लेकिन असली बात उसमें मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं, संघर्षों और जीवन के ऐसे सत्य के चित्रण का होना है, जो देश, काल और परिस्थिति से परे हर मनुष्य को अपनी कहानी जैसी लगती है। ऐसी रचनाओं का अपने सृजन के वर्षों या सदियों बाद भी पुराना नहीं पड़ना एक आवश्यक शर्त है।
नवीन जोशी का उपन्यास "दावानल" (सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली) आए हुए लगभग 20 साल हो रहे हैं। यह कथा भी कई मायनों में उपर्युक्त श्रेणी में शुमार होती है। आज दुर्गम पहाड़ों तक पहुँच को सुगम करने तथा विकास के नाम पर जो तोड़-फोड़ चल रही है, उसे देखकर ‘दावानल’ तथा ‘देवभूमि डेवलपर्स’ फिर से पढ़े जा रहे हैं।
उस समय मैंने "दावानल" पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी थी, जो "अमर उजाला" के साहित्यिक पृष्ठ में छपी :
जनांदोलन की चिंगारी से भड़का दावानल
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नवीन जोशी का 'दावानल' एक मुकम्मल उपन्यास है। शुरू में ही इसके साथ यह 'टैग' नत्थी कर देना कि उत्तराखंड में चला 'चिपको' आंदोलन ही इसकी केंद्रीय चिंता है, रचना के आस्वाद में कमी का कारण बन सकता है। यह 'नहीं' होना चाहिए।'दावानल' में पिछली शताब्दी के आठवें दशक में पहाड़ों में छिड़े वनांदोलन के बहाने पहाड़ का पूरा इतिवृत्त पढ़ने को मिलता है। लगता है कि लेखक का रचनादायित्व और उसका सामाजिक दायित्व आपस में घुल-मिल गए हों जैसे। छह वर्ष के पुष्कर को उसके बाबू लखनऊ ले आए, पर कितने ही पहाड़ थे जो बड़े होते जा रहे पुष्कर के दिमाग में अपने दरवाजे खोल रहे थे। शुरुआती दौर में नहर कालोनी लखनऊ में चिंतामणि जोशी का परिवार, फिर गांव में अनुली बुआ से पूछी गई जड़ी-कंजड़ी, मई 1977 में हल्द्वानी में से पोस्टर की इबारत और डाक्टर ज्योति के प्रेरक 'रियल' सेवाभाव ने उसकी दिशा तय कर दी। उसने सोच लिया कि पहाड़ की रंगीन तस्वीरों के असल घूसर रंग को वह सामने ला कर रहेगा। इसका उपक्रम था 'जहां मरीज को अस्पताल के बजाय श्मशान ले जाना आसान होता है' शीर्षक लेख।
वस्तुतः कहानी है व्यापार के लिए पहाड़ों के जंगल सत्ता द्वारा ठेकेदारों को सौंप देने से पर्वतवासियों को अपनी जीवन शक्ति छीन लिए जाने की आशंका की, और इसके प्रतिकारस्वरूप गौरा देवी की हुंकार 'दौड़ो! गढ़देश के देवियों दौड़ो! उस जंगल को बचाने जो तुम्हारा मायका है, जो तुम्हारे जीवन का अवलंब है, जिसके बिना तुम्हारे जीवन का आधार खिसक जाएगा, दौड़ो!' की। वे दौड़ीं, उन्होंने पेड़ों को अंगवाल्ठा डाल दिया। उन्होंने पट्ट पकड़ लिया पेड़ को। हर पेड़ पर एक-एक औरत चिपक गई, लेकिन जंगल को बचाने के लिए वन में आछंरियों के इस तांडव, वनों पर अपना पारंपरिक हक जताने का उनका यह संघर्ष किस दहाने पर जाकर खुला? नए वन अधिनियम 1980 के डेल्टा पर या पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चालाक लोगों द्वारा राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सम्मान बटोरने के मुख-विवर में। जनांदोलन के इस तरह स्खलित हो जाने, भटक जाने के रिजल्ट फिर दिशाविहीन सोच, अनमने क्रिया-व्यापार के रूप में सामने आते हैं।
समग्रता में दावानल की यह कथा आंदोलन में उन लोगों की भागीदारी को भी रेखांकित कर देती है, जिन्हें प्रतीकात्मक तौर पर ही सही, जिनको क्षेत्रीय इतिहास और उस कालखंड की शोध कथा में शायद जगह न मिल पाती। एक तरफ बाबा जीवन लाल और रामप्रसाद जी को पाठक खूब पहचान रहे हैं तो दूसरी ओर गिर्दा, विपिन चच्चा, चंदर, सीपी, सलीम और गिरीश जैसे किरदारों की मौजूदगी की भी पंक्ति-दर पंक्ति टोह ले रहे हैं।
यों तो उपन्यास में तवाघाट का भूस्खलन, भागीरथी की मारक बाढ़ और बाघ का आतंक सरीखी पहाड़ की पीड़ा के दूसरे ब्यौरे भी हैं, लेकिन इनके उत्स की यहां न तो गुंजाइश थी और न मौका। होना यह चाहिए था कि हल्की फिरोजी आंखों वाली लड़की कविता को कुछ और एक्सपोजर मिलता। तभी यह पुष्ट हो पाता कि 'पहाड़ में उतरता था तो गांव की अल्हड़ छोकरी की झुगुली से लेकर कैलाशवासी शिव की भभूत तक वासंती हो जाती थी' और ऐसे ही नहीं पहाड़ की ईजाओं को आभास हो जाया करता था कि उनके लाड़लों के जीवन में कोई 'देसवाली' आएगी करके।
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• डॉ. भूपेन्द्र बिष्ट की फेसबुक पोस्ट से, 13 सितम्बर 2026

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