('नैनीताल समाचार' अपने निरंतर प्रकाशन के पचासवें वर्ष में प्रवेश कर गया है। शुरूआती वर्षों में उसकी धारदार जनपक्षधर पत्रकारिता से प्रभावित होकर प्रसिद्ध और जुझारू लेखक शैलेश मटियानी ने यह लम्बा लेखनुमा पत्र लिखा था। यह लेख जनपक्षधर पत्रकारिता के मूल ध्येयों पर स्पष्ट और बेबाक रोशनी डालता है और क्या यह कहना भी जरूरी होगा कि पत्रकारिता को जनपक्षधर होना ही चाहिए! पुरानी फाइलें पलटते हुए मुझे यह लेख दिखा तो इसे अविकल रूप में यहां लगाने से अपने को रोक नहीं पाया। धैर्य हो तो पढ़िए और पीटिए कि पत्रकारिता कहां पहुंच गई है- न जो)
‘नैनीताल समाचार’ मैं देखता रहा हूँ और पत्रकारिता का जो तेवर इसमें है, अच्छा लगता रहा है।
यह दौर व्यावसायिक अथवा राजनैतिक सौदेबाजियों के लिए पत्रिकाएं निकालने वाले लोगों का है। साधन सिर्फ उन्हीं पत्रिकाओं तथा अखबारों के पास हैं, पत्रकारिता जिनके लिए निजी इस्तेमाल की चीज है, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का निमित्त नहीं। किसी भी तरह की राष्ट्रीय, मानवीय या कि सामाजिक चिन्ता से जिनका कोई सरोकार नहीं है। यह सचमुच कितनी तकलीफदेह बात है कि जिस क्षण आप यह तय करें कि लेखन अथवा पत्रकारिता के स्तर पर सामाजिक पक्षधरता बरतनी है, लोगों को उत्पीड़क तथा शोषक ताकतों के प्रति सावधान करना है और पारस्परिक एकजुटता के द्वारा समाजद्रोही शक्तियों के प्रतिरोध की पहल करनी है, तब जो पहली वास्तविकता सामने आती है वह यह, कि अपने इस संघर्ष में आप अकेले हैं। अकेले और साधनहीन। समाज को भ्रष्ट करके पैसा कमाने के इरादे से निकाली गयी गंदी पत्रिकाएँ अपने लिए लाखों पाठक जुटा लेती हैं, और समाज के पक्ष में संघर्ष करने के इरादे से प्रकाशित पत्रिका के लिए सौ-दो सौ खरीदार जुटा पाना कठिन हो जाता है। जो समाज को निरन्तर क्षय की ओर ले जाना चाहते हैं, वो इसके भीतर पैठे रहते हैं, और जो समाज को जागृत करने का इरादा रखते हैं, वो सामाजिक बहिष्कार की स्थिति में ।
समकालीन
पत्रकारिता के दौर की यह अत्यन्त तकलीफदेह वास्तविकता है। और इसकी तहों तक गये
बिना पत्रकारिता अथवा लेखन के प्रति सही और दूरगामी निर्णय लेना सम्भव नहीं। अक्सर
ही सामाजिक पक्षधरता के उत्साह में प्रारम्भ की गई पत्रकारिता का अंत जो एक खास
प्रकार की निजी सौदेबाजियों अथवा कुंठाग्रस्तता में होता दिखाई पड़ता है, इसके पीछे सही समझ और दृष्टि का न
होना ही मुख्य कारण है।
यहाँ राजनैतिक पार्टियों के मुखपत्रों अथवा
उपजीवी पत्रिकाओं की बात छोड़कर, सिर्फ उस तरह की पत्रिकाओं की समस्यायों पर ही
बात की जाय, जिनमें
राजनैतिक प्रतिबद्धता को ही सामाजिक प्रतिबद्धता भी नहीं मान लिया जाता और जिनके
पीछे इस बुनियादी सच्चाई की समझ होती है कि राजनीति सामाजिक जीवन की अनिवार्य
नियति भले ही हो, लेकिन
उसका सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व राजनीति के द्वारा सम्भव नहीं है, क्योंकि कुल
मिलाकर राजनीति का केन्द्र सत्ता-संघर्ष ज्यादा है, सामाजिक संघर्ष कम। राजनीति के
केन्द्र में समाज नहीं होता, सत्ता होती है, इसलिए वह अपने सत्ता-संघर्ष के
अनुसार अपना ताम-झाम बदलती रहती है। लेकिन यह छूट समाज के पक्ष में संघर्ष करने
वाले लोगों को नहीं होती। यही वजह है कि राजनीति के बूते सत्ता-केन्द्र
