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Tuesday, September 08, 2026

हिमालय और उसके जन-जीवन की गहन पड़ताल

 

‘अब ताला क्या लगाना!..........
तो क्या कोठरी खुली ही छोड़ दे?
असमंजस में वह बंद दरवाजे के सामने खड़ा रह गया।’ (पृष्ठ-9)
‘दावानल’ उपन्यास की उक्त शुरूआती लाइनों में व्यक्त लेखक नवीन जोशी का असमंजस व्यवहारिक जीवन में भी अभी तक ज्यों का त्यों है। उनका ही क्यों हम-सब भी तो जीवन में व्याप्त असमंजस से कहाॅं उभर पा रहे हैं?
उत्तराखण्डी होने के नाते सामाजिक तौर पर विगत शाताब्दी में यहाॅं उपजे और सफल कहे और माने जाने वाले वन, शराब तथा पृथक राज्य आन्दोलनों के औचित्य और अस्तित्व का असमंजस हम सब में नहीं है, क्या? आज, हम-सबकी जीवन में स्थिति जीवनीय अवसरों और संभावनाओं के लिए बंद दरवाजे के बाहर खड़े निरीह प्राणी की नहीं है, क्या? राजनैतिक हालातों ने हमें सामाजिक तौर पर बीते पर पछताना, वर्तमान में लाचार और भविष्य के लिए आशंकित नहीं बना दिया है, क्या?
प्रतिष्ठित लेखक और पत्रकार नवीन जोशी के ‘दावानल’ और ‘देवभूमि डेवलपर्स’ संस्मरणात्मक उपन्यास क्रमबद्ध तरीके से उत्तराखण्ड में विगत आधी शताब्दी के विविध पड़ावों यथा- सत्तर के दशक के ‘चिपको’, अस्सी के दशक के ‘नशा नहीं रोजगार दो’, नब्बे के दशक के ‘पृथक राज्य आन्दोलन’ से जूझते हुए आज ‘हेलंग’ और ‘हाकम’ के मुकाम पर पहुॅंचे उत्तराखण्डी जन और जीवन की गहन पड़ताल के रूप में प्रकाशित हुए हैं।
मैं आपको इन किताबों की शब्द-यात्रा की ओर ले चलता हूं।
पहले, ‘दावानल’ की बात कर लेते हैं-
नवीन जोशी का ‘दावानल’ उपन्यास, सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली से वर्ष- 2006 और 2008 (दूसरा संस्करण) में प्रकाशित हुआ। लेखक संशय की गुंजाइश को विराम देते हुए आरम्भ में ही घोषित करते हैं कि ‘दावानल’ किताब ‘बीसवीं शताब्दी के सातवें और आठवें दशक में उत्तराखण्ड में छिड़ा व्यापक वन (चिपको) आंदोलन, इस कथा की आधारभूमि है। यह उपन्यास है, इतिहास नहीं।’
उपन्यास का नायक पुष्कर है। गाॅंव से लखनऊ पिता के पास पढ़ने आया नन्हा पुष्कर युवा होते ही कब कैरियर बनाती किताबों से बाहर छिटक-कर पहाड़ के सामाजिक सरोकारों की लड़ाई का हिस्सा बन गया, ये उसे भी पता नहीं चला। लखनऊ विश्वविद्यालय के मेघावी छात्र पुष्कर ने मई, 1977 के किसी दिन जब हल्द्वानी में ‘पर्वतीय युवा मोर्चा’ के एक पर्चे को पढ़ा तो जिज्ञासावश वह अपने गांव न जाकर नैनीताल चला गया। नैनीताल में ‘पढ़ाई के साथ लड़ाई’ में सक्रिय साथियों से हुई मुलाकात ने उसकी जीवन की दशा और दिशा ही बदल दी। पुष्कर को जब पूरा पहाड़ अपने गांव का ही विस्तार लगने लगा तो वो उसके दुखःदर्दो से दूर कैसे रह सकता था।
असल में, पुष्कर के रूप में नवीन जोशी ने अपने किशोरावस्था से युवा अवस्था तक के संस्मरणों को इसमें पिरोया है। उत्तराखण्ड में बीसवीं शताब्दी के 70 के दशक के सामाजिक आन्दोलनों को एक अध्येयता के रूप में नवीन जोशी ने बेहद करीब से देखा और समझा था। उस काल में, पिता के सुनहरे सपनों से इतर अपने खुरदरे जीवनीय उद्देश्यों के ऊहापोह में वे रहे। कहना चाहिए कि, यह किताब, लखनऊ के नहर दफ्तर की कालोनी में अपने बाबू (पिता) के साथ रहने वाले नवीन जोशी के जीवनीय बदलावों और अनुभवों का ताप है।
‘दावानल’ उपन्यास का केन्द्रीय भाव चिपको आन्दोलन है। इसके माध्यम से यह उस काल के पहाड़ और पहाड़ी की अनेकों पीड़ाओं को प्रकट तौर पर पाठकों तक पहुंचाता है। नवीन जोशी ने ‘दावानल’ उपन्यास में पुष्कर और उसके साथियों के माध्यम से उस दौर के उत्तराखण्डी युवाओं की स्थिति, मनोदशा, पीड़ा, उन पर पारिवारिक - सामाजिक - शैक्षिक - राजनैतिक दबाव तथा चेतना के विविध आयामों को इस किताब में सार्वजनिक किया है। उपन्यास के पात्र यथा- रामप्रसाद, जीवन लाल, चंदर, मुन्नी भाभी, शंभू, ज्योति, गिर्दा, इरा, शैली, राधाबल्लभ, गौरा, सलीम, दीवान, कविता, सीपी, ममता, तिलदा, कमला, चन्द्र सिंह, लोकेन्द्र, लक्ष्मी, सुदर्शन, चन्द्रशेखर, त्रिवेन्द्र, गिरीश आदि सभी हमारे आस-पास के ही लोग हैं। इनको पहचानना मुश्किल नहीं है। चिपको आन्दोलन से प्रशिक्षित ये चेहरे उत्तराखण्ड के सवालों और मुद्दो पर चर्चित रहे हैं।
