
कुछ मास पहले ही सम्पन्न लोक सभा
चुनाव में तमिलनाडु में भाकपा और माकपा का द्रमुक से चुनावी समझौता था. इस गठबंधन
से दोनों ही पार्टियों को लोक सभा की दो-दो सीटें जीतने में सफलता मिली. चुनाव
आयोग को दिए गए द्रमुक के चुनाव खर्च के ब्योरे से पता चला है कि उसने भाकपा को 15
करोड़ और माकपा को 10 करोड़ रु दिए थे. मूल्यविहीन राजनीति के इस दौर में दोनों वाम
दलों को इस बारे में स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा है कि इस लेन-देन में कुछ भी गोपनीय
और गैर-कानूनी नहीं है. यह रकम बैंक खातों में सीधे जमा की गई है,
आदि.
कोई और पार्टी शायद ही ऐसे राजनैतिक
चंदे पर सफाई देना आवश्यक समझती हो. भाजपा और कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दल
औद्योगिक घरानों से बड़ी-बड़ी रकम चंदे के रूप में पाते रहे हैं. विदेशों से चंदा
लेने पर पहले कभी रोक थी लेकिन अब तो खुली छूट मिल गई है. बल्कि,
इस चंदे को जग-जाहिर करना भी जरूरी नहीं रह गया है.
ऐसे में वाम दलों को द्रमुक से मिली
इस रकम पर विवाद से अधिक सफाई देना चौंकाता है. इसका कारण यह है कि वाम दलों ने
राजनैतिक हाशिए पर जाने के बावजूद कुछ मूल्य बचा रखे हैं. प्रकट रूप में वे आज भी
अपने प्रत्याशियों का चुनाव खर्च जनता और ‘शुभचिंतकों’
के सहयोग से पूरा करते हैं. पूंजीपतियों से किसी भी तरह का चंदा
लेना उनकी नीतियों के विरुद्ध है, यद्यपि कई बार वे ‘उनके शुभचिंतकों’ में शामिल हो सकते हैं. इस पर कभी
बड़ा विवाद सामने नहीं आया.
तमिलनाडु में द्रमुक से रकम लेने के
बारे में दोनों दलों की सफाई यह है कि चूंकि हमारा द्रमुक से चुनावी तालमेल था,
इसलिए हमारे प्रत्याशियों के प्रचार के लिए उनके बड़े नेता भी आये.
उन बड़े द्रमुक नेताओं की ‘हाई-प्रोफाइल रैलियों’ के लिए ही द्रमुक ने यह धन दिया और इसे द्रमुक के स्थानीय नेताओं ने ही खर्च
भी किया.
यहां हमारा मंतव्य वाम दलों के
स्पष्टीकरण के विस्तार में जाने की बजाय इस बहाने चुनाव-खर्च और उसके लगातार बढ़ते
दबदबे पर चर्चा करना है. मुख्य निर्वाचन आयोग के रूप में शेषन के कार्यकाल से
चुनाव-प्रचार संबंधी कानूनों पर कड़ाई से अमल किए जाने के बावजूद कई अन्य माध्यमों
से बेहिसाब धन खर्च करके चुनाव को प्रभावित करना जारी है. अकूत धन खर्च करके
पार्टियां और प्रत्याशी ऐसा माहौल रच देते हैं जैसे कि वे ही विजयी होने वाले हैं.
इस कारण कई ऐसे मतदाता प्रभावित हो जाते हैं जिनके मत पूर्व-निर्धारित नहीं होते.
अच्छे और योग्य प्रत्याशी धनाभाव के
कारण चुनाव जीतना तो दूर, चुनाव
मैदान में अपनी प्रभावी उपस्थिति तक दर्ज़ नहीं करा पाते. मुख्य धारा के मीडिया से
लेकर सोशल मीडिया तक की चर्चाओं में धन-बली प्रत्याशियों का ही दबदबा दिखाई देता
है. यह तथ्य लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है. लोकतांत्रिक चुनाव का सिद्धांत
यह है कि धन-बली प्रत्याशी हो या अत्यंत गरीब, जनता के समक्ष
अपनी उम्मीदवारी साबित करने के लिए उसे बराबर के अवसर मिलने चाहिए. व्यवहार में
ऐसा कतई नहीं होता. ऐसा हो सके, इसीलिए चुनाव खर्च की सीमाएं
तय की गई हैं.
