Tuesday, September 15, 2026

गलत काम में सफल होने से बेहतर है सही काम में विफल होना

 

(पत्रकारिता की जनपक्षधर भूमिका के बारे में 1979 में  'नैनीताल समाचार' को लिखे गए शैलेश मटियानी के लम्बे और खरे-खरे पत्र के अविकल रूप का शेष भाग-)      

"आपसे एक बात कहना चाहता हूं। अंततः आदर्शजीवी टूटता है, तो साधन विहीन हो जाने के कारण नहीं, बल्कि आकांक्षाविहीन हो चुकने की वजह से। पत्रिका का बन्द हो जाना, पत्रिका के पीछे निहित मानवीय संवेदना,  वैचारिक जिजीविषा और नैतिक जागरूकता का अंत हो जाना कदापि नहीं होता। 

        आदमी को तब तक कोई नहीं तोड़ सकता, जब तक खुद उसके भीतर की आकांक्षा, जिजीविषा और नैतिकता का क्षय न हो चुका हो। साधन बाहर से जुटने वाली चीज है। इससे हम वंचित किये जा सकते हैं, मगर आकांक्षा, वैचारिकता और नैतिकता, ये हमारी भीतरी निधियां है। इनको जब भी त्यागते हैं,  हम खुद त्यागते हैं। बाहरी प्रतिकूलताओं के कारण टूटने का तर्क इस्तेमाल करता इसलिए गलत है और बाहरी प्रतिकूलता तथा कठिनाइयों से घबराने वाले व्यक्ति को विचारक अथवा नैतिक होने की दावेदारी बरतनी ही नहीं चाहिए।

      लेखन और पत्रकारिता – इनकी एकमात्र सार्थकता इसी पर निर्भर है कि ये अपने पाठकों के भीतर की संवेदना को कितना जाग्रत कर पाते हैं और सामाजिक पक्षधरता तथा सहभागिता का कितना गहरा अहसास उनमें भर पाते हैं। एक जागरूक समाज में ही व्यक्ति भी अपना सही उत्कर्ष पा सकता है, इसलिए व्यक्तिगत सुविधाओं और सुरक्षा में ही आदमी की मुक्ति का मायाजाल फैलाने वाली पूँजीवादी तथा अधिनायकवादी शक्तियों के प्रति समाज में विद्रोह की भावना को बल देते रहना ही लेखन और पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए।

        साहित्य-सृजन पत्रकारिता की तुलना में अप्रत्यक्ष और विलम्बित प्रक्रिया वाली विधा है, किन्तु सही-सही पत्रकारिता की पहचान कर सकने लायक हम बनें, इसमें सबसे बड़ा योगदान साहित्य का ही होता है। साहित्य हमें मानसिक और वैचारिक रूप से सम्पन्न करने का सर्वोपरि माध्यम है और इतिहास में साहित्य ही, इसलिए, सदैव अक्षुण्ण रूप से प्रभावकारी बना रहता है ।

        पत्रकारिता में भी जब साहित्य की कोटि के नैतिक मूल्यों और संवेदना का समावेश हो, तभी वह अपने पाठक को भीतर तक स्पर्श कर सकती है। पत्रिका सिर्फ वही दीर्घ समय तक बनी रह सकती है, जो अपने पाठक के अस्तित्व का जरूरी हिस्सा बन जाये। इसलिए हमें निरन्तर यह उद्यम करना ही होगा कि हम पत्रकारिता को उस हद तक ले जा सकें, कि जहाँ उसे जीवित रखने की जरूरत दूसरे लोग अनुभव करने लगें। पूँजीवादी पत्रकारिता इसलिए सफल होती है कि वह 'लोग क्या पसंद करते हैं'  के व्यावहारिक सिद्धान्त पर चलती है और सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रकारिता इस नैतिक मूल्य को दृष्टिगत रखते हुए कि लोगों तक क्या पहुँचाया जाना चाहिए।

      आदमी की प्रारम्भिक पसंद सेक्स-रोमांस और रोमांचकता की होती हैं।  नैतिक-वैचारिक रूप से मूल्यवान लेखन और पत्रकारिता की पहचान में बहुत वक्त लगता है। यह सब अब और कठिन इसलिए होता जाता है कि हम जिस तरह के पूँजीवादी लोकतन्त्र में जी रहे हैं,  उसमें समाज को नैतिक वैचारिक रूप से जागरूक कर सकने की भी खुली छूट है और भ्रष्ट कर सकने की  भी। 

        पूंजीवादी तंत्र का कमाल यह है कि वह समाज के बौद्धिक वर्ग  का, धर्मगुरुओं का, राजनैतिक नेताओं का इस्तेमाल समाज को  वैचारिक, नैतिक तथा मानसिक रूप से कमजोर करने में करता है, ताकि लोगों में अपने आर्थिक-सामाजिक शोषण- उत्पीड़न के प्रति संगठित हो पाने की चेतना ही नष्ट हो जाय। समाज को अपने अनुकूल बनाये रखने में पूंजीवादी तंत्र धार्मिक, राजनैतिक और बौद्धिक वर्ग का समान रूप से इस्तेमाल करता है। एक छोर पर वह आचार्य रजनीश, महेश योगी, सांई बाबा, बाल योगेश्वर जैसे धार्मिक धूर्तों को प्रश्रय देता है;  तो दूसरे छोर पर अर्थलोलुप राजनेता तथा बौद्धिकों को।   

