दो-तीन मिनट के अंतराल से वे प्रतिदिन अपने-अपने घर का गेट खोलकर बाहर निकलते हैं। अपवाद स्वरूप ही कभी पांच-दसेक मिनट की देर होती हो। पहले बाहर आने वाला मकानों की कतार के सामने धीरे-धीरे टहलता हुआ या सामने के पार्क में चहलकदमी करते हुए दूसरे की प्रतीक्षा करता है। आज रहमान को निकलने में कुछ देर लग रही थी। सक्सेना अपने घर के सामने वाली सड़क पार करके बाएं मुड़े और थोड़ा आगे चलकर दीवार के बीच बने छोटे गेट से पार्क में दाखिल हो गए। पार्क में सन्नाटा था। चहारदीवारी की झाड़ियां बड़ी होकर बेतरतीब फैल गई थीं। माली को टोकना होगा कि कब से उसने छंटाई नहीं की। फिर याद आया कि माली चार दिन की छुट्टी मांगकर गांव गया था। हफ्ते भर से अधिक हुआ, लौटा नहीं है। दिन में उसे फोन करना होगा।
‘गुड मॉर्निंग,’ पीछे
से रहमान की ताजगी भरी आवाज़ आई।
‘मॉर्निंग, रहमान।’
उन्होंने कहा और लपक कर गर्मजोशी से हाथ मिलाया। दोनों पार्क से
बाहर निकल कर तेज कदमों से अपने रोजाना के रास्ते पर चल पड़े। कॉलोनी से बाहर मुख्य
सड़क पर दूर तक अशोक, नीम, गुलमोहर और
अमलतास के घने पेड़ थे। चिड़ियां चहचहाते हुए झुण्ड में इधर-उधर उड़ रही थीं। वासंती
हवा ताजी और स्फूर्तिदायक थी। पत्ते गिरने का मौसम था। पेड़ों के नीचे फुटपाथ ही
नहीं, बीच सड़क तक पीले-धानी पत्ते बिछे हुए थे जो हलकी हवा
में इधर से उधर उड़ रहे थे। उनके तेज़ कदमों से भी कुछ पत्ते अपनी जगह बदल लेते। कोई
गाड़ी गुजरती तो शाखों से बिछड़े पीले-भूरे पत्तों में एकाएक भगदड़ मच जाती। कई पत्ते
पहियों तले कुचल जाते। बचे हुए पत्ते झुण्ड बनाकर थोड़ी दूर तक गाड़ी का पीछा करते।
जैसे, डपट रहे हों कि इस अंतिम अवस्था में भी चैन से पड़े नहीं
रहने दोगे!
‘डंके की चोट पर सीएए लागू करेंगे, सरकार का ऐलान,’ अखबार का मुख्य शीर्षक जोर से सुनाता
हुआ एक हॉकर उनके पास से गुजरा। रहमान ने चौंक कर उसे देखा। एकबारगी उन्हें लगा कि
हॉकर वह हेडिंग उन्हीं को सुना रहा है। क्या वह जान रहा है कि वे मुसलमान हैं?
क्या उनके कपड़े, उनकी शक्ल और उनकी चाल उनके
मजहब की चुगली कर रहे हैं? उन्होंने अनायास सक्सेना की ओर
देखा। क्या इसे देखकर उसके धर्म का पता चलता है? अपनी
जिज्ञासा पर वे खुद ही मुस्करा दिए।
‘बड़े मुस्करा रहे हो!’ सक्सेना
ने ताड़ लिया।
‘ऐसे ही,’ उन्होंने चाल
और तेज कर दी। हॉकर अपनी ही मस्ती में चला जा रहा था। उसकी सायकिल में आगे-पीछे
अखबारों के बण्डल लदे थे। वह पैडल मारता हुआ कभी अखबार की हेडिंग चीखता और कभी कुछ
गुनगुनाता आगे-आगे चला जा रहा था- ‘डंके की चोट पर सीएए...।
हवा-हवा, ये हवा, ओ हवा... डंके की चोट पर सीएए...।’
‘कल सुना भाषण आपने?’ सक्सेना
ने पूछा।
‘सुना था,’ रहमान ने
धीरे से इतना ही कहा। इंतज़ार करने लगे कि सक्सेना आगे कुछ कहे। कोई टिप्पणी,
अपनी सहमति या असहमति, लेकिन वह कुछ नहीं
बोले। आठ-दस कदम चुप्पी में चलने के बाद रहमान ने सोचा कि कल से मन में खुदबुदा
रही अपनी प्रतिक्रिया खुद ही बता दें कि ‘डंके की चोट’ वाली भाषा डेमोक्रेसी में कैसी लगती है? डेमोक्रेसी
में डायलॉग होता है। आप किसी की सुनोगे ही नहीं? कम से कम
लोगों से बात तो करो। कई शहरों-कस्बों में बड़ी संख्या में जनता मुखालफ़त कर रही है,
भीषण सर्दी और बारिश में ठिठुरते हुए बेमियादी धरने पर बैठी हैं तो
उनका कोई पक्ष होगा न! भारी बहुमत है आपके पास तो क्या हुआ, आखिर
डेमोक्रेसी है। या नहीं है? कल टीवी पर ग़ृह मंत्री का भाषण
सुनने के बाद से वे मन ही मन ऐसे कई सवाल पूछते रहे हैं। पहले की बात होती तो वे
टहलते-टहलते बड़बड़ा रहे होते, गुस्से में बोल रहे होते या कोई
तीखा चुटकुला सुना रहे होते, जिस पर उनकी ‘ठहाका टोली’ अट्टहास करती। ठहाके लगाने का कोई भी
