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Saturday, May 16, 2026

'टनल' - हिमालय के सरोकारों का स्पर्श मात्र

‘महामाया’, ‘कालीचाट’, ‘गाफिल’ समेत कुछ अन्य उपन्यास लिख चुके सुनील चतुर्वेदी ने इस बार ‘हिमालय की घुटती सांसें’ को ‘टनल’ उपन्यास का विषय बनाया है। नवम्बर 2023 में उत्तरकाशी जिले के सिल्क्यारा नामक स्थान में चार धाम राजमार्ग के लिए निर्माणाधीन सुरंग के भीतर भारी भू-स्खलन हो जाने से 41 मजदूर फंस गए थे। उन्हें बाहर निकालने के लिए कई दिन तक कई प्रकार के उपाय किए गए, भारी-भारी मशीनें मंगवाई गईं, देश-विदेश से विशेषज्ञ बुलाए गए लेकिन सब विफल रहे। अंत में ‘रैट होल माइनर्स’ की सहायता से सुरंग में फंसे श्रमिक 17 दिन बाद बचाए जा सके थे।  

‘रैट होल माइनर्स’ पहाड़ या धरती के भीतर बहुत छोटे से छेद से घुसकर खनन का खतरनाक काम किया करते हैं, जो अवैध घोषित है। जब तमाम विशेषज्ञ और बड़ी-बड़ी मशीनें फेल हो गईं तब यही अवैध काम करने वाले दीन-हीन श्रमिक काम आए थे।

खैर, सुनील चतुर्वेदी ने सिल्क्यारा हादसे के बहाने हिमालय के विनाश और असंगत विकास नीतियों पर सवाल उठाने की कोशिश की है। सिल्क्यारा टनल के बाहर चाय की टपरी चलाने वाले एक बूढ़े की मुंहजबानी सुरंग में फंसे मजदूरों की कहानी शुरू होती है। बीच-बीच में बूढ़ा कभी चिपको आंदोलन के किस्से बयान करने लगता है, कभी टिहरी बांध के विरोध में हुए आंदोलन के बारे में बताता है। यह बूढ़ा कौन है, कोई नहीं जानता। सिल्क्यारा और आसपास के गांव वाले भी नहीं, जो उससे कहानी सुनते हैं और उसके खान-पान एवं सेहत का ध्यान भी रखते हैं।

धीरे-धीरे पाठक अवश्य जान जाता है कि वह बूढ़ा अपनी जवानी में संसार के दुखों से परेशान होकर बुद्ध के मार्ग पर चलने की ठान लेने के बाद हिमालय की ओर आया था। यहां उसे चिपको आंदोलन चलाने वाले सुंदरलाल बहुगुणा, चण्डी प्रसाद भट्ट, घनश्याम सैलानी, धूम सिंह नेगी जैसे लोग मिलते हैं। बूढ़ा विशेष रूप से सुंदरलाल बहुगुणा जैसे ‘संत’ से अत्यंत प्रभावित होकर उनके अभियान में शामिल हो जाता है और बाद में उनका विश्वस्त सहायक भी बन जाता है। लेखक भी बहुगुणा जी से बहुत प्रभावित है और यह उपन्यास उनको और उनके जैसे अन्य योद्धाओं को ही समर्पित भी है। 

तो, बूढ़े के मुंह से चंद ग्रामीण (और पाठक भी) सुरंग में फंसे श्रमिकों की कहानी के साथ-साथ चिपको आंदोलन और बाद में टिहरी बांध विरोधी आंदोलन के किस्से सुनते हैं। आप चकित हो सकते हैं कि सिल्क्यारा के निकटवर्ती गांवों में रहने वाले इन लोगों को तीन वर्ष पूर्व हुए उस हादसे के बारे में पता क्यों नहीं है और वे इसे सुनने के लिए अत्यंत लालायित क्यों हैं। खैर, सुरंग में फंसे मजदूरों की मुक्ति के साथ कहानी खत्म हो जाती है और कथा सुनने वालों को हैरत में डालते हुए बूढ़ा किसी रहस्य की तरह अचानक लापता हो जाता है।

यह उपन्यास बहुत उम्मीद के साथ पढ़ना शुरू किया था क्योंकि हमारे योजनाकारों और सरकारों ने विकास के नाम पर शुरू से ही हिमालय के साथ अत्यंत बर्बर व्यवहार किया है। सिल्क्यारा हादसा भी ऐसी ही प्रकृति-विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम था। हिमालय ने कई तरह से योजनाकारों को चेताया है, बगावत भी उसने खूब की है लेकिन सरकारों और उनके नीति-निर्धारकों ने लगातार उसकी उपेक्षा की है, अनसुनी की है।

