
चिकित्सा और पुलिस विभागों को छोड़ कर अन्य विभागों में नयी नियुक्तियां नहीं करने का आदेश कर्मचारी संगठनों को नाराज करने वाला है किंतु यह भी सच है कि कई विभागों में काम से ज्यादा कर्मचारी हैं. कम्प्यूटर आ जाने का बाद काम काफी हलका हुआ है. काम में हीला-हवाली करने और भ्रष्टाचार के लिए सरकारी विभाग कुख्यात हैं. सरकारी विभागों के कई काम पहले से ठेके पर (आउटसोर्सिंग) दिये जा रहे हैं. नया आदेश इसे और बढ़ाने की बात करता है. काम में टालमटोल के आदी कर्मचारियों को यह भी नहीं सुहाएगा.
सवाल यह है कि क्या सरकार मितव्ययिता पर वास्तव में गम्भीर है? ऐसे आदेश पहले की सरकारों में भी यदा-कदा जारी हुए थे. ईमानदारी से पालन कभी नहीं हुआ. पूरा सरकारी अमला, चतुर्थ श्रेणी कर्माचारी से लेकर, आला अफसरों तक, जनता के धन को मुफ्त के माल की तरह उड़ाने का आदी है. अफसरों की चाय-पानी, दफ्तर एवं घर की साज-सज्जा और स्टेशनरी का हिसाब ही मांग लीजिए तो आंखें खुल जाती हैं.
सरकार सही में मितव्ययी होना चाहती है तो सिर्फ अफसरों से ही उम्मीद क्यों की जा रही है? ऐसा ही फरमान सरकार के मुखिया क्यों नहीं जारी करते? क्यों नहीं विधायकों के विभिन्न भत्तों में कुछ कटौती की जाती? क्यों नहीं मंत्रियों के बेशुमार खर्चों पर लगाम लगाई जाती? मंत्रियों की सुरक्षा व्यवस्था पर कितना खर्च होता है? क्या सब के सब हर समय बहुत खतरे में रहते हैं? उसमें कुछ कटौती नहीं की जा सकती? मुख्यमंत्री के काफिले को थोड़ा छोटा नहीं किया जा सकता? ये सब जन-प्रतिनिधि हैं. जनहित और प्रदेश के विकास की चिंता उन्हें होनी ही चाहिए. जिम्मेदारी भी उन्हीं की है?
होना भी यही चाहिए कि सरकारी अमले को निर्देश देने से पहले नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे. पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं. अपनी निजी गाड़ियों में तेल भरवाते समय दस बार सोचा जाता होगा, लेकिन सरकारी गाड़ियों के फर्राटे में कहीं कोई संकोच नहीं है. मंत्री हों या अफसर, हरेक को नयी गाड़ी चाहिए. विभागों के अन्य मदों के बजट से गाड़ियां खरीदी जाती हैं. विभिन्न विभागों के अधीन दर्जनों निगम हैं. इन निगमों की गाड़ियां मंत्रियों-अफसरों की सेवा में तैनात रहती हैं, जिसकी शायद ही लिखत-पढ़त होती हो.
ये चंद उदाहरण हैं. सरकारी फिज़ूलखर्ची के इतने ओने-कोने हैं कि हमारी नजर वहां तक पहुंच नहीं सकती. सरकार अपने अनुत्पादक व्यय कम करना ही चाहे तो ऐसे बहुतेरे मद होंगे जिनमें कटौती करके सरकार अच्छी-खासी बचत कर सकती है. योजनाओं में विलम्ब ही कितनी बड़ी चपत लगा देता है. भ्रष्टाचार तो खैर ईश्वर का चढ़ावा-सा है. उस पर बात करना व्यर्थ है.
प्रश्न है कि हमारे सरकारी विभाग निजी क्षेत्र के कार्यालयों की तरह चुस्त-दुरस्त और त्वरित परिणाम देने वाले क्यों नहीं बन सकते? क्या कभी वहां हर एक पैसे के खर्च की उपयोगिता साबित होगी? प्रत्येक कर्मचारी समय का पाबंद और अपने काम के प्रति कब उत्तरदाई होगा?
मितव्ययिता अपनी जिम्मेदारी समझने से आती है.
(सिटी तमाशा, 23 सितम्बर, 2018)
(सिटी तमाशा, 23 सितम्बर, 2018)
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