‘दवानल’ उपन्यास घर और बाहर की मध्य रेखा पर ठिठके युवा पुष्कर की उस कशमकश से आरम्भ होता है, जिसमें इजा (माॅं) के कहे वचन ‘अपने बाबू को कभी दुःख नहीं देना बेटा!’ को निभाने में वह अपने को असमर्थ पाता है। जबकि, ‘पुष्कर जानता था कि बाबू हर सांस पहाड़ में छोड़ आए गांव, खेत और मां के लिए लेते हैं या फिर उस बेटे के लिए जिसे पढ़ाने के लिए वे अपने साथ लखनऊ ले आए हैं। उनकी कोई सांस शायद अपने लिए नहीं होती थी। वे ऐसी मशीन थे जो गांव के लिए हर महीने एक मनिआर्डर और बेटे के लिए पढ़ाई का बंदोबस्त करने के लिए चलती थी। दो रोटी और दाल-भात खाते थे तो इसलिए कि मशीन को चलने के लिए कुछ तेल तो चाहिए ही।’ (पृष्ठ-31)
यह किताब, पिता और पुत्र के उस एकाकीपन को भी कुदेरती है जिसमें वे साथ रहते हुए भी वैचारिक रूप में साम्य नहीं रख पाते हैं। पिता-पुत्र के एक दूसरे के बारे में सोचे-समझे सुनहरे सपने जब टूट कर बिखरते हैं तो उसकी आवाज दोनों को सुनाई देती है, पर बोल कोई भी नहीं पाता है। पिता के पुत्र के प्रति बड़ते परायेपन के भाव का जिम्मेदार वह स्वयं है, ऐसा पुष्कर का मानना है।
'और, अब तो शायद उन्होंने उसे अपने से दूर, पराया-सा भी मान लिया। नहीं तो ऐसे क्यों बोलते वे-‘आप खाना खाएंगे या अभी जाना है?’ पहले कभी उन्होंने पुष्कर से ‘आप’ नहीं कहा था।’ (पृष्ठ- 179)
ऐसी बैचैनी में पुत्र पुष्कर के अन्तःमन की धुगधुगी हर क्षण पिता को महसूस कराने के लिए मचलती थी कि ‘मैं तुम्हारे प्रति बेईमान नहीं था, बाबू’...नहीं बाबू, मैं सिर्फ तुम्हारे सपने को दूसरे कोण से देख रहा था, उसमें और भी पिताओं के सपने शामिल कर रहा था।’ (पृष्ठ- 32)
पिता-पुत्र के संबंधों की यही शाश्वत नियति इस किताब में बखूबी आयी है।
‘दावानल’ सत्तर के दशक में लखनऊ में जड़-जमाते प्रवासी उत्तराखण्डियों की कथा-व्यथा की दांस्तान भी है। ‘ये लोग अपना परिवार साथ में नहीं रखते थे क्योंकि वे शहर में बसने नहीं आए थे। वे पहाड़ की किसी चोटी या घाटी में बसे गांव में छोड़ आये अपने परिवार की सप्लाई लाइन थे। वहां गांव में कुछ सीढ़ीनुमा खेत हैं, बाप-दादों का बनवाया एक मकान है, कुछ ढोर-डंगर हैं, जिन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। इसलिए नहर दफ्तर के उन क्वार्टरों में ये लोग अकेले रहते थे। नहीं, अकेले रहते थे कहना गलत होगा, उनके साथ होते थे पढ़ाने के लिए लाए गए बेटे या नौकरी लगने के इंतजार करने वाले छोटे भाई या रिश्तेदार।...पहाड़ से भागे हुए छोकरे शहर की भीड़-भाड़ और चकाचौंध से घबराकर जब कभी स्टेशन के बाहर रोते-भटकते पाए जाते, तो दयालु रिक्शेवाले उन्हें यहीं छोड़ जाते थे।’ (पृष्ठ-37)
कमोवेश यही तस्वीर थी उन दिनों लखनऊ में पनप रहे एक नये उत्तराखण्ड की थी। पुष्कर के बाबू की तरह हर साल असूज के महीने काम-धंधे, खेती-बाड़ी के लिए लखनऊ से घर-गाॅंव आना पहाड़ियों का नियमित दस्तूर था। क्योंकि, तब उनके मन-मस्तिष्क में लखनऊ मात्र जीवकोपार्जन का ठिकाना था। पारिवारिक जीवन की जीवंतता तो वे अपने पहाड़ी गांवों में ही महसूस करते थे।