पर पहुँचने वाले लोग कभी भी समाज के पक्ष में सत्ता का प्रतिरोध करने वाले लोगों
को पसंद नहीं करते। सत्ता अपने आपको समाज का सम्पूर्ण और सर्वोच्च नियामक मानकर
चलना चाहती है, और जो
भी लोग उसके इस दर्प पर प्रहार करना चाहते हैं, उन्हें वह शत्रुओं के रूप में ही देखती है। यहां
तक कि समाजिक क्रान्ति के नाम पर सत्ता में आने वाले लोगों तक को सत्ता-विरोध
असहनीय ही लगता है ।
समाज और सत्ता के समीकरण को समझे बिना पत्रकारिता
के क्षेत्र में कारगर भूमिका निभाना सम्भव नहीं है। समाज की जगह सत्ता को ही
सर्वोपरि मान लेने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में सिर्फ सत्ता की राजनीति का
प्रवक्ता बन जाने के अलावा कुछ बाकी बच नहीं जाता। यह स्थिति लेखन और पत्रकारिता
की उस प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में हो जाती है, जो एकाधिकारी शक्ति-केन्द्र की वकालत
करती हो, फिर चाहे
यह तानाशाही के अन्तर्गत हो अथवा सर्वहारा अधिनायकवाद के नाम पर। सर्वाधिकारी
सत्ता का अर्थ ही समाज की सर्वोच्चता को ताक पर रख देना है। पत्रकारिता के संदर्भ
में इस बात का जिक्र यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि यह शुद्ध साहित्यिक लेखन की
अपेक्षा ज्यादा प्रत्यक्ष सामाजिक माध्यम है और अपने समय की, खास तौर पर अपने देश की, राजनैतिक व्यवस्था और प्रवृत्तियों
को समझे बिना सही और सटीक पत्रकारिता सम्भव नहीं। हम फिलहाल, लोकतांत्रिक
राजनीति के दौर से गुजर रहे हैं और यहां के साम्यवादी दल तक सर्वहारा अधिनायकवाद
का नाम लेने से कतराते हैं। अब हमारी पत्रकारिता किस कोटि की होगी, यह इसी बात पर निर्भर
है कि अपने समाज और सामाजिक व्यवस्था को परिचालित करने वाली राजनैतिक तथा आर्थिक
शक्तियों की समझ हमें कितनी है। समय की खास तौर से अपने
तौर पर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय देखने की
चीज यह है कि बाहरी तौर पर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय कही जाने वाली राजनैतिक पार्टी
के सत्ता केन्द्र पर रहने के लम्बे दौर में भी हम पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ही
रह रहे थे और मौजूदा जनता पार्टी उसका अपेक्षाकृत निकृष्ट विकल्प कही जा सकती थी और
यही स्थिति इस तरह के अन्य किसी भी समाजद्रोही राजनैतिक गठबंधन की होगी। परिणामतः
सत्ता पर बैठे लोगों को समाज के हितों की चिंता कम, पूँजीवादी शक्तियों की चिन्ता ज्यादा
है, क्योंकि
आज तक ऐसा एक भी राजनेता न कांग्रेसी सत्ता के दौर में दिखाई पड़ा, न जनता पार्टी
के दौर में, जिसने पूंजी संग्रह
के लिए अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया हो। जहाँ राजनीति के सूत्रधार पूंजी-संग्रह
के रोग से ग्रस्त होंगे, वहां
व्यवस्था और कानून
के पूंजी-विपन्न लोगों के पक्ष में होने की कोई गुंजाइश नहीं, और इसी कुटिल, छद्मवेशी
लोकतांत्रिक व्यवस्था का यह परिणाम है कि इस देश के करोड़ों नागरिक लावारिश
मवेशियों की सी जिन्दगी जीने को लाचार हैं ।
अब पत्रकारिता हमें चाहे राष्ट्रीय पैमाने
पर करनी हो या नितांत क्षेत्रीय, इन पूंजीवादी
शक्तियों के द्वारा परिचालित राजनैतिक तंत्र से जुड़े अथवा टकराये बिना इसे बरतना
सम्भव नहीं है। पूँजीवादी तंत्र के दुष्चक्रों से बेखबर समाज के बीच सही लेखन अथवा
