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Monday, March 05, 2018

कितनी दूर तक चलेगी सपा-बसपा जुगलबंदी ?


उत्तर प्रदेश के दो लोक सभा उप-चुनावों- गोरखपुर और फूलपुर- में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को बहुजन समाज पार्टी के समर्थन और फिर राज्य सभा चुनावों में सपा के समर्थन से बसपा प्रत्याशी को जिताने के समझौते की घोषणा चौंकाने वाली ही नहीं, ऐतिहासिक भी है.

मायावती या उनका प्रत्याशी सपा के समर्थन से राज्य सभा जाएंगे, यह इतिहास का खुद को दोहराना रहा है या कोई नयी इबारत लिखी जाने वाली है?

पचीस वर्ष पहले सन 1993  में उग्र हिंदुत्त्व की लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने से रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में चुनावी करार हुआ था. यह समझौता ऐतिहासिक इस मायने में था कि पिछड़ों और दलितों के आक्रामक समाजिक रिश्ते चुनावी गठबंधन में बदल गये थे. बसपा के संस्थापक अध्यक्ष कांशीराम और तब सपा के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव की यह रणनीति सफल हुई थी. बाबरी मस्जिद ध्वंस का श्रेयऔर अयोध्या में राम मंदिर बनाने के संकल्प के साथ चुनाव लड़ने वाली भाजपा तब सत्ता से वंचित रह गयी थी, हालांकि सबसे ज्यादा विधायक उसी के जीते थे.

जून 1995 में सपा-बसपा नेताओं की हिंसक झड़पों और राज्य अतिथि गृह में मायावती पर हमले के बाद यह समझौता टूट गया था. भाजपा ने इस लड़ाई का खूब फायदा उठाया. अपने समर्थन से एकाधिक बार मायावती की सरकार बनवाकर उसने सपा-बसपा की दरार चौड़ी कर दी. पिछले 23 वर्षों में चुनावी दोस्ती की बात कौन कहे, मुलायम और मायावती ने एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखा.

अखिलेश के नेतृत्त्व में आई नरमी 

सन 2016 में समाजवादी पार्टी के आंतरिक कलह के बाद मुलायम सिंह के नेपथ्य में जाने और पार्टी की कमान अखिलेश यादव के हाथ आने के बाद इन तल्ख रिश्तों में कुछ मुलायमियत के संकेत मिले थे. 2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने के प्रस्ताव पर अखिलेश ने बसपा के साथ मेल-मिलाप की सम्भावना पर हामी भरी थी, हालांकि तब मायावती ने प्रस्ताव सिरे से खारिज कर दिया था. फिर सपा और कांग्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा था.

मायावती के रुख में बदलाव तब दिखा जब बिहार में नीतीश कुमार के भाजपा के साथ चले जाने के बाद लालू यादव ने भाजपा-विरोधी दलों की बड़ी रैली पटना में बुलाई और अखिलेश के साथ मायावती को भी आमंत्रित किया. मायावती रैली में तो नहीं गईं लेकिन भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने के प्रस्ताव पर सहमत दिखीं. तब उन्हंने कहा था कि बसपा भाजपा-विरोधी मोर्चे में शामिल हो सकती है बशर्ते सीटों का बंटवारा पहले कर लिया जाए. उसके बाद बात आयी-गयी हो गयी थी.

दिसम्बर 2017 में गुजरात में भाजपा की पुन: विजय के बाद  उत्तर प्रदेश में होने वाले दो लोक सभा उप-चुनावों में विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने की चर्चा चली थी. गोरखपुर और फूलपुर लोक सभा सीटें क्रमश:  मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद वर्मा के इस्तीफे से खाली हुई हैं. यह भी चर्चा थी कि फूलपुर से मायावती को संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी बनाया जाए तो भाजपा को हराया जा सकता है. मायावती ने कुछ मास पूर्व राज्य सभा में अपनी बात ठीक से रखने का मौका नहीं दिये जाने का आरोप लगा कर सदन से इस्तीफा दे दिया था.