चिपको के बहाने 20वीं सदी के उत्तरोत्तर काल में पलते-बढ़ते उत्तराखण्ड के मन-मस्तिष्क का मिज़ाज़ इस किताब में है। उस दौर के तमाम सामाजिक - राजनैतिक - आर्थिक - सांस्कृतिक घटनाओं और जन-आन्दोलनों, व्यक्तित्वों, संस्थाओं तथा शासन-प्रशासन की नीति-नियत से हम परिचित होते हैं। तवाघाट की तबाही, नैनीताल गोली काण्ड, चांचरी धार और अदवानी का जंगल आन्दोलन, नैनीताल समाचार और उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी का अस्तित्व आना आदि घटनायें इस किताब के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
लेखक, उत्तराखण्ड के तत्कालीन वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत को भी टटोलता है। अखबारों की पुरानी फाइलों में दर्ज 20 जुलाई, 1970 को बेलाकूची में हुई त्रासदी को पुष्कर ने कुछ इस तरह से पढ़ा-
‘...कुल बारह किलोमीटर सड़क, तीस बसें, ट्रक व कारें, इक्कीस छोटे-बड़े पुल और अलकनंदा के किनारे बसे गांव उस प्रलय की भेंट चढ़ गए।
और मनुष्य?
‘अरे छोड़ो महाराज, मनखियों के मरने-जीने का भी कोई हिसाब-किताब होता है!’ दुरमी के प्रधान रामेश्वरजी से पूछ पाता पुष्कर तो उनका यही जवाब होता।’ (पृष्ठ-174)
नवीन जोशी ने उत्तराखण्डी समाज में उदित, उभरे और अवसान को प्राप्त चिपको आन्दोलन के महत्वपूर्ण पक्षों को ‘दावानल’ उपन्यास में विस्तार दिया है। उत्तराखण्ड में वन-वनवासियों के प्राकृतिक सह-संबंधों, प्रकृति की चेतावनी और उसको भूल-बिसरने की मानवीय प्रवृत्ति के मध्य चिपको आन्दोलन की विडम्बना और चरित्रों को यह जीवंत करता है। इस नाते, चिपको के मर्म और दर्द की अभिव्यक्ति इसमें हुई है।
उपन्यास का एक पात्र शैली पुष्कर से कहता है कि ‘...चिपको आंदोलन जनता का आक्रोश भर था, गुस्सा था जनता में जो उस तरह फूटा और उसे तरह-तरह के लोगों ने अपने ढंग से व्याख्यापित कर दिया। कोई उसे पर्यावरण का आंदोलन बताने लगा, कोई अधिकारों की बहाली का।...पहली तरह के लोग उसमें अपने लिए अवसर देख रहे थे तो तुम लोग दिवास्वप्न में खोए थे। दोनों अपने-अपने ढंग से दोषी हो।’ (पृष्ठ-20)
यह किताब बताती है कि सरकार ने चालाकी से चिपको के शीर्ष नेतृत्वों को अलग-अलग तरीके से पुरस्कारों और सम्मानों के मोह-जाल में कैसे फंसाया? सम्मानों ने चिपको के कुछ चेहरों को देश-दुनिया में ख्याति दी, इससे वे तो बड़े हो गए पर स्थानीय समाज और उनकी संस्थायें उनसे बहुत पीछे छूट गयीं। और, यह आन्दोलन दो वैचारिक पक्षों के जगह दो चेहरों को लिए आगे बढ़ने लगा। इन दो चेहरों ने सरकार के हितों के अनुकूल चिपको के मूल चिन्तन जिसमें स्थानीय लोगों के परम्परागत हक-हकूकों से जंगलों की हिफाज़त की बात थी उससे हटकर मात्र इकालाजी की बात करना उचित समझा। लिहाजा, स्थानीय ‘आर्थिकी’ पर उनका स्वर धीमा होने लगा और ‘पारिस्थितिकी’ का स्वर तेज होने लगा। परन्तु एक तरफ देश-दुनिया में चिपको आन्दोलन के प्रचार की धूम थी तो दूसरी तरफ उसके शीर्ष नेतृत्व के मध्य अहम और वहम की धूल मंडराने लगी थी। सम्मानों की ललक ने इसको और पनाह दी थी।
चिपको की लोकप्रियता को अलग-अलग तरीके से लेखकीय रंग भरे जाने लगे। ‘...मगर छपते जा रहे हैं नामचीन पर्यावरणविदों के लेख और इंटरव्यू। बाबा जीवन लाल ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में भी लिखना शुरू कर दिया है। वे अखबारों में छाए हुए हैं। स्वच्छ हवा और शुद्ध पर्यावरण के लिए जंगलों को बचाओ! ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी-पानी और बयार।’ उनकी देखा-देखी राम प्रसादजी ने भी कलम उठा ली है। पता नहीं खुद लिखते हैं या कोई लेखक रख लिया है। बाबा तो अच्छे वक्ता और लेखक रहे हैं। मगर राम प्रसादजी हिंदी भी ठीक से नहीं बोल पाते थे। बार-बार अपनी पहाड़ी बोली में आ जाते। शायद आंदोलन और प्रसिद्धि ने उन्हें सिखा दिया है। जो भी हो, खूब छप रहे हैं दोनों। लिखने और इंटरव्यू देने की होड़।’ (पृष्ठ, 202-203)
