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Sunday, July 14, 2024

कुमाऊंनी की पहली पत्रिका 'अचल' और जीवन चंद्र जोशी

 

1977 में क्लिक-3 से खींचा गया फोटो, नजो

लखनऊ में बर्लिंगटन चौराहे से केसरबाग को जाने वाली सड़क पर ओडियन सिनेमाघर से कुछ आगे, बाएं हाथ की तरफ कालीबाड़ी नाम का पुराना मुहल्ला है। वहां काली का पुराना मंदिर होने से यह नाम पड़ा। केसरबाग की ओर जाते हुए मंदिर वाले मोड़ से पहले जो गली बाएं मुड़ती है, उसी के कोने पर दाहिनी तरफ सफेद रंग से पुता हुआ एक पुराना मकान आज भी है। सड़क से लगा छोटा-सा दरवाजा। उसी दरवाजे पर ‘हीरा तिवारी’ नाम की तख्ती लगी रहती थी, जिसके नीचे लगी ‘कॉल बेल’ का स्विच मैं बड़े संकोच से दबाता था। दरवाजा खुलता तो धीरे-से पूछता- ‘जोशी जी से मुलाकात हो पाएगी?’

1977-1979 के उस दौर में मुलाकात लगभग हो ही जाती थी क्योंकि उन दिनों वे कहीं आ-जा नहीं पाते थे। कभी ज्यादा अस्वस्थ हुए तो मैं ही लौट आता। जोशी जी माने जीवन चंद्र जोशी, ‘अचल’ वाले। ‘अचल’ यानी कुमाउंनी बोली की पहली पत्रिका, जो 1938-40 में अल्मोड़ा से प्रकाशित हुई थी। जीवन चंद्र जोशी उसके मुख्य योजनाकार और प्रधान सम्पादक थे। वैसे, ‘अचल’ उनके योगदान का एक ‘शृंग’ भर है। इसके अलावा भी वे कुमाउंनी बोली के लिए बहुत दौड़े-लड़े-जूझे। अशक्त और अस्वस्थ हो जाने बाद अपना बुढ़ापा लखनऊ में काट रहे थे। काली बाड़ी मुहल्ले में उनके बाबू का बनवाया हुआ मकान था, जिसके एक हिस्से में वे सपत्नीक अपनी बेटी हीरा तिवारी और उनके बच्चों के साथ रहते थे। मकान के दूसरे हिस्से में उनके बेटे गुरुप्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे। मैं उन्हें जीवन बड़बाज्यू कहता था। कभी-कभार बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ जी के साथ या अकेले भी मिलने चला जाता था। उनसे बहुत कुछ पुराना और कीमती सुनने को मिलता। प्रेरणा मिलती।

 मई 1980 के बाद मैंने वह कॉल बेल नहीं बजाई। जरूरत ही नहीं रही।  

जब भी कुमाउंनी बोली की कोई पत्रिका घर पहुंचती है, जब भी कोई कुमाउंनी में लिखने का आग्रह करता है, या कुमाउंनी बोली पर गोष्ठी या सम्मेलन का न्योता मिलता है, जीवन बड़बाजू याद आ जाते हैं। मरते समय तक उनका एक ही दुख था कि कुमाउंनी बोली को कुमाऊं के लोग ही ल्याख नहीं लगाते। अपनी बोली के लिए उनमें हीन भावना है, ऐसा कहते थे। जीवित होते तो शायद खुश होते। स्तर उनकी अपेक्षा के अनुरूप हो, न हो, मगर कुमाउंनी में अब खूब लिखा-छापा जा रहा है।

 
जीवन बड़बाज्यू से मुलाकात 1977 में बंसीधर पाठक
‘जिज्ञासु’ जी ने कराई थी। उन दिनों हम ‘आँखर’ संस्था बना कर कुमाउंनी-गढ़वाली बोली में नाटक मंचन करते और कुमाउंनी बोली में ‘आँखर’ पत्रिका नियमित निकालने की तैयारी में थे। जिज्ञासु जी हमारी प्रेरणा थे और उनकी प्रेरणा थे जीवन चंद्र जोशी। तब वे 77 साल के हो चुके थे। कई बीमारियों से ग्रस्त थे। उनके हाथ कांपते थे, जिह्वा लड़खड़ाती थी लेकिन बोलते तो वाणी की प्रखरता साफ मालूम होती। उनकी भीतरी ऊर्जा कायम थी।

बोलने लगते तो यादों का पिटारा खुल पड़ता। स्मृति बढ़िया थी। बोलते-बोलते एक साथ कई प्रसंग खुल पड़ते। मूल बात कहीं पीछे छूट जाती। उसकी अंतर्कथाएं खुलने लगतीं। भावावेश, नराई और स्मृति के आवेग से आधा वाक्य उनके मुंह ही में रह जाता। नोट्स लेना मुश्किल हो जाता। लगता कि टेप रिकॉर्डर होना चाहिए, जो कि तब अपने पास था नहीं। बाद में लगता रहा कि उस युग के महत्त्वपूर्ण लोगों की कितनी बातें, कितने संस्मरण और कितने दस्तावेज उनके साथ ही गुम हो गए।