वोटों का गणित

इसी दौरान राज्य सभा चुनाव का गणित भी चर्चा में रहा. बसपा अपने मात्र 19 विधायकों के बल पर एक भी राज्य सभा सीट नहीं जीत सकती. उधर 47 विधायकों वाली सपा के पास अपना एक प्रत्याशी जिताने के बाद 10 वोट बचते हैं. अगर ये दस वोट बसपा को मिल जाएं तो चंद और वोट (कांग्रेस से) जुटाकर बसपा राज्य सभा की एक सीट जीत जाएगी. अन्यथा आसार हैं कि भाजपा जोड़-तोड़ से राज सभा की नौवीं सीट भी जीत लेगी. आठ सीटें जीतने की स्थिति में वह आराम से है.   

उप-चुनावों का मत-गणित भी रोचक है. 2014 के लोक सभा चुनाव में गोरखपुर में भाजपा को मिले मत (51.80%) सपा ( 21.75%) और बसपा (16.95%) को मिले कुल मतों से काफी ज्यादा थे. मगर 2017 के विधान सभा चुनाव में सपा+कांग्रेस और बसपा  के कुल वोट पांच में से चार विधान सभा क्षेत्रों में भाजपा से अधिक थे.

यही हाल फूलपुर लोक सभा सीट का भी था. आसन्न उप-चुनाव में कांग्रेस ने भी अपने प्रत्याशी खड़े किये हैं. राज्य में कांग्रेस की पतली हालत को देखते हुए कहा जा सकता है कि सपा-बसपा के वोटर एकजुट रहे तो भाजपा के लिए चुनाव कतई आसान न होगा.

इस सम्भावना पर दोनों तरफ से कोई बोल नहीं रहा था, भीतर-भीतर बातचीत अवश्य चल रही थी. मायावती दोनों लोक सभा सीटों के बसपा कोआर्डिनेटरों से लगातार सम्पर्क में थीं.
तीन मार्च को त्रिपुरा, नगालैण्ड और मेघालय के चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में आते ही लगता है कि सपा-बसपा को साथ आने की जरूरत शिद्दत से महसूस होने लगी. अखिलेश यादव पहले से ही एकता के पक्ष में थे. मायावती को भी वक्त की नजाकत समझ में आ गयी और समझौते का ऐलान हो गया.

मगर दोनों तरफ सतर्कता भी

इस समझौते की घोषणा अखिलेश ने की न मायावती ने. स्थानीय नेताओं ने इस सहमति का ऐलान किया. दोनों फिलहाल इसे घोषित रूप से बहुत महत्त्व नहीं दे रहे. इसकी कुछ खास वजह हैं. एक तो यही कि दोनों के रिश्तों की खटास अभी पूरी मिटी नहीं है. दोनों के जनाधार वाली पिछड़ी और दलित जातियां परम्परागत टकराव वाली हैं. दोनों मिलकर भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकते हैं, इस आशंका से समझौता तोड़ने की साजिशें बाहर-भीतर से हो सकती हैं. सतर्कता स्वाभाविक है.

मायावती ज्यादा सावधान हैं. जब मीडिया में यह कयास लगाये जाने लगे कि सपा-बसपा का यह चुनावी समझौता 2019 के लोक सभा चुनाव तक जा सकता है तो उन्होंने तुरन्त सफाई दी कि बसपा ने किसी पार्टी से चुनावी समझौता नहीं किया है. हम सिर्फ भाजपा को हरा सकने वाले मजबूत उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं.
मायावती इस चुनावी रणनीति को परखना चाहती हैं. वे जानती हैं कि उनके कहने पर दलित वोट सपा की तरफ चला जाएगा. उनकी चिंता यह होगी कि सपा का वोटर बसपा का साथ देता है या नहीं. फिर, दलित वोटों में भाजपा की सेंध भी उनकी चिंता का बड़ा कारण होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछड़ों (यानी सपा) का साथ देने की बजाय दलित वोटर भाजपा के साथ जाना चाहें? भाजपा इस जोड़-तोड़ में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली.

