
सरकारी दफ्तर कामचोरी और लापरवाहियों
के लिए कुख्यात हैं लेकिन अपने देश में बड़ी एवं प्रतिष्ठित निजी कम्पनियाँ भी इस
मामले में कम नहीं हैं. निजी टेलीकॉम कम्पनियाँ बहुत लापरवाह साबित हो रहीं हैं. ब्रॉडबैण्ड
कनेक्शन के तार बड़ी बेतरतीबी से दूसरे घरों की छतों, बालकनियों
से होते हुए बिजली के खम्भों में जैसे-तैसे
बांधे गए कहीं भी देखे जा सकते हैं.
ओएफसी डालने के लिए वे बेरहमी से
खुदाई कराते हैं. कभी पानी की पाइपलाइन फटती है,
कभी टेलीफोन केबल. चंद महीने पहले गोमती नगर के एक हिस्से में पानी देने वाली
मुख्य पाइप लाइन खुदाई में कट गई. चौबीस घण्टे से ज़्यादा पानी आपूर्ति ठप रही.
खुदाई कराने वालों ने जल संस्थान को यह सूचना देना भी उचित नहीं समझा कि नुकसान किस
जगह हुआ है. इसलिए मरम्मत में भी देर हुई.
जहाँ मर्जी आए खोदो और अपना काम करवा
कर चलते बनो. निजी कम्पनियों का यही रवैया बन गया है. ये कम्पनियाँ नगर निगम,
जल संस्थान, बीएसएनएल, आदि
से खुदाई की अनुमति लेती हैं या नहीं, खुदाई की मरम्मत का धन
जमा कराती हैं या नहीं, स्पष्ट नहीं होता. कुछ औपचारिकता भले
होती हो, बाकी काम ‘अण्डर द टेबल’
होता है. अपना काम निकालने के लिए निजि कम्पनियाँ सरकारी अमले को की
जेब गरम करने में सबसे आगे हैं. इसीलिए खुदे फुटपाथों एवं सड़कों की मरम्मत नहीं
होती. बड़े-बड़े गड्ढे जानलेवा हो गए हैं. बरसात में उनकी
मिट्टी धँसने से और भी खतरनाक.
प्रतिष्ठित निजी कम्पनियों में पहले
एक घोषित नियम था. वे अपने कार्यालय नियमानुसार कमर्सियल भवनों में ही खोलते थे.
हाल के वर्षों में नियम के विपरीत निजी भवनों में खुलेआम कॉर्पोरेट दफ्तर खोले गए
हैं. बैंक भी यही कर रहे हैं. शहर के हर इलाके में आवासीय कॉलोनियों में निजी
कम्पनियों के बड़े-बड़े दफ्तर और बैंक खुले हुए हैं. इनमें स्टाफ के लिए भी पार्किंग
की जगह नहीं होती, ग्राहकों की चिंता कौन
करे. जाम लगना आम बात है.
लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन की अवश्य
प्रसंशा करनी होगी. मेट्रो ट्रेक निर्माण के दौरान उन्होंने न केवल सुरक्षा मानकों का पूरा ध्यान रखा बल्कि खुदाई और तोड़फोड़
समबद्ध विभागों से अनुमति लेने और शुल्क जमा करने के बाद की. काम हो जाने के बाद ज़ल्दी ही सड़कें ठीक कीं. इस पूरे दौरान यातायात
संचालन के लिए उसने कर्मचारी भी तैनात किए. उनके ही कारण मेट्रो निर्माण के दौरान
यातायत बाकी दिनों की तुलना में बहुत सुचारू रूप से चला.
कभी निजी कम्पनियों की
कार्य-संस्कृति की तारीफ होती थी. अब उन्होंने सरकारी ढर्रा अपना लिया है. सरकारी
अमले की आदतें बिगाड़ने में उनका खास योगदान है. सरकारी तंत्र में आसानी से काम
करवाने के लिए उन्होंने बकायदा एजेण्ट रखे हैं जो लेन-देन और राजनैतिक प्रभाव से
कम्पनी के काम करवाते हैं.
बेईमानी,
लापरवाही, टालमटोल और कामचलाऊ उपाय करना हमारी
चारित्रिक विशेषता है. सरकारी तंत्र में हम हैं और निजी कम्पनियों में भी हम ही
हैं. फिर भला निजी क्षेत्र में उजली
कार्य-संस्कृति के उदाहरण कैसे दिए जा सकते हैं!
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