
कुछ वर्ष पहले जब मोबाइल पर वाट्सऐप डाउनलोड किया था तब कभी-कभार आने वाले सन्देश
की सूचना देती हलकी-सी टिन-टिन मधुर लगती थी. अब हर एक मिनट में न्यूनतम दो-चार
संदेश मिलने की सूचना देती वही टिन-टिन कर्ण-कटु लगने लगी है. आस-पास जितने भी हैं,
हर पल किसी न किसी का मोबाइल वाट्सऐप संदेशों की भांति-भांति की
घण्टी बजाता रहता है. काम के संदेश मुश्किल से एक-आध ही होते हैं. ज्यादातर
फॉरवर्ड किये गये बेहूदा संदेश या वीडियो. फेक-न्यूज की भरमार. आजकल तो चुनावी
संदेशों की बाढ़ आयी हुई है.
दुखी होकर हमने नोटीफिकेशन बंद कर
दिया. अब जब भी मोबाइल उठाइये, व्हाट्सऐप
का आयकन बताता है कि वहाँ सैकड़ों सन्देश हमारा इंतज़ार कर रहे हैं. डिलीट और एक्जिट
करते-करते भी दस वाट्स-ऐप ग्रुप ऐसे हैं
जिनमें बने रहना अनेक कारणों से मजबूरी बन गयी है. इनमें सुबह से रात तक सात-आठ सौ
संदेश आते हैं. गुड मॉर्निग से लेकर गुड नाइट तक, नेहरू
गांधी खानदान का देशद्रोह बताने से लेकर फासीवादी राजनीति का चेहरा उघाड़ने तक,
फिल्मी गीतों से लेकर साँप-नेवले की लड़ाई तक के वीडियो, जाने क्या-क्या. इनसे छुट्टी पाने में कम से कम दोनों टाइम आधा घण्टा लगता
है.
सोचता हूँ, कितने सारे लोग हर वक्त सिर्फ वाट्सऐप
पर ही लगे रहते हैं. जहां जाइए, जहाँ देखिए सभी हाथ के
मोबाइल फोन में डूबे है. स्मार्ट फोन नहीं है तो जिंदगी बेकार है. कहीं बिल बिल
जमा करने जाइए या बैंक, काउण्टर के पीछे बैठा व्यक्ति
घड़ी-घड़ी काम रोककर वाट्सऐप देखता है और जवाब
देता है. काउण्टर के इस तरफ वाला कुढ़ता है. फिर वह भी अपना वाट्सऐप खोल लेता है. पूरी लाइन इसी में लगी रहती है.
भारत में 45 करोड़ से अधिक व्यक्तियों
के हाथों में स्मार्ट फोन हैं और इनमें 20 करोड़ से ज्यादा वाट्सऐप के सक्रिय उपयोगकर्ता हैं. गूगल महाशय यह आंकड़ा
तीस करोड़ तक पहुँचता बता रहे हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही यह संख्या और आगे
निकल जाए. रोजगार वैसे भी कम हो रहे हैं. बेरोजगारों के लिए वाट्सऐप और फेसबुक से अच्छा काम कोई है नहीं. प्रसंगवश,
अपने देश में तीस करोड़ से ज्यादा व्यक्ति फेसबुक में लगे रहते हैं.
ऐसा कोई अध्ययन सामने नहीं आया है कि
इन माध्यमों का कितना उपयोग रचनात्मक या सार्थक काम में होता है. जुकरबर्ग ने
फेसबुक बनाया था हारवर्ड के विद्यार्थियों में नोट्स, आदि शेयर करने के वास्ते. आज इन माध्यमों का कितना उपयोग बेहतरी के लिए
हो रहा है? अपने देश में तो हद है. हम दुनिया भर में सबसे
ज्यादा वाट्सऐप करने वाला देश हैं. दंगा भड़काने, नफरत फैलाने,
किसी को बदनाम करने या समय नष्ट करने में हमारा शानी नहीं.
टेक्नॉलॉजी का उपयोग जीवन की बेहतरी
के लिए होना चाहिए. हर नई ईजाद के साथ मुश्किल काम आसान हुए हैं. हफ्तों लम्बी
यात्रा कुछ घण्टों में होने लगी है. विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने काम आसान बनाकर हमारा
समय बचाया है. आज हमारे पास खूब समय है. उस वक्त का कैसा उपयोग हम कर रहे हैं?
हाल के एक शोध ने बताया कि सबसे
ज्यादा ‘फेक न्यूज’ यानी झूठ और अफवाहें भारत से उपजती और फैलाई जाती हैं. चुनावी राजनीति ने
फेक न्यूज की विशाल इण्डस्ट्री तैयार कर दी हैं. युवा पीढ़ी इसमें सबसे ज्यादा
व्यस्त है. बिल्कुल अशिक्षित और बहुत कम
पढ़े-लिखे भी ‘वाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से पीएच-डी
कर चुके हैं.
किसी देश की युवा पीढ़ी की ऊर्जा उसकी
सबसे बड़ी ताकत होती है. वह बेहतरी के लिए बदलाव का माध्यम बनती है. वाट्सऐप में पारंगत हमारे युवा कैसा बदलाव लाने
वाले हैं, यह सोच-सोच कर चिंता होती है.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 4 मई, 2019)
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