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Tuesday, September 15, 2026

लेखन और पत्रकारिता की एकमात्र सार्थकता क्या है?

  ( पत्रकारिता की जनपक्षधर भूमिका के बारे में 'नैनीताल समाचार' को लिखे गए शैलेश मटियानी के लम्बे पत्र का शेष भाग)      

आपसे एक बात कहना चाहता हूं। अंततः आदर्शजीवी टूटता है, तो साधन विहीन हो जाने के कारण नहीं, बल्कि आकांक्षाविहीन हो चुकने की वजह से। पत्रिका का बन्द हो जाना, पत्रिका के पीछे निहित मानवीय संवेदना,  वैचारिक जिजीविषा और नैतिक जागरूकता का अंत हो जाना कदापि नहीं होता। 

        आदमी को तब तक कोई नहीं तोड़ सकता, ब तक खुद उसके भीतर की आकांक्षा, जिजीविषा और नैतिकता का क्षय न हो चुका हो। साधन बाहर से जुटने वाली चीज है। इससे हम वंचित किये जा सकते हैं, मगर आकांक्षा, वैचारिकता और नैतिकता, ये हमारी भीतरी निधियां है। इनको जब भी त्यागते हैं,  हम खुद त्यागते हैं। बाहरी प्रतिकूलताओं के कारण टूटने का तर्क इस्तेमाल करता इसलिए गलत है और बाहरी प्रतिकूलता तथा कठिनाइयों से घबराने वाले व्यक्ति को विचारक अथवा नैतिक होने की दावेदारी बरतनी ही नहीं चाहिए।

      लेखन और पत्रकारिता – इनकी एकमात्र सार्थकता इसी पर निर्भर है कि ये अपने पाठकों के भीतर की संवेदना को कितना जाग्रत कर पाते हैं और सामाजिक पक्षधरता तथा सहभागिता का कितना गहरा अहसास उनमें भर पाते हैं। एक जागरूक समाज में ही व्यक्ति भी अपना सही उत्कर्ष पा सकता है, इसलिए व्यक्तिगत सुविधाओं और सुरक्षा में ही आदमी की मुक्ति का मायाजाल फैलाने वाली पूँजीवादी तथा अधिनायकवादी शक्तियों के प्रति समाज में विद्रोह की भावना को बल देते रहना ही लेखन और पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए।

        साहित्य-सृजन पत्रकारिता की तुलना में अप्रत्यक्ष और विलम्बित प्रक्रिया वाली विधा है, किन्तु सही-सही पत्रकारिता की पहचान कर सकने लायक हम बनें, इसमें सबसे बड़ा योगदान साहित्य का ही होता है। साहित्य हमें मानसिक और वैचारिक रूप से सम्पन्न करने का सर्वोपरि माध्यम है और इतिहास में साहित्य ही, इसलिए, सदैव अक्षुण्ण रूप से प्रभावकारी बना रहता है ।

        पत्रकारिता में भी जब साहित्य की कोटि के नैतिक मूल्यों और संवेदना का समावेश हो, तभी वह अपने पाठक को भीतर तक स्पर्श कर सकती है। पत्रिका सिर्फ वही दीर्घ समय तक बनी रह सकती है, जो अपने पाठक के अस्तित्व का जरूरी हिस्सा बन जाये। इसलिए हमें निरन्तर यह उद्यम करना ही होगा कि हम पत्रकारिता को उस हद तक ले जा सकें, कि जहाँ उसे जीवित रखने की जरूरत दूसरे लोग अनुभव करने लगें। पूँजीवादी पत्रकारिता इसलिए सफल होती है कि वह 'लोग क्या पसंद करते हैं'  के व्यावहारिक सिद्धान्त पर चलती है और सामाजिक पक्षधरता बरतने वाली पत्रकारिता इस नैतिक मूल्य को दृष्टिगत रखते हुए कि लोगों तक क्या पहुँचाया जाना चाहिए।