मौका वे छोड़ते न थे। कभी तो बेवजह ही ठहाके लग जाते। अब न वैसे दिन रहे न उनकी
टोली उनके साथ है। सो, वे कहते-कहते रुक गए। सक्सेना ने खुद क्यों
कुछ नहीं कहा? होम मिनिस्टर की बात का जिक्र करने के बाद चुप
क्यों हो गया? क्या वह ‘डंके की चोट’
वाली भाषा से सहमत है? क्या पता। रहमान का
भरोसा हिल चुका है। पता नहीं कौन क्या कह दे, भले ही सक्सेना
हो, सबसे पुराना दोस्त।
दोनों चुपचाप चलते रहे। पिछले कुछ वर्षों से उनके
बीच चुप्पियां बढ़ती गई हैं। खासकर रहमान का बोलना बहुत कम हो गया है। बात-बात पर मजाकिया
टिप्पणी, चुटकुले या मज़ेदार किस्से सुनाने वाले
रहमान अब कम बोलने लगे हैं। कभी बोलते-बोलते रह जाते हैं। सक्सेना का मुंह देखने
लगते हैं कि वह क्या कहेगा। एक सक्सेना ही तो बचा है जो अब भी साथ है। बाकी लोग
धीरे-धीरे उनसे कटने लगे हैं। कॉलोनी से झुण्ड बनाकर सुबह घूमने जाने वाले दसेक
लोग थे। खूब हंसी-ठट्ठा होता था। चुटकुले, किस्से और
राजनैतिक बहसें। रहमान सबमें आगे। टोली की जान। किसी दिन वे घूमने नहीं आ पाते,
तबीयत ठीक नहीं होती, बाहर गए रहते या कोई और
व्यस्तता, तो टोली का मॉर्निंग वॉक रसहीन हो जाता। रहमान की कमी सबको अनुभव होती। अब वह बात
नहीं रही। किसी न किसी बहाने एक-एक, दो-दो करके लोग अलग-अलग
होते गए। रहमान और सक्सेना को छोड़कर बाकी साथियों की अलग टोली बन गई। पता नहीं कब
और किस बात पर सक्सेना भी अलग हो जाए और दूसरी टोली में जा मिले, ऐसी आशंका बनी रहती है। इसलिए रहमान मुंह से निकलती बात रोक लेते हैं।
दोनों के बीच चुप्पी पसरती जाती है।
थोड़ा आगे जाकर रहमान रोजाना की तरह सड़क छोड़कर
कच्चे रास्ते में उतरने लगे तो सक्सेना ने कहा- ‘आज दूसरी तरफ चलें, उधर?’ उन्होंने सड़क की सीध में इशारा किया।
‘क्यों? आज उधर क्यों?
कोई खास बात?’ रहमान दोस्त का चेहरा देखते
हैं।
‘ऐसे ही, आज दूसरी तरफ
चलते हैं,’ सक्सेना सामने देखते रहते हैं।
रहमान के चेहरे पर वक्र हंसी फैल गई। निचला होंठ
अनायास बाईं तरफ टेढ़ा हो गया और कुछ देर तक उसी मुद्रा में खिंचा रहा। फिर उसे
हंसी में बदलते हुए बोले- ‘अरे सक्सेना, कहां-कहां रास्ता बदलेंगे। रहना तो यहीं है न, इन्हीं
लोगों के बीच।’ जुबान पर तो आया था कि ‘पाकिस्तान तो चले नहीं जाएंगे’ लेकिन उन्होंने सायास
रोक लिया। ऐन मौके पर जुबान सी लेना इधर उनसे खूब सध गया है। सक्सेना की बांह
पकड़कर रहमान सड़क से नीचे कच्चे रास्ते पर उतर लिए।
‘कैसी-कैसी बातें करने लगे हैं लोग!’ सक्सेना ने अपनी खिसियाहट छुपाने के लिए कहा।
‘हॉकर मेरा नाम नहीं जानता होगा। वहां तो सब
जानते हैं, मैं रहमान हूं।’
सक्सेना ने कोई टिप्पणी नहीं की, हालांकि
रहमान उम्मीद कर रहे थे कि शायद कुछ कहें। दोनों के बीच फिर चुप्पी छा गई। कच्चे
रास्ते पर उनके जूतों की हलकी धमक के साथ तेज सांसें सुनाई देती रहीं।
सड़क से उतर कर कच्चा रास्ता रेल पटरी की तरफ
जाता है। पटरी पार खूब फैली खाली जगह है। सुबह घूमने वालों की पसंदीदा जगह। खूब खुली
जगह और अपेक्षाकृत साफ हवा। झुण्ड के झुण्ड लोग घूमते हुए आते हैं। कुछ कसरत करते
हैं, कुछ योगासन लगाते हैं और कुछ गप्पें लगाया करते हैं। एक ठहाका
क्लब चलता है। बात-बात पर गगनभेदी ठहाके जो अक्सर योगासन वालों का ध्यान भंग कर
खिलखिलाहट में बदल देते हैं। चाय की दो-तीन गुमटियां भी सुबह-सुबह खुल जाती हैं। इतनी
सुबह कुछ लोग पर्चे बांटने भी आते हैं। अच्छे तन-मन के टिप्स, योग केंद्रों और वजन घटाने की गारण्टी देने वाले केंद्रों के पते, भारतीय दर्शन, विविध रत्नों, गोमूत्र,
यज्ञ-हवन, आदि की उपयोगिता बताने वाले पर्चे।
पिछले साल से एक युवक ने अंकुरित चना-मूंग के साथ आंवला, करेला,
