‘अब ताला क्या लगाना!..........
Tuesday, September 08, 2026
हिमालय और उसके जन-जीवन की गहन पड़ताल
Tuesday, August 25, 2026
'पुष्कर-कविता में विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता है'
प्रिय भाई नवीन,
बड़ी मुश्किल से जुटा पाया हूं अपने को यह पत्र लिखने के लिए। चाहता तो तुमसे मिलकर 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'
करके तुम्हारे 'दावानल' की औपचारिक प्रशंसा कर सकता था। मगर उससे मन कहां मानता। उपन्यास मुझसे कम पढ़े जाते हैं। कुछ कहानी-कविता पढ़ता भी हूं तो ज़्यादा याद नहीं रख पाता। मौके पर तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारी कुछ कहानियां भी पढ़ीं। मंचन करने का तत्काल मन भी किया मगर फिर वही पहाड़ियों की मारगांठ वाली स्थिति। खैर...।
'दावानल' पढ़कर दरअसल में बहुत भावुक हो गया। सोचा इस गीली स्थिति में कुछ बोल-लिख न पाऊंगा। फिर रख दिया। कुछ दिन लग गए। कुछ उबरा तो लगा, ये इतना आसान नहीं है। उपन्यास के खास तौर पर नहर दफ्तर, हुसेनगंज के दृश्य, लोग, उनके रेखाचित्र जाने-पहचाने लगे। अच्छा लगा। पहली बार पढ़ते समय जो-जो मन जुड़ा गया, वो नोट कर लेता तो अच्छा था। अब वही याद है जो नहीं भूल पाता।
यद्यपि उपन्यास में वन आंदोलनों पर तुम्हारी व्याख्या, विवरण, इतिहास और समीक्षा अद्भुत, जानकारीपूर्ण और मन में गुस्सा उपजाने वाले हैं, मगर छपछपी पड़ी ईजा व बाबू वाले प्रसंगों पर। तुम्हारी निस्संग स्वभाव की भावुकता इसीलिए रुलाती है कि यहीं अब तक पहाड़ी लड़के (भले ही वे अधेड़ या वृद्ध हो गए हों) स्वयं को आडेंटीफाई करते हैं।
हमारी और हमारे कुछ बाद की पीढ़ी के ईजा-बाबू लगता है एक ही घराने के होते थे। उनके कष्ट, भले ही उन्होंने शहर में सहे हों, होते पहाड़ के ही थे। बहुत रुलाई आई यार खास तौर पर उनके तर्पण प्रसंगों में। जाने क्यों, अगर ये बुराई हो तो हो मगर, वन आंदोलन के प्रकरणों उतना नहीं झकझोरा, जितना ईजा-बाबू या इनसे मिलते-जुलते प्रसंगों ने, जैसे कि बाघ वाला प्रसंग।
हां, एक बात और जुड़ा गई। पुष्कर और कविता के सम्बंध। यहां तुम गज़ब के हो गए। न केवल शरतचंद्रीय गलदश्रु भावुकता से भी और अज्ञेय की क्रांतिकारिता से भी (बचा ले गए)। ऐसी आदर्श स्थिति रची कि मैं भी फेल हो गया। पुष्कर-कविता में तुमने विछोह नहीं, प्रेम की सार्थकता रची है। ये मेरा पहले पढ़ा हुआ नहीं है। एक मेच्योर विचारक की छवि बनाई तुमने। यद्यपि चेहरे से तुम किशोर पुष्कर ही लगते हो। वर्षों पहले मेरे देखे, हुसेनगंज वाले।
सबसे बड़ी बात तो ये कि उपन्यास पढ़कर मुझे अपना अब तक का किया पूरा फरमाइशी लेखन और ओढ़ा हुआ रंगमंच अचानक बहुत सतही लगने लगता है। तुमने वाकई हम सब जैसे मीडियाकरों पर लोहार की चोट की है। ये हुआ संगठित सोच, खूब छना हुआ विचार, खूब खंगाली हुई दृष्टि और मेच्योर लेखन।