निर्वाचन आयोग ने अलग-अलग चुनावों के
लिए प्रचार-व्यय की जो सीमाएं तय की हैं, अब
वे भी इतनी बड़ी हो गई हैं कि आम प्रत्याशी के लिए उतनी रकम की व्यवस्था करना सम्भव
नहीं हो पाता. दूसरी तरफ, बड़े दलों के अमीर प्रत्याशी
निर्धारित सीमा से कई गुणा अधिक खर्च करते हैं. स्वतंत्रता के एक दशक तक के
चुनावों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब अत्यल्प धन व्यय करके गरीब किंतु ईमानदार
प्रत्याशियों ने चुनाव जीते. अब ये किस्से परी लोक की कहानियों जैसे लगते हैं.
वाम-दलों के स्पष्टीकरण से एक और कटु
सत्य उजागर होता है. राजनैतिक दलों के बड़े नेताओं की चुनावी रैलियां ‘असाधारण’ बनाई जाती हैं. भाकपा-माकपा का कहना है कि
उनके प्रत्याशियों के प्रचार के लिए आने वाले द्रमुक के बड़े नेताओं की ‘हाई प्रोफाइल’ रैलियों के लिए ही उन्हें वह रकम दी
गई थी. यानी, वाम दलों की सामान्य रैलियों में आना द्रमुक के
हाई-प्रोफाइल नेताओं की शान के विरुद्ध था. यह तथ्य द्रमुक से ज़्यादा भाजपा और
कांग्रेस पर लागू होता है. नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की चुनावी रैलियां उनकी प्रतिष्ठा से जोड़ी
जाती हैं. इसी कारण अकूत धन खर्च करके उनका आयोजन भव्य और विशिष्ट किया जाता है.
हाई-प्रोफाइल नेताओं की चुनावी
रैलियां किसी कारण भव्य नहीं हो पातीं तो ऐन मौके पर उन्हें रद्द किया जाना भी यही
बताता है. बड़े नेता नुक्कड़ सभाएं नहीं करते. उन्हें रैली नहीं,
‘महारैली’ को ही सम्बोधित करना होता है.
यानी कि चुनाव-प्रचार जनता को अपने मुद्दे समझाने का नहीं, अपनी प्रतिष्ठा, दम-खम और चकाचौंध दिखाने का होता
है. इसीलिए हमारे यहां चुनाव अब प्रदर्शन बन कर रह गए हैं. प्रदर्शन के लिए धन
चाहिए. जितना अधिक धन, उतना बड़ा और बढ़िया प्रदर्शन.
चुनावी चंदे का अपना अर्थशास्त्र है. यह कोई छुपी बात नहीं
रह गई है कि बड़े कॉरपोरेट या औद्योगिक घराने चुनावी चंदे के रूप में ऐसे ही दांव
लगाते है जैसे रेस के घोड़ों पर. दान का प्रतिदान अपेक्षित होता है. यही बात चुनाव
जीतने के लिए सब कुछ झौंक देने वाले प्रत्याशियों के लिए भी कही जा सकती है.
मंत्री बनने का एक प्रस्ताव ही दल-बदल कराने का चारा और क्यों बनता है?
धन-तंत्र से प्रभावित चुनाव से बचने
के लिए ही सरकारी व्यय पर चुनाव कराने का महत्त्वपूर्ण सुझाव बहुत पहले दिया गया
था जिस पर आज तक गम्भीरता से विचार नहीं किया गया. क्या कारण है कि पूरे देश में
एक साथ सभी चुनाव कराने पर तो खूब हल्ला किया जा रहा है लेकिन चुनाव सुधार के
महत्त्वपूर्ण सुझावों पर बात नहीं हो रही?
भाकपा-माकपा को द्रमुक से मिले धन पर
विवाद को इस विमर्श के लिए देखा जाए तो ठीक, वर्ना
यह भी कोई मुद्दा है!
(प्रभात खबर, 26 सितम्बर, 2019)
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