एलोवेरा, नीम, तुलसी के रस
का ठेला लगाना भी शुरू कर दिया है। पांच साल नौकरी की तलाश में गंवा देने के बाद
उसने यह उद्यम शुरू किया है। बी टेक पास यह लड़का खूब हंसमुख है। कहता है पिता जी
ने खेत बेचकर मुझे इंजीनियरिंग पढ़ाई ताकि में मॉर्निंग वॉकर्स के लिए ‘हेल्दी स्नैक्स’ बेच सकूं।
वहीं पीपल के एक विशाल पेड़ के नीचे चबूतरा बना है।
अलग-अलग दिशाओं से मॉर्निंग वॉकर्स की टोलियां आ जुटती हैं। देसी-विदेशी नेताओं से
लेकर नेता-अभिनेताओं तक पर टिप्पणियां होती हैं। उस चबूतरे की गप्प गोष्ठी के हीरो
होते थे रहमान। अब उन्हें आते देखते ही लोग कानाफूसी करने लगते हैं।
‘आदाब, रहमान साहब।
खैरियत?’ कोई यूं ही पूछ लेता है।
‘आपकी दुआ है,’ वे धीरे
से कहते हैं।
‘बहुत मजे में हैं साहब। खाते यहां का और गाते
वहां का,’ चबूतरे के इर्द-गिर्द जुटे लोगों में से कोई
जाना-अनजाना स्वर इस तरह कहता है कि रहमान सुन लें लेकिन लगे भी कि उनके लिए नहीं
कहा गया।
‘अरे, इन्हें क्यों
सुना रहे हो? ये वैसे मुसलमान नहीं हैं।’ इतनी सुबह भी माथे पर लम्बा सिंदूरी टीका लगाए हनुमान प्रसाद तिवारी की
आवाज रहमान अच्छी तरह पहचानते हैं। उनके घर से चार मकान छोड़कर रहता है। कुछ साल
पहले तक ईद-बकरीद में सपरिवार मिलने आता था। नॉनवेज नहीं खाता लेकिन बड़े शौक से
वेज बिरयानी के बाद चार किस्म की सेवईं जी भरकर खाता था। पुराने दिन होते तो वे उससे
पूछ लेते – ‘अबे तिवारी, सुबह बिना
मुंह धोए टीका लगाकर वॉक पर निकलने लगे हो क्या?’ पूरी टोली
खूब ठहाका लगाती। अब वे चुपचाप उसके माथे पर त्रिपुण्ड और चोटी की बड़ी गांठ देखते
रह जाते हैं जिनका आकार इधर बढ़ गया है। कोई चुटकुला या मज़ेदार किस्सा सूझने पर भी
नहीं कहते। याद आ गए किस्से पर हंसी फूटने को होती है तो सांस रोक लेते हैं। वैसे,
अब उन्हें किस्से कम ही सूझते हैं और हंसी की बजाय माथे पर पड़ते बल
वे खुद भी महसूस करने लगे हैं।
‘चलो रहमान, थोड़ा प्राणायाम
कर लें,’ अपनी बांह पर सक्सेना का खिंचाव उन्हें सुकून देता
है। दोनों चबूतरे से दूर दूब पर पालथी लगाकर अनुलोम-विलोम शुरू करते हैं।
‘कल तो भैया, पूरा
परिवार टेम्पो करके घण्टाघर गया था।’
‘घण्टाघर नहीं, शाहीनबाग
कहो!’
‘सुना, कबाब के साथ बिरयानी
का बड़ा देगचा लाद कर ले गए थे।’
‘संविधान की प्रतियां और तिरंगा भी ले गए
होंगे लहराने के लिए!’
कपालभांति के बीच टिप्पणियां कानों के रास्ते सीधे
दिमाग पर चोट कर रही हैं। ध्यान उधर चला जा रहा है। सक्सेना को इस समय पूरा प्रसंग
ठीक से समझ में आ रहा है। कल शाम पत्नी बता रही थी- ‘आज रहमान
भाई का पूरा परिवार टेम्पो में बिरयानी का बड़ा-सा भगोना ले गया था।’ पत्नी की बात पर वे कुछ नहीं बोले थे। पूरी कॉलोनी में ऐसी खुशुर-पुशुर
होती रहती है। इस समय ताने सुनते हुए उन्हें रहमान पर थोड़ा क्रोध आने लगा। ऐसा
खिझाने वाला काम करने की क्या जरूरत है! उन्होंने आंख खोलकर उनकी तरफ देखा। वह
बहुत जोर लगाकर कपालभांति कर रहे थे लेकिन उलटा! सांस छोड़ने के साथ पेट भीतर जाने
की बजाय बाहर आ रहा था। चेहरा भी ऐंठा हुआ दिखा। यह कोई योगासन हुआ! क्या फायदा
इसका! उन्हें रहमान पर तरस भी आने लगा। तभी कहा था कि दूसरी तरफ चलते हैं। माने तब
न!
‘एक-एक घुसपैठिया बाहर किया जाएगा, डंके की चोट पर।’
‘यह देश है, कोई
धर्मशाला नहीं।’ पता नहीं, कुछ लोग
अखबार पढ़ रहे हैं या कल रात के न्यूज चैनलों की पंचलाइन दोहरा हैं।
‘वंदे मातरम भी नहीं बोलेंगे। भारत माता की
जै कहने में फटती है। दिखाने को लहराएंगे तिरंगा और संविधान की प्रतियां, साजिश करेंगे देश के खिलाफ।’
‘कश्मीर में नहीं देखते, आतंकवादियों को दामाद बनाकर रखते हैं!’