पत्रकारिता को दोहरे संकटों से तो गुजारना ही होता है। पूंजीवादी तंत्र में से तो
इसे किसी तरह का प्रोत्साहन इसलिए नहीं मिलता कि रोचक, रंगीन तथा
उत्तेजक पत्रिकाओं से सारे बुक स्टालों को पाटकर, सामान्य लोगों की रुचि को विकृत कर
दिया गया होता है। हमारी शिक्षा पद्धति पूंजीवादी व्यवस्था के हितों को ध्यान में
रखकर तय की जाती है और उसमें पूँजीवादी व्यवस्था के मनुष्य तथा समाजद्राही ढाँचे
के प्रति छात्रों को जागरूक बनाने का कोई प्रावधान नहीं। इसी तरह न्यायिक व्यवस्था
का भी सारा ढाँचा पैसे वालों के अनुकूल खड़ा किया गया है, और इसीलिए सबके
लिए समान घोषित कानूनों के सबके लिए समान नतीजे निकलते नहीं। पूंजीवादी तंत्र की
सबसे बड़ी ताकत इस बात में निहित होती है कि पैसे की कीमत और शक्ति को सबसे ऊपर कर
दो, बाकी सारी समस्यायें अपने आप हल हो
जायेंगी।
जब पूँजीवादी व्यवस्था के प्रतिरोध की बात
हम करते हैं, तो इस
वास्तविकता को ध्यान में रखना चाहिए कि पूंजी और साधनों की तलाश में रहने के पीछे
अगर से सामाजिक जागृति के निमित्त ही इनके उपयोग का विवेक साथ न हो तो इस किस्म की
तलाश का अंत या तो पूंजी-संग्रह कर चुकने की निजी सुरक्षा और या न कर पाने की
व्यक्तिगत कुंठा में होता है।
सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रकारिता को
यह हमेशा ध्यान में रखना होता है कि जिस देश में सामाजिक जागृति जितनी कम हो, पत्रकारिता के
जोखिम उतने ही बढ़ जाते हैं और समाजद्रोही शक्तियों के प्रतिरोध का संघर्ष उतना ही
लम्बा हो जाता है। इस दूरगामी और जोखिम भरे संघर्ष में हमारी सांस न फूल जाये और
दम न घुटने लगे, इसके
लिए यह जरूरी है कि हमारे लेखन और पत्रकारिता के पोछे सिर्फ तात्कालिक आवेग और
उत्साह न हो, बल्कि
अपने लक्ष्य और संघर्ष की कठिनताओं की गहरी समझ हो। हममें से जो भी लोग जिस क्षण
इस महादेश की उत्पीड़क तथा शोषक शक्तियों के प्रतिरोध में खड़े होंगे, उनकी जगह उसी क्षण
शोषित, उत्पीड़ित
तथा विभाजित लोगों को कतार में होगी। जिनके पक्ष में हमें संघर्ष करना हो, उनकी खुद की
स्थिति और नियति से अलग खड़े रहकर, उत्पीड़क तथा शोषक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष
करने के मुगालतों में रहना खुद को और समाज को धोखे में रखना है। निजी सुरक्षा की
सावधानी जब तक हममें हो, तब
तक सामाजिक पक्षधरता बरतने के जोखिम उठाने की शक्ति हममें नहीं होगी। सामाजिक
पक्षधरता जब तक
सिर्फ दिमागी चिंता के स्तर पर हो, अपने
निजी आचरण में न हो, तब तक उस कोटि की पत्रकारिता की कोई
गुंजाइश नहीं, जिससे
उत्पीड़क व्यवस्था के वास्तविक प्रतिरोध की शुरूआत होती है।
साधन
विपन्नता के बीच, और
बावजूद,
सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रिकाओं के प्रकाशन के उद्यम में जुटे हम लोगों की
सबसे बड़ी चिंता शायद साधनों के न होने की ही है। इस सच्चाई को या तो हमने अर्जित
ही नहीं किया है और, या, इसे दबाये
रखना चाहते हैं कि इसके लिए नैतिक और वैचारिक शक्ति का, वास्तविक
सामाजिक चिंता का, होना
पहली जरूरत है, साधनों
का होना या न होना बाद की चीज है। मनुष्य और मानव समाज के पक्ष में जितने भी बड़े
संघर्ष आज तक के इतिहास में किये गये हैं, साधनों के नहीं, बल्कि नैतिक तथा वैचारिक शक्ति के
आधार पर; और यह
उपलब्ध होती है, निजी