चिपको के परिपेक्ष्य में उपन्यास के पात्र सलीम के इन विचारों से असहमत कैसे हो सकते हैं कि ‘...यह व्यवस्था हमेशा इसी तरह काम करती है। यह जन-आंदोलनों को भी ऐसी चालाकी से मोड़ देती है कि उसका मूल स्वर गायब हो जाता है और वह जन-भावनाओें को अपने पक्ष में भुना लेती है। चूंकि ये सरकारें पूंजीपतियों, दलालों, ठेकेदारों यानी जनता की शोषक ताकतों का गठजोड़ हैं, इसलिए वास्तविक जनहित का कोई फैसला ले ही नहीं सकतीं। लेकिन पुष्कर भाई, चूंकि तुम भावुक हो, मेरे शब्दों में रोमांटिक आंदोलनकारी, इसलिए तुम्हें झटका लगना स्वाभाविक है।’ (पृष्ठ- 219)
चिपको के देश-दुनिया में फैलते तथाकथित ग्लेमर से तस्त्र पुष्कर अपने मित्रों शैली और सलीम के उस पर लगे ‘रोमांटिक आंदोलनकारी’ के तगमें आखिर तोड़ ही डालता है। वह पुरुजोर आवाज़ में अपनी खीज व्यक्त करते हुए आगे एक अध्येयता ही रहना चाहता है-
‘ओ गौरा देवी! रामी देवी!, बौंणी देवी!, रामी देवी!, लक्ष्मी देवी! और जसुली देवी! बधाई हो तुमको, पद्मभूषण और मैगसेसे की। क्या कहा? तुम इन्हें नहीं जानती! अरे पगली! किसी लाट-गवर्नर के नाम नहीं हैं। इनाम हैं, इनाम! बडे़-बड़े सम्मान! तुम्हारे नाम और काम के, जो तुम्हारे नेताओं को मिले हैं। श्रेय और सम्मान तो नेताओं को ही मिलता है न!’
............
‘याद है गौरा देवी, ये रामप्रसादजी रेणी का जंगल बचा लेने पर तुम्हें शाबासी देने आए थे! आज तुम उन्हें बधाई दो। घर में थोड़ा गुड़ हो तो एक डली रामप्रसादजी को खिलाओ। एक डली बाबा जीवनलाल के लिए भी भेजो।
और यह लकड़ी-पानी, घास-पत्ते की रट मत लगाओ। बड़ा काम करने वालों को छोटी-छोटी चीजों की चिंता शोभा नहीं देती। एक बात और, गौरा देवी! जो जंगल तुमने तब बचाया था, अब उसकी तरफ एक कदम मत बढ़ाना। वहां अब खूंखार, मनखीमार बाघ रहते हैं, हां! खबरदार!’ (पृष्ठ, 226-227)
‘दावानल’ में चंट-चालाक सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच ऐसे नायकों का भी जिक्र किया है जिनकी कथनी-करनी में कभी भेद नहीं रहा। चांचरीधार के जंगलों को कटने से बचाने के बाद उत्साही विपिन त्रिपाठी से जुड़ा यह किस्सा बेहद प्रेरक है, जिसने उनको ताउम्र जमीनी कार्यकर्ता बनाये रखा-
‘विपिन त्रिपाठी जिंदाबाद...टैक्सी की खिड़की से विपिन चच्चा ने भोटिया भाई के हाथ अपने हाथों में लेकर प्यार से दबाए तो निर्विकार-सा वह बोला था- ‘भुला, अपनी औकात मत भूलना, हां!’ डंक-सा लगा था विपिन चच्चा को। कैसी पते की बात कह दी थी उसने! जेल से छूटते ही चंदे की टैक्सी! वे फौरन टैक्सी से बाहर निकले, अपने गले की फूलमालाएं भोटिया भाई को पहनाई और समर्थकों के हुजूम को आश्चर्यचकित छोड़कर बस स्टैंड की ओर चल पड़े थे।’ (पृष्ठ-156)
पुष्कर के जीवनीय उतार-चढ़ावों ने उसे एक तरफ 70 के दशक के आम युवा की चर्चित ‘यंग ऐंग्री मैन’ की छवि के रूप में ढ़ाला तो दूसरी ओर उसे उनसे जीवन दर्शन का पाठ भी मिला। श्मशान घाट में किसी सयाने का यह कथन कि ‘अपना शोक यहीं बहा दो, पुत्र। यह शोक को बहा देने की जगह है। यहां से फिर जिंदगी में लौटना होता है। वह देखो, ऊपर सड़क किनारे...लाश लेकर आए आधे लोग नहा-धोकर दाल-भात पका रहे हैं। यहां चिता जल रही है और वहां भात पक रहा है। चिता की राख के साथ सारा शोक बहाकर वे भोजन करेंगे। दूर से आए हैं, थके हैं। खाकर आराम करेंगे और फिर लौट जाएंगे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में। यही संसार का नियम है। उधर देखो, चिता की राख बहाकर वह बालक उस ठौर पर दिया जला रहा है। पंडित कह रहा है बालक से कि अब पीछे मुड़ो और घर जाओ। इस तरफ मुड़कर मत देखना। यानी इस शोक को भूल जाना और वापस जिंदगी में शामिल हो जाना। तुम भी लौट जाओ, युवक। मन का संताप यहीं छोड़कर लौट जाओ।’ (पृष्ठ- 135)
‘दावानल‘ का नायक पुष्कर भी अपने जीवन के कर्तव्य-पथ की ओर लौटते हुए उपन्यास के विराम में मन-ही-मन गाता है-
‘ऋतु औंनै रौली, भवंर उड़ाला बलि...’।
यही तो जीवन की नियति है।
 