‘ऐसा ही रहा तो यहां भी होगा, देखते जाओ।’
‘अब न होगा, इनके डंडा
करने वाली सरकार जो आ गई है।’
‘अरे तिवारी, इन लोगों
के लिए प्राणायाम करना हराम नहीं है?’
सक्सेना झुंझलाकर खड़े हो गए। रहमान नाक से
जोर-जोर से फूं-फां करने में लगे रहे। जैसे कोई सांड़ डुकारता-फुफकारता हो।
‘भई दोस्त हो तो सक्सेना जैसा,’ सुरेंद्र सिंह ने मुस्कराकर चबूतरे पर सक्सेना का स्वागत किया।
‘कायस्थ वैसे भी आधे मुसलमान होते हैं,’
तिवारी ने चोटी की गांठ बांधते हुए कहा, जो
कसरत करते हुए ढीली हो गई थी। रहमान भी उठकर वहीं आ गए। उनके चेहरे पर तनाव साफ
था।
‘चलो, मुझे आज ऑफिस
जल्दी पहुंचना है,’ सक्सेना ने रहमान की बांह खींची।
‘घण्टाघर भी जाना होगा,’ पीछे से आवाज आई।
‘कहा था न कि दूसरी तरफ चलो,’ तेज़-तेज़ चलते सक्सेना ने तनिक गुस्से में कहा।
‘कहीं भी जाओ, मैं रहमान
से घनश्याम तो हो नहीं जाऊंगा। इस देश में अब मुसलमान होना गुनाह हो गया।’ रहमान के स्वर की पीड़ा सक्सेना से छुपी न रही।
‘बहुत खराब माहौल हो गया है,’ उन्होंने कहा।
‘बना दिया गया है, नहीं
कहोगे?’ रहमान ने दोस्त के चेहरे पर निगाह गड़ा दी। उसने
चुप्पी साध ली थी।
[] [] []
‘मुझे निकलना है इन तंग गलियों से, मुल्ला-मौलवियों के फतवों-तकरीरों से, शरिया की जकड़न
से, पर्देदारी और जहालत से। मुझे खुली हवा में सांस लेनी है,
बच्चों को अच्छा पढ़ाना-लिखाना है, आगे देखना
है।’ रहमान को अपनी कही बातें साफ-साफ याद हैं। अब तो एक-एक
लफ्ज़ अक्सर दिमाग में गूंजता है।
बड़े भाई अल्ताफ ने गरजते हुए कहा था- ‘जाओ,
खूब शौक से जाओ लेकिन एक दिन पछताओगे और इन्हीं तंग गलियों की तरफ
वापस दौड़े आओगे। किस खुली हवा में जाना चाहते हो, जहां कोई हिंदू
मुसलमान को किराए का मकान भी नहीं देता?’ भाई देर तक हंसते
रहे थे। वह हंसी नहीं थी। उसमें तकलीफ थी, आशंकाएं थीं,
बल्कि डर था और नफरत थी। इसी सब से रहमान निकलना चाहते थे। इन्हें
गलत और झूठा साबित करना चाहते थे।
‘तेरे दादा और अब्बा को कभी जरवत ना पड़ी अपने
को अच्छा मुसलमान साबित करने की,’ अम्मी ने अपनी कमजोर आवाज़
में सिर्फ इतना कहा था। अब्बा के इंतकाल और भाइयों में बंटवारे के बाद वे चौक का
पुश्तैनी ‘दड़बा’ छोड़कर बीवी शकीला और तीन
बरस की बेटी अमीना के साथ आवास-विकास परिषद की नई आवासीय योजना में रहने चले आए
थे। सिर्फ शकीला को पता था कि वेतन की किस्तों से एक एमआईजी मकान बुक कराया हुआ था।
तब बसना शुरू हो रही कॉलोनी में सक्सेना अकेला पड़ोसी था।
‘रहमान अच्छा मुसलमान है,’ यह प्रमाण पत्र उन्हें शीघ्र ही मिल गया था। बल्कि ‘बहुत
अच्छा, जैसा देश के सारे मुसलमानों को होना चाहिए।’ उनके घर ईद-बकरीद मनती थी। तिवारी जैसे पड़ोसियों के लिए वेज-बिरयानी और
छोले पकते थे। शकीला की बनाई बिरयानी बहुत पसंद की जाती और सिल पर पीस कर
जो कबाब वे बनातीं उनकी इतनी मांग होती कि अपने चखने को मुश्किल से बचते। शकीला
खूब मन से तड़के उठकर तैयारी करती। कई परिवार मांस नहीं खाते थे लेकिन कुछ पूछ लेते
थे- ‘भई, बड़े का तो नहीं है?