2019 की सम्भावनाएं

बड़ा सवाल स्वाभाविक ही यह उठ रहा है कि क्या सपा-बसपा की यह जुगलबंदी 2019 के लोक सभा चुनाव में किसी बड़े भाजपा विरोधी मोर्चे का आधार बनेगी? त्रिपुरा के नतीजों से चिंतित ममता बनर्जी से लेकर तेलंगाना के टी चंद्रशेखर राव और भाजपा से खिन्न चल रहे तेलुगु देशम के नेता ऐसी सम्भावना पर चर्चा कर ही रहे हैं. सपा-बसपा का साथ आना इस मुहिम को और हवा दे सकता है.

बिहार में एक-दूसरे के धुर विरोधी लालू और नीतीश भाजपा को हराने के लिए एक मंच पर आये और सफल हुए थे. उत्तर प्रदेश में कट्टर शतुत्रा पालने वाले सपा-बसपा को साथ लेना विपक्षी एकता के सूत्रधारों को सबसे कठिन लगता रहा है. आज जब वे स्वयं परस्पर सहमति तक पहुंचे हैं तो आगे की राह आसान बन सकती है.
उत्तर प्रदेश की 80 लोक सभा सीटें दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने की राह आसान करती हैं. अगर यहां भाजपा के मुकाबले तगड़ा मोर्चा बने तो 2019 की लड़ाई कांटे की हो जाएगी. इसकेलिए सपा-बसपा की दोस्ती अनिवार्य होगी.

विपक्षी एकता के लिए मायावती के रुख में आते सकारात्मक परिवर्तन का संकेत यह भी है कि उन्होंने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को समर्थन देने की पेशकश की है. उन्होंने कहा है कि अगर यूपी में कांग्रेस के साथ विधायक बसपा को समर्थन दें तो  बसपा मध्य प्रदेश से राज्य सभा के चुनाव में कांग्रेस को समर्थन दे सकती है. दरअसल, बसपा को यूपी से अपने प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए सपा के समर्थन के अलावा कांग्रेस की मदद भी चाहिए होगी. मध्य प्रदेश में बसपा के चार विधायक हैं. हाल के उप-चुनावों में जहां कांग्रेस जीती, वहां बसपा ने अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये थे.

मायावती जाएंगी राज्य सभा या कोई और?       

यह प्रश्न भी स्वाभाविक है कि सपा के सहयोग से बसपा किसे राज्य सभा भेजना चाहती है? क्या मायावती उम्मीदवार होंगी? कुछ महीने पहले ही उन्होंने राज्य सभा से त्याग पत्र दिया है. ऐसे में यही सम्भावना ज्यादा लगती है कि वे अपने भाई आनंद कुमार को राज्य सभा भेजेंगी, जिसे उन्होंने हाल में पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है.

मायावती के अगले कदम का आकलन करना हमेशा कठिन रहा है. पार्टी को मजबूत करने में ज्यादा समय देने के लिए वे खुद अलग रह कर आनन्द को चुनाव लड़ा सकती हैं. या क्या पता, इस आशंका से कि भाजपा विरोधी मुहिम का हिस्सा बनने पर मोदी सरकार आय से अधिक सम्पति के मामलों में सीबीआई को उनके पीछे लगा सकती है, वे पुन: राज्य सभा पहुंच कर विशेषाधिकार का एक कवच ओढ़ने की सोच रही हों.    


 (https://hindi.firstpost.com/politics/support-akhilesh-yadav-samajwadi-party-in-byelection-may-be-a-long-term-strategy-of-mayawati-93954.html)

Tuesday, December 05, 2017

निकाय चुनाव: यूपी सही में क्या बोली?