      आदमी की प्रारम्भिक पसंद सेक्स-रोमांस और रोमांचकता की होती हैं।  नैतिक-वैचारिक रूप से मूल्यवान लेखन और पत्रकारिता की पहचान में बहुत वक्त लगता है। यह सब अब और कठिन इसलिए होता जाता है कि हम जिस तरह के पूँजीवादी लोकतन्त्र में जी रहे हैं,  उसमें समाज को नैतिक वैचारिक रूप से जागरूक कर सकने की भी खुली छूट है और भ्रष्ट कर सकने की  भी। पूंजीवादी तंत्र का कमाल यह है कि वह समाज के बौद्धिक वर्ग  का, धर्मगुरुओं का, राजनैतिक नेताओं का इस्तेमाल समाज को  वैचारिक, नैतिक तथा मानसिक रूप से कमजोर करने में करता है, ताकि लोगों में अपने आर्थिक-सामाजिक शोषण- उत्पीड़न के प्रति संगठित हो पाने की चेतना ही नष्ट हो जाय। समाज को अपने अनुकूल बनाये रखने में पूंजीवादी तंत्र धार्मिक, राजनैतिक और बौद्धिक वर्ग का समान रूप से इस्तेमाल करता है। एक छोर पर वह आचार्य रजनीश, महेश योगी, सांई बाबा, बाल योगेश्वर जैसे धार्मिक धूर्तों को प्रश्रय देता है;  तो दूसरे छोर पर अर्थलोलुप राजनेता तथा बौद्धिकों को।   

        पूंजीवादी प्रेस जगत पूंजीवादी तंत्र का सबसे बड़ा और कारगर करिश्मा है, जिसके बूते पर यह निरन्तर लोगों को वास्तविकताओं के प्रति बेखबर और उदासीन रखने में सफल होता है। पूँजीवादी प्रेस जगत की पत्रकारिता का मूल उद्यम मनुष्य को बौद्धिक रूप से दिवालिया और मानसिक रूप से पतनशील,  नैतिक रूप से दुर्बल और सामाजिक स्तर पर विघटित करना है। धार्मिक, राजनैतिक, और बौद्धिक - तीनों स्तरों पर वह लोगों को भाग्यवादी, पुरुषार्थ विहीन, आत्मभीरु, उदासीन और विघटनवादी बनाने में रुचि लेती है। आदमी के मनोबल को क्षीण करना, सामाजिक उत्कर्ष के संघर्ष की जगह, उसे व्यक्तिगत सुविधा-सुरक्षा की होड़ में डाल देना, लोगों के भीतर सामाजिकता की, सहभागिता की चेतना को ही जाग्रत न होने देना - पूँजीवादी प्रेस जगत की पत्रकारिता की यही मुख्य धुरी है। मनुष्य की सामाजिक चेतना को रौंदने के लिए इस्तेमाल किये जा रहे इस पूँजीवादी दुष्चक्र में उच्च वेतन भोगी बौद्धिकों की बहुत लम्बी बिरादरी है, जो पत्रकारिता के नैतिक तथा वैचारिक पक्ष को ही घपले में डाले हुए हैं, क्योंकि इससे उनकी खुद की वास्तविकताएं उजागर होती हैं।

      अथर्ववेद के एक सूत्र में कहा गया है- योक्त्रे सहवो युनज्मि समञ्चोऽग्नि सपर्यतारा। अर्थात् जैसे पहिए के अरे नाभि (धुरे) से जुड़े होते हैं, वैसे ही तुम सब एक अग्नि (चेतना) से जुड़ो। हमारे अधिकांश स्वनामधन्य बौद्धिकों ने इस आवाहन को साक्षात फ़लीभूत कर दिखाया है,  और पूँजीवादी प्रेस जगत के धुरे में अरों की तरह जुड़े हुए देश की सामाजिक,  नैतिक तथा वैचारिक चेतना को रौंदने में लगे हुए हैं।

      लेखन और पत्रकारिता का एकमात्र नैतिक पक्ष यह है कि वह लोगों में सामाजिक सहभागिता और संघबद्धता की चेतना जगाये। लोगों में इस विवेक को जाग्रत करे कि सबके हित में ही हमारा भी हित है। इस मनोबल को टूटने न दे कि अंतिम विजय नैतिक और सामाजिक मूल्यों की ही होगी,  समाज तथा मानव विरोधी शक्तियों की नहीं। उत्पीड़क तथा शोषक शक्तियों के विरुद्ध अपने संघर्ष में आदमी अकेला नहीं,  यह प्रतीति देना पत्रकारिता की नैतिक जिम्मेदारी है। समाज विरोधी शक्तियाँ प्रायः तूफान की तरह समाज को अपनी चपेट में लिए रहती हैं,  मगर मनुष्य की सामाजिक, वैचारिक अथवा नैतिक चेतना को जड़ से उखाड़ फेंकना - यह इनके लिए न कभी सम्भव हुआ है,  न होगा। 