'दावानल' में उसका अपना स्वभाव व प्रकृति है। चूंकि तुम्हारा लेखन प्राकृतिक है, इसलिए मौलिक है। ऐसा नहीं कि वन आंदोलन वाले प्रसंगों ने मुझे खदबदाया नहीं, गुस्सा भी आया मगर एक रूपवादी-कलावादी होने के कारण मुझे भावुकता ही अधिक सुरक्षा देती है। शायद पहाड़ियों की दुखती रग यही है।
उपन्यास का कैनवस काफी बड़ा था मगर तुम कुशल चित्रकार निकले। कहीं अनावश्यक स्ट्रोक नहीं। सभी रंग संतुलित। मुझे नहीं पता, उत्तराखण्ड में उपन्यास को क्या प्रतिक्रिया मिली। क्या इसे बहुगुणा जी-भट्ट जी ने पढ़ा होगा? न हो तो पढ़ाओ। गिर्दा से तुम्हारा दीर्घजीवी जुड़ान पहले पता नहीं था।
'दावानल' से उठे प्रश्न क्या उत्तराखण्ड बनने के बाद उतने पैने रह गए हैं या नहीं? क्या अलग राज्य बनने के बाद 'दावानल' के आरोपों का कोई मतलब नहीं रहा? 'नैनीताल समाचार' अभी भी पुष्कर निकाल रहा है क्या?
कहना बहुत था। 'दावानल' फिर से पढ़कर कह पाऊंगा।
नवीन, हुसेनगंज से गोमती नगर तक तुमने बहुत सार्थक रचनात्मक सृजनशील यात्रा तय की है। ऐसी तप:पूत साधना कभी समाप्त नहीं होती। बहुत-बहुत बधाई और आशीर्वाद। *
तुम्हारा- उर्मिल कुमार थपलियाल
* बहुत आश्चर्य होता है तुम्हारी रिसर्च और वन आंदोलनों की संदर्भ सामग्री जुटाने पर्। इस रूप में मुझे तुम शेखर पाठक से दिखे। तथ्यगत उपन्यास तो डॉक्यूमेण्ट्री लगने लगते हैं। पहाड़ की स्थिति तुमने दलित आत्म कथाओं की तरह महिमावर्णन करते हुए नहीं लिखी। तुम्हारी भाषा में चेग्वेरा और वामपंथियों की ललित ललकार नहीं है। भाषा की पहुंच सरलता-तरलता और सहज सम्प्रेषण से आती है। यह सिद्ध हुआ।
वाकई नैनीताल में रहने से कुमाऊं औरमेरी तरह देहरादून में रहने से गढ़वाल नहीं जाना जा सकता। पता नहीं तुम्हें पढ-अने के बाद मैं जिस हीनभावना से गुजरा हूं, वहां से कब उबर पाऊंगा। शायद वो सभी पहाड़ी जो तुम्हारी तरह का गम्भीर और सार्थक काम नहीं कर पा रहे हैं।
इस पत्र को पुराना पोस्टकार्ड ही समझना, क्योंकि लिखना ख्तम करते ही और कुछ लिखना याद आने लगता है। जहां तक कागज हो, वहां तक। बिखराव इसी को कहते हैं।
(प्रसिद्ध रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल ने मेरा उपन्यास 'दावानल' पढ़कर यह पत्र मुझे 20 मई 2008 को लिखा था और फिर खुद ही चलकर मुजेह देने आए थे। आज पुराने कागजों में मिला तो यहां लगा दे रहा हूं ताकि सनद रहे- न जो)
Saturday, July 16, 2022
सुंदर लाल बहुगुणा को याद रखने के कई आयाम हैं