        पूंजीवादी प्रेस जगत पूंजीवादी तंत्र का सबसे बड़ा और कारगर करिश्मा है, जिसके बूते पर यह निरन्तर लोगों को वास्तविकताओं के प्रति बेखबर और उदासीन रखने में सफल होता है। पूँजीवादी प्रेस जगत की पत्रकारिता का मूल उद्यम मनुष्य को बौद्धिक रूप से दिवालिया और मानसिक रूप से पतनशील,  नैतिक रूप से दुर्बल और सामाजिक स्तर पर विघटित करना है। धार्मिक, राजनैतिक, और बौद्धिक - तीनों स्तरों पर वह लोगों को भाग्यवादी, पुरुषार्थ विहीन, आत्मभीरु, उदासीन और विघटनवादी बनाने में रुचि लेती है। आदमी के मनोबल को क्षीण करना, सामाजिक उत्कर्ष के संघर्ष की जगह, उसे व्यक्तिगत सुविधा-सुरक्षा की होड़ में डाल देना, लोगों के भीतर सामाजिकता की, सहभागिता की चेतना को ही जाग्रत न होने देना - पूँजीवादी प्रेस जगत की पत्रकारिता की यही मुख्य धुरी है। 

        मनुष्य की सामाजिक चेतना को रौंदने के लिए इस्तेमाल किये जा रहे इस पूँजीवादी दुष्चक्र में उच्च वेतन भोगी बौद्धिकों की बहुत लम्बी बिरादरी है, जो पत्रकारिता के नैतिक तथा वैचारिक पक्ष को ही घपले में डाले हुए हैं, क्योंकि इससे उनकी खुद की वास्तविकताएं उजागर होती हैं।

      अथर्ववेद के एक सूत्र में कहा गया है- योक्त्रे सहवो युनज्मि समञ्चोऽग्नि सपर्यतारा। अर्थात् जैसे पहिए के अरे नाभि (धुरे) से जुड़े होते हैं, वैसे ही तुम सब एक अग्नि (चेतना) से जुड़ो। हमारे अधिकांश स्वनामधन्य बौद्धिकों ने इस आवाहन को साक्षात फ़लीभूत कर दिखाया है,  और पूँजीवादी प्रेस जगत के धुरे में अरों की तरह जुड़े हुए देश की सामाजिक,  नैतिक तथा वैचारिक चेतना को रौंदने में लगे हुए हैं।

      लेखन और पत्रकारिता का एकमात्र नैतिक पक्ष यह है कि वह लोगों में सामाजिक सहभागिता और संघबद्धता की चेतना जगाये। लोगों में इस विवेक को जाग्रत करे कि सबके हित में ही हमारा भी हित है। इस मनोबल को टूटने न दे कि अंतिम विजय नैतिक और सामाजिक मूल्यों की ही होगी,  समाज तथा मानव विरोधी शक्तियों की नहीं। उत्पीड़क तथा शोषक शक्तियों के विरुद्ध अपने संघर्ष में आदमी अकेला नहीं,  यह प्रतीति देना पत्रकारिता की नैतिक जिम्मेदारी है। समाज विरोधी शक्तियाँ प्रायः तूफान की तरह समाज को अपनी चपेट में लिए रहती हैं,  मगर मनुष्य की सामाजिक, वैचारिक अथवा नैतिक चेतना को जड़ से उखाड़ फेंकना - यह इनके लिए न कभी सम्भव हुआ है,  न होगा। 

        सही पत्रकारिता की यह पहचान है कि वह लोगों को इस सनातन सच्चाई का अहसास कराये। कोई भी समाज पूरी तौर पर तब तक नष्ट नहीं हो सकता, जब तक उसकी वैचारिक और नैतिक चेतना अंतिम रूप से नष्ट न हो जाय । वैचारिक और नैतिक चेतना,  ये हवाई अवधारणायें नहीं हैं। ये मानव इतिहास और मानव समाज की सनातन सच्चाइयाँ हैं और देखने वाली आखों को ये साफ-साफ दिखाई देती हैं। उत्पीड़क,  शोषक शक्तियों की चपेट में आ जाने पर भी कोई देश अथवा समाज अंतिम रूप से टूट जाने से तभी बचा रह सकता है, जब वह वैचारिक और नैतिक शक्ति के स्रोतों से विहीन न हो चुका हो।

