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Monday, August 03, 2026

लेखक की बरसाती में रिश्तों का वैभव

आकाश में बादल छाए हुए हैं। कभी रिमझिम होने लगती है लेकिन शीघ्र थम भी जाती है। उमस और पसीने के बावजूद मेरे भीतर की रिमझिम जारी रहती है। दो-तीन दिन से मन भीगा-भीगा है। मेरे हाथ में अशोक अग्रवाल की पुस्तक है- 'लेखक की बरसाती'। 

संस्मरणों की किताब है। यादें हैं, यात्राएं हैं, अंतरंग रिश्तों का वैभव है और लिखने का अलग ही कौशल है। रचनाकारों के बीच ऐसे निर्मल-निश्छल रिश्ते अब नहीं दिखते। मन कलपता है। 

पहला संस्मरण निर्मल वर्मा पर है- 'एक लेखक की बरसाती'। किताब का नाम यहीं से लिया गया है। किताब पूरी पढ़ जाने के बाद लगता है कि निर्मल जी यहां नहीं भी हो सकते थे। वे किसी और किताब में जा सकते थे। तब किताब का नाम कुछ और होता। पर किताब यही बनती।  

इसे वास्तव में सौमित्र मोहन, जितेंद्र भाटिया, विनोद कुमार श्रीवास्तव, हिमा कौल और स्वयं लेखक अशोक अग्रवाल मुकम्मल बनाते हैं। जो दोस्ती, अंतरंगता, सहकार, प्रेम, चिंता और लम्बे दौर का संग-साथ इनके बीच है, वह किसी भी सबंध के परे जाता है। वह पाठक को भिगोता रहता है। निर्मल जी इनके बीच, प्रवेश द्वार पर सहजता से तो हैं लेकिन किसी कद्दावर लेखक की तरह थोड़ा दूर बैठे लगते हैं। 

पुस्तक के अंत में संकलित छोटे-छोटे रेखाचित्रों में भी निकटता और आत्मीयता का रसायन है। वे पाठक का अंतर्मन स्पर्श कर ले जाते हैं, लेकिन किताब की वास्तविक पूंजी तो वे चार संस्मरण ही हैं। अशोक अग्रवाल जी का लेखक इन्हीं में अपनी शान के साथ उपस्थित है।

सौमित्र मोहन का नाम हमने 'वह लुकमान अली है...' से जाना था। वह हिंदी की बहुचर्चित कविता है। यहां भी कवि का प्रवेश  लुकमान अली की मार्फत होता है लेकिन फिर कविता पीछे रह जाती है और लेखक इस  कवि के भीतर-बाहर का वह संसार दिखाता है, जहां इनसान किसी भी रचना से ऊपर हो जाता है। 

जितेंद्र भाटिया हिंदी में खूब पढ़े-लिखे-घूमे, विश्व साहित्य से लेकर विश्व सिनेमा तक में गहरे पैठे, यायावर, छायाकार, लेखक और विरले अनुवादक हैं। अब भी खूब सक्रिय हैं। उन्हें पढ़ना कई प्रकार समृद्ध होना होता है।  

विनोद कुमार श्रीवास्तव हिंदी कविताई की आत्म-मुग्ध दुनिया से दूर-दूर रहने वाले नायाब कवि हैं। कभी ज्ञानरंजन ने उनके लिए लिखा था कि उनकी कविताएं समुद्र में तैरता ग्लेशियर हैं, जिसका नब्बे प्रतिशत पानी के भीतर ओझल रहता है। अब तो वे मित्रों से भी दूर अपने बनाए किले में कैद हो गए हैं। दोस्तों से भी उनका संवाद नहीं होता। 

हिमा कौल का नाम मैंने सबसे पहले 1980 के दशक में राजीव मित्तल से सुना था। नवभारत टाइम्स लखनऊ के दिनों में कभी-कभार रम के दो पैग के बाद बाबा छाप तम्बाखू का पान चुभालते हुए वह हिमा कौल, उसके गढ़े शिल्पों और उसकी लाइलाज बीमारी के किस्से सुनाया करता था। 

