बीते रविवार को तेलंगाना के
मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने मंत्रिमण्डल में जिन छह नए मंत्रियों को
शामिल किया उनमें उनका बेटा के टी रामाराव और भतीजा टी हरीश राव भी शामिल हैं. 2014
में बने तेलंगाना की पहली सरकार में राजनैतिक वंशवाद का यह नया रूप उसी साल सामने
आ गया था. लेकिन 2018 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर राव ने बेटे
और भतीजे दोनों को मंत्रिमण्डल से बाहर रखने का साहस दिखाया था. भाजपा की बढ़ती
चुनौती का मुकाबला करने के लिए उन्हें यही राह सूझी कि बेटे-भतीजे को फिर से
मंत्री बना दें.
भारतीय राजनीति के लिए परिवारवाद अब
कोई चौंकाने वाली बात नहीं रही. लगभग सभी क्षेत्रीय पार्टियां पारिवारिक दल का रूप लेती जा रही हैं,
हालांकि मुख्यमंत्री पिता की सरकार में बेटे-भतीजे के मंत्री बनने
का संयोग इससे पहले नहीं बना. हां, 2009 में तमिलनाडु के
मुख्यमंत्री करुणानिधि ने अपने तेज-तर्रार और महत्वाकांक्षी बेटे स्टालिन को
उप-मुख्यमंत्री बनाया था.

भाजपा की अब जिन राज्यों पर निगाह है
उनमें पश्चिम बंगाल और तेलंगाना प्रमुख हैं. बंगाल में वह किस कदर आक्रामक ढंग से
अपने पैर जमा रही है, उसका नज़ारा लोक सभा में
दिख चुका. भाजपा ने बंगाल ही नहीं तृणमूल कांग्रेस में भी बड़ी सेंध लगा दी है. ममता
बनर्जी अपना किला बचाए रखने की कोशिश में जुटी हैं. उड़ीसा भी भाजपा के राडार
पर है लेकिन लोक सभा चुनाव में अच्छा
प्रदर्शन करने के बावज़ूद वह विधान सभा चुनाव में नवीन पटनायक के किले में दरार
नहीं डाल सकी थी.
तेलंगाना में भाजपा दो कारणों से अपने
लिए बेहतर सम्भावना देख रही है. एक तो वहां कांग्रेस और तेलुगु देशम दोनों ही
बिल्कुल हाशिए पर चले गए हैं. सफाया तो इनका पड़ोसी आंध्र प्रदेश में भी हो गया
लेकिन वहां वाईएसआर कांग्रेस के रूप में बहुत तगड़ा प्रतिद्वंद्वी मौज़ूद है.
तेलंगाना में कांग्रेस और तेलुगु देशम की जमीन छिन जाने के बाद टीएसआर के मुकाबले
भाजपा ही बचती है. लोक सभा चुनाव में भाजपा ने वहां चार सीटें जीतीं जिनमें से तीन
टीएसआर से छीनी थीं.
टीआरएस को घेरने के लिए भाजपा कई
मोर्चों पर काम कर रही है. पिछले विधान सभा चुनाव में टीआरएस का कुछ सीटों पर
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इण्डिया मजलिसे इत्तहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) से
समझौता था. भाजपा इसे मुद्दा बनाकर तेलंगाना में हिंदू ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही
है. टीआरएस को मुसलमान समर्थक पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है.
भाजपा की इस चाल को नाकामयाब करने के लिए टीआरएस ने तीन तलाक विधेयक पर राज्य सभा
से बहिर्गमन करके उसे पास होने देने में मदद की और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को
निष्प्रभावी करने वाले विधेयक का समर्थन किया. उसका सहयोगी दल एआईएमआईएम इस कारण
उससे बहुत खफा हुआ. उसने टीआरएस को सबक सिखाने की चेतावनी तक दी लेकिन चंद्रशेखर
राव भाजपा को यह अवसर कतई नहीं देना चाहते कि वह उनकी पार्टी को मुस्लिम विरोधी
प्रचारित करे.
इस बीच भाजपा ने नया दांव चला.
चन्द्रशेखर राव ने दूसरी बार विधान सभा चुनाव जीतने के बाद अपने बेटे और महत्त्वाकांक्षी
भतीजे हरीश राव को पहली बार की तरह मंत्री नहीं बनाया. बेटे को उन्होंने पार्टी का
कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर संतुष्ट कर दिया था लेकिन भतीजा हरीश राव उपेक्षित ही रहा.