        सही पत्रकारिता समाज और देश का ऐसा ही जीवंत और जागरूक स्रोत होती है। स्वच्छ और दूरदर्शी आँख की तरह यह  मनुष्य को,  मानव समाज को उसकी अविच्छिन्न परम्परा में देखती है, सिर्फ तत्काल में नहीं। अपने इस कोटि के देखने को पत्रकारिता जब भी शक्तिशाली भाषा में प्रकट करती है, समाज में इसका स्थान उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है, जितना किसी मनुष्य में जिह्वा का। पत्रकारिता जितनी नैतिक और वैचारिक रूप से खरी होगी,  उसकी वाग्मिता उतनी ही शक्तिशाली और प्रेरक होगी।

      ऊँचे आदर्शों अथवा मूल्यों को आचरण में उतारना बहुत कठिन होता है, लेकिन इस कठिनता से डर कर आदर्श और मूल्यों से ही विमुख हो जाना ठीक नहीं। अपने संघर्ष में विफल होना एक चीज है, अपने आदर्श और लक्ष्य से ही विमुख हो जाना बिल्कुल दूसरी। पहली स्थिति आदमी को विवेकी,  दूरदर्शी,  करुणा सम्पन्न,  अनुभवी और दृढ़ संकल्पी बनाती है, दूसरी में सिर्फ पतन होता है। हमारे जिस संघर्ष के पीछे सच्चाई और संवेदना हो,  वह हमें निरन्तर माँजता जाता है और अपेक्षाकृत ज्यादा बड़े तथा मूल्यवान संघर्ष में जुड़ सकने की नैतिक स्फूर्त तथा वैचारिक चेतना से हमें अनुप्राणित करता है। अपनी व्यक्तिगत सुविधा, प्रतिष्ठा अथवा स्वार्थपरता के लिए किये जा रहे संघर्ष में आदमी अन्ततः टूटता है। और, बुरी तरह टूटता है।

      मनुष्य सिर्फ सामूहिकता की नहीं, बल्कि सामाजिकता की नियति से बंधा हुआ है। सामाजिकता और सामूहिकता के इस अंतराल को पहचानने वाले लोग ही सामाजिक संघबद्धता और सहभागिता की दिशा में सार्थक और सही पहल कर सकते हैं। सही पत्रकारिता की कसौटी इसी में है कि वह लोगों को सामाजिकता के विवेक के प्रति प्रेरित कर पाती है या नहीं। विचारविहीन सामूहिकता साम्यवादी अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त करती है और विघटित सामाजिकता पूंजीवादी व्यवस्था का। एक में मनुष्य सैनिक आतंक का आखेट बनता है, दूसरे में आर्थिक शोषण का।

      सही पत्रकारिता को राजनैतिक व्यवस्था का अनुगामी न होकर,  समाज का प्रवक्ता होना होता है। उसके पास आदर्श सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना जरूर होनी चाहिए,  क्योंकि क्या मनुष्य के पक्ष में है, इस बात की तमीज हमें न हो, तो हम उसके विपक्ष में पड़ने वाली चीजों की सटीक पहचान कर नहीं सकते। अपनी सम्पूर्ण जागरूकता और तत्परता के साथ मनुष्य के पक्ष में होने की संकल्पबद्धता,  इसी में पत्रकारिता की श्रेयस्करता निहित है। सामाजिक सहभागिता की पक्षधरता, यही पत्रकारिता का नैतिक पक्ष है और 'नैनीताल समाचार' पत्रकारिता के इस नैतिक पक्ष को सदैव ध्यान में रखे रहे,  यही कामना है। आज भ्रष्ट पत्रकारिता अपने चरम पर है, इसलिए सही और संवेदनशील पत्रकारिता का मूल्य और ज्यादा बढ़ गया है। 

        सही दिशा में संघर्ष करने का एक अपना परितोष होता है और वह कठिनाइयों को वहन करने की शक्ति तथा विफ़लता के बावजूद आकांक्षावान और संघर्षशील रह सकने की प्रेरणा देता है ।

      साहित्यिक और वैचारिक स्तर पर अच्छी और ईमानदार पत्रकारिता सचमुच बहुत कठिन हो गई है। पूंजीवादी प्रतिष्ठानों की पत्रिकाओं में इसके लिए कोई स्थान नहीं है। निजी तौर पर पत्रिकायें निकालना बेहद मुश्किल काम है। पूंजीवादी तंत्र ने इसकी गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है कि मनुष्य और समाज को जाग्रत करने वाले लोगों को समाज में से खुराक मिल सके। समाज का ऊपरी ढाँचा उन लोगों के लिए ही सबसे ज्यादा अनुर्वर और संवेदनविहीन है,  जो सामाजिक तथा मानवीय मूल्यों के लिए संघर्य करना चाहते हैं। 