- अरुण कुकसाल
ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163
पट्टी- असवालस्यूॅं, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखंड
(आज सुबह-सुबह अरुण कुकसाल ने फेसबुक पर दावानल की यह याद दिला दी।) 

Tuesday, August 25, 2026

'पुष्कर-कविता में विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता है'

प्रिय भाई नवीन,

बड़ी मुश्किल से जुटा पाया हूं अपने को यह पत्र लिखने के लिए। चाहता तो तुमसे मिलकर 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'


करके तुम्हारे 'दावानल' की औपचारिक प्रशंसा कर सकता था। मगर उससे मन कहां मानता। उपन्यास मुझसे कम पढ़े जाते हैं। कुछ कहानी-कविता पढ़ता भी हूं तो ज़्यादा याद नहीं रख पाता। मौके पर तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारी कुछ कहानियां भी पढ़ीं। मंचन करने का तत्काल मन भी किया मगर फिर वही पहाड़ियों की मारगांठ वाली स्थिति। खैर...। 

'दावानल' पढ़कर दरअसल में बहुत भावुक हो गया। सोचा इस गीली स्थिति में कुछ बोल-लिख न पाऊंगा। फिर रख दिया। कुछ दिन लग गए। कुछ उबरा तो लगा, ये इतना आसान नहीं है। उपन्यास के खास तौर पर नहर दफ्तर, हुसेनगंज के दृश्य, लोग, उनके रेखाचित्र जाने-पहचाने लगे। अच्छा लगा। पहली बार पढ़ते समय जो-जो मन जुड़ा गया, वो नोट कर लेता तो अच्छा था। अब वही याद है जो नहीं भूल पाता। 