पिछले वर्ष सुंदरलाल बहुगुणा के रूप में उत्तराखण्ड, हिमालय और देश-दुनिया ने एक दृढ़ संकल्पवान गांधीवादी पर्यावरण-योद्धा खो दिया था। उन्होंने अपनी यात्राओं, लेखों-भाषणों, अनशनों-आंदोलनों और जीवन-शैली से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनका न रहना एक ईमानदार एवं समर्पित हिमालय हितैषी का न रहना है। पिछले दिनों बहुगुणा जी की स्मृति में उनकी पत्नी विमला बहुगुणा एवं सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण संरक्षण एवं शोध संस्थान ने ‘संकल्प के हिमालय’ नाम से स्मृति-ग्रंथ प्रकाशित किया है। उनकी बेटी मधु पाठक के सम्पादन में प्रकाशित इस ग्रन्थ में उनके परिवारीजनों, सम्बंधियों, आंदोलन के सहयोगियों-कार्यकर्ताओं, शिष्यों, गांधीवादी संस्थाओं के प्रतिनिधियों और पर्यावरणविदों के स्मृति लेख हैं- 63 हिंदी में और 22 अंग्रेजी में।
इस ग्रंथ को पढ़ना बहुगुणा जी के ज्ञात-अल्पज्ञात
जीवन-प्रसंगों, संकल्पों, आंदोलनों, प्रभाव-क्षेत्रों और प्रेरक व्यक्तित्व से प्रभावित होते चलना है। विमला
बहुगुणा जी ने, जिन्होंने सुंदरलाल जी से विवाह ही इस शर्त
पर किया था कि वे राजनीति (वे तब कांग्रेस में जिला स्तरीय पदाधिकारी थे) से सदा
के लिए मुंह मोड़कर समाज सेवा में प्रवृत्त होंगे, उनके
पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर बिना भावुक हुए गहरी अंतदृष्टि से लिखा है। सुंदरलाल
बहुगुणा को दुनिया जिस रूप में जानती है या दुनिया के कम जानते हुए भी जो-जो जमीनी
काम उन्होंने किए, उस व्यक्तित्व को गढ़ने में विमला जी का ही
पूरा योगदान है। विमला जी ने यह संकल्प और जीवन-दृष्टि सरला बहन की शिष्या के रूप
में लक्षी आश्रम, कौसानी में पढ़ते-रहते हुए पाई थी। फिलहाल
उनका यह लेख श्रद्धाजंलि स्वरूप है, भविष्य में उनसे विस्तार
से इस पर लिखने की अपेक्षा की जानी चाहिए, बल्कि आग्रह।
सुंदरलाल जी ने भी विमला जी के इस योगदान को स्वीकार किया था, जैसा कि राधा भट्ट दीदी ने अपने लेख में उनको उद्धृत किया है- “मैं विमला
के बल पर खड़ा हूं। मैं झण्डा हूं, सबको दिखाई देता हूं पर
झण्डे को फहराने वाला डंडा तो विमला का है।”
मेधा पाटकर ने बहुगुणा जी को बड़े बांधों के विरोध और नर्मदा
आंदोलन में उनकी भागीदारी के संदर्भ में दिल से याद किया है। लम्बे समय तक बहुगुणा
जी के सहयोगी रहे धूम सिंह नेगी, प्रसिद्ध लेखक और बहुगुणा जी के निकट
सम्बंधी विद्यासागर नौटियाल, सुशीलचंद्र डोभाल, सदन मिश्र, कुंवर प्रसून, भतीजी डॉ प्रज्ञा पाठक और आंदोलनकारी
समीर रतूड़ी के लेख सुंदरलाल जी के विचार, व्यवहार और योगदान पर गहरी नजर डालते हैं। 13 साल की उम्र
में श्रीदेव सुमन से प्रभावित होकर टिहरी राजशाही के विरुद्ध बगावती तेवर अपनाने
से लेकर बाद के सर्वोदयी-गांधीवादी नेता के रूप में उनके विविध सामाजिक एवं निजी
प्रयोगों, विचार-व्यवहार और आंदोलनों के बारे में बहुत-सी
जानकारियां सामने आती हैं। उनके शिष्यों अथवा उनके सहयोग से जीवन में ऊंचे मुकाम
हासिल करने वालों में चंद्र सिंह का लेख बहुगुणा जी के बहुत कम जाने गए पक्ष पर
प्रेरक रोशनी डालता है। एक दर्जी-बाजगी परिवार में जन्मे चंद्र सिंह को बहुगुणा जी