अपने पिता के बारे में वे बहुत उल्लास और गर्व के साथ बताते थे। पं लीलाधर जोशी कुमाऊं के सांस्कृतिक-साहित्यिक इतिहास का महत्वपूर्ण किंतु अल्पज्ञात नाम है। जो जानकारियां जोशी जी ने उनके बारे में हमें दी थीं उनके अनुसार लीलाधर जी विलक्षण प्रतिभाशाली और खूब पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में स्नातक किया और स्वर्ण पदक जीता था। अंग्रेजी और संस्कृत में विशेष योग्यता प्राप्त की थी। वे अंग्रेजी और कुमाउंनी में मौलिक लेखन के अलावा अनुवाद भी खूब किया करते थे। उन्होंने ‘मेघदूत’ और ‘गीता’ का कुमाउंनी में छंदबद्ध अनुवाद किया था। ‘गीता’ का अनुवाद हू-ब-हू अनुष्टुप छंद में और ‘मेघदूत’ का अनुवाद मूल शार्दूलविक्रीडित छंद में किया गया है। संस्कृत के प्रख्यात कवि बाण की पुस्तक ‘हर्षचरित’ के कुछ अध्याय भी उन्होंने कुमाउंनी में श्लोकबद्ध किये थे। ‘डायरी ऑफ लीलाधर जोशी’ शीर्षक से अंग्रेजी में अपनी आत्मकथा भी लिखी थी, जिसकी पाण्डुलिपि अब नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी और म्यूजियम में सुरक्षित है। मौलिक लेखन भी बहुत सारा किया था। लीलाधर जी की कुछ रचनाएं प्रकाशित हुईं और बाकी अप्रकाशित रह गई थीं। ‘मेघदूत’ का उनका किया हुआ अनुवाद 1894 में ‘अल्मोड़ा प्रिंटिंग वर्क्स’ वे प्रकाशित हुआ था (देखें kumauniarchives.com)। लीलाधर जी धाराप्रवाह संस्कृत बोलते थे और अधिकतर पत्र-व्यवहार भी संस्कृत या कुमाउंनी में करते थे। कुमाउंनी बोली के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। उनका आग्रह होता था कि मैदानों में आ बसे कुमाउंनी जन अपनी बोली छोड़ें नहीं। अंग्रेजी से कुमाउंनी सीखने के लिए उन्होंने अपने मित्र जयदत्त जोशी से ‘शिशु बोध’ नाम की एक किताब भी लिखवाई थी, जिसका पूरा नाम था- Shishubodh or An Anglo-Kumauni Reader for Beginners। (देखें- ‘दास्ताने हिमालय भाग-एक’- शेखर पाठक, पृष्ठ 270)। 158 पृष्ठों की यह पुस्तक अंग्रेजी से कुमाउंनी और कुमाउंनी से अंग्रेजी सीखने के लिए थी।

मैंने जीवन बड़बाज्यू से इन दस्तावेजों के बारे में कई बार पूछा था। कहते थे कि उनका सारा संग्रह अल्मोड़ा में रह गया। ‘अचल’ का भी कोई अंक उनके पास लखनऊ में नहीं था। वे लाचारी और बीमारी में अल्मोड़ा छोड़ कर लखनऊ आए थे, जैसे दशकों पहले बीमारी के कारण ही लखनऊ छोड़ कर अल्मोड़ा लौट गए थे। हम बार-बार आग्रह करते थे कि कुछ दस्तावेज मंगवाइए। वे लाचारी में दोनों हाथ उठा देते। खुद जाने लायक नहीं थे और अन्य किसी की रुचि इस ओर न थी। पहाड़ में छूट गए अपने संग्रह का जिक्र आने पर उनकी आंखें सजल हो उठती थीं।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि कभी हल्द्वानी जाएं तो वहां भोटिया पड़ाव में मेरे जीजा जगन्नाथ पाण्डे जी के यहां ‘अचल’ की कुछ सामग्री रखी हुई आपको मिल जाएगी। मैंने यह पता एक पर्ची में लिखकर डायरी के बीच रख लिया था, जो फिर मिला नहीं और मैं भी भूल गया। दशकों बाद मकान बदलते समय पुरानी डायरी के बीच वह पर्ची 2022 में मिली तो भोटिया पड़ाव के उस घर में जाने पर पाण्डे जी के परिवारीजनों से तो मुलाकात हुई लेकिन तब तक ‘अचल’ सबंधी कोई सामग्री वहां नहीं रह गई थी। जोशी जी के भांजे ईश्वरी दत्त पाण्डे (अवकाश प्राप्त आईएफएस अधिकारी) ने बताया कि मामाजी (जीवन चंद्र जोशी) के बहुत से कागज-किताबें घर में एक बोरे में सम्भालकर रखे थे लेकिन धीरे-धीरे सीलन और दीमकों ने सब नष्ट कर दिया। थोड़ी सामग्री कोई शोधार्थी भी ले गए होंगे। अब यहां कुछ भी उपलब्ध नहीं है। पाण्डे जी से सम्पर्क होने का लाभ यह अवश्य हुआ कि जीवन चंद्र जी की पुत्री श्रीमती हीरा तिवारी से वर्षों बाद पुन: सम्पर्क हो सका, जो काली बाड़ी, लखनऊ वाला मकान छोड़कर वृद्धावस्था में अपने बेटे के पास रहने गुड़गांव चली गई हैं। हीरा जी से पता चला कि उनके भाई गुरु प्रसाद भी मकान में ताला लगाकर अपने बच्चों के पास चले गए थे और अब उनकी मृत्यु हो चुकी है। कालीबाड़ी वाले मकान में आज भी ताला लगा हुआ है।

...