‘तुम चिकन खाओ, यह बड़े का नहीं बनता,’
रहमान मनोहर पाण्डे से दिल्लगी करते जो ठीक उनके पड़ोस में रहता था। दो-तीन
परिवार ऐसे भी थे जिनका हर ईद-बकरीद पर ‘व्रत’ रहता था। वे रहमान के यहां आते, बैठते, गप्पें मारते। खाते समय रहमान ही पूछ लेते- ‘कहो मिश्रा
जी, आज आपका कौन-सा व्रत है?’ हंसी के
ठहाके बाहर तक गूंज जाते।
दीवाली के पांचों दिन रहमान का मकान रोशन रहता। शकीला
बुर्का नहीं पहनती थी, बेटी बिना हिजाब मुहल्ले की
लड़कियों के साथ उछलती-खेलती थी, बेटा राशिद (जो इस कॉलोनी
में आने के बाद पैदा हुआ) जन्माष्टमी में कान्हा का रूप धर कर पार्क में सबको
मोहता था और सुरीले स्वर में भजन गाता था। पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की जीत पर पटाखे
छुड़ाने वाले मुसलमानों को वे गरियाते थे। तीन तलाक जैसी कुप्रथा के खिलाफ बोलते थे।
कहते थे कि मुसलमानों को मज़हब के नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने ज़ाहिल बना रखा है और
राजनैतिक दलों ने वोट बैंक।
‘जो मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए, उन्होंने इस देश को मर्जी से चुना। इस देश के नियम-कानूनों को चुना,
संविधान को चुना। उन पर कोई दबाव नहीं था,’ रहमान
की स्पष्टोक्ति पर तालियां बजतीं।
‘पहला मुसलमान देखा जो कॉमन सिविल कोड की
वकालत करता है। जियो रहमान!’ तिवारी उनकी पीठ ठोकता और गले
लगाता।
‘मुसलमान हो तो रहमान जैसा,’ उनके पड़ोसी कहते।
बाबरी मस्जिद के ध्वंस के समय रहमान युवा थे, करीब तीस
साल के। राजनैतिक संरक्षण में बकायदा अभियान चलाकर जिस तरह भारी अराजकता, हिंसा और घृणा के साथ ‘विवादित ढांचे’ को गिराया गया, उसे देख रहमान को बुरा लगा था। वे
ईद-बकरीद ही नमाज पढ़ने जाते थे। बाबरी मस्जिद से कोई मोह नहीं था मगर तब उन्हें इस
देश के लिए चिंता जरूर हुई थी। बाद में हुए दंगों ने उनकी चिंता बढ़ा दी थी। तब
उन्हें बहुत गुस्सा आया था कि इसे किस राह धकेला जा रहा है। जो ताकतें इस बहुरंगी
देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र यथासम्भव बचाए रखती आई हैं, क्या
उन्होंने हथियार डाल दिए हैं या वे भी इसमें शामिल हो गई हैं? बाद में वे मनाते थे कि सुप्रीम कोर्ट ज़ल्दी से ज़ल्दी फैसला दे और यह
विवाद सदा के लिए खत्म हो जाए।
आज वे मन ही मन पूछते हैं कि क्या वे गलत सोचते
थे। गुजरात दंगों के बाद उनके भरोसे की नींव दरकने लगी थी। उसके बाद तो पूरे देश
में गुजरात-प्रयोग होने लगा। आखिर क्या होगा इस देश का, वे अपने से
ही सवाल करते हैं। सक्सेना से भी अब अपने मन की बात साझा नहीं करते।
[] [] []
‘किसी ने उड़ा दी कि अखलाक के घर में गोमांस रखा
है और सब उस बेचारे पर टूट पड़े। मार डाला उसे, जान से मार डाला! कोई बचाने
नहीं आया! पड़ोसी भी नहीं!’ घर से निकल कर अपनी टोली में शामिल होते ही रहमान चीखे
थे। वह सुबह उनके दिमाग में बिल्कुल ताज़ा है। पहली बार साथियों ने रहमान को
उत्तेजित देखा था।
‘बहुत बुरा हुआ,’ कोई बोला था।
‘बुरा हुआ?’ रहमान ने कहने वाले को घूरा- ‘एक
आदमी की हत्या कर दी घर में घुस कर, उसके ही पड़ोसियों ने और तुम कह
रहे हो बुरा हुआ?’ सब चुप हो गए थे।
‘हमारे फ्रिज में मांस नहीं रहता? तिवारी, पाण्डे और मिश्रा को छोड़कर किसने नहीं खाए बड़े के कबाब? गोमांस कह कर वहशी भीड़ मारने आएगी तो तुम लोग बचाने आओगे कि मारने वालों
में शामिल हो जाओगे? क्या होता जा रहा है इस देश को?’
उनकी टोली सुन रही थी और वे उत्तेजना में बोले जा रहे थे।
खबर देखने-सुनने के बाद वे रात भर बेचैन रहे थे।
ठीक से सो नहीं पाए थे। सुबह टहलते समय उनकी आखें ही नहीं जल रही थीं, दिल-दिमाग
भी उबल रहा था। उनके साथी चुप थे। कुछ ने हलके से ‘हां-हू’ करके, गर्दन हिलाकर या ‘च्च-च्च-च्च’
कर सहानुभूति जताई। शायद वह पहली बार था कि सुबह घूमते समय हंसने के
बहाने ढूँढने वाली उनकी टोली गम्भीर थी। सबसे ज़्यादा हंसोड़ रहमान ही थे और उनके
भीतर तूफान मचा हुआ था।
‘ये तो गलत हुआ, बहुत
गलत,’ नारायण सिंह ने कुछ देर बाद कहा था- ‘उसका बेटा फौज में है।’
‘फौज में नहीं होता उसका बेटा तो?’ रहमान ने तीखे स्वर में कहा। नारायण चुप हो गए।
‘हो सकता है अखलाक ने नहीं काटी हो लेकिन ये
लोग गाय को काटते तो हैं ही,’ चोटी वाला तिवारी बोला- ‘हम लोग गाय को पूजते हैं।’
‘ये लोग!’ तड़प के साथ रहमान
चीखना चाहते थे- “अब हम ‘ये लोग’ हो गए!”