        परिणामतः जो भी लोग पूंजीवादी व्यवस्था के प्रतिरोध में पत्रिका निकालने का उद्यम करते हैं, सामाजिक स्तर पर उन्हें सिर्फ हताशा का सामना करना पड़ता है और वैचारिक - सामाजिक क्रान्ति के उत्साह में निकाली गई पत्रिका एक बार बंद होती है, तो फिर दुबारा उसे निकालने की नौबत नहीं आती। और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि हमने अपने संघर्ष की कठिनता तथा जटिलता को गहराई से समझा ही नहीं होता है। अपने लक्ष्य के विफल होने और संघर्ष से घबराकर अपने लक्ष्य को ही स्थगित कर देने में बुनियादी फर्क होता है।

      समाज की सिर्फ ऊपरी या सतही किस्म की समझ हमेशा व्यक्ति के संघर्ष को कुंठित करती है,  क्योंकि अपने उत्साह और आवेग की तुलना में दूसरों से सहयोग न पाने पर हम खीझने लगते हैं और एक खास तरह की अहम्मन्यता हमारे भीतर जड़ जमाने लगती है कि लोग हमारे उद्देश्य और संघर्ष की महानता को समझ नहीं पा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि अपने उद्देश्य और संघर्ष की गहरी समझ न होने के कारण ही हम बहुत जल्दी उत्साहित और उतनी ही जल्दी हताश होने के आदी हो जाते हैं।

      शोषण और उत्पीड़न के प्रति जैसा विक्षोभ हममें है,  वैसा सब में नहीं तो बहुतों में होगा। नैतिक मूल्यों के प्रति जितना अनुराग हममें है,  वैसा सबमें नहीं, तो बहुतों में होगा। बिना इस आस्था के ही किसी बड़े संघर्ष में कूद पड़ना अंधे का कुएँ में कूदना है ।

      पूंजीवादी पत्रकारिता का लक्ष्य होता है,  आदमी को बाहरी तौर पर प्रभावित करना। सामाजिक पक्षधरता बरतने की आकांक्षी पत्रकारिता का उद्देश्य होता है, आदमी को उसके भीतर तक स्पर्श करना। निश्चय ही दूसरे का काम ज्यादा कठिन, संघर्ष-भरा और दूरगामी होगा। इस बुनियादी अंतराल को अगर हम ध्यान में रख सकें, तो तात्कालिक विफलताएं हमें अंतिम रूप से हताश नहीं करेंगी। हमें शायद यह भी सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि गलत किस्म के कामों में सफल होने की तुलना में सही कामों में विफल हो जाना ज्यादा बेहतर है।" (इति) 

(‘नैनीताल समाचार’ के वर्ष 3 अंक 7 व 8 (नवम्बर-दिसम्बर 1979) में प्रकाशित 

 

पत्रकारिता बनाम सामाजिक पक्षधरता


('नैनीताल समाचार'  अपने निरंतर प्रकाशन के पचासवें वर्ष में प्रवेश कर गया है। शुरूआती वर्षों में उसकी धारदार जनपक्षधर पत्रकारिता से प्रभावित होकर प्रसिद्ध और जुझारू लेखक शैलेश मटियानी ने यह लम्बा लेखनुमा पत्र लिखा था। यह लेख जनपक्षधर पत्रकारिता के मूल ध्येयों पर स्पष्ट और बेबाक रोशनी डालता है और क्या यह कहना भी जरूरी होगा कि पत्रकारिता को जनपक्षधर होना ही चाहिए! पुरानी फाइलें पलटते हुए मुझे यह लेख दिखा तो इसे अविकल रूप में यहां लगाने से अपने को रोक नहीं पाया। धैर्य हो तो पढ़िए और पीटिए कि पत्रकारिता कहां पहुंच गई है- न जो) 

‘नैनीताल समाचार’ मैं देखता रहा हूँ और पत्रकारिता का जो तेवर इसमें है, अच्छा लगता रहा है।

        यह दौर व्यावसायिक अथवा राजनैतिक सौदेबाजियों के लिए पत्रिकाएं निकालने वाले लोगों का है। साधन सिर्फ उन्हीं पत्रिकाओं तथा अखबारों के पास हैं, पत्रकारिता जिनके लिए निजी इस्तेमाल की चीज है, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का निमित्त नहीं। किसी भी तरह की राष्ट्रीय, मानवीय या कि सामाजिक चिन्ता से जिनका कोई सरोकार नहीं है। 

         यह सचमुच कितनी तकलीफदेह बात है कि जिस क्षण आप यह तय करें कि लेखन अथवा पत्रकारिता के स्तर पर सामाजिक पक्षधरता बरतनी है, लोगों को उत्पीड़क तथा शोषक ताकतों के प्रति सावधान करना है और पारस्परिक एकजुटता के द्वारा समाजद्रोही शक्तियों के प्रतिरोध की पहल करनी है, तब जो पहली वास्तविकता सामने आती है वह यह, कि अपने इस संघर्ष में आप अकेले हैं। 