लीलाधर जोशी जी मुंसिफ थे। कई शहरों-कस्बों में उनका तबादला होता रहता था।  सन 1901 में वे सफीपुर (जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश)) में तैनात थे। वहीं 23 अगस्त को उनकी पत्नी कौशल्या देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जीवन चन्द्र नाम का यह बालक बचपन में बहुत चंचल और शरारती था। अध्ययवसायी पिता के इस बालक को पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी न थी। वह दिन भर पतंग उड़ाने और ताश खेलने में मस्त रहता। 1903 में तबादले के बाद से लीलाधर जी का परिवार लखनऊ रहने लगा था। पतंगबाजी के दीवाने बालक जीवन को मुहल्ले के लड़के ‘पतंगबाज भैया’ के नाम से जानते थे।

दमा रोग के कारण हांफते-हांफते जीवन बड़बाज्यू के बूढ़े मुख पर एक स्मित खिल जाती थी- “मैं पढ़ने के लिए बैठता ही न था। तब पिता जी ने मुझे अक्षर ज्ञान कराने के लिए अभिनव तरीका निकाला। वे ताश की नयी गड्डी ले आए और उसके पत्तों पर स्वर, ब्यंजन तथा गिनतियां लिख दीं। मुझसे कहते, आओ, ताश खेलें। मैं खुशी-खुशी खेलने बैठ जाता। वे खेलते-खेलते सिखाते रहते- इक्का माने अ, बादशाह माने आ ...।  इस तरह मैंने पढ़ना-लिखना सीखा। धीरे-धीरे पढ़ाई में रुचि विकसित होने लगी। फिर तो बाबू की किताबें निकालकर पढ़ने लग गया था।”

सन 1912 में जब लीलाधर जी की बदली बहराइच हुई तब तक भी बालक जीवन की स्कूली पढ़ाई शुरू नहीं हुई थी, हालांकि वह ग्यारह वर्ष का हो चुका था। घर पर वह तरह-तरह की किताबें अवश्य पढ़ने लगा था। बहराइच में लीलाधर जी के एक दोस्त बने आशुतोष हाजरा। वे एक स्कूल के हेडमास्टर थे। एक दिन हाजरा जी जोशी जी के घर आए थे तो उनके बेटे को देख कर पूछ लिया- “किस दर्जे में पढ़ते हो?” लीलाधर जी ने दोस्त से कहा- “इसने अभी तक स्कूल का मुंह ही नहीं देखा।” हाजरा जी ने दूसरे ही दिन पिता-पुत्र को स्कूल बुलाया।

जीवन बड़बाज्यू हंसते हुए बताते थे कि “स्कूल पहुंचे तो हेडमास्टर ने मुझसे पूछा, क्या-क्या पढ़ सकते हो? मैंने कह दिया था- सब पढ़ सकता हूँ। हेडमास्टर ने मुस्कराते हुए अंग्रेजी की एक पुस्तक मेरे सामने खोल दी। कहा- पढ़ो। जो पन्ना खुला था वह मैंने फटाफट पढ़ दिया। हेडमास्टर ने खुश होकर मेरी पीठ ठोकी। पता चला कि वह कक्षा सात की पाठ्य पुस्तक थी। उसी दिन मुझे कक्षा सात में भर्ती कर दिया गया।”

उसी साल यानी 1912 में लीलाधर जी का निधन हो गया। इस आघात के बाद परिवार को अल्मोड़ा आना पड़ा। वहीं उनकी आगे की स्कूली पढ़ाई शुरू हुई। 1916-17 में हाईस्कूल पास किया। उन दिनों के अल्मोड़ा की सांस्कृतिक-साहित्यिक चेतना एवं सक्रियता अद्भुत थी। जीवन चंद्र के साथ (एक-दो साल आगे-पीछे) पढ़ने वाले विद्यार्थियों में सुमित्रानन्दन पंत, गोविंदबल्लभ पंत (नाटककार), किशन चंद्र जोशी ‘वकील’, इलाचंद्र जोशी आदि थे जो बाल्यकाल से ही साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय थे। हाईस्कूल में पढ़ते हुए इन लड़कों ने अल्मोड़ा में ‘मर्चेण्ट ऑफ वेनिस’ और ‘वीर अभिमन्यु’ जैसे नाटक खेले थे। शेक्सपियर के मशहूर नाटक में क्रूर शायलॉक की भूमिका जीवन चंद्र जोशी ने निभायी थी। दूसरे नाटक में सुमित्रानन्दन पंत अभिमन्यु बने थे। जीवन चंद्र जोशी ने कर्ण का पात्र निभाया था। हंसते हुए जीवन बड़बाज्यू बताते थे कि हमने एक और नाटक खेला था- ‘दुर्गादास’। राजेंद्र राय का लिखा यह बांग्ला नाटक राजनैतिक था जिसका रूप नारायण पाण्डे ने हिंदी में अनुवाद किया था। इसे खेलने के लिए हमें बड़ी डांट पड़ी थी। सम्भ्रांत और कुलीन अल्मोड़ा को लड़कों का यह राजनैतिक दखल कतई पसंद नहीं आया था। खैर।

साहित्यिक मोर्चे पर ये लड़के खूब सक्रिय रहते थे। उनमें आपस में ही होड़ लगी रहती थी। अलग-अलग ग्रुप बन गए थे और एक-दूसरे से अच्छा करने की प्रतियोगिता जैसी रहती थी। कुछ लड़कों ने ‘शुद्ध साहित्य समिति’ बनाई और एक पुस्तकालय खोला। कुमाउंनी कवि श्यामाचरण दत्त पंत इस ग्रुप के लीडर बने। इस ग्रुप ने ‘सुधाकर’ नाम से मासिक पत्र निकाला जो हाथ से लिख कर बांटा जाता था। दूसरे ग्रुप के लीडर जीवन चंद्र जोशी थे। उन्होंने ‘वसंत’ और ‘उशीर’ नाम से हस्तलिखित पत्रिकाएं निकालीं। नाटककार गोविंद बल्लभ पंत चित्रकार भी थी और इन पत्रिकाओं के लिए चित्रकारी किया करते थे।

