
एक भयावह काण्ड के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस को याद आया है कि अपने सिपाहियों को ट्रेनिंग देने की जरूरत है. अब उन्हें सिखाया जाएगा कि जनता से अच्छा व्यवहार कैसे किया जाता है, वाहनों और व्यक्तियों की जांच कैसे की जानी चाहिए, सबूत जुटाने के लिए घटनास्थल को कैसे सुरक्षित रखा जाए, आदि-आदि. देर आयद, दुरस्त आयद. लेकिन क्या पुलिस के उच्चाधिकारी वास्तव में यह समझते हैं कि इस तरह की टुकुड़ा-टुकुड़ा ट्रेनिंग से सिपाही ‘सुधर’ जाएंगे?
सिपाहियों ही को नहीं, पूरे पुलिस महकमे को ट्रेनिंग और सुधार की जरूरत है. पुलिस सुधारों की जो सिफारिशें वर्षों से फाइलों में दबी हैं, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट जो निर्देश दे चुका है, उनके बारे में क्या खयाल है? वे कब लागू होंगे? उनसे क्यों मुंह चुराया जाता है? इस सवाल का जवाब कौन देगा कि सिपाहियों को पिस्तौल रखने-चलाने की ट्रेनिंग नहीं है लेकिन उनके हाथों में यह हथियार दिया क्यों जा रहा है?
कोई राजनैतिक दल नहीं चाहता कि पुलिस सुधार की महत्त्वपूर्ण
सिफारिशें लागू हों. पुलिस का इस्तेमाल वे अपनी सत्ता बचाने और विरोधियों को सताने
के लिए तरह-तरह से करते रहे हैं. पिछले कुछ दशक से राजनीति के आपराधीकरण में पुलिस
सबसे बड़ी मदददगार बन गयी है. जिनको जेल में होना चाहिए था या जिनके अपराधों के
सबूत पुलिस को जुटाने चाहिए थे, उन्हीं की चेरी बनी वह उनकी सुरक्षा में
लगी है.
क्या ट्रेनिंग में सिपाहियों, दरोगाओं, आदि को यह सिखाया जाएगा कि वे ‘वसूली’ न करें? ईमानदारी से अपना काम करें? अगर सिपाहियों ने पलट कर पूछ लिया कि हुजूर क्या अब ऊपर ‘हफ्ता’ और ‘महीना’ पहुँचाना नहीं पड़ेगा तो क्या जवाब देंगे? वसूली करना
सिखाया किसने है? थानों की ‘कीमत’
किसने तय की है? हाथ जोड़ कर, निवेदन करते हुए तो वसूली होगी नहीं. उसके लिए पुलिसिया रौब दिखाना होगा.
फिर पुलिस का व्यवहार सुधरेगा कैसे?
माना कि विवेक तिवारी की हत्या के अभियुक्त सिपाही का पक्ष
भी जांच में सुना-जांचा जाना चाहिए लेकिन यह क्या बात हुई कि बहुत सारे पुलिसकर्मी
सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में ऐसे अभियान चला रहे हैं जैसे कि वह सर्वथा निर्दोष
है और उसने जो किया वह बिल्कुल ठीक किया. उसके लिए चंदा जुटाया जा रहा है. उसके
धतकर्म को बहादुरी बताया जा रहा है. आंदोलन करने की चर्चा हो रही है. क्या ये
पुलिस वाले मानते हैं कि उस सिपाही ने सामान्य जांच और पूछताछ में कार सवार को
सीधे गोली मार कर सही किया? उसके समर्थक पुलिस वाले भी ऐसा ही करेंगे?
अगर पुलिस बल में यह सोच मौजूद है तो फिर कोई भी नागरिक कहीं भी
सुरक्षित नहीं. एक अभियुक्त के रूप में उसके कानूनी अधिकार उसे मिलने चाहिए लेकिन
उसे सही ठहराना भयानक बात है.
इस प्रकरण में एक और तथ्य की शायद जान-बूझ कर उपेक्षा की जा
रही है. विवेक तिवारी की हत्या के बाद कुछ पुलिस अधिकारियों ने सिपाही को बचाने, सबूत
मिटाने और हत्या को दुर्घटना बनाने की साजिश रची. अगर उन पर अपराध छुपाने और
अभियुक्त का साथ देने का मुकदमा नहीं चलाया जाता तो सरकार एक और अन्याय होने दे
रही है.
आम चुनाव नजदीक नहीं होते और अंगुली सीधे सरकार की छवि पर
नहीं उठ गयी होती तो न्याय के नाम पर जो किया गया है, न हुआ
होता. सवाल और भी हैं. फर्जी मुठभेड़ों में मारे गये लोगों के परिवारों की आवाज कौन
सुन रहा है? उनके लिए सोशल मीडिया पर कौन आक्रोश व्यकत कर
रहा है? किसी अभियुक्त और एक निर्दोष नागरिक को सीधे गोली
मार देने में क्या फर्क है?
(सिटी तमाशा, नभाटा, 6 अक्टूबर, 2019)
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