        सही पत्रकारिता की यह पहचान है कि वह लोगों को इस सनातन सच्चाई का अहसास कराये। कोई भी समाज पूरी तौर पर तब तक नष्ट नहीं हो सकता, जब तक उसकी वैचारिक और नैतिक चेतना अंतिम रूप से नष्ट न हो जाय । वैचारिक और नैतिक चेतना,  ये हवाई अवधारणायें नहीं हैं। ये मानव इतिहास और मानव समाज की सनातन सच्चाइयाँ हैं और देखने वाली आखों को ये साफ-साफ दिखाई देती हैं। उत्पीड़क,  शोषक शक्तियों की चपेट में आ जाने पर भी कोई देश अथवा समाज अंतिम रूप से टूट जाने से तभी बचा रह सकता है, जब वह वैचारिक और नैतिक शक्ति के स्रोतों से विहीन न हो चुका हो।

        सही पत्रकारिता समाज और देश का ऐसा ही जीवंत और जागरूक स्रोत होती है। स्वच्छ और दूरदर्शी आँख की तरह यह  मनुष्य को,  मानव समाज को उसकी अविच्छिन्न परम्परा में देखती है, सिर्फ तत्काल में नहीं। अपने इस कोटि के देखने को पत्रकारिता जब भी शक्तिशाली भाषा में प्रकट करती है, समाज में इसका स्थान उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है, जितना किसी मनुष्य में जिह्वा का। पत्रकारिता जितनी नैतिक और वैचारिक रूप से खरी होगी,  उसकी वाग्मिता उतनी ही शक्तिशाली और प्रेरक होगी।

      ऊँचे आदर्शों अथवा मूल्यों को आचरण में उतारना बहुत कठिन होता है, लेकिन इस कठिनता से डर कर आदर्श और मूल्यों से ही विमुख हो जाना ठीक नहीं। अपने संघर्ष में विफल होना एक चीज है, अपने आदर्श और लक्ष्य से ही विमुख हो जाना बिल्कुल दूसरी। पहली स्थिति आदमी को विवेकी,  दूरदर्शी,  करुणा सम्पन्न,  अनुभवी और दृढ़ संकल्पी बनाती है, दूसरी में सिर्फ पतन होता है। हमारे जिस संघर्ष के पीछे सच्चाई और संवेदना हो,  वह हमें निरन्तर माँजता जाता है और अपेक्षाकृत ज्यादा बड़े तथा मूल्यवान संघर्ष में जुड़ सकने की नैतिक स्फूर्त तथा वैचारिक चेतना से हमें अनुप्राणित करता है। अपनी व्यक्तिगत सुविधा, प्रतिष्ठा अथवा स्वार्थपरता के लिए किये जा रहे संघर्ष में आदमी अन्ततः टूटता है और, बुरी तरह टूटता है।

      मनुष्य सिर्फ सामूहिकता की नहीं, बल्कि सामाजिकता की नियति से बंधा हुआ है। सामाजिकता और सामूहिकता के इस अंतराल को पहचानने वाले लोग ही सामाजिक संघबद्धता और सहभागिता की दिशा में सार्थक और सही पहल कर सकते हैं। सही पत्रकारिता की कसौटी इसी में है कि वह लोगों को सामाजिकता के विवेक के प्रति प्रेरित कर पाती है या नहीं। विचारविहीन सामूहिकता साम्यवादी अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त करती है और विघटित सामाजिकता पूंजीवादी व्यवस्था का। एक में मनुष्य सैनिक आतंक का आखेट बनता है, दूसरे में आर्थिक शोषण का।