लेकिन उनका गला जकड़ गया था। फुसफुसाने की तरह आवाज निकली तो भी साथियों ने सुन
लिया। वे चेहरों पर आश्चर्य लिए एक-दूसरे का मुंह देखने लगे कि रहमान की आपत्ति
किस बात पर है भला!
रहमान कई दिन तक सदमे में रहे थे। अखलाक और उनके
परिवार की चीख उन्होंने नहीं सुनी थी लेकिन एक हृदय विदारक चीख लगातार उनके कानों
में गूंजती रही। टीवी चैनलों के एंकर-रिपोर्टर चीख-चीख कर उसे गोमांस साबित करने
में लगे थे, हालांकि जांच रिपोर्ट आई नहीं थी। जांच के
नाम पर भी राजनीति हो रही थी। अपने ग्रुप के साथ वे मॉर्निंग वाक पर जाते लेकिन
सामान्य नहीं हो पाए थे। साथियों की चर्चाएं गाय के महात्म्य, उसके दिन-रात ऑक्सीजन छोड़ने, गोमूत्र के गुणों,
पूजा में गाय के गोबर के उपयोग और पंचगव्य के महत्त्व पर होने लगी। मन
ही मन भुनभुनाते रहमान चुप ही रहते। भीतर का बवण्डर उनके दिल-दिमाग में घूमता और
सिल्ली बनता रहा। सक्सेना ही कभी टोकता- ‘क्या यार रहमान,
तुम चुप्पे नहीं अच्छे लगते। कुछ सुनाओ।’
‘हां भाई रहमान, कोई
चुटकुला हो जाए।’
‘गाय दिन-रात ऑक्सीजन छोड़ती है, इससे अच्छा चुटकुला क्या होगा,’ उन्होंने पट से कहा
और चाल बढ़ाकर थोड़ा आगे चलने लगे थे।
‘जब से नई सरकार आई है, रहमान की फटी-फटी रहने लगी है,’ तिवारी ने कहा और
ठहाका लगाया। हंसी में कुछ और लोग भी शामिल हुए। रहमान ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन
उनका ध्यान इस ओर अवश्य गया कि केंद्र में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से उनके ग्रुप
में कुछ अतिरिक्त उत्साह और खुशी रहने लगी है। वे जोश में बोलने लगे हैं। उनकी
बातचीत में पाकिस्तान, हिंदू धर्म, एक
देश-एक कानून, कश्मीर, हिंदू-राष्ट्र,
नेहरू की ब्लण्डर्स, पटेल की उपेक्षा, कांग्रेस की तुष्टीकरण नीतियां, इत्यादि बार-बार सुनाई
देने लगे हैं। पहले उन्होंने इस तरह गौर नहीं किया था। उन्हें राजनीति पर बात करते
देख्कर वे कोई किस्सा या चुटकुला सुना देते और माहौल बदल जाता था। उस दिन उन्होंने
नोट किया कि इसका सबंध केंद्र की नई सरकार और उसकी नीतियों और कार्यक्रमों से है।
परिवर्तन उनकी कॉलोनी के लोगों में ही नहीं आया, पूरा देश
बदल रहा था। या, देश बदल रहा था इसलिए वे लोग भी बदल गए थे। नफरत
से भरी भीड़ जगह-जगह दिखाई देने लगी थी। दूध का धंधा करने वाला पहलू खान पशु मेले
से गाय खरीदकर घर ले जा रहा था। भीड़ ने उसे गो-तस्कर बताकर पीट-पीट कर मार डाला। वहशी
भीड़ कोई भी आरोप लगाकर अखलाक, पहलू खान, खलीक अहमद, अलीमुद्दीन अंसारी और हाफिज जुनैद जैसे
नाम वालों को मारने-पीटने या कत्ल करने लगी थी। हमलावर या तो पकड़े नहीं जाते या
सबूतों के अभाव में छोड़ दिए जाते। उनकी रिहाई पर मंत्री और नेता उन्हें फूलमालाओं
से लादने लगे। इस तरह देश के बदलने का रहमान के मानस पर गहरा असर पड़ा था। वे और भी
ज़्यादा चुप रहने लगे। तमाम चुटकुले, किस्से और दिलफेंक ठहाके
भूल गए। एक सुबह तिवारी ने उनकी पीठ पर धौल जमाते हुए कहा- ‘यह
अच्छा मुसलमान भी अब बिगड़ गया है।’ सबने ठहाका लगाया। रहमान
भी मुस्कराए लेकिन उन्होंने महसूस किया कि यह सिर्फ हंसी में कही गई बात नहीं थी।
उनके सम्बंधों में बहुत परिवर्तन आ गया था। तिवारी, मिश्रा, पाण्डे समेत कुछ और पड़ोसियों ने ईद-बकरीद पर घर आना कबके छोड़ दिया था। एक
बार शकीला के बनाए लज़ीज़ कबाब, बिरयानी और सिवइयां बड़ी मात्रा
में बच गए तो पूरे परिवार ने बहुत असहज महसूस किया। अगले दिन वे सारा खाना
यतीमखाने पहुंचा आए। अगली बकरीद पर शकीला ने ही कहा था- ‘सिर्फ
एक-डेढ़ किलो मटन और आधा किलो कीमा लाइएगा।’ उसके स्वर का
ठंडापन घर भर में पसर गया था। कॉलोनी के बच्चों ने उनसे होली का चंदा मांगना बंद