'लेखक की बरसाती' के उल्लिखित चार संस्मरणों में लेखक चारों दोस्तों के साथ बराबर मौजूद है। सभी में सभी की आवाजाही है। चारों संस्मरण एक-दूसरे के कहे जा सकते हैं। हिमा आज दुनिया में मौजूद नहीं है, लेकिन वही यहां सबसे अधिक उपस्थित है । वह शेष चारों में बराबर उपस्थित है। अशोक जी की स्मृतियों में वह बेतरह छाई हुई है। कई बार आंखों की कोर नम हो आती है।

पांचों रचनाकार रिश्तों की ऐसी डोर में बंधे दिखते हैं, जो एक दूसरे को पूरा बनाती है। एक दूसरे की रिक्ति को भरती रहती है। ये रिश्ते भावनाओं से भरपूर हैं लेकिन शब्दों में भावुकता नहीं भरी है। लेखकीय वस्तुनिष्ठता का बेहतरीन संतुलन अशोक जी ने साधा है। लहरें पाठक के भीतर स्वयं ही बहने लगती है।

सभी रिश्तों की शुरूआत रचनाओं से ही होती है। वही उन्हें करीब लाती हैं। धीरे-धीरे वह करीबी रचनाओं के बाहर जाकर एक-दूसरे को समेट लेती है। दोस्ती, प्रेम, अंतरंगता एवं परस्पर सम्मान को पार करता हुआ रिश्ता रूहानी-सा भी बन जाता है। वे कई-कई दिन तक साथ रहते हैं, एक-दूसरे घर में और लम्बी यात्राओं में। समुद्र, पहाड़, जंगल, पक्षी, पगडंडियां, आकाश उनके रिश्तों में रंग भरते हैं। 

हिमा कौल को खतरनाक स्नायु रोग हुआ। मोटर न्यूरॉन डिजीज। इस बीमारी से वह हंसते-काम करते हुए लड़ी। कोई रोना-धोना, निराशा-हताशा नहीं। देश भर में कई जगह इलाज चला। ये दोस्त हर जगह साथ बने रहे। उसकी मां उद्विग्न हो जाती रही, लेकिन दोस्तों ने जो साथ दिया, वही दोस्ती की परिभषा है। किसी ने हार नहीं मानी। खुद हिमा अपने शिल्प गढ़ती रही। प्रदर्शनी भी हुईं। फिर एक दिन हिमा चली गई। नहीं, दोस्तियों में बची रह गई।   

दो वर्ष पहले अशोक जी के संस्मरणों की एक और पुस्तक पढ़ी थी- 'संग-साथ'। उसमें भी कुछ मित्रों के आत्मीय संस्मरण हैं। नवीन सागर, विश्वेश्वर, जितेंद्र कुमार, अमितेश्वर और प्रियदर्शी प्रकाश पर उनके स्मृति लेख विशेष रूप से याद रह जाते हैं। 'लेखक की बरसाती' के उपर्युक्त चार संस्मरण उनसे आगे निकल गए हैं। 

ये संस्मरण एक संवेदनशील लेखक होने के नाते ही नहीं लिखे जा सकते। इनके लिए एक रचनाकार की भटकन, अदेखे को देखने की और इस जीव-जगत को अनुभव करने की बेचैनी चाहिए। वह अशोक अग्रवाल में और उनके अंतरंग दोस्तों में रही है। यह किताब सबूत है।    

- नवीन जोशी, लखनऊ। 03 अगस्त, 2026

( लेखक की बरसाती- अशोक अग्रवाल, सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, मूल्य- 300/-, सम्पर्क- 7017437410)  

 

  

 

 

