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Wednesday, September 16, 2026

विज्ञानियों ने बताया, नेपाल में तबाही क्यों हुई

हिमालय की लांगटांग लिरुंग चोटी का 2.2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला और 50 मीटर गहरा  हिस्सा 26 अगस्त को नीचे लुढ़क पड़ा था। नेपाल में भयावह और तिब्बत में अपेक्षाकृत कम तबाही इसी कारण मची थी। यह मलवा 5150 मीटर की ऊंचाई से सीधे 1400 मीटर नीचे घाटी में गिरा और फिर नीचे लुढ़कता चला गया। 

विज्ञानियों ने अध्ययन के बाद हिसाब लगाया है कि उस दिन लांगटांग चोटी के उत्तरी मुहाने से चट्टानों और बर्फ का  एक करोड़ 10 लाख क्यूबिक मीटर मलवा नीचे लुढ़का था,  जिसके धक्के से 5.2 रिचर पैमाने का भूकम्प भी आया। इसके बाद वह अपने साथ और भी मलवा लेकर नीचे लुढ़ता गया और वह सब कुछ बहा कर लेता या दबाता गया, जो भी उसके रास्ते में पड़ा।

यह मलवा कितना विकराल था, इसका अनुमान देने के लिए विज्ञानियों ने बताया कि उस पत्थर, बर्फ, पानी और कीचड़ से फुटबॉल के 300 मैदान 50 मीटर ऊंचाई तक भर जाते!

ऐसा क्यों हुआ?

'द वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन' ने, जो कई देशों के विज्ञानियों का साझी संस्था है और बिगड़ते पर्यावरण के अति गम्भीर परिणामों का अध्ययन करती है, इसे कई कारणों का सम्मिलित परिणाम बताया है- वैश्विक तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने, चट्टानों के अनावृत होने, चट्टानों को जकड़ी हुई सदियों पुरानी ठोस बर्फ के ढीले पड़ने, 2015 में आए भूकम्प से चट्टानों के हिलने, पिघलती बर्फ के पानी के दरारों में पैठने और वहां तक गर्मी पहुंचने के मिले-जुले कारणों से हुआ। 

इस इलाके में 2015 में 7.8 रिचर पैमाने का भूकम्प आया था। उसने चट्टानों को कितना कमजोर किया और उसका कितना असर इस हादसे का कारण बना, यह स्पष्ट नहीं है लेकिन विज्ञानी कहते हैं कि उस भूकम्प ने लांगटांग पर्वत की ढाल को अस्थिर तो किया ही हो सकता है। 

इम्पीरियल कॉलेज, लंडन में क्लाइमेट चेंज के प्रोफेसर फ्रेडरिक ओट्टो ने अध्ययन रिपोर्ट के बारे में बताया कि मानव जनित पर्यावरण संकट ने यह जरूर किया कि आधारभूत यानी सदियों से जमी बर्फीली चट्टानें ढीली पड़ने लगीं, ग्लेशियर पिघल कर पतले हुए या पीछे सरके और इन चोटियों पर खूब हिमपात होने की बजाय बारिश अधिक होने लगी।

उन्होंने कहा कि इतनी विशाल बर्फीली चट्टान का गिरना विरले ही होता है। अनुमान है कि ऐसा 1000 से 10000 साल में कभी एक बार होता है। उन्होंने बताया कि जो मलवा 1400 मीटर की ऊंचाई से गिरा, उसने और भी चोटियों-घाटियों को तोड़ा, और भी मलवा पैदा किया और नीचे लुढ़कते हुए आयतन और आवेग में विकराल होता चला गया।

इसकी गति इतनी भयानक थी कि चोटी से घाटी में गिरने के बाद वह मात्र 7-8 मिनट में तिब्बत के जीरोंग पोर्ट तक पहुंच गया। अंदाजन उसकी गति 170 किमी प्रति घण्टा थी।   

वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण कई दशकों से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, पतले हो रहे हैं। ग्लेशियरों के पीछे खिसकने यानी पिघलने की दर आधा मीटर प्रति वर्ष  थी। अब यह दर तेज हो गई है। ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार पिछले 16 वर्षों में लांगटांग लिरुंग ग्लेशियर का पिघलना 0.5% प्रति वर्ष से बढ़कर 1% से 2.3% तक प्रतिवर्ष हो गया है।   

यह चेतावनी है कि उच्च हिमालय में हो रहे परिवर्तनों पर नज़र रखी जाए, खतरनाक झीलों/ग्लेशियरों की लगातार निगहबानी हो और सीमावर्ती देश एक-दूसरे के साथ आंकड़े व अन्य जानकारियां साझा करें। 

अध्ययन-रिपोर्ट यह सुझाव भी देती है कि जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, कोयला, आदि) का इस्तेमाल जल्दी से जल्दी  बंद किया जाए।  

- न जो, 17 सितम्बर 2026