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Tuesday, August 04, 2026

पहाड़ों की वादियों के पत्थरों पर उकेरा गया एक उदास गीत।

नवीन जोशी  जी का अद्यतन उपन्यास 'भूतगांव ' पहाड़  के पूरे एकांत, वहां के लोगों के अथक परिश्रम, पलायन की त्रासदी, प्रकृति  का आनंद मिश्रित भय, पहाड़ी  सहज सरलता, भाषा की अद्भुत  मिठास, जाति-धर्म  के पक्के बाड़े और संबंधों  के छीजते जाने  की कहानी है, जिसे नवीन  जी ने पूरी संवेदनशीलता  से लिखा है। 

पहाडो़ं के परिदृश्य  में  एक अचीन्ही  खामोशी , सौंदर्य और सूफ़ी रहस्य  का बोध होता है । ऐसा ही कुछ 'भूतगांव 'को पढ़ते हुए महसूस होता  है। और, सबसे  चमकृत करने वाली बात तो  यह है  कि आप की आंखें  तो पृष्ठों पर फिसलती हैं लेकिन  मन जैसे  किसी बहुत संवेदनशील  फिल्म  देखने  लगता  है । 
 
यह उपन्यास अर्नेस्ट  हेमिंग्वे  के 'द ओल्ड मैन  ऐंड  सी' के सैंटियागो  की याद दिलाता है। 
 
रिटायर्ड  फौजी आनन्द सिंह  अपने एक मात्र  साथी 'शेरू', जो चौपाया श्वान है,  व  चारों तरफ फैली निशब्दता है, से बातें करता है । फौजी के साथी यही दोनों  हैं और दूर से  या क़रीब  से डराकर चली  आती बाघैन (बाघ की गंध)।
 
पूरे उपन्यास  में  आपको कहीं भी इल्म  और व्यर्थ  जानकारी  को प्रदर्शित  करने की उत्कंठा,  बेजान शब्दों  की भरमार, चौंकाने वाले परिदृश्य  अथवा सब कुछ  समेटने की भ्रामक हड़बड़ी  नहीं  मिलेगी,  जैसा कि नवीन जी का व्यक्तित्व है....शांत, बेहद सरल, सहज और विचारशील ।

कथा उत्तराखंड के एक दूरस्थ गांव सतौर से शुरू होकर उसी गांव में समाप्त होती  है । भरे-पूरे  गांव  की लगभग सभी जाति की उपस्थिति,  बस्ती के मेलजोल ,भाईचारा, स्नेह, जलन-कुढन, ऊंच-नीच और रईस -गरीब के दायरे, और कहानियों  के अनंत सिलसिलों  से  शनै:शनै:  वह गांव  एक भुतहा गांव बन जाता है, जिसमें  एक अकेला  बूढ़ा  हो  चला रिटायर्ड  फौजी  आनंद  सिंह अपने घर में  पले और बचे रहे  शेरू कुत्ते से अपने घर,गांव , प्रकृति, जंगल, बाघ और बाघ के डर तथा  सुख-दुख, नियति,और छीजते  चले गये  संबंधों की कथा-भीतर-कथा कहता  रहता है  और अपनी  बेजान बची रही गृहस्थी  को जलते -बुझते  अंगारों  की गर्माहट से बचाये  रखता  है ।

आनंद सिंह को  पता है कि जब बोलती-बतियाती बस्ती  थी तब जंगल  और जंगली जानवर भी दूर भागते  थे और अब जंगल घर के दरवाजे पर  खड़ा है और  बाघ घात लगाने की फिराक में  है ।

इस उपन्यास  की आत्मा  है  कथाओं का संसार। यह कहीं  सिंहासन बत्तीसी, अरेबियन नाइट्स, या विक्रम  वेताल के लय की याद दिलाता है  कि जिनमें असमाप्त कहानी  से  दूसरी कहानी  खाद-पानी  लेकर पनपती है। किंतु यह कहानियां अवसादित  करती हैं।

नवीन  जी  स्वयं  पहाड़ से हैं इसलिए  वे  जानते हैं  पहाडो़ं पर होते विकास  का लेखा-जोखा, वहां  के लोगों  की कमर तोड़ मेहनत, परेशानियां, अभाव, ऊंची जातियों  का डर और जीवन  बचाये रखने की जद्दोजहद ।

उपन्यास   का मुख्य  पात्र  वीरेन्द्र के साथ  भागी हीरा  के विषय में  पहाड़ का  ही खीम सिंह  कहता है, "कोई नहीं  आएगा  मीमसाब, वहां  रपट लिखाने वाला कौन है! थोड़ी  देर  रो-धोकर  खुश हो  जाएंगे  कि सिर से बोझ उतर गया।" क्योंकि  वह एक दलित  लड़की  है। लेकिन वीरेन्द्र सिंह  जो राजपूत है  और जिसने अपने हलवाहे की बेटी को भगाया है,  उसका  परिवार  बिरादरी  से बाहर  कर दिया जाता है और जिनकी नियति गांव के छीजने की कथा  में  मिलमिला  जाती है ।

इस उपन्यास  की उपलब्धि  है  पहाडों के गूढ़ सौंदर्य  जैसी वहां  की बोली-बानी । वाक्य के अंत में  आता जादू 'बल', दाज्यू, उड्यार, ज्वे(पत्नी) , क्वे(कोई) ,आमा(दादी), फाल(कूद), लैम्फु(लैंप) या बाघैन जैसे कई -कई शब्दों  का विन्यास जो  उपन्यास  की कथा वस्तु  के साथ बांधे रखता है । इस उपन्यास  की एक और खूबी है,  वे हैं पहाड़ी मुहावरे । 
नवीन जी  ने  उनका सटीक उपयोग  किया  है और इसलिए  भाषा  में  लुनाई आ गई है । 

'भूतगांव ' पहाड़  की उदास कथा कहते हुए आजकल के  रिश्तों, स्वार्थ, बेरुखी,असंवेदनशीलता  और अलगाव  पर भी पात्रों  द्वारा  बहुत  कुछ  कहता  हुआ  नज़र  आता  है ।  इन पहाड़ी  गावों पर विकास  के नाम  पर जो कहर बरसा है  उसका दर्द  तो  टूटकर खंडहर होते घरों, भाग कर चले गये  युवाओं, पलायन करते  जाते मित्रों  व  पारिवारिक  रिश्ते दारों और घास-चारे के अभाव में  मरते  पशु धन का लेखा जोखा तो बचे रह गये  कुछ जोड़ी  आंखों में  ही बसा रह गया है,  जिसे धीरे धीरे  और धूतणसर होते जाना है।

'भूतगांव ' बनने  की कथा जितनी मार्मिक  है उतनी  ही  विचारशील  है। क्यों  ऐसा है कि मैदानों  ने उनके दुख दर्द, नैराश्य, जद्दोजहद, कुंठित  मनों , बेरोजगारी  और शिक्षा  के लिए  वादों का   मल्लमा  तथा  बहेतरी के लिए  इतना  कम सोचा और प्रयास  किये ? क्या  हम सब  इसके लिए  जि़म्मेदार  नहीं हैं?

नवीन जोशी  जी  का यह उपन्यास  आपके मन में एक खलिश दे जाता  है  जिसे आप भुला नहीं  सकते ।

'भूतगांव 'के लिए  नवीन जी  को बहुत  बधाई  और  शुभकामनाएं ।

- शीला  रोहेकर , 5 नवंबर  2025
(नवम्बर 2025 में शीला जी ने यह टिप्पणी लिखी थी जो मुझे आज ही मिल पाई है।)