        अकेले और साधनहीन। समाज को भ्रष्ट करके पैसा कमाने के इरादे से निकाली गयी गंदी पत्रिकाएँ अपने लिए लाखों पाठक जुटा लेती हैं, और समाज के पक्ष में संघर्ष करने के इरादे से प्रकाशित पत्रिका के लिए सौ-दो सौ खरीदार जुटा पाना कठिन हो जाता है। जो समाज को निरन्तर क्षय की ओर ले जाना चाहते हैं, वो इसके भीतर पैठे रहते हैं, और जो समाज को जागृत करने का इरादा रखते हैं, वो सामाजिक बहिष्कार की स्थिति में ।

      समकालीन पत्रकारिता के दौर की यह अत्यन्त तकलीफदेह वास्तविकता है। और इसकी तहों तक गये बिना पत्रकारिता अथवा लेखन के प्रति सही और दूरगामी निर्णय लेना सम्भव नहीं। अक्सर ही सामाजिक पक्षधरता के उत्साह में प्रारम्भ की गई पत्रकारिता का अंत जो एक खास प्रकार की निजी सौदेबाजियों अथवा कुंठाग्रस्तता में होता दिखाई पड़ता है,  इसके पीछे सही समझ और दृष्टि का न होना ही मुख्य कारण है।

      यहाँ राजनैतिक पार्टियों के मुखपत्रों अथवा उपजीवी पत्रिकाओं की बात छोड़कर, सिर्फ उस तरह की पत्रिकाओं की समस्यायों पर ही बात की जाय, जिनमें राजनैतिक प्रतिबद्धता को ही सामाजिक प्रतिबद्धता भी नहीं मान लिया जाता और जिनके पीछे इस बुनियादी सच्चाई की समझ होती है कि राजनीति सामाजिक जीवन की अनिवार्य नियति भले ही हो, लेकिन उसका सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व राजनीति के द्वारा सम्भव नहीं है, क्योंकि कुल मिलाकर राजनीति का केन्द्र सत्ता-संघर्ष ज्यादा है, सामाजिक संघर्ष कम। 

        राजनीति के केन्द्र में समाज नहीं होता, सत्ता होती है, इसलिए वह अपने सत्ता-संघर्ष के अनुसार अपना ताम-झाम बदलती रहती है। लेकिन यह छूट समाज के पक्ष में संघर्ष करने वाले लोगों को नहीं होती। यही वजह है कि राजनीति के बूते सत्ता-केन्द्र पर पहुँचने वाले लोग कभी भी समाज के पक्ष में सत्ता का प्रतिरोध करने वाले लोगों को पसंद नहीं करते। सत्ता अपने आपको समाज का सम्पूर्ण और सर्वोच्च नियामक मानकर चलना चाहती है, और जो भी लोग उसके इस दर्प पर प्रहार करना चाहते हैं, उन्हें वह शत्रुओं के रूप में ही देखती है। यहां तक कि समाजिक क्रान्ति के नाम पर सत्ता में आने वाले लोगों तक को सत्ता-विरोध असहनीय ही लगता है ।

      समाज और सत्ता के समीकरण को समझे बिना पत्रकारिता के क्षेत्र में कारगर भूमिका निभाना सम्भव नहीं है। समाज की जगह सत्ता को ही सर्वोपरि मान लेने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में सिर्फ सत्ता की राजनीति का प्रवक्ता बन जाने के अलावा कुछ बाकी बच नहीं जाता। यह स्थिति लेखन और पत्रकारिता की उस प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में हो जाती है, जो एकाधिकारी शक्ति-केन्द्र की वकालत करती हो, फिर चाहे यह तानाशाही के अन्तर्गत हो अथवा सर्वहारा अधिनायकवाद के नाम पर। सर्वाधिकारी सत्ता का अर्थ ही समाज की सर्वोच्चता को ताक पर रख देना है। पत्रकारिता के संदर्भ में इस बात का जिक्र यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि यह शुद्ध साहित्यिक लेखन की अपेक्षा ज्यादा प्रत्यक्ष सामाजिक माध्यम है और अपने समय की, खास तौर पर अपने देश की, राजनैतिक व्यवस्था और प्रवृत्तियों को समझे बिना सही और सटीक पत्रकारिता सम्भव नहीं। हम फिलहाल, लोकतांत्रिक राजनीति के दौर से गुजर रहे हैं और यहां के साम्यवादी दल तक सर्वहारा अधिनायकवाद का नाम लेने से कतराते हैं। अब हमारी पत्रकारिता किस कोटि की होगी, यह इसी बात पर निर्भर है कि अपने समाज और सामाजिक व्यवस्था को परिचालित करने वाली राजनैतिक तथा आर्थिक शक्तियों की समझ हमें कितनी है। समय की खास तौर से अपने