हाईस्कूल स्तर के लड़कों की यह साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता आज चकित कर सकती है लेकिन उस दौर में परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने की तनावपूर्ण प्रतियोगिता नहीं होती थी। दूसरे, अल्मोड़ा शहर की चेतना और सक्रियता स्वाभाविक रूप से किशोरों-युवाओं को उद्वेलित-प्रेरित करती थी। बीसवीं सदी के शुरुआती पांच-छह दशकों का अल्मोड़ा का इतिहास इसका साक्षी है।

हाईस्कूल पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जीवन चंद्र जोशी लखनऊ आ गए। लखनऊ से उनका पुराना सम्पर्क रहा था। कालीबाड़ी में बाबू का बनवाया हुआ मकान था ही। लखनऊ विश्वविद्यालय से, जो 1920 तक केनिंग कॉलेज कहलाता था, सन 1923 में उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास में एम ए की डिग्री हासिल की। इस पूरे दौर में साहित्यिक कर्म भी जारी था। लिखते और यत्र-तत्र छपते भी थे लेकिन पढ़ना और साहित्यकारों से सम्पर्क कराना उससे ज्यादा होता था। बाल-सखा सुमित्रानंदन पंत, इलाचंद्र जोशी और गोविंदबल्लभ पंत भी क्रमश: कविता, कहानी और नाटक के क्षेत्र में उभरता नाम बन चुके थे। हालांकि सब-अलग-अलग चले गए थे लेकिन सम्पर्क बना हुआ था। यह दायरा लगातार बढ़ता रहा।

इतिहास में परास्नातक कर चुकने के बाद जीवन चंद्र जोशी का इरादा पुष्यमित्र शुंग के शासन काल और भारत में बौद्धों के पराभव पर शोध कार्य करने का था। मौर्य साम्राज्य का पतन होने पर शुंग वंश की नींव डालने वाले सम्राट पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का दमन करने के लिए भी जाना जाता है। जीवन चंद्र जी ने अपने शोध के लिए काफी समय तक तैयारी भी कर ली थी। इसी बीच उन्होंने उर्दू, संस्कृत और बांग्ला भाषाएं भी सीखीं। पढ़ाई के साथ-साथ वे साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में भी खूब सक्रिय रहा करते थे। 1921-22 में उन्होंने लखनऊ शहर में प्रवासी कुमाउंनियों की एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था गठित करने का प्रयास भी किया था, जो एक कवि सम्मेलन के आयोजन से आगे न बढ़ सका। लखनऊ में उनका वह समय बहुविध सक्रियता का था। वे ग़ठे हुए शरीर के बलिष्ठ युवक थे और फुटबाल उनका प्रिय खेल था। एक बार हंसते हुए उन्होंने मुझे बताया था कि अपनी सेंट्रल बैक पोजीशन से मेरी किक सीधे दूसरे गोल पोस्ट तक पहुंच जाती थी। यदा-कदा गाना भी गाया करते थे और ढोलक बजाने का शौक था। दुर्भाग्य से उसी दौरान उनके जीवन में कुछ हादसे हो गए। एक के बाद एक उनकी दो दीदियों का निधन हुआ। फिर एक भांजे की मौत हुई। खुद उन्हें लखनऊ की लू के थपेड़ों ने इतना बेहाल किया कि उनका स्नायु तंत्र प्रभावित हो गया, जिसने बाद में भी उन्हें काफी परेशान किया। इन दुखद घटनाओं से परेशान होकर वे पहाड़ लौट गए थे।

उनके मामा, नैनीताल के एडवोकेट मथुरादत्त पाण्डे नैनीताल बैंक के प्रमुख कर्ता-धर्ताओं में एक थे। अपने इन मामा के बारे में जोशी जी कहा करते थे कि उन्होंने नैनीताल में अंग्रेजों के मुकाबिल भारतीयों को बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। बहरहाल, नौकरी नहीं करने का इरादा कर चुके जोशी जी नैनीताल बैंक का काम-काज देखने में अपने मामा की मदद करने लगे। उस दौरान बैंक की कुछ शाखाएं खोली गयीं। पहाड़ में और भी बहुत कुछ करने की योजना थी लेकिन मथुरादत्त जी की मृत्यु  से सब ठप हो गया।   

...

सन 1937 में ‘विशाल भारत’ में छपे एक लेख ने जीवन चंद्र जोशी जी का जीवन-लक्ष्य निर्धारित कर दिया। कलकता से प्रकाशित होने वाले उस समय के इस प्रमुख पत्र में देवेंद्रकुमार जोशी का कुमाउंनी साहित्यकारों के बारे में एक लेख छपा था। इस लेख में जीवनचंद्र जोशी का भी जिक्र था। इस लेख पर एडवोकेट बदरी शाह, श्रीधर प्रसाद और तारादत्त पाण्डे जैसे मित्रों से चर्चा में यह बात निकली कि हिंदी के लिए कुछ किया तो ठीक, लेकिन बात तो तब है जब अपनी बोली, कुमाउंनी के लिए नया काम किया जाए। बात-बात में कुमाउंनी में एक पत्रिका निकालना तय हुआ। कुछ दिन बाद दिल्लगी-दिल्लगी ही में ‘शक्ति’ और ‘कुमाऊं कुमुद’ अखबारों में इस आशय का विज्ञापन छपवा दिया कि शीघ्र ही कुमाउंनी की एक पत्रिका प्रकाशित की जाएगी।