Monday, May 25, 2026

‘आधे सूरज की धूप’- टीसती स्मृतियों में गुमशुदा स्त्री का चेहरा

परिवार के भीतर आपसी सबंधों के पेच एक अत्यंत संवेदनशील बच्चे को वयस्क बनाते हुए किन-किन और कैसी-कैसी जटिल व अंधेरी आंतरिक उलझनों-बिखरावों की दुनिया में ले जाते हैं जो उसके पूरे जीवन पर मंडराते रहते हैं, इसका टीसता हुआ मार्मिक वृतांत है नरेश गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘आधे सूरज की धूप’। लघु कलेवर (मात्र 83 पृष्ठ) का यह उपन्यास अपनी व्याप्ति में विराट है और पाठक को मथता चलता है। इसे पढ़ना अपने भीतर के अनेक गह्वरों में झांकते चलना भी है। अतीत की वे कौन सी चोट हैं, कौन सी अनुभूतियां हैं, जिनसे हम आजीवन छुटकारा नहीं पा पाते, जिनके प्रेत हमारे वर्तमान पर मंडराते रहते हैं?   

परिवार के सबसे छोटे बेटे अरविंद को पिता के फोन से चाचा की मृत्यु का समाचार मिलता है। पिता से भौतिक और मानसिक रूप से भी बहुत दूर जा चुके अरविंद की स्मृति-यात्रा के साथ उपन्यास शुरू होता है। कभी बालक अरु और कभी युवा आरवि होता हुआ वयस्क अरविंद मुख्य रूप से अपने पारिवारिक, विशेष रूप से माता-पिता के संबंधों की गांठों में झांकता है।

इस प्रक्रिया में उसके भीतर निरंतर आलोड़न-विलोड़न चलता है। वस्तुत: यह हालडोला उसके भीतर बचपन से ही शुरू हो गया था जिसने उसे न युवावस्था में प्रगतिशील राजनैतिक धारा में टिकने दिया और न बाद में किसी रिश्ते या नौकरी में। बचपन से आज तक वह भटकता ही रहा है। यह भटकन बाहरी से अधिक भीतरी है और उसके साथ इसका त्रास भी जुड़ा हुआ है। उसके ‘वर्तमान पर अतीत के प्रेत मंडराते रहते हैं। हमें पता नहीं चलता कि बाहर से बिल्कुल सामान्य, चुस्त-दुरुस्त दिखता आदमी अपने भीतर किस यंत्रणा से गुजरता रहता है।’

पिता (पितृसत्ता कह लीजिए) यहां अपराधी हैं, मां की घोर उपेक्षा करने का अपराधी, बच्चों की परवाह न करने का अपराधी, बड़े भाई का शोषण बर्दाश्त करने का अपराधी और अपने किए का बचाव करने के साथ मां को ही दोष देते रहने का अपराधी- ‘किसान परिवार से आई थी ... अनपढ़ और अनगढ़ थी, इसलिए जीवन भर भैंसों में उलझी रही ...पहले रिश्ते को नहीं भुला पाई ... समय के साथ नहीं चल पाई...।’

रामरती (मां) पहले परिवार के बड़े लड़के शिवपाल से ब्याही गई थी। उस रिश्ते से एक पुत्र भी जन्मा था लेकिन न वह पुत्र बचा, न पति। तब वह दुत्कार और अपमान के बाद मायके भगा दी गई। जाते हुए वह अपने सबसे छोटे देवर से पूछती गई थी- ‘बता, जिब तू बड़ा हो जावैगा तो मझे लैण आवैगा?’ वह बिना जाने-समझे जवाब देता है- ‘हां, बड़ा होते ही लेने आऊंगा’।

और, मायके में ग्यारह वर्ष वैधव्य के काटने के बाद रामरती अपने से बारह वर्ष छोटे देवर की पत्नी बनकर फिर उसी घर में लौट आई। नए पति बने देवर ने उससे बच्चे पैदा किए लेकिन न कभी प्यार दिया, न पत्नी का मान-सम्मान। जेठ-जिठानियों ने भी उसे प्रताड़ना ही दी- ‘या डंकिणी फेर आ गई!’ लेकिन वह हारी नहीं, मायके से एक गाय लेकर आई और उसके सहारे धीरे-धीरे कई भैंसों को पालकर परिवार चलाने वाली बनी, कमाऊ खेतों में खटी और खटते-खटते एक दिन मर गई।