      तौर पर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय देखने की चीज यह है कि बाहरी तौर पर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय कही जाने वाली राजनैतिक पार्टी के सत्ता केन्द्र पर रहने के लम्बे दौर में भी हम पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ही रह रहे थे और मौजूदा जनता पार्टी उसका अपेक्षाकृत निकृष्ट विकल्प कही जा सकती थी और यही स्थिति इस तरह के अन्य किसी भी समाजद्रोही राजनैतिक गठबंधन की होगी। परिणामतः सत्ता पर बैठे लोगों को समाज के हितों की चिंता कम, पूँजीवादी शक्तियों की चिन्ता ज्यादा है, क्योंकि आज तक ऐसा एक भी राजनेता न कांग्रेसी सत्ता के दौर में दिखाई पड़ा, न जनता पार्टी के दौर में, जिसने पूंजी संग्रह के लिए अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया हो। जहाँ राजनीति के सूत्रधार पूंजी-संग्रह के रोग से ग्रस्त होंगे, वहां व्यवस्था और कानून के पूंजी-विपन्न लोगों के पक्ष में होने की कोई गुंजाइश नहीं, और इसी कुटिल, छ‌द्मवेशी लोकतांत्रिक व्यवस्था का यह परिणाम है कि इस देश के करोड़ों नागरिक लावारिश मवेशियों की सी जिन्दगी जीने को लाचार हैं ।

      अब पत्रकारिता हमें चाहे राष्ट्रीय पैमाने पर करनी हो या नितांत क्षेत्रीय,  इन पूंजीवादी शक्तियों के द्वारा परिचालित राजनैतिक तंत्र से जुड़े अथवा टकराये बिना इसे बरतना सम्भव नहीं है। पूँजीवादी तंत्र के दुष्चक्रों से बेखबर समाज के बीच सही लेखन अथवा पत्रकारिता को दोहरे संकटों से तो गुजारना ही होता है। पूंजीवादी तंत्र में से तो इसे किसी तरह का प्रोत्साहन इसलिए नहीं मिलता कि रोचक, रंगीन तथा उत्तेजक पत्रिकाओं से सारे बुक स्टालों को पाटकर, सामान्य लोगों की रुचि को विकृत कर दिया गया होता है। हमारी शिक्षा पद्धति पूंजीवादी व्यवस्था के हितों को ध्यान में रखकर तय की जाती है और उसमें पूँजीवादी व्यवस्था के मनुष्य तथा समाजद्राही ढाँचे के प्रति छात्रों को जागरूक बनाने का कोई प्रावधान नहीं। इसी तरह न्यायिक व्यवस्था का भी सारा ढाँचा पैसे वालों के अनुकूल खड़ा किया गया है, और इसीलिए सबके लिए समान घोषित कानूनों के सबके लिए समान नतीजे निकलते नहीं। पूंजीवादी तंत्र की सबसे बड़ी ताकत इस बात में निहित होती है कि पैसे की कीमत और शक्ति को सबसे ऊपर कर दो,  बाकी सारी समस्यायें अपने आप हल हो जायेंगी।

      जब पूँजीवादी व्यवस्था के प्रतिरोध की बात हम करते हैं, तो इस वास्तविकता को ध्यान में रखना चाहिए कि पूंजी और साधनों की तलाश में रहने के पीछे अगर से सामाजिक जागृति के निमित्त ही इनके उपयोग का विवेक साथ न हो तो इस किस्म की तलाश का अंत या तो पूंजी-संग्रह कर चुकने की निजी सुरक्षा और या न कर पाने की व्यक्तिगत कुंठा में होता है।

      सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रकारिता को यह हमेशा ध्यान में रखना होता है कि जिस देश में सामाजिक जागृति जितनी कम हो, पत्रकारिता के जोखिम उतने ही बढ़ जाते हैं और समाजद्रोही शक्तियों के प्रतिरोध का संघर्ष उतना ही लम्बा हो जाता है। इस दूरगामी और जोखिम भरे संघर्ष में हमारी सांस न फूल जाये और दम न घुटने लगे, इसके लिए यह जरूरी है कि हमारे लेखन और पत्रकारिता के पोछे सिर्फ तात्कालिक आवेग और उत्साह न हो, बल्कि अपने लक्ष्य और संघर्ष की कठिनताओं की गहरी समझ हो। हममें से जो भी लोग जिस क्षण इस महादेश की उत्पीड़क तथा शोषक शक्तियों के प्रतिरोध में खड़े होंगे, उनकी जगह उसी क्षण शोषित, उत्पीड़ित तथा विभाजित लोगों को कतार में होगी। 

        जिनके पक्ष में हमें संघर्ष करना हो, उनकी खुद की स्थिति और नियति से अलग खड़े रहकर, उत्पीड़क तथा शोषक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करने के मुगालतों में रहना खुद को और समाज को धोखे में रखना है। निजी सुरक्षा की सावधानी जब तक हममें हो, तब तक सामाजिक पक्षधरता बरतने के जोखिम उठाने की शक्ति हममें नहीं होगी। सामाजिक पक्षधरता जब तक सिर्फ दिमागी चिंता के स्तर पर हो,  अपने निजी आचरण में न हो,  तब तक उस कोटि की पत्रकारिता की कोई गुंजाइश नहीं, जिससे उत्पीड़क व्यवस्था के वास्तविक प्रतिरोध की शुरूआत होती है।