कर दिया था। वे पहले की तरह पार्क में जाते और अबीर-गुलाल लगाकर सबसे गले मिलते
लेकिन जैसे कोई स्पर्श ही नहीं होता था। बीच में मुर्दनी-सी पसरी होती। गुलाल में कोई
ऊष्मा और रंग नहीं रह गए थे। दीवाली पर बिजली की लड़ियां सजाते लेकिन पहले जैसी
रोशनी दिखती ही नहीं थी।
उन्होंने बेटे को टोका था- ‘कहां से लाए
हो, अच्छी रोशनी नहीं हो रही।’ वह मां
और बहन का मुंह देखने लगा था।
जब तक अम्मी ज़िंदा थीं, कभी-कभार
मिलने आ जाया करती थीं। वे खुद पुराने मुहल्ले में जाते रहते थे। अम्मी के गुजर
जाने के बाद भाभीजान भूले भटके आ जातीं लेकिन अल्ताफ भाई नहीं आते थे। हाल में एक
रोज वे अकेले आए। रहमान को बड़ा अचम्भा हुआ लेकिन खुश हुए। अरसे बाद उनके चेहरे पर
उन्मुक्त हंसी दिखाई दी थी। भाईजान को पूरा घर दिखाया, छोटा-सा
बगीचा और छत।
‘है न खूब खुला-खुला,’ उन्होंने
खुश दिल से रजामंदी चाही।
‘पूरी कॉलोनी में तू शायद अकेला मुसलमान हो,’
जाते समय उन्होंने कहा था। भाईजान का चेहरा पत्थर-सा हो रहा था। उस पर
शायद डर और नफरत भी थी। रहमान ने कहा कुछ नहीं सिर्फ हंस दिए थे।
‘अमज़ाद और ताहिर लोग वापस लौट आए, पता है?’ मोटर साइकिल में चाभी लगाते हुए उन्होंने
पूछा। रहमान को पता था। दोनों परिवार उन्हीं की तरह कई साल पहले शहर के नए इलाके
में रहने चले गए थे। हाल में मकान बेचकर फिर पुराने मुहल्ले में आ गए।
‘हिंदू अपने मकान बेच-बेचकर जा रहे हैं।’
रहमान को यह भी पता था कि उस पुराने मुहल्ले को कुछ लोग ‘पाकिस्तान’ कहने लगे हैं।
‘चलें।’ मोटर साइकिल
स्टार्ट कर वे चले गए।
‘भाईजान क्या कहने आए थे?’ उनके जाते ही शकीला ने पूछा।
‘कहने आए थे कि पाकिस्तान लौट आओ।’
‘क्या!’ शकीला चौंकी
फिर खिसियाई- ‘आप भी!’
[] [] []
‘कहां रह गई थी, अमीना?
फोन भी नहीं लगा तेरा,’ उस शाम देर से घर लौटी
अमीना को शकीला ने डपटा था- ‘फोन तो कर देती। फिक्र हो जाती
है।’
‘सॉरी अम्मी, घण्टाघर चली
गई थी। पता है, कल से यहां भी धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया!’
उसने चहकते हुए बताया- ‘यूनिवर्सिटी से हम कई
दोस्त गए थे। हमने वहां नारे लिखे, पोस्टर बनाए, गाने गाए। बहुत लोग जुट रहे हैं, अब्बा।’
‘अच्छा!’ रहमान भी
अमीना के उत्साह में शामिल हो गए थे। दिल्ली के शाहीनबाग में नागरिकता संशोधन
कानून (सीएए) विरोधी धरना-प्रदर्शन होते एक महीने से ज़्यादा हो गया था। भीषण
शीतलहर और बरसते पानी में भी महिलाएं, बच्चे, विद्यार्थी, युवक-युवतियां और विभिन्न संगठनों के
लोग डटे हुए थे। दिन पर दिन समर्थन बढ़ता जा रहा था। किसी खबरिया चैनल पर चल रहे
प्रदर्शन के फुटेज में ‘प्यार बांटो, देश
नहीं,’ ‘हम कागज नहीं दिखाएंगे,’ ‘संविधान
बचाओ, सीएए हटाओ’ जैसे नारे लिखे
बैनर-पोस्टर लहराते दिखे तो रहमान को बहुत अच्छा लगा था। जनता में विभेदकारी कानून
के खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरूरी था। उनका मन होता कि दिल्ली जाकर प्रदर्शन में
शामिल हो आएं। लखनऊ में भी प्रदर्शन होने लगा तो उनकी मुराद पूरी हो गई। वे अगली
ही शाम दफ्तर से निकलकर घण्टाघर पहुंच गए। बड़ी तादाद में महिलाएं घण्टाघर के सामने
बैठी थीं। बड़ी संख्या में पुरुष भी बाहरी घेरे में मौजूद थे। विभिन्न कॉलेजों और
यूनिवर्सिटी की लड़कियां बंदोबस्त देख रही थीं। कार्यकर्ताओं की एक टीम निगाह रखे
थी कि प्रदर्शन को बदनाम करने की नीयत से कोई उपद्रवी न घुस आएं, जिसका इन दिनों बहुत डर हो गया था। चारों तरफ राष्ट्र ध्वज लहरा रहे थे।
एक तरफ कुछ युवतियां संविधान की प्रस्तावना का पाठ कर रही थीं। कुछ लड़के–लड़कियां
सफेद कपड़े का लम्बा थान बिछाकर उस पर पेण्टिंग बना रहे थे। एक कोने में नुक्कड़