अखबारों में विज्ञापन छप गया तब फिक्र होनी शुरू हुई कि क्या होगा, कैसे होगा। फिर सोचा, जो होगा देखा जाएगा। अब करना तो है ही। और, जुट गए काम में। पत्रिका का नाम रखा गया ‘अचल’। तय हुआ कि मासिक प्रकाशन होगा। प्रधान सम्पादक तो खुद जोशी ही ठहरे, तारादत्त पाण्डे को सहकारी सम्पादक बनाया। पाण्डे जी (मई 1903 - 1965) स्वयं भी बड़े प्रतिभावान थे। उन्होंने कुमाउंनी कहावतों-मुहावरों का अंग्रेजी रूपांतर करके एक कोश तैयार किया और उमर खय्याम की रुबाइयों का (फिट्जेराल्ड के अंग्रेजी अनुवाद से) कुमाउंनी में अनुवाद किया था, जिसमें फारसी नामों की जगह भारतीय नाम रखे। खैर, धर्मानंद पंत प्रबंध सम्पादक बने।

1937 में कुमाउंनी भाषा में नियमित मासिक पत्रिका के सम्पादन-प्रकाशन का निर्णय करना निश्चय ही साहसिक था। बहुत सारे परिचितों को चिट्ठियां लिखी गईं कि कुमाउंनी में कविता, कहानी, लेख, वगैरह लिखो। बाल-सखाओं सुमित्रानंदन पंत, गोविंद बल्लभ पंत, इलाचंद्र जोशी, आदि को कई-कई पत्र लिखे गए कि कुमाउंनी में रचनाएं भेजो। गोविंद बल्लभ पंत को यह भी लिखा गया– “यार, अपनी नक्काशी भी दिखाओ। अब वक्त आ गया है।” यह बताते हुए जीवन चंद्र जी बुढ़ापे में भी जोश से भर जाते थे। पंत जी स्कूली दिनों से ही चित्रकारी भी किया करते थे। सो, उनसे ‘अचल’ का मुखपृष्ठ बनाने के लिए कहा गया। जोश इतना था कि पंत जी से निवेदन नहीं, आदेश किया गया। पंत जी ने जिद्दी मित्र का आदेश तुरंत मान भी लिया। प्रवेशांक के लिए उन्होंने जो आमुख तैयार किया उसमें पर्वत श्रंखलाएं, ध्रुव तारा (‘अचल’ नाम के प्रतीक), पेड़, नदी, आदि चित्रित किए। उन्होंने दो चित्र बनाए- एक, मुख्य आवरण के लिए। दूसरा आवरण के भीतर के पेज के लिए। भीतर वाले चित्र में पर्वत शृंखलाओं के बीच ध्यानमग्न शिव का रेखांकन उकेरा गया, जिनकी जटाओं से गंगा की धारा निकलती दिखती है।

जीवन चंद्र जोशी जी ने ‘अचल’ के वास्ते खूब तैयारी की। उन्होंने रवींद्रनाथ (ठाकुर) टैगोर और हिमालय के अद्भुत चित्रकार निकोलस रोरिक तक को अपनी योजना के बारे में लिखा और सुझाव मांगे। रोरिक के साथ उनके सम्पर्क पहले से थे। टैगोर से तो उनका बांग्ला में पत्र-व्यवहार होता था। दोनों ने ही अपने संदेश भेजकर में योजना का स्वागत करते हुए उनका मनोबल बढ़ाया।

कुमाउंनी में लिखने वाले बहुत कम थे। कुछ रचनाएं आईं, कुछ उन्होंने पीछे पड-पड़ कर लिखवाईं। फिर भी सामग्री का संकट हुआ तो जोशी जी और तारा दत्त पाण्डे ने भी अलग-अलग नामों से कई लेख, कहानियां, व्यंग्य, समीक्षाएं, आदि लिखे। इस तरह ‘अचल’ का प्रवेशांक फरवरी 1938 में प्रकाशित हुआ। वास्तव में, उसे ‘प्रवेशांक’ नहीं कहा गया था। ‘वर्ष’ और ‘अंक’ लिखने की परम्परा निभाने की बजाय सर्वथा नया प्रयोग किया गया। ‘अचल’ को पहाड़ मानकर वर्ष के लिए ‘श्रेणी’ और अंक के लिए ‘शृंग’ लिखा गया। यानी ‘वर्ष 1, अंक 1’ की बजाय ‘श्रेणी 1, शृंग 1’। यह भी अभिनव विचार था। पत्रिका का आकार 8 गुणा 7 इंच का था। हर पृष्ठ दो कॉलमों में विभाजित था।

यह ऐतिहासिक अवसर था। कुमाउंनी बोली की पहली पत्रिका जन्म ले चुकी थी। इसी ‘अचल’ को भविष्य में कुमाउंनी बोली के लिखित साहित्य में मील का पत्थर बनना था। इसे अनेकानेक लेखकों को अपनी बोली में लिखने के लिए प्रेरित करना था। आने वाली पीढ़ी में अपनी दुदबोली में पत्रिका प्रकाशन का उत्साह जगाना था।

‘श्रेणी एक, शृंग एक’ की चढ़ाई तो चढ़ ली गई थी, मगर आगे के शृंगों का सफर तय करते रहना निश्चय ही आसान नहीं था। कदम-कदम पर दिक्कतें थीं। संसधानों की कमी थी लेकिन वह ज्यादा बड़ी बाधा नहीं बनी। पहले दो ‘शृंग’ प्रकाशित होने के बाद अल्मोड़ा के इंदिरा प्रेस से, जहां से ‘अचल’ छप रहा था, झगड़ा हो गया। इसका भी रास्ता निकाल लिया गया। अगले अंक छापने की व्यवस्था नैनीताल के ‘किंग्स प्रेस’ से हो गई।

मुख्य समस्याएं दो थीं। पहला- नियमित रूप से स्तरीय सामग्री जुटाना। दूसरा- पत्रिका के लिए ऐसा पाठक वर्ग तैयार करना जो इस ‘अचल’ का महत्त्व समझे और उसे सम्मान दे। कुमाउंनी में अच्छी सामग्री के लिए जोशी जी ने हर सम्भव दरवाजा खटखटाया, हर उपलब्ध लेखक को टोका और सम्भावनाशील व्यक्तियों को लिखने के लिए प्रेरित किया। खुद भी अलग-अलग नामों से लिखा।