तब अरविंद बहुत छोटा था लेकिन हर ओर से उपेक्षित वह मां, जो उसे भी बहुत स्नेह नहीं दे पाई, उसकी आत्मा में एक टीस बनकर बैठी रह गई- ‘क्या उसकी ज़िंदगी उसी धुंए में धुंधवाती रही थी, जिससे बाहर आकर और आंखें पोछकर वह हमसे मिल लेती थी? क्या उसके भीतर कोई धागा नहीं बचा था जो बाहर फैले जीवन से जुड़ सके?’

नन्हे कलेवर के इस उपन्यास में वह मां सघन रूप से बसी हुई है। वह वाक्यों में है, पंक्तियों के बीच में है, घटनाओं में है, मौन में है। वह अरविंद की भटकन में टीसती है, खण्डहर हो रहे मकान की मिट्टी में महकती है, बुआ के किस्सों से झांकती है। ‘मां के पीछे छिपी एक गुमशुदा औरत’ अरविंद के चेतन-अवचेतन में हमेशा बनी रहती है, इस कदर कि ‘अरविंद जीवन भर किसी भी फिल्म में मां का जिक्र आने भर से भावुक हो जाता था और शर्मिंदा होना पड़ता था। इसीलिए उसने फिल्म देखना ही छोड़ दिया था।’

उस मां को पति और परिवार का प्यार नहीं मिला लेकिन उसने सारा जग जीत लिया था, यह उसकी मौत के बाद पता चलता है जब शोक व्यक्त करने इतनी स्त्रियां आ जाती हैं कि घर के भीतर और दालान तक में उन्हें बैठाने की जगह नहीं बचती- ‘कस्बे के अलग-अलग कोनों, कुम्हारों, लुहारों, छिप्पियों और मुसलमानों की गलियों से आई अनाम और अनजान औरतों का यह रेला देखकर मोहल्ले की परिचित ताई-चाचियां और घर के लोग हैरान थे... औरतों का यह तांता कई दिनों तक लगा रहा। कई तो महीनों बाद सिर्फ यह कहने आई कि घर में किसी काम की जरूरत पड़े तो खबर करवा दियो।’

धरती-सी धैर्यवान और मजबूत यह मां अपने घर की नींव में ही नहीं थी, मामा की ‘रखैल’ कही जाने वाली उस रसूलन के मान-सम्मान के लिए भी कमर बांध कर खड़ी रही, जिसने मामा के परिवार को बिखरने से बचा रखा था। और तो और, वह आततायी जेठ के हाथ का लट्ठ छीनकर उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो गई थी। वह स्त्री उपन्यास से बाहर आकर पाठक के भीतर बैठ जाती है और वहीं बनी रहती है।

यह कथा एकरेखीय नहीं है और न इस तरह सिलसिलेवार कही गई है। अरविंद के अंतर में लगातार चलने वाले स्मृतियों के मोंताज में कथा के बिखरे-बिखरे तार उभरते और क्रमश: जुड़ते जाते हैं। उपन्यास पूरा होते-होते एक कसक गहरे उतर जाती है। शिल्प इतना प्रभावशाली और अलग किस्म का है कि कथा का कहीं विस्तार न होने, तारतम्य नहीं बनने, विवरणों में न जाने और कोई विशेष ढांचा खड़ा न किए जाने के बावजूद वह समग्रता में प्रवाहित होती है। भाषा में देशज छोंक इसे और आत्मीय बना देता है।  