उतर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में “विपक्ष का सफाया करने वाली विजय” का सिंहनाद करने के लिए भारतीय जनता पार्टी एक विजेता टीम मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्त्व में गुजरात पहुंच रही है. वहां यह संदेश देना है कि भाजपा सरकारों को जनता कितना पसंद कर रही है और जो कांग्रेस गुजरात-विजय का दिवास्वप्न देख रही है वह राहुल गांधी की अमेठी में नगर निकायों की एक सीट नहीं जीत सकी.
क्या वास्तव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के नगर निकायों में विपक्ष का सफाया कर दिया है, जैसा कि उसके नेताओं के अलावा मीडिया का बड़ा तबका भी बता रहा है? क्या खुद विपक्ष ने, विशेष रूप से बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने, इन चुनाव नतीजों को गौर से देखा और विश्लेषित किया है? आखिर वे क्यों ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगाकर खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचेकी कहावत चरितार्थ कर रहे हैं?
विपक्ष को खिसियाने की कतई जरूरत नहीं है. उसे तो भाजपा से सवाल पूछना चाहिए कि आखिर वह सिर्फ 16 नगर निगमों के चुनाव नतीजों का प्रचार कर क्यों फूली नहीं समा रही? नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के परिणामों की बात क्यों नहीं कर रही? बल्कि, विपक्ष चाहे तो इन चुनाव नतीजों से संदेश ग्रहण कर 2019 के लिए भाजपा के मुकाबले साझा मंच बनाने की पहल कर सकता है. हैरत है कि न मायावती और न ही अखिलेश यादव ने इस तरह देखा और सोचा है. लगता है वे भाजपाई प्रचार के सामने असहाय-से हो गये हैं.
क्या कहते हैं नतीजे
सोलह नगर निगमों में मेयर के 14 पद भाजपा ने जीते हैं. पार्षदों के करीब 46 फीसदी पद भी उसे हासिल हुए हैं. यह निश्चय ही बड़ी जीत है लेकिन यह कोई नई बात नहीं. नगर निगमों में भाजपा का पहले से ही कब्जा रहा है. 2012 में जब न मोदी राष्ट्रीय परिदृश्य नें थे, न योगी और यूपी में शासन समाजवादी पार्टी का था, तब के 12 नगर निगमों में मेयर के दस पद भाजपा ने जीते थे. पार्षदों में भी उसी का बहुमत था. इसलिए इस बार की विजय विशेष नहीं जबकि मुख्यमंत्री योगी समेत पूरा मंत्रिपरिषद चुनाव प्रचार में जुटा था. अकेले योगी ने ही 26 चुनाव सभाएं कीं. अखिलेश यादव और मायावती दोनों ही प्रचार करने नहीं निकले.
बड़े शहरी क्षेत्र से बाहर निकल कर नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के नतीजों पर निगाह डालते ही भाजपा की प्रचण्ड विजय का दावा फीका पड़ने लगता है. नगर पालिका परिषदों के 198 अध्यक्ष पदों में सिर्फ 70 भाजपा जीत सकी. बाकी 128 पद निर्दलीयों और विपक्षी दलों के हिस्से आये. परिषद सदस्यों के 5261 पदों में मात्र 922 (17.53%) भाजपा जीती. यहां निर्दलीयों ने 3380 (64.25%) पद जीते. सपा, बसपा ने बहुत खराब प्रदर्शन नहीं किया. नगर पंचायत अध्यक्ष के 438 पदों में भाजपा को सिर्फ 100 (22.53%) पर जीत मिली. सपा ने 83, बसपा ने 45 और निर्दलीयों ने 182 (41.55%) पद हासिल किये. पंचायत सदस्यों के 5434 पदों में केवल 664 (12.22%) भाजपा ने जीते. निर्दलीयों ने 3875 (71.31%), सपा ने 453 और बसपा ने 218 पद जीते.