      सही पत्रकारिता को राजनैतिक व्यवस्था का अनुगामी न होकर,  समाज का प्रवक्ता होना होता है। उसके पास आदर्श सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना जरूर होनी चाहिए,  क्योंकि क्या मनुष्य के पक्ष में है, इस बात की तमीज हमें न हो, तो हम उसके विपक्ष में पड़ने वाली चीजों की सटीक पहचान कर नहीं सकते। अपनी सम्पूर्ण जागरूकता और तत्परता के साथ मनुष्य के पक्ष में होने की संकल्पबद्धता,  इसी में पत्रकारिता की श्रेयस्करता निहित है। सामाजिक सहभागिता की पक्षधरता, यही पत्रकारिता का नैतिक पक्ष है और 'नैनीताल समाचार' पत्रकारिता के इस नैतिक पक्ष को सदैव ध्यान में रखे रहे,  यही कामना है। आज भ्रष्ट पत्रकारिता अपने चरम पर है, इसलिए सही और संवेदनशील पत्रकारिता का मूल्य और ज्यादा बढ़ गया है। सही दिशा में संघर्ष करने का एक अपना परितोष होता है और वह कठिनाइयों को वहन करने की शक्ति तथा विफ़लता के बावजूद आकांक्षावान और संघर्षशील रह सकने की प्रेरणा देता है ।

      साहित्यिक और वैचारिक स्तर पर अच्छी और ईमानदार पत्रकारिता सचमुच बहुत कठिन हो गई है। पूंजीवादी प्रतिष्ठानों की पत्रिकाओं में इसके लिए कोई स्थान नहीं है। निजी तौर पर पत्रिकायें निकालना बेहद मुश्किल काम है। पूंजीवादी तंत्र ने इसकी गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है कि मनुष्य और समाज को जाग्रत करने वाले लोगों को समाज में से खुराक मिल सके। समाज का ऊपरी ढाँचा उन लोगों के लिए ही सबसे ज्यादा अनुर्वर और संवेदनविहीन है,  जो सामाजिक तथा मानवीय मूल्यों के लिए संघर्य करना चाहते हैं। 

        परिणामतः जो भी लोग पूंजीवादी व्यवस्था के प्रतिरोध में पत्रिका निकालने का उद्यम करते हैं, सामाजिक स्तर पर उन्हें सिर्फ हताशा का सामना करना पड़ता है और वैचारिक - सामाजिक क्रान्ति के उत्साह में निकाली गई पत्रिका एक बार बंद होती है, तो फिर दुबारा उसे निकालने की नौबत नहीं आती। और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि हमने अपने संघर्ष की कठिनता तथा जटिलता को गहराई से समझा ही नहीं होता है। अपने लक्ष्य के विफल होने और संघर्ष से घबराकर अपने लक्ष्य को ही स्थगित कर देने में बुनियादी फर्क होता है।

      समाज की सिर्फ ऊपरी या सतही किस्म की समझ हमेशा व्यक्ति के संघर्ष को कुंठित करती है,  क्योंकि अपने उत्साह और आवेग की तुलना में दूसरों से सहयोग न पाने पर हम खीझने लगते हैं और एक खास तरह की अहम्मन्यता हमारे भीतर जड़ जमाने लगती है कि लोग हमारे उद्देश्य और संघर्ष की महानता को समझ नहीं पा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि अपने उद्देश्य और संघर्ष की गहरी समझ न होने के कारण ही हम बहुत जल्दी उत्साहित और उतनी ही जल्दी हताश होने के आदी हो जाते हैं।

      शोषण और उत्पीड़न के प्रति जैसा विक्षोभ हममें है,  वैसा सब में नहीं तो बहुतों में होगा। नैतिक मूल्यों के प्रति जितना अनुराग हममें है,  वैसा सबमें नहीं, तो बहुतों में होगा। बिना इस आस्था के ही किसी बड़े संघर्ष में कूद पड़ना अंधे का कुएँ में कूदना है ।

      पूंजीवादी पत्रकारिता का लक्ष्य होता है,  आदमी को बाहरी तौर पर प्रभावित करना। सामाजिक पक्षधरता बरतने की आकांक्षी पत्रकारिता का उद्देश्य होता है, आदमी को उसके भीतर तक स्पर्श करना। निश्चय ही दूसरे का काम ज्यादा कठिन, संघर्ष-भरा और दूरगामी होगा। इस बुनियादी अंतराल को अगर हम ध्यान में रख सकें, तो तात्कालिक विफलताएं हमें अंतिम रूप से हताश नहीं करेंगी। हमें शायद यह भी सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि गलत किस्म के कामों में सफल होने की तुलना में सही कामों में विफल हो जाना ज्यादा बेहतर है। (इति) 

(नैनीताल समाचारके वर्ष 3 अंक 7 व 8 (नवम्बर-दिसम्बर 1979) में प्रकाशित