      साधन विपन्नता के बीच, और बावजूद, सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रिकाओं के प्रकाशन के उद्यम में जुटे हम लोगों की सबसे बड़ी चिंता शायद साधनों के न होने की ही है। इस सच्चाई को या तो हमने अर्जित ही नहीं किया है और, या, इसे दबाये रखना चाहते हैं कि इसके लिए नैतिक और वैचारिक शक्ति का, वास्तविक सामाजिक चिंता का, होना पहली जरूरत है, साधनों का होना या न होना बाद की चीज है। मनुष्य और मानव समाज के पक्ष में जितने भी बड़े संघर्ष आज तक के इतिहास में किये गये हैं, साधनों के नहीं, बल्कि नैतिक तथा वैचारिक शक्ति के आधार पर; और यह उपलब्ध होती है, निजी स्वार्थ और सुरक्षा के मोह से उबरकर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को सामाजिक सहभागिता के प्रति समर्पित कर देने पर।

      पिछले कुछ वर्षों के अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि अपने उद्देश्य और लक्ष्य में विफल होने के पीछे सिर्फ निजी खामियों और दुर्बलताओं को मैंने मुख्य कारण पाया है, दूसरों से मिलने वाले असहयोग या परिस्थितियों के प्रतिकूल होने को नहीं।

        हमें शायद इस सनातन सच्चाई को हमेशा याद रखना चाहिए कि जैसे प्रत्येक युग में, वैसे ही आज भी दूसरों को प्रभावित व प्रेरित कर सकने का रास्ता सिर्फ एक ही है- अपने विचार और आचरण में सच्चाई बरतना। आज भी आदमी सच्चाई से हो सबसे ज्यादा प्रभावित, आंदोलित और प्रेरित होता है। यदि हम सच्चाई पर हों तो दूसरों तक हमारा ऐसा होना, हवा में व्याप्त सुगंध की तरह पहुँचता है। हाँ, यह जरूर है कि सच्चाई दूसरों तक सुगंध की तरह तभी पहुंचती है, जब वह हममें पूरी तरह उतर चुकी हो।

         आज यदि हम सचमुच अपने आपको समाज तथा मनुष्य के पक्ष में समर्पित कर सकें, तो वह दिन दूर नहीं होगा, जबकि सामाजिक सहभागिता हमारे साथ होगी। नैतिक तथा वैचारिक क्रांतियाँ प्रतिफलित होने में लम्बा वक्त सिर्फ इसलिए लेती हैं कि ये समाज की जड़ों में होतो है, जबकि आर्थिक तथा राजनैतिक शक्तियां समाज के शिखर पर विराजमान रहती हैं। 

        इस मुगालते में हमें कभी नहीं रहना चाहिए कि समाज के पक्ष में संघर्ष करने की जिजीविषा सिर्फ हमारे ही भीतर है, समाज में नहीं है। इस तरह के मुगालतों का अन्त हमेशा हताशा में होता है। उत्पीड़क शक्तियों का विरोध जब हम खुद नहीं कर पाते हैं, तो सोचते हैं कि चूंकि इसमें ये-ये जोखिम थे, इसलिए। या कि, जरा अपने परिवार की व्यवस्था कर लें, तो फिर पूरी ताकत से समाजद्रोही शक्तियों से लोहा लें। इतनी दूर तक शायद हम सोच ही नहीं पाते हैं कि समाजद्रोही उत्पीड़क शक्तियों के प्रतिरोध का दूसरे लोग भी ठीक उन्हीं वजहों, उसी तरह के भयों और पारिवारिक चिंताओं के कारण नहीं उठा पा रहे है, जिस तरह के कारणों को हम अपने पक्ष में तकों की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं। बहुधा हम निजी तौर पर अभावग्रस्त होने के कारण विक्षुब्ध होते हैं अथवा निजी प्रचार-प्रतिष्ठा के आवेग से परिचालित होते हैं और निजी तौर पर अभावमुक्त तथा प्रतिष्ठित होते ही हमारी वैचारिक क्रांतिदर्शिता और समाजवादिता का भी अंत हो जाता है।

      व्यक्तिगत रूप से न जाने कितने लोग विक्षुब्ध तथा क्रांतिदर्शी होते हैं, लेकिन निजी विक्षुब्धता तथा क्रांति विह्वलता की कोई सार्थकता होती नहीं, जब तक वह सामाजिक विक्षोभ और क्रांति से न जुड़ जाये।

      सीधी सी बात है कि अगर हम उत्पीड़क शक्तियों के प्रतिरोध के जोखिमों से बचना चाहते हैं, तो हमारा संघर्ष कभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पायेगा,  जहां से वह समाज के अन्य लोगों के लिए प्रेरक बन सके। 