निश्चित ही भाजपा ने पिछली बार की तुलना में बेहतर नतीजे हासिल किये. सभी राजनैतिक दलों में वह शीर्ष पर रही लेकिन निर्दलीयों ने उसे बहुत पीछे छोड़ा. मोदी और योगी राज में पूरा जोर लगाने के बाद मिली यह जीत “विपक्ष का सफाया करने वाली” तो नहीं ही है. बल्कि 2014 के लोक सभा और इसी वर्ष मार्च में हुए विधान सभा चुनावों के परिणामों की तुलना में भाजपा का यह प्रदर्शन फीका ही कहा जाएगा.
मुस्लिम मतदाताओं का रुझान
लोक सभा और विधान सभा चुनाव में भारी पराजय झेल चुकी बसपा की निकाय चुनावों से वापसी हुई है. दो नगर निगमों के मेयर पद उसने भाजपा से छीन कर जीते और दो में दूसरे नम्बर पर रही. इससे साबित हुआ कि शहरी इलाकों में भी उसका प्रभाव बढ़ा है. एक और महत्त्वपूर्ण संकेत यह है कि भाजपा को हराने के लिए कुछ जिलों में मुसलमानों ने एकजुट होकर बसपा को वोट दिये. दलित-मुस्लिम एका से ही बसपा को बढ़त मिली. विधान सभा चुनाव में मायावती ने इसके लिए पूरा जोर लगाया था. क्या अब उस प्रयोग का असर हो रहा है? समाजवादी पार्टी के लिए यह चिंता की बात होगी. मुलायम सिंह यादव ने कुछ दिन पहले आगाह भी किया था कि पार्टी नेतृत्त्व मुसलमानों को अपने साथ बानये रखने के प्रयास नहीं कर रहा. असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने भी पहली बार यूपी में अपना खाता खोला है. निकाय चुनावों में कई स्थानीय कारक महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं के रुझान में परिवर्तन के संकेत इससे मिलते हैं.
समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन नगर निगमों में खराब रहा लेकिन नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में उसने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया. पार्टी नेतृत्त्व ने पता नहीं क्यों इन चुनावों को गम्म्भीरता से नहीं लिया. अखिलेश यादव और दूसरे प्रमुख नेता चुनाव प्रचार के लिए निकले ही नहीं, जबकि भाजपा ने मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों को प्रचार में झौंक रखा था. मायावती ने भी न तो प्रचार किया और न ही मतदान. नतीजों के आधार पर भाजपा के दावों की पोल खोलने से भी उन्हें परहेज-सा है.
विपक्षी एकता के सूत्र
भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की वकालत करने वालों के लिए ये नतीजे उत्साहवर्धक संदेश देते हैं. निकाय चुनावों में मतदाता का रुझान सर्वथा स्थानीय मुद्दों और सम्बंधों से तय होता है. इसके बावजूद ये नतीजे संकेत देते हैं कि यदि भाजपा के मुकाबले विरोधी दलों का महागठबंधन बने तो वह 2019 में उसे कड़ी टक्कर दे सकता है. सप-बसपा भी मिलकर लड़ें तो भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है लेकिन इन दलों के साथ आने में रोड़े ही रोड़े हैं.
राज्य में पहली बार निकाय चुनाव पार्टी और चुनाव चिह्न के आधार पर लड़े गये हैं. पहले राजनैतिक दल निर्दलीयों को अपना बताने के दावे किया करते थे. इस बार उनकी जमीनी ताकत की तस्वीर खुली है. नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में 65-70 प्रतिशत निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं. 
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत सुधरने के संकेत अब भी नहीं हैं. निकाय चुनावों में उसका प्रदर्शन बहुत दयनीय रहा. सोनिया की रायबरेली ने लाज रखी लेकिन राहुल की अमेठी में कहीं उसके प्रत्याशी ही नहीं थे और जहां थे, वहां हार गये. वाम दलों ने भी कई प्रत्याशी उतारे थे. साबित यही हुआ कि उत्तर प्रदेश में उनका जनाधार समाप्त प्राय है. आपको भी कोई खास सफलता नहीं मिली.
(प्रभात खबर, 06 दिसम्बर, 2017)