यद्यपि उपन्यास में वन आंदोलनों पर तुम्हारी व्याख्या, विवरण, इतिहास और समीक्षा अद्भुत, जानकारीपूर्ण और मन में गुस्सा उपजाने वाले हैं, मगर छपछपी पड़ी ईजा व बाबू वाले प्रसंगों पर। तुम्हारी निस्संग स्वभाव की भावुकता इसीलिए रुलाती है कि यहीं अब तक पहाड़ी लड़के (भले ही वे अधेड़ या वृद्ध हो गए हों) स्वयं को आडेंटीफाई करते हैं। 


हमारी और हमारे कुछ बाद की पीढ़ी के ईजा-बाबू लगता है एक ही घराने के होते थे। उनके कष्ट, भले ही उन्होंने शहर में सहे हों, होते पहाड़ के ही थे। बहुत रुलाई आई यार खास तौर पर उनके तर्पण प्रसंगों में। जाने क्यों, अगर ये बुराई हो तो हो मगर, वन आंदोलन के प्रकरणों उतना नहीं झकझोरा, जितना ईजा-बाबू या इनसे मिलते-जुलते प्रसंगों ने, जैसे कि बाघ वाला प्रसंग।

हां, एक बात और जुड़ा गई। पुष्कर और कविता के सम्बंध। यहां तुम गज़ब के हो गए। न केवल शरतचंद्रीय गलदश्रु भावुकता से भी और अज्ञेय की क्रांतिकारिता से  भी (बचा ले गए)। ऐसी आदर्श स्थिति रची कि मैं भी फेल हो गया। पुष्कर-कविता में तुमने विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता रची है। ये मेरा पहले पढ़ा हुआ नहीं है। एक मेच्योर विचारक की छवि बनाई तुमने। यद्यपि चेहरे से तुम किशोर पुष्कर ही लगते हो। वर्षों पहले मेरे देखे, हुसेनगंज वाले। 

सबसे बड़ी बात तो ये कि उपन्यास पढ़कर मुझे अपना अब तक का किया पूरा फरमाइशी लेखन और ओढ़ा हुआ रंगमंच अचानक बहुत सतही लगने लगता है। तुमने वाकई हम सब जैसे मीडियाकरों पर लोहार की चोट की है। ये हुआ संगठित सोच, खूब छना हुआ विचार, खूब खंगाली हुई दृष्टि और मेच्योर लेखन। 

'दावानल' में उसका अपना स्वभाव व प्रकृति है। चूंकि तुम्हारा लेखन प्राकृतिक है, इसलिए मौलिक है। ऐसा नहीं कि वन आंदोलन वाले प्रसंगों ने मुझे खदबदाया नहीं, गुस्सा भी आया मगर एक रूपवादी-कलावादी होने के कारण मुझे भावुकता ही अधिक सुरक्षा देती है। शायद पहाड़ियों की दुखती रग यही है।

उपन्यास का कैनवस काफी बड़ा था मगर तुम कुशल चित्रकार निकले। कहीं अनावश्यक स्ट्रोक नहीं। सभी रंग संतुलित। मुझे नहीं पता, उत्तराखण्ड में उपन्यास को क्या प्रतिक्रिया मिली। क्या इसे बहुगुणा जी-भट्ट जी ने पढ़ा होगा? न हो तो पढ़ाओ। गिर्दा से तुम्हारा दीर्घजीवी जुड़ान पहले पता नहीं था।

'दावानल' से उठे प्रश्न क्या उत्तराखण्ड बनने के बाद उतने पैने रह गए हैं या नहीं? क्या अलग राज्य बनने के बाद 'दावानल' के आरोपों का कोई मतलब नहीं रहा? 'नैनीताल समाचार' अभी भी पुष्कर निकाल रहा है क्या? 

कहना बहुत था। 'दावानल' फिर से पढ़कर कह पाऊंगा।

नवीन, हुसेनगंज से गोमती नगर तक तुमने बहुत सार्थक रचनात्मक सृजनशील यात्रा तय की है। ऐसी तप:पूत साधना कभी समाप्त नहीं होती। बहुत-बहुत बधाई और आशीर्वाद। * 

तुम्हारा- उर्मिल कुमार थपलियाल  

* बहुत आश्चर्य होता है तुम्हारी रिसर्च और वन आंदोलनों की संदर्भ सामग्री जुटाने पर्। इस रूप में मुझे तुम शेखर पाठक से दिखे। तथ्यगत उपन्यास तो डॉक्यूमेण्ट्री लगने लगते हैं। पहाड़ की स्थिति तुमने दलित आत्म कथाओं की तरह महिमावर्णन करते हुए नहीं लिखी। तुम्हारी भाषा में चेग्वेरा और वामपंथियों की ललित ललकार नहीं है। भाषा की पहुंच सरलता-तरलता और सहज सम्प्रेषण से आती है। यह सिद्ध हुआ।