      आप, शायद 'दिनमान' तो अक्सर देखते होंगे। इस राष्ट्रीय पत्र की नियति से वैचारिक रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता करने के आकांक्षी तथा दावेदार लोगों को सबक लेना चाहिए। 'दिनमान'  का सारा बाहरी तेवर सामाग्य नागरिकों,  बल्कि सर्वहारा और शोषित जनों,  के पक्ष में वैचारिक पहल और प्रतिरोध का दिखाई देता है। मगर भीतरी सच्चाई बिल्कुल भिन्न है। अपने पूरे चरित्र में वह एक पूजीवादी पत्र है और सामान्य तथा शोषित जनों की पक्षधरता का इसका सारा छद्‌मवेश पूंजीवादी प्रतिष्ठानों की कूट पत्रकारिता का अद्भुत उदाहरण है। शोषकों और उत्पीड़कों के विपक्ष में हुए बिना ही शोषितों और उत्पीड़ितों के पक्ष में होने का नाटक अंतत: नाटक है, चाहे वह बाहरी तौर पर कितना ही प्रामाणिक बनाया गया हो।

      हम शोषितों और पीड़ितों भी लड़ाई तो लड़ना चाहें,  लेकिन ये शोषक और उत्पीड़क शक्तियां कौन हैं,  इस बारे में गोलमोल बने रहना चाहें, तो साफ है कि हमें उत्पीड़क शक्तियों की पहचान ही नहीं है और या जान-बूझकर हम उनकी खरी-खरी पहचान होने नहीं देना चाहते। साफ है कि इन दोनों ही स्थितियों में शोषित-पीड़ितों की पक्षधरता बरतने की कोई गिंजाइश नहीं। पूंजीपति कभी इतना बेवकूफ नहीं होता कि वह शोषितों-पीड़ितों को पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति विद्रोही बनाने के दीक्षा-केंद्रों के रूप में अपने अखबारी प्रतिष्ठान चलाता रहे।


      'दिनमान' का उदाहरण मैंने यहाँ जान-बूझकर इसलिए दिया है कि इस पूंजीवादी तंत्र का करिश्मा देखिये कि गंदी-उत्तेजक-अश्लील पत्रिकाओं से लेकर उच्च स्तरीय साहित्यिक तथा वैचारिक पत्रिकाओं तक, सर्वत्र यह सिर्फ अपना ही जाल बिछाये रहना चाहता है। समाज को मानसिक रूप से भ्रष्ट करने के लिए सेक्स- -हत्या-षड्यंत्र और बलात्कार-भ्रष्टाचार के रंगीन किस्सों की पत्रिकायें मौजूद हैं और बौद्धिक रूप से विभ्रमित तथा लुंज-पुंज करने के लिए उच्च कोटि की साहित्यिक तथा वैचारिक पत्रिकायें उपस्थित हैं।

      पत्रकारिता के क्षेत्र में पूँजीवादी तंत्र के इस भयावह और सर्वग्रासी मायाजाल को देखे-समझे बिना ही अगर हम सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रिकायें निकालने के उद्यम में जुटेंगे,  तो इस बात भी कत्तई गुंजाइश नहीं है कि हम कोई कारगर भूमिका निभा सकेंगे ।

      अपने उद्देश्य, अपनी नीयत में खरा होना पहली शर्त है। साधनों का होना, न होना इसके बाद की चीज है। समाज और मनुष्य के पक्ष में यदि हम कुछ करना चाहें तो इसके लिए पहली जरूरत सच्चाई बरतने की है और इसके जोखिमों का रोना रोना इसलिए ठीक नहीं है कि बिनामा जोखिम उठाये ही सच्चाई बरती जा सकती होती, नैतिक और वैचारिक जीवन व्यतीत किया जा सकता होता, तो ऐसा करने वाले हम ही न होते।

      जैसे किसान उसी अनुपात में बोता है, जितनी उसके पास भूमि होती है; वैसे ही पत्रकारिता को भी बरतना चाहिए। आपने 'नैनीताल समाचार'  का जो क्षेत्रीय रूप रखा है, यह बहुत सही फैसला है और इतने भर का निमित्त भी यह बन पाता है तो कम नहीं होगा।

      ‘नैनीताल समाचार’ के पीछे कुछ आदर्शवादी, बौद्धिक रूप से जागरूक और नैतिक पत्रकारिता के हामी नवयुवकों का उद्यम साफ-साफ दिखाई दे जाता है और सराहनीय लगता है। चिन्ता सिर्फ इतनी होती है कि यदि वित्तीय कठिनाइयों के कारण यह पत्र बंद होने की स्थिति में जा पड़ा, तो इस आदर्शवादिता, बौद्धिक जागरूकता और नैतिक दावेदारी का अंत कहीं हताशा या बड़े प्रतिष्ठानों की छद्मवेशी पत्रकारिता के साथ जा जुड़ने में तो नहीं होगा। कभी-कभी उत्साह और जावेग लम्बी और सघर्षपूर्ण यात्रा में बाधा बन जाते हैं।

(शेष भाग कल। ) 
     

(‘नैनीताल समाचार’ के वर्ष 3 अंक 7 व 8 (नवम्बर-दिसम्बर 1979) में प्रकाशित)