Monday, April 17, 2017

कांशीराम ने अपना घर छोड़ा था, मायावती ने उनके मूल्य छोड़ दिये

                                                        
अपने भाई आनंद कुमार को बहुजन समाज पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पार्टी में अपने बाद नम्बर दो की हैसियत देने के लिए मायावती की काफी आलोचना हो रही है. विरोधी दल ही नहीं, दलित आंदोलन से जुड़े कई पुराने नेताओं ने भी इस कदम के लिए उनकी आलोचना की है.
बसपा मुखिया मायावती ने शुक्रवार को अम्बेडकर जयंती पर लखनऊ में आयोजित रैली में यह घोषणा की. उन्होंने यह शर्त जरूर रखी है कि आनंद कुमार कभी विधायक, सांसद, मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. हाँ, वे अपना रियल एस्टेट बिजनेस चलाने और घर वालों को राजनीति में लाने के लिए स्वतंत्र होंगे.
विपक्षी नेता इस कारण आलोचना कर रहे हैं  कि अब तक मायावती खुद दूसरे दलों पर परिवारवाद को बढ़ाने का आरोप लगाती रही हैं.
कांशीराम के पुराने साथियों और कई दलित नेताओं ने इसलिए उनकी निंदा की है कि कांशीराम ने दलित आंदोलन के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए अपने परिवार से सारे सम्पर्क तोड़ लिये थे. कांशीराम ने मायावती को अपना राजनैतिक वारिस बनाया था और उनसे अपने काम को आगे ले जाने की उम्मीद की थी.  
इस प्रसंग में यह जानना समीचीन होगा कि दलित आंदोलन को व्यापक रूप देने और बामसेफएवं डीएस-4’ जैसे संगठनों के जरिए बहुजन समाज पार्टी को खड़ा करने वाले कांशीराम का अपने परिवार और सम्पति के बारे में क्या सोचना था और उन्होंने किया क्या था.
सन 1978 में बामसेफ’ (बैकवर्ड एण्ड माइनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लॉई फेडरेशन) को संगठन का औपचारिक रूप देने के बाद कांशीराम ने पुणे में अपनी नौकरी छोड़ दी थी और पूरी तरह दलित आंदोलन के लिए समर्पित हो गये. तभी उन्होंने तय कर लिया था कि अब अपने परिवार से भी कोई ताल्लुक नहीं रखेंगे. उन्होंने कई प्रतिज्ञाएं कीं और अपने घर वालों को बताने के लिए लम्बी चिट्ठी लिखी थी.
दलित मामलों के अध्ययेता प्रोफेसर बदरीनारायण ने अपने पुस्तक कांशीराम: लीडर ऑफ दलित्समें एक उद्धरण दिया है जिसमें कांशीराम की बहन सबरन कौर के हवाले से बताया गया है कि कांशीराम ने कभी घर न लौटने, खुद का मकान न बनाने और दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के घरों को ही अपना घर मानने की शपथ ली थी. उन्होंने अपने सम्बंधियों से कोई नाता नहीं रखने, किसी शादी, जन्म दिन समारोह, अंत्येष्टि, आदि में भाग न लेने और बाबा साहब अम्बेडकर का सपना साकार करने तक चैन से न बैठने की कसम खायी थी.
कांशीराम की चिट्ठी पढ़कर माता बिशन कौर बहुत परेशान हुईं थीं और बेटे को मनाने पुणे भागीं. उन्होंने कांग्रेस के एक दलित विधायक की बेटी से कांशीराम का विवाह तय रखा था. दो महीने तक साथ रह कर वे कांशीराम को मनाती रहीं.  फिर हार कर बहुत दुख के साथ वापस लौट आईं.