जीवन चंद्र जोशी जी के बाल सखा सुमित्रानंदन पंत तब तक हिंदी कविता-आकाश के चमचमाते सितारे बन चुके थे। उनकी ‘उच्छ्वास’, ‘वीणा’, ‘पल्लव’, जैसी कई काव्य-कृतियां चर्चित हो चुकी थीं। जीवन चंद्र जी ने मित्र पंत जी से ‘अचल’ के लिए अपनी बोली में भी लिखने का आग्रह ‘अचल’ निकालने की योजना बनाने के साथ ही कर दिया था। कई बार कहने पर भी जब पंत जी ने प्रवेशांक के लिए कुमाउंनी में कुछ लिखकर न भेजा तो जीवन चंद्र जी को गुस्सा आ गया था। उन्होंने 1978 में इस लेखक को हंसते हुए बताया था- “फिर मैंने पंत को फटकार लगाते हुए चिट्ठी लिखी कि कैसे पहाड़ी हो तुम? इतने बड़े कवि हो गए हो, पहाड़ी में कुछ लिख कर दो वर्ना कह दो कि मैं पहाड़ी नहीं हूँ।” इस डांट का असर पड़ा और पंत जी ने कुमाउंनी में ‘संस्कृतिक ल्वे-मांसु’ (संस्कृति की रक्त-मज्जा) शीर्षक एक गद्यांश लिखा, जो अचल के दूसरे अंक (श्रेणी 1, शृंग 2, मार्च 1938) में प्रकाशित हुआ। किंतु जोशी जी को कवि पंत जी से कुमाउंनी में कम से कम एक कविता अवश्य चाहिए थी। इसका उलाहना उन्होंने जारी रखा। तब पंत जी ने ‘अचल’ के लिए ‘बुरूँश’ शीर्षक कुमाउंनी कविता लिख भेजी, जो तीसरे शृंग (अप्रैल 1938) में प्रकाशित हुई थी, जिसकी शुरुआत इस तरह होती है - “सार जंगल में त्वे जस क्वे नहां रे, बुरांश/ फुलन छै के बुरांश/ सार जंगल जस जलि जां।” पंत जी की यह एकमात्र कुमाउंनी एकविता साबित हुई।


‘अचल’ के कुछ अंक सामने आए तो फिर कई रचनाकारों को जोश आ गया। स्थापित कुमाउंनी कवियों को तो मंच मिला ही, कई नए रचनाकार भी प्रेरित हुए। लेखक बिरादरी जुटती गई। श्यामाचरणदत्त पंत, जयंती पंत, रामदत्त पंत, भोलादत्त पंत ‘भोला’, बचीराम पंत, दुर्गादत्त पाण्डे, त्रिभुवन कुमार पाण्डे, आदि–आदि की बड़ी टीम बन गई। जहां तक ‘अचल’ को कुमाउंनी समाज में व्यापक स्वीकृति और सम्मान मिलने का सवाल है, जीवन चंद्र जोशी जी को इसमें बहुत कटु अनुभव हुए। कुमाउंनी रचनाकारों ने तो स्वाभाविक ही ‘अचल’ का स्वागत किया लेकिन तथाकथित कुमाउंनी भद्रलोक ने उसे हिकारत से देखा। बीमारी और वृद्धावस्था के बावजूद वह प्रसंग हमें बताते हुए उन्हें गुस्सा आ जाता था। कहते थे कि अंग्रेजों के पिछलग्गू बने हमारे बहुत सारे कुमाउंनी परिवार अपनी बोली को हीन भावना से देखते थे। जब उन्हें ‘अचल’ भेजा गया तो कुछ ने बिना पत्रिका खोले उस पर यह लिख कर वापस कर दिया कि “डू नॉट सेण्ड सच ट्रेश” (ऐसा कचरा न भेजें)। कुछ ने इसे ‘एण्टी नेशनल’ काम बता दिया।

जीवन बड़बाज्यू गुस्से में बोलने लगते तो आवाज कांपने लगती थी- “हम कहते, अरे, कैसे है एण्टी नेशनल काम? हम बता रहे हैं हमारे भीतर क्या है। तुम अपने भीतर का बाहर लाओ। हमारी उलटी खोपड़ी यह मानती थी कि कुमाउंनी में बहुत किया जा सकता है। कभी बांग्ला की स्थिति ऐसी ही थी। बोशी सेन जैसे लोग कहते थे- ‘यू हैव ब्रॉट आउट अ ग्रेट थिंग, बट यू आर वर्किंग फॉर अनग्रेटफुल पीपुल।’ सही कहते थे वे। हम पहाड़ियों में अपण्याट ही नहीं रहा”। उन्हें अंतिम समय तक यह तकलीफ रही कि पहाड़ियों में अपनी बोली के प्रति वह प्रेम, वह समर्पण नहीं है जो बंगाली या मराठी लोगों में है।

तब भी वे नियमित रूप से ‘अचल’ का प्रकाशन करते रहे। सभी ‘शृंग’ स्तरीय और व्यापक संदर्भों वाली सामग्री लिए हुए हों, इस प्रयास में वे निरंतर लगे रहते थे। सचमुच, ‘चल’ के सभी शृंग स्तरीय और विविश सामग्री से भरपूर हैं।