वाकई नैनीताल में रहने से कुमाऊं औरमेरी तरह देहरादून में रहने से गढ़वाल नहीं जाना जा सकता। पता नहीं तुम्हें पढ-अने के बाद मैं जिस हीनभावना से गुजरा हूं, वहां से कब उबर पाऊंगा। शायद वो सभी पहाड़ी जो तुम्हारी तरह का गम्भीर और सार्थक काम नहीं कर पा रहे हैं।   

इस पत्र को पुराना पोस्टकार्ड ही समझना, क्योंकि लिखना ख्तम करते ही और कुछ लिखना याद आने लगता है। जहां तक कागज हो, वहां तक। बिखराव इसी को कहते हैं।  

(प्रसिद्ध रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल ने मेरा उपन्यास 'दावानल' पढ़कर यह पत्र मुझे 20 मई 2008 को लिखा था और फिर खुद ही चलकर मुजेह देने आए थे। आज पुराने कागजों में मिला तो यहां लगा दे रहा हूं ताकि सनद रहे- न जो) 

  

Saturday, July 16, 2022

सुंदर लाल बहुगुणा को याद रखने के कई आयाम हैं

पिछले वर्ष सुंदरलाल बहुगुणा के रूप में उत्तराखण्ड, हिमालय और देश-दुनिया ने एक दृढ़ संकल्पवान गांधीवादी पर्यावरण-योद्धा खो दिया था। उन्होंने अपनी यात्राओं, लेखों-भाषणों, अनशनों-आंदोलनों और जीवन-शैली से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनका न रहना एक ईमानदार एवं समर्पित हिमालय हितैषी का न रहना है। पिछले दिनों बहुगुणा जी की स्मृति में उनकी पत्नी विमला बहुगुणा एवं सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण संरक्षण एवं शोध संस्थान ने ‘संकल्प के हिमालय’ नाम से स्मृति-ग्रंथ प्रकाशित किया है। उनकी बेटी मधु पाठक के सम्पादन में प्रकाशित इस ग्रन्थ में उनके परिवारीजनों, सम्बंधियों, आंदोलन के सहयोगियों-कार्यकर्ताओं, शिष्यों, गांधीवादी संस्थाओं के प्रतिनिधियों और पर्यावरणविदों के स्मृति लेख हैं- 63 हिंदी में और 22 अंग्रेजी में।

इस ग्रंथ को पढ़ना बहुगुणा जी के ज्ञात-अल्पज्ञात जीवन-प्रसंगों, संकल्पों, आंदोलनों, प्रभाव-क्षेत्रों और प्रेरक व्यक्तित्व से प्रभावित होते चलना है। विमला बहुगुणा जी ने, जिन्होंने सुंदरलाल जी से विवाह ही इस शर्त पर किया था कि वे राजनीति (वे तब कांग्रेस में जिला स्तरीय पदाधिकारी थे) से सदा के लिए मुंह मोड़कर समाज सेवा में प्रवृत्त होंगे, उनके पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर बिना भावुक हुए गहरी अंतदृष्टि से लिखा है। सुंदरलाल बहुगुणा को दुनिया जिस रूप में जानती है या दुनिया के कम जानते हुए भी जो-जो जमीनी काम उन्होंने किए, उस व्यक्तित्व को गढ़ने में विमला जी का ही पूरा योगदान है। विमला जी ने यह संकल्प और जीवन-दृष्टि सरला बहन की शिष्या के रूप में लक्षी आश्रम, कौसानी में पढ़ते-रहते हुए पाई थी। फिलहाल उनका यह लेख श्रद्धाजंलि स्वरूप है, भविष्य में उनसे विस्तार से इस पर लिखने की अपेक्षा की जानी चाहिए, बल्कि आग्रह। सुंदरलाल जी ने भी विमला जी के इस योगदान को स्वीकार किया था, जैसा कि राधा भट्ट दीदी ने अपने लेख में उनको उद्धृत किया है- “मैं विमला के बल पर खड़ा हूं। मैं झण्डा हूं, सबको दिखाई देता हूं पर झण्डे को फहराने वाला डंडा तो विमला का है।”

