चुनाव आयोग बहुत बड़ी धांधलियां कर रहा है। SIR के बहाने अलोकतांत्रिक और अवैध काम कर रहा है। Indian Express अखबार में प्रकाशित रितिका चोपड़ा की एक खोजी रिपोर्ट ने आज यह साबित कर दिया। रिपोर्ट लम्बी है और कई भागों में छपी है। उसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-
1. चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं। एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। कोई भी फैसला तीनों को सर्वसम्मति से या बहुमत से करना होता है। पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्तियां कीं कि गलत हो रहा है और उन्हें बताए बिना आयोग के नाम से निर्णय किए जा रहे हैं। ये आपत्तियां बकायदा लिखित रूप से दर्ज़ की गईं और कैबिनेट सचिव तक पहुंचाई गईं। सब तरफ चुप्पी रही।
2. दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग यह आपत्ति की कि बिना 'आयोग' की सहमति के आयोग के नाम पर आदेश-निर्देश जारी किए जा रहे हैं।
3. मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय प्रत्येक विधान सभा क्षेत्र के मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को करना होता है। ऐसा नियम है और यह संवैधानिक पद है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के निदेशक (आईटी) ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर लागू कराया जिससे मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार ईआरओ से छिन गया। वे इस सॉफ्टवेयर को 'एक्सेस' ही नहीं कर सकते हैं।
4. मतदाताओं के बारे में सारे निर्णय सीधे दिल्ली में होने लगे। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लिखित आपत्ति की कि यह नियम विरुद्ध है। बिना नियम बदले ऐसा किया जा रहा है और यह केंद्रीयकरण क्यों किया गया। अखबार ने कुछ राज्यों के ऐसे मामले रिपोर्ट में दर्ज़ किए हैं जहां ईआरओ वाजिब पाए जाने पर भी नाम जोड़ नहीं पाए।
4. SIR में नए नाम जोड़ने वाले फॉर्म 6 में बदलाव करके पहली बार के मतदाताओं से यह बताने को कहा गया कि उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम सूची में पहले था या नहीं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने लिखित आपत्ति की कि यह अवैध है। उनकी आपत्ति, जो बहुमत की आपत्ति थी, के बावजूद फॉर्म 6 में ये बदलाव किए गए। ऑनलाइन आवेदन पत्रों में इसे भरे बिना नए मतदाता आगे बढ़ ही नहीं पाए। 13 अगसत को श्री संधू ने लिखित दिया कि तत्काल इसे हटाया जाए। दूसरे आयुक्त ने भी यही कहा लेकिन नया फॉर्म 6 जारी कर दिया गया और आज तक चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की ही तरह ये दोनों आयुक्त भी एनडीए सरकार में नियुक्त किए गए थे। नियुक्त करने वाली तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और नेता विपक्ष हैं। नेता विपक्ष ने दोनों आयुक्तों के नाम पर आपत्ति की थी। तब भी दो आयुक्तों ने ये आपत्तियां की हैं।
30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के नाम पर 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। अकेले बंगाल में 60 लाख मतदाताओं के नाम 'तार्किक विसंगति' की नोटिस जारी की गई। इनमें से 27 लाख नाम आयोग ने हटा दिए। कई याचिकाओं पर सुनवाइयों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में न्यायाधिकरण बनाए, जिन्हें 37 लाख 31 हजार अपीलों को सुनना था। इनमें से 22 लाख 21 हजार अपीलें नाम काटे जाने के खिलाफ मतदाताओं ने की थीं, जबकि 16 लाख 10 हजार अपीलें नाम काटे जाने के लिए चुनाव आयोग की ओर से दाखिल की गई थीं। आयोग की ओर से ये अपीलें किसने दायर कीं, यह अभी कोर्ट को नहीं बताया गया है।
लोकतंत्र का तकाज़ा है और चुनाव आयोग का दायित्व है कि एक भी सही मतदाता वोट डालने से वंचित न होने पाए। अकेले बंगाल में SIR के कारण करीब 37 लाख मतदाता वोट डालने से वंचित रहे और न्यायाधिकरण उनके मामले आज तक सुन नहीं पाया है।
यह बात पहले कई बार सामने आ चुकी है कि बिहार से लेकर बंगाल तक और सभी राज्यों में मतदाता सूची से जिनके नाम काटे गए उनमें मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक है।
बड़ा सवाल यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त किसके इशारे पर यह सब कर रहे थे? सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेक ध्यानाकर्षणों के बाद भी SIR पर चुनाव आयोग को पूरी छूट क्यों दी?
Indian Express की रितिका चोपड़ा को इस खोजी रिपोर्ट के लिए साधुवाद्। पूरी रिपोर्ट नीचे दिए दिए लिंक्स पर जाकर पढ़ी जा सकती है-
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-sir-14-objections-gyanesh-kumar-sukhbir-singh-sandhu-vivek-joshi-10889737/
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-illegal-changes-form-6-gyanesh-kumar-10889714/
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-special-intensive-revision-sir-electoral-roll-centralisation-eci-ecinet-10889738/
https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-gyanesh-kumar-sukhbir-sandhu-vivek-joshi-electoral-roll-control-systems-10889773/
- न. जो, 23 सितम्बर 2026

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