ठीक दो साल बाद दिसम्बर 1939-जनवरी,1940 का संयुक्तांक अंतिम साबित हुआ, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने से कागज व स्याही मिलने मुश्किल हो गए थे और कीमतें आसमान चढ़ गई थीं। समाज का सहयोग भी निराशाजनक था। फरवरी 1938 से जनवरी 1940 तक दो वर्षों में कुल 21 शृंग (अंक) प्रकाशित हुए। फरवरी-मार्च 1938, अक्टूबर-नवम्बर 1938 तथा दिसम्बर 1939-जनवरी 1940 के तीन शृंग संयुक्तांक के रूप में निकालने पड़े थे। औसतन एक शृंग में 35 से 40 पृष्ठ की सामग्री होती थी जिसमें कहानी, गल्प, कविता, निबंध, हास्य-व्यंग्य, बालोपयोगी साहित्य, भाषा विमर्श, लोक साहित्य, देश-देशान्तर आदि विविध सामग्री प्रकाशित होती थी। कुमाउंनी में ‘वर्ग पहेली’ प्रकाशित देखकर तो आज आश्चर्य होता है। किसी-किसी शृंग में उस समय के अखबारों तथा पत्र-पत्रिकाओं की समीक्षाएं भी प्रकाशित होती थीं। उस समय के बहुचर्चित हैड़ाखान बाबा और सोमवारी बाबा पर सबसे पहले ‘अचल’ ने विस्तार से सामग्री छापी थी, जो बाद में उन पर पुस्तकें लिखे जाने में सहायक हुई। प्रख्यात रूसी चित्रकार निकोलाई रोरिख के लेखों का कुमाउंनी अनुवाद भी उसमें प्रकाशित किया गया था। मुख्य रूप से कुमाउंनी भाषा की पत्रिका होने के बावजूद उसमें गढ़वाली, नेपाली भाषाओं समेत कुमाउंनी की विविध बोलियों में भी सामग्री प्रकाशित की जाती थी। एक शृंग का मूल्य था चार आना और वार्षिक ग्राहकों के लिए कीमत रखी गई थी दो रुपए बारह आना। 

रामनगर, नैनीताल से कुमाउंनी बोली में ‘दुदबोलि’ प्रकाशित करने वाले कुमाउंनी साहित्य-सेवी मथुरादत्त मठपाल जी ने, जिन्हें कुमाउंनी में उल्लेखनीय कार्य के लिए चारुचंद्र पाण्डे जी के साथ ही साहित्य अकादमी सम्मान दिया गया, यत्न करके अपने जीते जी ‘अचल’ के सभी अंक अपने संग्रह में सुरक्षित कर लिए थे। उन अंकों को पुनर्प्रकाशित और डिजिटल रूप में संरक्षित किए जाने की जरूरत है। मठपाल जी ने ‘अचल’ से काफी सामग्री लेकर ‘दुदबोलि’ के अंकों में प्रकाशित भी की है। ‘अचल’ और जीवन चंद्र जोशी जी के बारे में मठपाल जी ने एक सौ कुमाउंनी कहानियों के संग्रह ‘कौ सुवा काथ कौ’ की भूमिका में लिखा है- “अचल की सामग्री बहुत मूल्यवान और संग्रहणीय है। कथा-कहानी (गल्प), कविता, निबंध, बाल साहित्य, लोक साहित्य, भाषा विमर्श, जीवनी, यात्रा वृतांत, इतिहास, विज्ञान, आदि सभी विषयों पर लेखनी चली है। इस पत्रिका की सामग्री और लेखकों का स्तर आज तक की कुमाउंनी पत्रिकाओं से किसी प्रकार उन्नीस नहीं है। पत्रिका के सभी 21 प्रतियों की कुल पृष्ठ संख्या कोई साढ़े सात सौ है।... अचल के यशस्वी सम्पादक स्व. जीवन चंद्र जोशी जी का कुमाउंनी साहित्य हमेशा बहुत-बहुत ऋणी रहेगा, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में यह दिया जलाकर हमको उजाला दिखाया।”

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जीवन बड़बाज्यू का बचपन और कैशौर्य मैदानी शहरों-कस्बों में बीता था। बाद में भी कई वर्ष वे कुमाऊं से दूर शहरों में रहे लेकिन उन्हें अपनी बोली से अद्भुत लगाव था। निश्चय ही इसमें उनके पिता लीलाधर जोशी जी के कुमाउंनी-प्रेम का योगदान रहा होगा। कुमाउंनी के लिए वे किसी से भी लड़ पड़ते थे। सम्भवत: चार सितम्बर 1935 की बात है। एक दिन पहले जवाहर लाल नेहरू अल्मोड़ा जेल से रिहा हुए थे। उसके अगले दिन नेहरू जी के स्वागत में कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने अल्मोड़ा शहर में एक सभा का आयोजन किया। बदरीदत्त पाण्डे ने जैसे ही हिंदी में भाषण शुरू किया, जीवन चंद्र जोशी जी ने प्रतिरोध किया कि कम से कम अल्मोड़ा में तो कुमाउंनी में बोलिए। समर्थन में सभा से कुछ और आवाजें उठीं तो बदरीदत्त पाण्डे और फिर हरगोविंद पंत को भी कुमाउंनी में बोलना पड़ा था।

इस घटना से ग्यारह साल पहले यानी 1924 में जीवनचंद्र जी की शादी हुई थी। पत्नी बुलंदशहर जिले के अनूपशहर नगर में पली-बढ़ी थीं और कुमाउंनी बोलना नहीं जानती थीं। शादी के बाद पत्नी को कुमाउंनी सिखाना उन्होंने अपना पहला दायित्व मान लिया। जल्दी ही वे सीख भी गयीं। ऐसा ही संयोग उनके बेटे गुरुप्रसाद की शादी के समय हुआ। बहू पूर्णिमा को भी कुमाउंनी नहीं आती थी। जोशी जी ने घर में सबको निर्देश दिया कि बहू से सभी लोग सिर्फ कुमाउंनी में बात करेंगे ताकि वह जल्दी से जल्दी अपनी बोली सीख सके। बच्चों को लोरियां सुनाना, लाड़ करना और खेल खिलाना तो कुमाउंनी में ही होता था। उनका मानना था और सबसे कहते रहते थे कि अपनी बोली-भाषा ही नहीं आयी तो मनुष्य कैसा!

