नाइफ ने चाकू-छुरी को कत्ल कर डाला है। नीबू, लेमन हो गया है। अदरक का स्वाद जिंजर ने ले लिया। जराकुश को लेमन ग्रास खा गई। डीटॉक्स वाटर बन रहा है। वुड यू लाइक?
हमारे घरों में अब रसोई नहीं होती। सुबह 'किचन' से शुरूआत हुई है।
स्पून ने चम्मच को पीट दिया है। कटोरी-कटोरा को बोल या बाउल ने धकिया दिया है। 'कटोरे पर कटोरा, बेटा बाप से भी गोरा' जैसी पहेली किसी किताब में शायद छुपी हुई मिले।
प्लेट ने थाली को भरमा दिया है। पलटा-करछुल को स्पैच्युला ने पलट डाला। तलना-भूनना-सेकना-छोंकना अब डीपफ्राई-फ्राई-स्टरफ्राई-सौते वगैरह कहाते हैं।
नाश्ता कभी-कभी होता है मगर कलेवा गुम गया। ब्रेकफास्ट टेबल पर लगा है। बटर मिल्क ट्राई करिए। कर्ड लेंगे? मिल्क, कोल्ड या हॉट? गुनगुना सुने कानों को जमाना हुआ।आपको छाछ, दूध, दही, मक्खन की याद है?
टोस्ट में बटर चलेगा या चीज? नूडल्स ज़्यादा स्पाइसी नहीं हैं। ट्राई तो करिए।
चटपटा, सूखा, लटपटा भी कुछ होता था? रसदार क्या होता है? अच्छा, ग्रेवी कहिए!
नमक, सॉल्ट हो गया है। चीनी- सुगर। सुपाच्य को लाइट और गरिष्ठ भोजन को हैवी डाइट का कब्ज हो गया।
कहां तक गिनाए। आप गवाह हैं।
गिला नहीं कि भाषा बदल गई। वह बदलती रहती है। बदलनी भी चाहिए। वह बंद तालाब नहीं कि सड़ने के लिए छोड़ दी जाए। भाषा निरंतर प्रवाहित होने वाली नदी है जो अपने कूल-किनारों को काटती, नए बनाती बहती रहती है।
जीवन-शैली बदलेगी, दुनिया खुलेगी तो भाषा बदलेगी। तकनीकी प्रगति, रहन-सहन और वैश्विक प्रभावों के साथ भाषा बदलती ही है। नए शब्द आएंगे। व्याकरण भी कोई जेल नहीं।
पर क्या हमें अपने सहज-सरल, सुंदर शब्दों को बोलना छोड़ देना चाहिए? उनकी जगह अंग्रेजी के शब्द क्यों ठूंसने चाहिए? अपने प्यारे शब्दों का उच्चारण पिछड़ापन क्यों माना जाना चाहिए?
ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, मामा-मामी, कितने प्यारे रिश्तों को अंकल में समेट देना कैसी प्रगति या आधुनिकता है? कजिन से क्या कोई समझे कि कैसा भाई या बहन है?
हमारी भाषा की जो खूबियां हैं, जो सटीक शब्द हैं और सरल भी हैं, उन्हें रोजमर्रा की बोलचाल में क्यों प्रयुक्त नहीं करना चाहिए।
हमारे लिए तो रोज ही हिंदी दिवस है। भाषा की हैरानियां भे एरोज की ही हैं।
- न जो, 14 सितम्बर 2026