मेधा पाटकर ने बहुगुणा जी को बड़े बांधों के विरोध और नर्मदा आंदोलन में उनकी भागीदारी के संदर्भ में दिल से याद किया है। लम्बे समय तक बहुगुणा जी के सहयोगी रहे धूम सिंह नेगी, प्रसिद्ध लेखक और बहुगुणा जी के निकट सम्बंधी विद्यासागर नौटियाल, सुशीलचंद्र डोभाल, सदन मिश्र, कुंवर प्रसून,  भतीजी डॉ प्रज्ञा पाठक और आंदोलनकारी समीर रतूड़ी के लेख सुंदरलाल जी के विचार, व्यवहार और  योगदान पर गहरी नजर डालते हैं। 13 साल की उम्र में श्रीदेव सुमन से प्रभावित होकर टिहरी राजशाही के विरुद्ध बगावती तेवर अपनाने से लेकर बाद के सर्वोदयी-गांधीवादी नेता के रूप में उनके विविध सामाजिक एवं निजी प्रयोगों, विचार-व्यवहार और आंदोलनों के बारे में बहुत-सी जानकारियां सामने आती हैं। उनके शिष्यों अथवा उनके सहयोग से जीवन में ऊंचे मुकाम हासिल करने वालों में चंद्र सिंह का लेख बहुगुणा जी के बहुत कम जाने गए पक्ष पर प्रेरक रोशनी डालता है। एक दर्जी-बाजगी परिवार में जन्मे चंद्र सिंह को बहुगुणा जी ने कैसे 25 किमी पैदल जाकर, उनके गांव से लाकर टिहरी के ठक्कर बापा छात्रावास में डाला और आगे तक ऐसी राह दिखाई कि एक दिन चंद्र सिंह प्रशासनिक सेवा में पहुंचकर टिहरी नरेश की उस कुर्सी पर जिलाधिकारी की हैसियत से बैठे, जिस पर बैठे राजा ने एक दिन उनके पिता को दुत्कार दिया था जो अपने एक बेटे को स्कूल में भर्ती करा देने के लिए दरबार में गिड़गिड़ा रहा था। यह विडम्बना ही है कि चंद्र सिंह बाद में उस टिहरी बांध के परियोजना निदेशक बने जिसके विरोध में बहुगुणा जी ने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। अपने जीवन में उनके योगदान से विनत चंद्र सिंह यही कर सके कि डूब गए ठक्कर बापा छात्रावास के लिए नई टिहरी में ठीक से जमीन और मुआवजा दिलवा गए। बहुगुणा जी के भक्त रहे प्रशासनिक अधिकारी डॉ प्रदीप कुमार भी टिहरी प्रशासन में दुविधाग्रस्त हो तैनात रहे, जिनके हिस्से टिहरी खाली करवाकर बांध जल्दी बनवाने की जिम्मेदारी आई थी।  

बीज बचाओ आंदोलन को समर्पित विजय जड़धारी ने 1979 के बडियारगढ़ के चिपको आंदोलन का विस्तार से जिक्र करते हुए बहुगुणा जी को आत्मीयता के साथ याद किया है। उनके लेख में कुंवर प्रसून की निर्भीकता और धूम सिंह नेगी के जुझारूपन का भी अच्छा विवरण है। कुंवर प्रसून का एक पुराना लेख चिपको के इतिहास पर है। राजीव लोचन साह ने उन्हें ‘नैनीताल समाचार’ के एक प्रेरणा-स्रोत और पत्रकार के रूप में पेश किया है। कुछ लेख मात्र श्रद्धांजलि स्वरूप हैं। सभी लेखों की चर्चा यहां की भी नहीं जा सकती। अंग्रेजी लेखों को फिलहाल पढ़ा नहीं जा सका है।  

सुंदरलाल जी से असहमतियां और उनसे जुड़े विवाद भी कम नहीं हैं लेकिन सम्पादक मधु पाठक ने लिखा ही है- “कुछ ऐसे भी लेख मिले जो आलोचनात्मक रूप से लिखे गए थे। यह उनके लिए उपयुक्त मंच नहीं था। इसलिए मैं उनको शामिल नहीं कर सकी।” इस स्मृति ग्रंथ में शेखर पाठक के लेख की अनुपस्थिति उल्लेखनीय है। आखिर वह बहुगुणा जी ही थे जिन्होंने इस पीढ़ी को सर्वाधिक उप्रेरित किया। ‘अस्कोट-आराकोट’ यात्रा का विचार उनका ही दिया हुआ है, जिसने उत्तराखण्ड को देखने की नई दृष्टि दी और उस टोली के प्रारम्भिक चार युवकों में आज शेखर पाठक ही हमारे बीच हैं और बहुगुणा जी के अत्यंत प्रिय भी रहे हैं। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाली अनुपस्थिति चंडी प्रसाद भट्ट जी की है, जो प्रारम्भ में बहुगुणा जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले-लड़े, हालांकि बाद में उनमें विवाद हुए और राहें भी अलग गईं।

जैसे, सुंदर लाल जी जैसे व्यक्तित्वों के होने से गांधी जी की प्रासंगिकता आज तक बनी आई है, वैसे ही सुंदरलाल जी की प्रासंगिकता उनके रोपे पौधों और उनसे प्रेरित पीढ़ियों की सक्रियता से बनी रहेगी।

- न जो, 14 जुलाई, 2022 (नैनीताल समाचार के लिए)