मैं और जिज्ञासु जी लखनऊ में जब भी उनसे मिलने जाते थे तो पूरी बातचीत कुमाउंनी ही में होती। एक दिन मैं उनका इण्टरव्यू करने पहुंचा। सवाल हिंदी में तैयार करके ले गया था। उन्होंने सारे जवाब कुमाउंनी में दिये और मुझे टोक दिया कि ‘आपणि बोलि में किलै नै पुछना।’ 1977 में जब ‘नैनीताल समाचार’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो कुछ माह बाद मैंने उन्हें इसके बारे में बताया। फिर उन्हें डाक से नियमित अंक भेजे जाने लगे। खुश होते थे और अक्सर कहते थे कि इसमें कम से कम आधा पन्ना कुमाउंनी के लिए रखना चाहिए। मैंने उनकी सहमति से उनके ही नाम से इस बारे में सम्पादक के नाम पत्र भेज दिया। 15 अक्टूबर, 1978 के नैनीताल समाचार में उनका यह पत्र प्रकाशित हुआ। मेरी गलती यह थी कि मैंने पत्र हिंदी में लिख दिया था। बाद में मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई हालांकि उन्होंने इसका कोई जिक्र नहीं किया।

29 अप्रैल 1980 को लखनऊ में उनका निधन हुआ, जिसकी सूचना हमें तीन-चार दिन बाद मिल पाई थी। ‘नैनीताल समाचार’ के एक जून के अंक में मैंने उनके बारे में विस्तार से लिख कर श्रद्धांजलि दी थी। उसे पढ़ने के बाद हीरा जी ने अपनी प्रतिक्रिया भेजी जो 15 जून 1980 के अंक में छपी। उनकी चिट्ठी साफ-सुथरी कुमाउंनी में थी। जीवनचन्द्र जोशी जी की कन्या के रूप में अपना परिचय देने के बाद उन्होंने लिखा था- “आपुं लोगन का बारा में (बाबू) सदैव कूंछिया कि मैकन बड़ो हर्ष छ कि मेरा नानातिना हिम्मत धरी समाचार निकालण रईं। उनन कन सफलता मिलते रौ। ऊं हर वक्त उत्साहित करन चाहन छिया और कूंछिया कि मैं तो के नि करी सक्यूं पर यो बच्चन कन उत्साहित करुलो तो यनरो हौसला बढ़लो।”  इस चिट्ठी से समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने बच्चों में कुमाउंनी के प्रति कितना प्यार और गर्व भर रखा था।     

हिंदी साहित्य में उनकी बढ़िया पकड़ थी और अच्छे सम्पर्क भी। प्रेमचन्द, निराला, अनूप शर्मा (इनका डॉक्टर पुत्र अंत तक उनका इलाज करता रहा) वासुदेव शरण अग्रवाल, दुलारे लाल भार्गव, कृष्णबिहारी मिश्र, बनारसीदास चतुर्वेदी, आदि से उनका साहित्यिक विमर्श होता था। लखनऊ से प्रकाशित भार्गव जी की चर्चित पत्रिका ‘सुधा’ में उन्होंने काफी लिखा। ‘सुधा’ का दफ्तर साहित्यकारों का खास अड्डा हुआ करता था, जहां प्रेमचन्द और निराला ने भी काम किया। जोशी जी बताते थे कि मैंने दुलारे लाल जी के कहने पर ‘सुधा’ के कुछ सम्पादकीय भी लिखे थे। लिखने-पढ़ने की उनकी तेज गति सराही जाती थी।

अल्मोड़ा में प्रसिद्ध चित्रकार ब्रूस्टर, वैज्ञानिक बोशी सेन से लेकर माइकल एण्टनी और प्रख्यात नृत्यकार उदय शंकर से उनका घनिष्ठ सम्पर्क रहा। उदय शंकर ने अपनी फिल्म ‘कल्पना’ के लिए कुमाउंनी घसियारी नृत्य के बारे में जोशी जी से विचार-विमर्श किया था। इस सब के बावजूद उनका पहला प्रेम कुमाउंनी था। कुमाउंनी में कुछ करते रहने और होता देखने की उनमें अदम्य ललक थी। बहुत सारी योजनाएं थीं उनके मन में। कुमाउंनी-गढ़वाली-नेपाली का शब्दकोश बनाना चाहते थे। मगर 1960 के बाद अकेले पड़ गए और बीमारी ने उन्हें लाचार बना दिया था।

1938-40 में कुमाउंनी पत्रिका ‘अचल’ निकालने का उनका ऐतिहासिक प्रयास और संघर्ष उन्हीं के साथ खत्म नहीं हुआ। 1970 के दशक में जब वे अपने को असहाय और अकेला महसूस करने लगे थे, बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ नाम का एक और धुनी व्यक्ति कुमाउंनी साहित्य-संस्कृति की निष्काम सेवा की राह पर चल पड़ा था। जिज्ञासु जी के बाद मथुरादत्त मठपाल जी ने यही राह पकड़ी और कुमाउंनी लिखित साहित्य की यात्रा को आगे बढ़ाया। फिर यह सिलसिला चल पड़ा।  

 - नवीन जोशी, (संस्मरणों की पुस्तक 'ये चिराग जल रहे हैं' में संकलित संस्मरण का समृद्ध व सम्पादित रूप। )