 उम्मीद थी कि सुनील चतुर्वेदी इन तमाम मुद्दों पर गहराई से विचार करेंगे, कथानक में उन विसंगतियों को उभारेंगे और एक विमर्श छेड़ेंगे। लेकिन ‘टनल’ उपन्यास निराश करता है। सिल्क्यारा हादसा हो या चिपको आंदोलन या टिहरी बांध विरोधी आंदोलन, इसमें मात्र हलके-फुलके विवरणों के रूप में दर्ज़ हुए हैं। चिपको आंदोलन की चंद घटनाओं को छोड़कर उसके विविध आयाम या टिहरी बांध से हुए विस्थापन का विराट दर्द छुआ ही नहीं गया, इनकी गहराई में जाना दूर की बात रही। उन लोगों के जीवन में तनिक भी नहीं झांका गया है, जो विकास की क्रूर विसंगतियों की मार झेलते आए हैं और समय-समय पर कई आंदोलनों के माध्यम से अपना दर्द एवं आक्रोश व्यक्त करते रहे हैं। कहीं-कहीं हलके से यह उल्लेख भर कर दिया गया है कि मैदानों जैसी विकास योजनाएं हिमालयी क्षेत्र के लिए कतई उपयोगी नहीं हैं।

बूढ़े के मुंह से सुने जाते किस्से मात्र सामान्य किस्से बनकर रह गए हैं। जो ग्रामीण इन किस्सों के श्रोता हैं, वे मात्र श्रोता हैं। न ही उनका दैनंदिन जीवन, न उनके कष्ट व संघर्ष और न ही थोड़े सुख और जीवन-रस, कहीं से भी कथा का हिस्सा बन पाए हैं। एक-दो प्रसंगों में ‘फुलदेई’ पर्व-गीत या एक लोक-कथा का उल्लेख तनिक आशा जगाता है, लेकिन वह भी पर्याप्त जानकारी या शोध के अभाव में प्रामाणिक नहीं बन पाया। ‘रैट होल माइनर्स’ भी घटनास्थल की तरह ही कथा में भी आते हैं और काम पूरा करके चले जाते हैं। न उनकी बहादुरी और न उनका दयनीय-उपेक्षित जीवन लेखक की निगाह में आ पाया है। एक सचेत लेखक से इसकी उम्मीद नहीं की जाती।

लेखक ने उपन्यास की भूमिका में बताया है कि सिल्क्यारा सुरंग हादसे की खबर मिलते ही वे एक पत्रकार मित्र के साथ सिल्क्यारा पहुंचे और वहां तीन दिन तक रहे थे। इससे उम्मीद बंधी थी कि लेखक की आंख उस समाज और उसके हालात पर गहरी गई होगी। किंतु उपन्यास पूरा पढ़ लेने के बाद लगता है कि यह भी ऊपरी पत्रकारीय रिपोर्ट से आगे नहीं पहुंच सका। 

वे एक लाइन में यह सवाल तो उठाते हैं कि आखिर इस सुरंग वाली सड़क की आवश्यकता किसे है, लेकिन कहीं भी यह उल्लेख नहीं करते कि यह सुरंग प्रधानमंत्री के ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कहे जाने वाले ‘ऑल वेदर चार धाम रोड प्रॉजेक्ट’ का हिस्सा है, जिसे तमाम मानकों, भू-विज्ञानियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की गम्भीर आपत्तियों की अनसुनी करके एक सनक की तरह पूरा किया जा रहा है। और, यह अकेला प्रॉजेक्ट नहीं है, जो हिमालय की क्रमश: बर्बादी का कारण बन रहा है। बहुत पहले से, पहले की सरकारों ने भी हिमालय के साथ ऐसी ही बर्बरता की है। 

पहले कम से कम चिपको या बांध विरोधी या नशा विरोधी जैसे कई आंदोलन जनता ने आक्रामकता के साथ किए थे, अब तो ऐसी सम्भावना ही खत्म कर दी गई है। पहाड़ों के लोग चुपचाप विकास के नाम पर विनाश देखने-सहने को विवश हैं।

ऐसे वृहत्तर प्रश्नों से यह उपन्यास नहीं टकराता और कुछ किस्सों का बयान भर बनकर रह जाता है।

·        (‘टनल’ (उपन्यास), लेखक- सुनील चतुर्वेदी, पृष्ठ 116, मूल्य 225 रु., सम्भावना प्रकाशन, हापुड़।)

- न जो, रामगढ़, 17 मई 2026