं को तरजीह दी गयी जिनकी निष्ठा उसकी विचारधारा में है ही नहीं. दूसरा कारण, जो कहीं ज्यादा नुकसानदेह साबित हुआ, यह कि मायावती ने पार्टी संगठन में  सत्ता-केंद्र पनपने के भय से दूसरे नेताओं को उभरने नहीं दिया. किसी पार्टी के लम्बे समय तक सक्रिय रहने और विस्तार पाने के लिए दूसरे-तीसरे दर्जे के नेताओं का विकास जरूरी होता है.”
ये बहुत महत्वपूर्ण सुझाव थे जिन पर मायावती ने ध्यान नहीं दिया. चुनावों में वे 50 फीसदी तक टिकट सवर्णों को देने लगीं. नतीजा यह हुआ कि दलित जातियों का, मायावती के अपने जाटवों को छोड़कर, बसपा से मोहभंग होने लगा. बसपा के कई पुराने नेता, जो कांशीराम के समय से दलित या बहुजन आंदोलन को खड़ा करने में समर्पित थे, पार्टी छोड़कर जाने लगे या मायावती ने ही उन्हें बाहर कर दिया.  
2017 के विधान सभा चुनावों के लिए भाजपा की रणनीति में बसपा की इन कमजोरियों का लाभ उठाना प्राथमिकता पर था.  इसकी अनदेखी कर मायावती अपनी तथाकथित सोशल इंजीनीयरिंगपर लगी रहीं, जिसके साथ इस बार मुसलमानों पर अत्यधिक फोकस भी जोड़ दिया गया. मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया, सवर्णों ने किनारा कर लिया और बहुतेरे दलित साथ छोड़ गये.
चूंकि उत्तर प्रदेश में दलित इतनी बड़ी तादाद में नहीं हैं कि अकेले उनके समर्थन से बसपा सत्ता पा सके, इसलिए सवर्णों को साथ लेना मायावती की चुनावी रणनीति की मजबूरी थी. कांशीराम ने भी इसे अपने भागीदारीसिद्धांत में शामिल किया था. मगर मायावती ने इसे ही सत्ता-प्राप्ति का सदाबहार फॉर्मूला मान लिया और दलित एजेण्डे की उपेक्षा की. कांशीराम दलित-सवर्ण एकरसता को तब तक व्यावहारिक नहीं मानते थे जब तक कि दलित बराबरी का दर्जा नहीं पा लेते.
कांशीराम ने दो दशक से भी ज्यादा समय तक अथक मेहनत और अविराम संघर्ष से जिस दलित आंदोलन को मिशनमान कर खड़ा किया था, वह आज बिखरने की कगार पर है. इसकी जिम्मेदारी स्वाभाविक ही मायावती पर आती है. ये वही मायावती हैं जिन्हें कांशीराम ने 2001 में अपना वारिस घोषित किया था. 25 अगस्त 2003 को लखनऊ की विशाल रैली में उन्होंने  कहा था कि “मेरी तीव्र इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद मायावती मेरे अधूरे कामों को पूरा करें.”  वे मायावती को इसमें सक्षम मानते थे और अपने पुराने साथियों से कहीं ज्यादा उन पर भरोसा करते थे.
2007 में मायावती के नेतृत्व में बसपा को पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में काबिज देखने के लिए कांशीराम जीवित नहीं थे. लेकिन उसी के बाद बसपा का लगातार पराभव और विचलन भी होता गया. आज दस साल बाद के चुनाव नतीजों ने मायावती के नेतृत्व और बसपा के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है.
1983 से कांशीराम के साथी रहे दलित नेता दद्दू प्रसाद को, जिन्हें डेढ़ साल पहले मायावती ने पार्टी से निकाल दिया था, हाल में बसपा में वापस लिए जाने से  क्या यह समझा जाए कि मायावती आत्मचिंतन कर रही हैं? क्या वे बसपा को मिशनकी राह पर वापस लाएंगी?
ऊंची चहारदीवारी और अत्यंत गोपनीयता में रहने वाली मायावती के बारे में कोई भी जवाब समय ही दे सकता है.
(http://hindi.firstpost.com/politics/up-assembly-elcection-2017-will-mayawati-be-able-to-restore-bsp-might-in-up-politics-sa-23177.html )