जो पिता तीन चौथाई उपन्यास में अपराधी ठहरते हैं, वह वृद्धावस्था में जैसे बरी कर दिए जाते हैं, हालांकि इसका जवाब अरविंद के पास भी नहीं है कि क्या उसनें उन्हें सचमुच बरी कर दिया? ऐसा केवल अरविंद के साथ ही नहीं होता, वह फिलहाल जिस सबीना के साथ रिश्ते में बना हुआ है, वह भी अपने आरोपित पापा को बख्श देती है- यह महसूस करते हुए कि ‘कि जो चोट मैंने अपने पापा को पहुंचाई थी, उसका घाव खुद मेरे अंदर हुआ था।’

सबीना का किस्सा यह है कि जब वह चौदह-पंद्रह की थी तो उसकी मम्मी की मौत हो गई थी और चार महीने भी नहीं बीते थे कि पापा ने दूसरी शादी कर ली थी। सबीना उनसे भाग आई और फिर नहीं लौटी थी। दोनों को लगता रहा था कि उनके पास लौटने के लिए कोई जगह नहीं है।

यहां पंकज बिष्ट का उपन्यास ‘उस चिड़िया का नाम’ याद आता है, जहां नायक पिता की मृत्यु के बाद उनके जीवन को किसी अभियोजन की दृष्टि से देखता रहता है। वास्तव में यह सब अपने ही भीतर झांकने की कोशिश है, अपने को समझने का प्रयास है। अंतिम पृष्ठों में अरविंद और सबीना की बातचीत इसे स्पष्ट कर देती है। सबीना के बहुत छोटे से प्रसंग में ‘मदर मेरी कम्स टु मी’ (अरुंधती राय) की स्मृति भी कोंध जाती है।

उपन्यास के शुरू में पिता का जो फोन आया था कि महेंद्र चाचा की मौत पर अवश्य घर आना क्योंकि तुम ‘दुनिया से कट गए हो’, उसका जवाब अंत में मिलता है, चालीस वर्षों में फैले तमाम स्मृति-मोंताज़ों की उड़ती-भागती यात्रा के बाद, अपने भाई गोविंद से यह कहने में कि ‘गोविंद भाई, पिता जी से मेरे न आने का कोई बहाना बना देना।’

‘आधे सूरज की धूप’ के बैक कवर पर दर्ज़ है कि ‘सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों और साहित्य में एक साथ आवाजाही करने वाले नरेश गोस्वामी का यह पहला उपन्यास है जो पिछले दस बरसों में अलग-अलग दिशाओं में भटकने के बाद अंतत: इस ठौर पर पहुंचा है।’

‘और क्या खूब पहुंचा है!’ मैं इतना और जोड़ना चाहता हूं। शानदार उपन्यास के लिए गोस्वामी जी को बधाई और प्रकाशित करने के लिए सम्भावना प्रकाशन को साधुवाद।

- नवीन जोशी, 25 मई 2026, रामगढ़  

(‘आधे सूरज की धूप’ (उपन्यास), लेखक- नरेश गोस्वामी। सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, पृष्ठ 83, मूल्य- 200 रु।)    

      

             

Tuesday, August 24, 2021

यात्राएं बताती हैं उत्तराखण्ड का हाल

कभी लखनऊ के गिरि विकास अध्ययन संस्थान की शोध परियोजनाओं के लिए उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों  की यात्रा पर गए अरुण कुकसाल अब पक्के पहाड़ी घुमक्कड़ हैं। पहाड़ के गांवों से उन्हें बहुत प्यार है। इसीलिए पौड़ी गढ़वाल के अपने गांव चामी में रहने लगे हैं। वहां एक पुस्तकालय और कम्प्यूटर केंद्र बनाकर बच्चों को भावी जीवन संग्राम के लिए तैयार कर रहे हैं। सुदूर गांवों और दुर्गम शिखरों की यात्रा करने का कोई अवसर वे छोड़ते नहीं।