ने कैसे 25 किमी पैदल जाकर, उनके गांव से लाकर टिहरी के
ठक्कर बापा छात्रावास में डाला और आगे तक ऐसी राह दिखाई कि एक दिन चंद्र सिंह
प्रशासनिक सेवा में पहुंचकर टिहरी नरेश की उस कुर्सी पर जिलाधिकारी की हैसियत से
बैठे, जिस पर बैठे राजा ने एक दिन उनके पिता को दुत्कार दिया
था जो अपने एक बेटे को स्कूल में भर्ती करा देने के लिए दरबार में गिड़गिड़ा रहा था।
यह विडम्बना ही है कि चंद्र सिंह बाद में उस टिहरी बांध के परियोजना निदेशक बने
जिसके विरोध में बहुगुणा जी ने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। अपने जीवन में उनके
योगदान से विनत चंद्र सिंह यही कर सके कि डूब गए ठक्कर बापा छात्रावास के लिए नई
टिहरी में ठीक से जमीन और मुआवजा दिलवा गए। बहुगुणा जी के भक्त रहे प्रशासनिक
अधिकारी डॉ प्रदीप कुमार भी टिहरी प्रशासन में दुविधाग्रस्त हो तैनात रहे, जिनके हिस्से टिहरी खाली करवाकर बांध जल्दी बनवाने की जिम्मेदारी आई थी।
बीज बचाओ आंदोलन को समर्पित विजय जड़धारी ने 1979 के
बडियारगढ़ के चिपको आंदोलन का विस्तार से
जिक्र करते हुए बहुगुणा जी को आत्मीयता के साथ याद किया है। उनके लेख में कुंवर
प्रसून की निर्भीकता और धूम सिंह नेगी के जुझारूपन का भी अच्छा विवरण है। कुंवर प्रसून का एक पुराना लेख चिपको के इतिहास पर
है। राजीव लोचन साह ने उन्हें ‘नैनीताल समाचार’ के एक
प्रेरणा-स्रोत और पत्रकार के रूप में पेश किया है। कुछ लेख मात्र श्रद्धांजलि
स्वरूप हैं। सभी लेखों की चर्चा यहां की भी नहीं जा सकती। अंग्रेजी लेखों को फिलहाल पढ़ा नहीं जा सका है।
सुंदरलाल जी से असहमतियां और उनसे जुड़े विवाद भी कम नहीं
हैं लेकिन सम्पादक मधु पाठक ने लिखा ही है- “कुछ ऐसे भी लेख मिले जो आलोचनात्मक रूप से लिखे गए थे। यह उनके लिए उपयुक्त
मंच नहीं था। इसलिए मैं उनको शामिल नहीं कर सकी।” इस स्मृति ग्रंथ में शेखर पाठक
के लेख की अनुपस्थिति उल्लेखनीय है। आखिर वह बहुगुणा जी ही थे जिन्होंने इस पीढ़ी
को सर्वाधिक उप्रेरित किया। ‘अस्कोट-आराकोट’ यात्रा
का विचार उनका ही दिया हुआ है, जिसने उत्तराखण्ड को देखने की
नई दृष्टि दी और उस टोली के प्रारम्भिक चार युवकों में आज शेखर पाठक ही हमारे बीच
हैं और बहुगुणा जी के अत्यंत प्रिय भी रहे हैं। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाली अनुपस्थिति
चंडी प्रसाद भट्ट जी की है, जो प्रारम्भ में बहुगुणा जी के साथ
कंधे से कंधा मिलाकर चले-लड़े, हालांकि बाद में उनमें विवाद हुए
और राहें भी अलग गईं।
जैसे, सुंदर लाल जी जैसे व्यक्तित्वों के होने से गांधी जी की प्रासंगिकता आज तक बनी आई है, वैसे ही सुंदरलाल जी की प्रासंगिकता उनके रोपे पौधों और उनसे प्रेरित पीढ़ियों की सक्रियता से बनी रहेगी।
- न जो, 14 जुलाई, 2022 (नैनीताल समाचार के लिए)