स्वार्थ और सुरक्षा के मोह से उबरकर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को सामाजिक सहभागिता
के प्रति समर्पित कर देने पर।
पिछले कुछ वर्षों के अपने अनुभवों के आधार
पर मैं कह सकता हूं कि अपने उद्देश्य और लक्ष्य में विफल होने के पीछे सिर्फ निजी
खामियों और दुर्बलताओं को मैंने मुख्य कारण पाया है, दूसरों से मिलने वाले असहयोग या
परिस्थितियों के प्रतिकूल होने को नहीं।
हमें शायद इस सनातन सच्चाई को हमेशा याद रखना चाहिए कि जैसे प्रत्येक युग में, वैसे ही आज भी दूसरों को प्रभावित व प्रेरित कर सकने का रास्ता सिर्फ एक ही है- अपने विचार और आचरण में सच्चाई बरतना। आज भी आदमी सच्चाई से हो सबसे ज्यादा प्रभावित, आंदोलित और प्रेरित होता है। यदि हम सच्चाई पर हों तो दूसरों तक हमारा ऐसा होना, हवा में व्याप्त सुगंध की तरह पहुँचता है। हाँ, यह जरूर है कि सच्चाई दूसरों तक सुगंध की तरह तभी पहुंचती है, जब वह हममें पूरी तरह उतर चुकी हो।
आज यदि हम सचमुच अपने आपको समाज तथा मनुष्य के पक्ष में समर्पित कर सकें, तो वह दिन दूर नहीं होगा, जबकि सामाजिक सहभागिता हमारे साथ होगी। नैतिक तथा वैचारिक क्रांतियाँ प्रतिफलित होने में लम्बा वक्त सिर्फ इसलिए लेती हैं कि ये समाज की जड़ों में होतो है, जबकि आर्थिक तथा राजनैतिक शक्तियां समाज के शिखर पर विराजमान रहती हैं। इस मुगालते में हमें कभी नहीं रहना चाहिए कि समाज के पक्ष में संघर्ष करने की जिजीविषा सिर्फ हमारे ही भीतर है, समाज में नहीं है। इस तरह के मुगालतों का अन्त हमेशा हताशा में होता है। उत्पीड़क शक्तियों का विरोध जब हम खुद नहीं कर पाते हैं, तो सोचते हैं कि चूंकि इसमें ये-ये जोखिम थे, इसलिए। या कि, जरा अपने परिवार की व्यवस्था कर लें, तो फिर पूरी ताकत से समाजद्रोही शक्तियों से लोहा लें। इतनी दूर तक शायद हम सोच ही नहीं पाते हैं कि समाजद्रोही उत्पीड़क शक्तियों के प्रतिरोध का दूसरे लोग भी ठीक उन्हीं वजहों, उसी तरह के भयों और पारिवारिक चिंताओं के कारण नहीं उठा पा रहे है, जिस तरह के कारणों को हम अपने पक्ष में तकों की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं। बहुधा हम निजी तौर पर अभावग्रस्त होने के कारण विक्षुब्ध होते हैं अथवा निजी प्रचार-प्रतिष्ठा के आवेग से परिचालित होते हैं और निजी तौर पर अभावमुक्त तथा प्रतिष्ठित होते ही हमारी वैचारिक क्रांतिदर्शिता और समाजवादिता का भी अंत हो जाता है।
व्यक्तिगत
रूप से न जाने कितने लोग विक्षुब्ध तथा क्रांतिदर्शी होते हैं, लेकिन निजी विक्षुब्धता तथा क्रांति विह्वलता की कोई सार्थकता होती नहीं, जब तक वह
सामाजिक विक्षोभ और क्रांति से न जुड़ जाये।
सीधी सी बात है कि अगर हम उत्पीड़क शक्तियों
के प्रतिरोध के जोखिमों से बचना चाहते हैं, तो हमारा संघर्ष कभी भी उस स्तर तक
नहीं पहुंच पायेगा, जहां से वह समाज के अन्य लोगों के लिए प्रेरक बन
सके।
आप, शायद 'दिनमान' तो अक्सर देखते
होंगे। इस राष्ट्रीय पत्र की नियति से वैचारिक रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता करने के
आकांक्षी तथा दावेदार लोगों को सबक लेना चाहिए। 'दिनमान' का सारा बाहरी तेवर सामाग्य नागरिकों,
बल्कि सर्वहारा और शोषित जनों, के पक्ष में वैचारिक पहल और प्रतिरोध का दिखाई
देता है। मगर भीतरी सच्चाई बिल्कुल भिन्न है। अपने पूरे चरित्र में वह एक पूजीवादी