‘चले साथ पहाड़’ (सम्भावना प्रकाशन) अरुण की दस यात्राओं का वृतांत है। ये यात्राएं 1990 से 2020 के बीच की अवधि में की गई हैं। तीस साल के लम्बे अंतराल में उत्तराखण्ड में आए बदलाव और कहीं-कहीं लगभग यथास्थिति को भी दर्ज़ किया गया है। अरुण जिज्ञासु यात्री हैं और अपने संस्मरणों में इतिहास से लेकर दंत कथाओं और धार्मिक मान्यताओं को भी पिरोते चलते हैं। कुछ यात्राएं तीर्थ स्थलों की है लेकिन उनके वृतांतों में भी अपने समाज को जानने की उत्कंठा ही दिखती है।

अरुण मानते हैं कि “इस दुनिया को बेहतर और जीवंत बनाने की पहली पहल करने वाला निश्चित ही एक घुमक्कड़ रहा होगा।” घुमक्कड़ी हमें अपने समाज को भीतर तक देखना सिखाती है। यह देखा हुआ यथार्थ बदलाव की ललक पैदा करता है। 2018 में मध्य महेश्वर की यात्रा में वे पाते हैं कि “रांसी गांव में सड़क तो आ गई पर रोजगार कुछ बढ़ा नहीं। नतीजन, इसी सड़क से लोग देहरादून और अन्य मैदानी शहरों की ओर सरकने लगे हैं। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से इन 18 सालों में 28 परिवार यहां से पूरी तरह पलायन करके जा चुके हैं।” पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति का कारण सिर्फ बेरोजगारी नहीं है। एक यात्रा में वे पाते हैं कि “30 किमी तक तो प्राथमिक उपचार भी सम्भव नहीं है। अव्यवस्थाओं का चरम देखना है तो उत्तराखण्ड आइए। प्रकृति ने जितनी खूबसूरत जगहें यहां दी हैं, उतना ही कुरूप व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार यहां का शासन-प्रशासन है।”

पलायन करने और न कर पाने की मजबूरियां इन यात्राओं में बार-बार सामने आती हैं। रुद्रनाथ जाते हुए “एक खण्डहर हवेली दिखी तो खेत में काम कर रही एक बुजुर्ग महिला ने बताया- ये खूब पैसे वाले लोग थे तो उनको यहां रहकर क्या करना था। बाहर देश चले गए। अब उनका कोई नहीं आता यहां। पहाड़ में रहना तो हम गरीब गुरबों के लिए है। कहां जाना हमने।” जहां सड़क नहीं पहुंची है, हर उस जगह उसकी मांग है लेकिन अरुण चौंकते हैं जब सरनौल में ग्रामीणों की सबसे पहली मांग मोबाइल टावर लगाने की होती है, सड़क की मांग दूसरे नम्बर पर। स्वाभाविक ही “संचार और यातायात आज की दुनिया में समुदायों की जरूरतों में पहले नम्बर पर हैं।” रंवाई इलाके के एक ग्राम प्रधान का दर्द देखिए- “एक जूनियर स्कूल है पर उसमें अध्यापक नहीं है। मोटर सड़क और बिजली कभी यहां आएगी, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है। मोबाइल टावर इधर हो जाता तो हम जीने-मरने की खबर तो दे पाते सरकार को।” यह वह रंवाई है जहां “साठ के दशक तक बाहर से बिल्कुल भी अन्न नहीं आता था।” तब का पूरी तरह आत्मनिर्भर इलाका अब ‘विकास’ के लिए सरकार का मुंह जोहता है। और, सरकार है कहां, ये देखिए-

आधा-अधूरा पड़ा स्कूल भवन देखकर “प्रदीप (राज्य सभा सदस्य प्रदीप टम्टा) पूछते हैं- कभी कोई जिला शिक्षा अधिकारी आए हैं इस इलाके में?