नाटक की तैयारी हो रही थी। ‘मैं हिंदू हूं और सीएए व एनआरसी
का विरोध करती हूं,’ ‘नो डोक्यूमेण्ट्स, रिजेक्ट सीएए’, आदि नारे लिखी तख्तियां हवा में लहरा
रही थीं। घण्टाघर के चारों तरफ बड़ी संख्या में पुलिस तैनात थी। रहमान देर तक वहां
चहलकदमी करते और लोगों से बतियाते रहे थे।
दफ्तर के बाद शाम को वहां जाना रोज का नियम बन
गया था। अमीना अपने दोस्तों के साथ प्रदर्शन में सक्रिय रहती। राशिद ने
इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल से उसके लिए शायरी और कविताएं भेजी थीं पोस्टरों के
लिए। लड़के-लड़कियों का बड़ा दल सारी व्यवस्थाएं सम्भाल रहा था। अमीना घर से भी
पोस्टर, वगैरह बनाकर ले जाती। दो-तीन बार उसे रात
को भी वहां रुकना पड़ा। शकीला एतराज करती लेकिन रहमान ने मौन सहमति दे दी थी।
कॉलोनी में खबर फैलते देर न लगी। रहमान को मॉर्निंग
वॉक के अलावा और वक्त भी ताने सुनाई देने लगे। वे दूध लेने या सौदा-सुलफ़ के लिए
बाजार जाते तो कुछ पड़ोसी घरों से उन्हें लक्ष्य कर सुनाया जाता- ‘ये कागज
नहीं दिखाएंगे भैया!’ दूसरी तरफ से आवाज आती- ‘यहीं रहकर छाती पर मूंग दलेंगे!’ रहमान चुप रहने के
अलावा और क्या कर सकते थे।
‘पिज्जा-बर्गर-बिरयानी खाकर सरकार के खिलाफ
साजिश की जा रही है।’
‘पाकिस्तान से फण्डिंग आ रही है। वर्ना कैसे
लगते शामियाने, तम्बू-कनात। कैसे पिकनिक मनाई जाती!’
‘अरे, इसी देश में कम
हैं क्या फण्डिंग करने वाले! भरे पड़े हैं अर्बन नक्सल और सिकुलर जमात!’
रहमान को हर जगह ऐसी बातें सुनाई देतीं। अचरज और
गुस्से में वे सोचते कि विरोध प्रदर्शन का लोकतांत्रिक अधिकार किस तरह गुनाह में
बदला जा रहा है। राहत की बात यह थी कि विरोध व्यापक होता जा रहा था। देश में
सैकड़ों जगह ‘शाहीनबाग’ बन गए थे
जहां संविधान में आस्था रखने वाली जनता, सेकुलर, प्रगतिशील और सिविल सोसायटी के लोग, महिलाएं,
पुरुष, बच्चे, सभी बड़ी
संख्या में शामिल और सक्रिय थे। राजनैतिक दलों को इससे दूर रखा जा रहा था। प्रदर्शन
को विपक्षी दलों की साजिश और सिर्फ मुसलमानों का विरोध साबित करने की साजिशें
कामयाब नहीं हो रही थीं। बहुत समय बाद रहमान को लग रहा था कि इस बहुरंगी देश को एक
रंग में रंगने की कोशिश कामयाब न होगी। उनकी चुप्पी को जैसे शब्द मिल रहे थे।
एक शाम अमीना ने कहा- ‘पापा,
कुछ रुपए चाहिए। हम कुछ दोस्त वहां कल दोपहर का खाना ले जाना चाहते हैं?’
‘तो, अम्मी से बिरयानी क्यों
नहीं बनवा लेती। क्यों शकीला?’ रहमान तपाक से बोल उठे थे।
[] [] []
पीपल के नीचे चबूतरे पर हुई अप्रिय छींटाकशी के
बाद दोनों दोस्त घर वापस लौट रहे थे। बहुत देर से उनके बीच मौन पसरा था।
‘तुम्हें क्या जरूरत थी वहां बिरयानी का देगचा
भिजवाने की? वह भी खुले आम टेम्पो में लदवा कर जिसमें बड़ा-सा
पोस्टर लगा था- हम कागज नहीं दिखाएंगे!’ सक्सेना ने काफी देर
से मुंह में रोकी हुई बात आखिर कह ही डाली- ‘देख तो रहे हो
कि माहौल कैसा हो गया है। तुम्हें कौन देश से बाहर निकाल रहा है?’
रहमान तड़प कर अपनी जगह खड़े रह गए। उन्होंने सक्सेना
के चेहरे पर नज़रें गड़ा दीं। भीतर एक बवण्डर-सा उठने लगा। मन हुआ कह दें, ‘हां, और हमें चैन और इज्जत से रहने देने के लिए
कैसे-कैसे कानून बनाए जा रहे हैं!’
वे बोले कुछ नहीं लेकिन चाल बढ़ाकर सक्सेना से काफी आगे निकल आए। पास ही किसी पेड़ की घनी शाखों से कोयल लगातार कूके जा रही थी।
-नवीन जोशी
(परिकथा, जनवरी-फरवरी 2022)
3 comments:
अद्भुत
ह्रदय विदारक कहानी है. मैं ऐसी स्थितियों का साक्षी हूँ.
पूरी शिद्दत से लिखा गया कडुआ सच।
अफसोसनाक ओर शर्मनाक दौर, जिसके हम सब गवाह हैँ।
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