बाद की घटनाएं गवाह हैं कि कांशीराम ने अपनी  सारी कसमें निभाईं. राखी बांधना तो दूर, वे अपनी बहन की शादी में भी शामिल नहीं हुए. न ही उसकी अचानक मृत्यु पर गये. बड़े बेटे होने के बावजूद वे अपने पिता की चिता को अग्नि देने नहीं गये. सम्पत्ति अर्जित करने का तो सवाल ही नहीं था. नौकरी छोड़ने के बाद वे अपने बकाया भत्ते लेने भी दफ्तर नहीं गये थे.
कांशीराम का पूरा जीवन दलितों की आजादी और उनके अधिकारों के लिए जबर्दस्त संघर्ष और त्याग का उदाहरण है. मायावती से भी उन्होंने ऐसी ही अपेक्षा की थी, जब यह कहा था कि मेरी दिली तमन्ना है कि मेरी मृत्यु के बाद मायावती मेरे कामों को आगे बढ़ाएंगी.
मायावती ने भी अपने शुरुआती दौर में दलित आंदोलन के लिए कम संघर्ष नहीं किया. कांशीराम ने यूं ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था. बदरीनारायण की उसी किताब में कांशीराम को एक जगह यह कहते उद्धृत किया गया है- “मायावती ने उत्तर प्रदेश में सायकिल से घूम-घूम कर जिस तरह बहुजन समाज पार्टी का संदेश जनता तक पहुंचाया है उसे मैं कभी नहीं भूल सकता, वह भी ऐसे समय में जबकि बसपा के चुनाव जीतने के आसार दूर-दूर तक नहीं थे. इस लड़की ने बुलंदशहर से बिजनौर तक सायकिल चलायी और लगातार मेरे साथ बनी रही. अगर उसने इतनी मेहनत नहीं की होती तो मैं बसपा को इतना आगे ले जाने में सफल नहीं हुआ होता.”    
मायावती कांशीराम का बहुत सम्मान करती रही हैं. बीमारी के लम्बे दौर में मायावती ने उनकी बहुत सेवा की. जब कांशीराम के परिवार ने उनके इलाज एवं देखभाल का जिम्मा जबरन खुद लेना चाहा तो अदालत ने भी मायावती ही का साथ दिया था. कांशीराम की चिता को अग्नि मायावती ने ही दी थी.
यह सब देखते हुए दलित समाज का मायावती से यह अपेक्षा रखना कि वे कांशीराम के पदचिह्नों पर चलेंगी, अस्वाभाविक नहीं है.
सन 2017 की मायावती वही नहीं हैं जिसकी तारीफ के पुल कांशीराम बांधते थे. सायकिल चलाकर दलित समाज में घुलना-मिलना वे कबके छोड़ चुकीं. अब उनके पास आलीशान बंगले हैं. वे ऊंची चहारदीवारियों के भीतर रहती हैं. उन पर अपार दौलत जमा करने के आरोप लगते रहते हैं.
मायावती के भाई आनंद कुमार पर भी बेहिसाब कमाई करने के आरोप हैं. उनके खिलाफ जांच चल रही है. नोटबंदी के बाद उनके खाते में बड़ी रकम जमा होने की खबरें आई थीं. उसी भाई को, जो बताते हैं कि बसपा का प्राथमिक सदस्य तक नहीं था, बहुजन समाज पार्टी का दूसरे नम्बर का मुखिया घोषित करके मायावती ने स्वाभाविक ही आलोचनाओं को न्योता दिया है.

कांशीराम के जीवन मूल्य बताते हैं कि वे इस फैसले को कतई पसंद नहीं करते.  

(http://hindi.firstpost.com/politics/kanshi-ram-leave-his-family-for-dalits-and-his-aim-mayawati-bsp-anand-kumar-pr-24058.html)