“जानकारी नहीं है सर, मैं भी पहली बार आ रहा हूं- खण्ड शिक्षा अधिकारी चौहान उत्तर देते हैं।” और, जब प्रदीप महिलाओं से मुखातिब होते हैं कि उनकी समस्याएं जान सकें तो पता चलता है कि “वे नहीं जानती कि महिलाओं के इलाज के लिए महिला डाक्टर भी होती हैं। उनके लिए फार्मासिस्ट ही सब कुछ है। महिला मंगल दल, आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ती, आदि के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है।”

बहुत पुरानी नहीं, यह 2016 की बात है जब ‘उत्तराखण्ड’ राज्य को अस्तित्व में आए सोलह साल हो चुके थे। बड़ी उम्मीद से अपने लिए अलग राज्य मांगा था उत्तराखण्डी जनता ने लेकिन 2017 की रुद्रनाथ यात्रा में लेखक और उसके साथी सुनते हैं कि “अच्छे खासे थे उत्तर प्रदेश में। कहने को अपना राज्य है पर जब जनता के पास खाणे-कमाणे के लिए कुछ होगा नहीं तो क्या करना ऐसे राज का?”

1990 में की गई सुंदरढूंगा यात्रा के समय ‘अपना राज्य’ नहीं बना था। उस समय का यात्रा विवरण बताता है कि “जातोली गांव की सरकारी राशन की दुकान आठ किमी दूर खाती गांव में है। वहां से एक खच्चर सामान की ढुलान 60 रु है। गांव में सरकारी गल्ले की दुकान की मांग लोग सालों से कर रहे हैं। सारी सरकारी सुविधाएं खाती गांव से आगे ही नहीं बढ़ पाती हैं...।” राज्य बनने के 21 वर्ष बाद पुस्तक की भूमिका में लेखक उस यात्रा का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि “तब से बहुत समय बदल गया है परंतु विडम्बना यह है कि सुंदरढूंगा ग्लेशियर जाने के रास्ते में आखिरी आबादी वाले जातोली गांव के लोग जीवन की मूलभूत सुविधाओं से अभी भी वंचित हैं।”  

सरकारों का दावा है पर्यटन प्रदेश बनाने का लेकिन 2017 में यात्री पाते हैं कि “सरकार का पर्यटन-तीर्थाटन विकास सिर्फ विज्ञापनों में ही दीखता है। यहां तो सरकार लापता है। जो कुछ है बस स्थानीय लोगों का किया हुआ कमाल है।” स्थानीय जनता है भी कमाल की मोहिली और भोली- “पास ही चाय की दुकान है। दुकानदार जी अपने जानवरों की खोज में सामने की धार में खड़े हैं। वहीं से ऊंची आवाज में कहते हैं- मुझे देर लगेगी, आप चाहें तो अपने आप चाय बना लीजिए। चाय के पैसे वहीं रख जाना।”              

ऐसी भोली जनता में सरकार के प्रति घोर अविश्वास है। उसके कारण हैं- “घिमतोली के सरकारी उद्यान फार्म के बारे में दुकानदार से पूछा- वह कहां पर है? तुनक कर वह कहता है- किसका फार्म साब! वह तो कब का सरकार ने किसी प्राइवेट को बेच दिया। वर्षों से सुन रहे हैं कि वो लोग जड़ी-बूटी उगाएंगे पर तब से उसे बंजर होते ही देख रहे हैं। सरकार को जो करना चाहिए वह तो उससे होता नहीं। हां, हम पहाड़ियों के पैतृक व्यवसाय जरूर हडप रही है।” यह अकेला किस्सा नहीं है। भराणीसैण में, जहां उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैण में बनाने के लिए आंदोलित जनता को ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ का झुनझुना दिया गया है, “राज्य बनने से पहले एशिया का प्रसिद्ध गोवंशीय संकर प्रजनन केंद्र था, जो अब वीराने के हवाले है। रास्ते में करोड़ों की लागत से बनी विदेश से आयातित भीमकाय मशीन को दिखाते हुए इंद्रेश कहते हैं, वर्षों पहले यह मशीन आई और बिना उपयोग में आए यहीं पड़े-पड़े खराब हो गई।” और, उखीमठ में “गढ़वाल मंडल विकास निगम के शुरुआती हिस्से में तीन भारी-भरकम भवनों के आधे-अधूरे अवशेष चुपचाप निरीह अवस्था में खड़े हैं। उनके चारों ओर बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई हैं। साफ बात है कि वर्षों से इनकी सुधि नहीं ली गई है।” एक स्थानीय व्यक्ति से इसका कारण पूछा गया तो बोला –“अजी बताना क्या, सरकार की नालायकी के नमूने हैं ये।” अरुण की यात्राएं पाठकों को उत्तराखण्ड के ऐसे दर्दनाक एवं क्रूर हालात से परिचित कराती चलती हैं।

