प्रत्येक शहर का एक चेहरा होता है, जिसमें उसके भूगोल, इतिहास और संस्कृति की गवाहियां चिपकी रहती हैं। वर्तमान उस पर कितना हावी हुआ है और इतिहास की आत्मा कितनी सांस ले रही है, यह देखने वाले की निगाह पर निर्भर करता है।
अपने शहर को देखने वाले की निगाह का कमाल अनुभव करना हो तो अजय कुमार की 'राग जौनपुरी' के पन्नों पर ध्यान से नज़रें दौड़ानी चाहिए। जौनपुर के बारे में हाल में एक और किताब देखने में आई थी- अमित श्रीवास्तव की 'सिराज-ए-दिल जौनपुर'। उसे पढ़ने का मौका तो नहीं मिला लेकिन 'गहन है यह अंधकारा' जैसी किताब लिखने वाले अमित श्रीवास्तव की कलम से भी जौनपुर कम न धड़का होगा।
जौनपुर को अपनी रगों में जीने वाले अजय कुमार कवि, गद्यकार, चित्रकार, संस्कृतिकर्मी और जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में रहे। 'राग जौनपुरी' पुस्तक उनकी वर्षों की मेहनत का नतीजा जरूर है मगर यह शहर उनकी सांसों में धड़कता-महकता रहता था।
'नवारुण' से प्रकाशित अपने पुस्तक का स्पर्श करने के लिए वे जीवित नहीं रहे, जिसका विमोचन कुछ मास पूर्व जौनपुर के उसी हिंदी भवन में हुआ था, जिसकी शुरूआत उनके पिता, स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर प्रसाद जी ने की थी और जिसे अजय जी ने शहर के प्रमुख साहित्य-संस्कृति केंद्र के रूप में विकसित किया।
यदा-कदा जिस जौनपुर को कुछ लोग उसकी इमरती के लिए याद करते हैं, उस पर अजय कुमार विद्यापति (1360-1440) की 'कीर्तिलता' से बात शुरू करते हैं। कहते हैं कि 'कीर्तिलता' का जौनपुर बाजार वर्णन जरूर पढ़ना चाहिए, जिसके अनुसार जौनपुर भारत का प्रमुख राजनैतिक और आर्थिक केंद्र मालूम पड़ता है। सारी दुनिया की चीजें वहां बिकने को आती थीं।
विद्यापति तो फिर विद्यापति ही हैं- "बाजार में मारे भीड़ के लोग पिस-पिस जाते हैं, जहां निगाह डालिए सिर ही सिर दिखाई देते हैं, एक का तिलक पुछ दूसरे में लग जाता है, पराई स्त्रियों के कंगन टकराकर टूट जाते हैं, ब्राह्मण का यज्ञोपवीत चांडाल के अंग में झूल जाता है, वेश्याओं के पयोधर से टकराकर यतियों का हृदय चूर-चूर हो जाता है"।
'जौनपुर' नाम की उत्पत्ति की अनेक चर्चाओं पर बहुत ध्यान न देकर वे नाम बदलने की मुहिम पर लानत भेजते हुए यह सजोर कहते हैं कि जौनपुर पर कोई साजिशी रंग चढ़ना आसान नहीं। जहां सिकंदर लोधी के भयानक हमले के बाद भी शर्की शासनकाल में शानदार वास्तुकला के साथ बनी इमारतें , शाही किला, अटाला मस्जिद, वगैरह बची रह गईं, उस जौनपुर पर कोई रंग चढ़ाए कैसे चढ़े!
अजय कुमार जौनपुर की विविध विशेषताओं, उसके सूफियों, हिंदी सेवियों, 'चितरकारों', वास्तुकारों, संग्रामियों, योद्धा किसानों, ऐसे-वैसे जौनपुरियों इत्यादि की चर्चा करते हुए भी 'हिंदू तुरुक के मिलल बास' का गौरवपूर्ण उद्घोष को दोहराने वालों से तीखा सवाल करते हैं कि 'क्या बद्दोपुर जौनपुर का हिस्सा नहीं है, वहां जो हुआ वह दंगा नहीं था?' शहरों के शानदार गंगा-जमुनी इतिहास को हमारा ही वर्तमान तो कलंकित कर रहा है।
जौनपुर पर किताब हो और वामिक जौनपुरी की चर्चा न आए, ऐसा कैसे हो सकता है। वामिक साहब की तरक्कीपसंद शायरी को हिंदी-उर्दू में परिचित करवाने में अजय जी का बड़ा योगदान रहा है। किताब में एक पूरा अध्याय वामिक साहब पर है। इनके साथ हफीज़ जौनपुरी और शफीक जौनपुरी भी हैं ही। इन सबसे जौनपुर की वह पहचान कायम है, जिसे मिटाने की तमाम साजिशों का हम गवाह होना हमारा दुर्भाग्य है।
जौनपुर का साहित्य, रंगमंच, संगीत और इत्र भी किताब में खूब महकता है। और कुछ रहे बचे या कहे को प्रमाणित करते हुए परिशिष्ट भी हैं ही। और हां, यही वह जौनपुर है जहां जाकर हमारी गोमती गंगा मिलती है, जिनसे नदी का दर्ज़ा भी अब हम छीनते जा रहे हैं।
'राग जौनपुरी' सचमुच ही जौनपुर की आत्मा का संगीत है।
- नवीन जोशी, 04 अगस्त 2026, लखनऊ।
(राग जौनपुरी- अजय कुमार, नवारुण प्रकाशन, सम्पर्क- 9811577426, मूल्य- 300/- )