प्रकट रूप में उसने विरोध नहीं जताया लेकिन पार्टी में इसकी सुन-गुन थी. उसकी
नाराज़गी को भाजपा ने सार्वजनिक करना शुरू किया. यह प्रचार भी शुरू कर दिया कि
टीआरएस के कई नेता भाजपा के सम्पर्क में हैं. यह भाजपा की पुरानी रणनीति है. बंगाल,
कर्नाटक समेत कई राज्यों में वह इसे आज़मा चुकी है. पश्चिम बंगाल में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यह कहने के बाद कि तृणमूल के चालीस विधायक हमारे
सम्पर्क में हैं, ममता बनर्जी की पार्टी से भाजपा की ओर
दल-बदल का सिलसिला शुरू हुआ था. भाजपा नेताओं के इस बयान के बाद चंद्रशेखर राव के
कान खड़े होना स्वाभाविक था.
भाजपा टीआरएस को घेरने का कोई मौका
छोड़ना नहीं चाहती. इस बार वह 17 सितम्बर को ‘हैदराबाद
मुक्ति दिवस’ बड़े पैमाने पर मनाने जा रही है. यह भी प्रचारित
कर रही है कि टीआरएस एआईएमआईएम की नाराजगी के डर से हैदराबाद दिवस नहीं मनाती.
उल्लेखनीय है कि भारतीय फौज के हस्तक्षेप के बाद 17 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारतीय संघ में विलय हो पाया था. हैदराबाद का निज़ाम
पाकिस्तान में विलय चाहता था. आज तक किसी पार्टी ने हैदराबाद मुक्ति दिवस नहीं
मनाया. भाजपा ने इसे बड़ा आयोजन बनाने के लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को हैदराबाद
आमंत्रित किया है.
अमित शाह स्वयं तेलंगाना में बहुत
दिलचस्पी ले रहे हैं. उन्होंने हाल में पार्टी का सदस्यता अभियान वहीं से शुरू
किया और खुद भी हैदराबाद से सदस्यता ली. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा
भी 18 सितम्बर को हैदराबाद जाने वाले हैं. पार्टी के राज्य नेता दावा कर रहे हैं
कि उस दिन कई टीआरएसनेता भाजपा में शामिल हो जाएंगे.
इस तरह घेराबंदी देखकर चंद्रशेखर राव
ने मंत्रिमण्डल विस्तार करके उन सबको संतुष्ट करना चाहा है जिन्हें भाजपा अपनी तरफ
खींच सकती थी. मंत्रिपरिषद का आकार जितना बड़ा हो सकता था,
उन्होंने कर दिया है. भतीजे हरीश राव को खुश करना सबसे ज़्यादा जरूरी
था. इस कोशिश में राजनैतिक वंशवाद का वह कीर्तिमान
फिर बन गया जिसे उन्होंने इस बार नहीं दोहराने का साहस दिखाया था.
भाजपा के लगभग वर्चस्व और कांग्रेसी
पराभव के इस दौर में क्षेत्रीय दलों का यह परिवारवाद भी विकल्पहीनता के लिए
ज़िम्मेदार है. अधिकाधिक पारिवारिक होते हुए वे बिल्कुल ‘बंद’ और अलोकतांत्रिक दल होते जा रहे हैं. कैसी
विडम्बना है कि इन दलों के सबसे बड़े संकट भी परिवार के भीतर से ही पैदा होते हैं.
करुणानिधि, बाल ठाकरे, मुलायम सिंह
यादव, लालू यादव, आदि-आदि के कभी
ताकतवर रहे दल पारिवारिक लड़ाइयों से ही कमजोर हुए.
राजनीति की नई प्रतिभाओं के विकास के
लिए भी क्षेत्रीय दलों का परिवारवाद कोई सम्भावना नहीं छोड़ता. अब कोई लालू,
कोई मुलायम या कोई चंद्रशेखर राव पैदा हो तो कैसे? उनके अस्तित्व को खतरा भीतर से हो या बाहर से, तारणहार
परिवार में ही तलाशा जाता है. तेलंगाना में भी यही हुआ है.
(प्रभात खबर, 11 सितम्बर, 2019)
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