भारी गड़बड़ियों और उपेक्षाओं वाले उत्तराखण्ड में अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, अरुण यह नोट करना भी नहीं भूलते। ‘कहो, कैसे हो रानीखेत’ वृत्तांत में वे उम्मीद की रोशनी भी देखते हैं- “पौड़ी से तकरीबन 90 किमी की यात्रा हो गई है और हमें न तो कोई टूटा/खण्डहर घर/इमारत मिली और न ही कहीं बंजर जमीन या छूटे हुए खेत दिखाई दिए हैं।” वैसे, यह चलती कार से देखा हुआ ‘सच’ है। तो भी कैन्यूर गांव का यह दृश्य उम्मीद जगाता है –“जंगल और लोगों के रिश्ते यहां अभी भी जीवंत हैं...। जंगलों की भरपूर उपलब्धता ने यहां के लोगों के पुश्तैनी कार्यों को कमजोर नहीं होने दिया है। जंगलों में जंगली जानवरों का आधिपत्य है तो खेत-खलिहानों में मानवों का।” यह संतुलन अब दुर्लभ ही कहा जाएगा। “कुमाऊं के सल्ट इलाके की देश-दुनिया में मशहूर मिर्च का लाखों का कारोबार” करने वाले आढ़तियों का होना भी आशा एवं सम्भावनाएं बनाए रखता है।

तमाम निराशाजनक दृश्यों के बीच अरुण पाठकों को जनता की मेहनत और अपने पहाड़ों से प्यार का दर्शन करा कर निराश नहीं होने देते- “ये है भाई लोगो, ग्राम सभा डख्याट.... गांव के ऊपरी भाग में घना बेमिसाल जंगल। विजय बताते हैं कि यह सब गांव के लोगों की मेहनत का फल है। इस पूरे पहाड़ पर ग्रामीणों ने वर्षों से देखभाल करके जंगल पैदा किया, उसे पाला-पोसा और आज उसका लाभ ले रहे हैं।” यहां हमारी भेंट अच्छी नौकरियां छोड़कर अपने-अपने गांव लौटे और कुछ न कुछ उद्यम कर रहे लोगों से भी होती है।

2013 के जल-प्रलय से तबाह हुए केदारनाथ और आसपास के इलाके के ‘सरकारी सौंदर्यीकरण’ को तनिक आशा से देखते हुए भी लेखक यह चेतावनी देता है कि “बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण पहाड़ों का पारिस्थितिकीय तंत्र गड़बड़ाने लगा है।” उधर, तीर्थाटन और पर्यटन के नाम पर “बिना साइलेंसर की बाइकें, बिना हेल्मेट और अंधाधुंध रफ्तार के साथ हवा में नशे की गंध छोड़ते दंभी युवकों की भीड़” हैरान-परेशान करती है।

कुल मिलाकर ये यात्रा वृत्तांत आज के उत्तराखण्ड का आईना हैं। प्रकाशित चित्रों में परिचय की कमी खलती है। कुछ अशुद्धियां भी हैं, विशेष रूप से ‘पितृ’ को को बार-बार ‘पित्र’ पढ़ना सुस्वादु भोजन के बीच कंकड़ आ जाने की तरह किरकिराता है।

    -चले साथ पहाड़, लेखक- अरुण कुकसाल, प्रकाशक- सम्भावना प्रकाशन, हापुड़ (7017437410) पृष्ठ 208, मूल्य 250/-