पत्र है और सामान्य तथा शोषित जनों की पक्षधरता का इसका सारा छद्मवेश पूंजीवादी
प्रतिष्ठानों की कूट पत्रकारिता का अद्भुत उदाहरण है। शोषकों और उत्पीड़कों के
विपक्ष में हुए बिना ही शोषितों और उत्पीड़ितों के पक्ष में होने का नाटक अंतत:
नाटक है, चाहे
वह बाहरी तौर पर कितना ही प्रामाणिक बनाया गया हो।
हम शोषितों और पीड़ितों भी लड़ाई तो लड़ना चाहें, लेकिन ये शोषक और उत्पीड़क शक्तियां
कौन हैं, इस बारे में गोलमोल बने रहना चाहें, तो साफ है कि हमें उत्पीड़क शक्तियों की पहचान ही
नहीं है और या जान-बूझकर हम उनकी खरी-खरी पहचान होने नहीं देना चाहते। साफ है कि इन
दोनों ही स्थितियों में शोषित-पीड़ितों की पक्षधरता बरतने की कोई गिंजाइश नहीं। पूंजीपति
कभी इतना बेवकूफ नहीं होता कि वह शोषितों-पीड़ितों को पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति
विद्रोही बनाने के दीक्षा-केंद्रों के रूप में अपने अखबारी प्रतिष्ठान चलाता रहे।
'दिनमान' का उदाहरण मैंने यहाँ जान-बूझकर इसलिए दिया है कि
इस पूंजीवादी तंत्र का करिश्मा देखिये कि गंदी-उत्तेजक-अश्लील पत्रिकाओं से लेकर
उच्च स्तरीय साहित्यिक तथा वैचारिक पत्रिकाओं तक, सर्वत्र यह सिर्फ अपना ही जाल
बिछाये रहना चाहता है। समाज को मानसिक रूप से भ्रष्ट करने के लिए सेक्स- -हत्या-षड्यंत्र
और बलात्कार-भ्रष्टाचार के रंगीन किस्सों की पत्रिकायें मौजूद हैं और बौद्धिक रूप
से विभ्रमित तथा लुंज-पुंज करने के लिए उच्च कोटि की साहित्यिक तथा वैचारिक
पत्रिकायें उपस्थित हैं।
पत्रकारिता
के क्षेत्र में पूँजीवादी तंत्र के इस भयावह और सर्वग्रासी मायाजाल को देखे-समझे
बिना ही अगर हम सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रिकायें निकालने के उद्यम में
जुटेंगे, तो इस बात भी कत्तई गुंजाइश नहीं है
कि हम कोई कारगर भूमिका निभा सकेंगे ।
अपने उद्देश्य, अपनी नीयत में खरा
होना पहली शर्त है। साधनों का होना, न होना इसके बाद की चीज है। समाज और मनुष्य के
पक्ष में यदि हम कुछ करना चाहें तो इसके लिए पहली जरूरत सच्चाई बरतने की है और
इसके जोखिमों का रोना रोना इसलिए ठीक नहीं है कि बिनामा जोखिम उठाये ही सच्चाई बरती
जा सकती होती, नैतिक
और वैचारिक जीवन व्यतीत किया जा सकता होता, तो ऐसा करने वाले हम ही न होते।
जैसे किसान उसी अनुपात में बोता है, जितनी उसके पास भूमि होती है; वैसे ही पत्रकारिता को भी बरतना चाहिए। आपने 'नैनीताल समाचार' का जो क्षेत्रीय रूप रखा है, यह बहुत सही फैसला है और इतने भर का निमित्त भी यह बन पाता है तो कम नहीं होगा।
‘नैनीताल समाचार’ के पीछे कुछ आदर्शवादी, बौद्धिक रूप से जागरूक और नैतिक पत्रकारिता के हामी नवयुवकों का उद्यम साफ-साफ दिखाई दे जाता है और सराहनीय लगता है। चिन्ता सिर्फ इतनी होती है कि यदि वित्तीय कठिनाइयों के कारण यह पत्र बंद होने की स्थिति में जा पड़ा, तो इस आदर्शवादिता, बौद्धिक जागरूकता और नैतिक दावेदारी का अंत कहीं हताशा या बड़े प्रतिष्ठानों की छद्मवेशी पत्रकारिता के साथ जा जुड़ने में तो नहीं होगा। कभी-कभी उत्साह और जावेग लम्बी और सघर्षपूर्ण यात्रा में बाधा बन जाते हैं।
(शेष भाग कल इसी जगह)
(‘नैनीताल समाचार’ के वर्ष 3 अंक 7 व 8 (नवम्बर-दिसम्बर 1979) में प्रकाशित)

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