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Tuesday, October 03, 2023

एक कहानीकार का कारखाना

“हम लोगों ने जो दक्षता हासिल की थी ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की, उसका अध्याय सन 1962 की लड़ाई के बाद खत्म हो गया था। चीन के साथ मुठभेड़ में हमारे जो ‘रिवर्सेज’ हुए, उसकी जब इंक्वायरी हुई, एंडर्सन ब्रुक्स की देख-रेख में तो पाया गया कि हमारी फ्लीट (सैन्य गाड़ियां) जो हैं, वह अलग-अलग किस्म की, विदेशी थी, जिसका निर्माण उन देशों में बंद हो चुका था। इसलिए ‘स्पेयर पार्ट्स’ की ‘बैकिंग’ नहीं थी। फ्लीट की ये जो कमजोरी थी इसकी वजह से भी नुकसान हुआ था। तो, रातों-रात ये तय हुआ कि अब व्हैकिल रिपेयर नहीं होंगे। नई खरीद की जाएगी और उस पर अपनी सेना की रिक्वायरमेंट के हिसाब से बॉडी बिल्ड की जाएगी। तो, हमारी रिपेयर वर्कशॉप को हम लोगों ने प्रॉडक्शन यूनिट के रूप में बदला और वो इतना प्रेरक था...। एक मेजर साब, जिनको ये ड्यूटी दी गई थी कि वो पूरे देश में जाकर ये देखें कि (गाड़ियों की) बॉडी बिल्डिंग के लिए किस तरह के उपकरणों की जरूरत होगी, किस तरह की उसकी रूपरेखा होगी। वो मेरे सीनियर बॉस थे। रिपेयर का काम खत्म हो गया था लेकिन वर्कर्स को निकाला नहीं जा सकता था। वर्कर्स आते थे और जो गाड़ियां खुली हुई थीं, उनको जोड़-जाड़ के डिस्पोजल के लिए भेजते थे। साढ़े तीन बजे जब वो चले जाते थे तो मेजर साब अकेले बैठ के प्लानिंग करते थे कि कौन-कौन सी मशीनें लगेंगी, कहां-कहां लगेंगी, कितनी पावर की उसमें जरूरत होगी। मैंने सोचा कि ये कभी ट्रांसफर हो गए, क्योंकि आर्मी ऑफीसर्स का दो-तीन साल में ट्रांसफर हो जाता था, तो इन चीजों को समझना जरूरी है। तो, मैंने उनसे कहा कि मैं आपके साथ बैठूंगा। वो मुझसे बहुत स्नेह करते थे। हम लोग वर्कर्स के जाने के बाद कॉफी बनाते थे, वो खुद बनाते थे, और एक-एक कप कॉफी पीकर काम पर जुट जाते थे। अपनी समझ से मैं भी उन्हें राय देता था। वो जो देख के आए थे पूरे देश में, कम्पनियों में, उसके हिसाब से मशीनें मंगाई गईं, इन्स्टॉल की गईं और वर्कर्स, जवानों को एक प्राइवेट कम्पनी में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। वो वहां से सीख के आए कि बड़ी-बड़ी मशीनें, जिनमें आठ बाई दस की बड़ी-बड़ी चादरें, दस गेज की, बारह गेज की, चौदह गेज की, कटती हैं, उनको कैसे ऑपरेट करना है, ब्रेक प्रेस है, पावर प्रेस है, वेल्डिंग कैसे करनी है। ये कमाल लोगों का था कि जो लोग बढ़ई थे, इलेक्ट्रीशियन थे, फिटर थे, वो लोग भी इन मशीनों पर काम करने लगे और एक भी एक्सीडेंट नहीं हुआ। जो ड्रॉइंग्स आई थीं, चूंकि हमने मैकेनिकल ड्रॉइंग भी पढ़ी थी, उसको मैं स्वयं डेवलप करके शॉप फ्लोर को देता था और क्या-क्या टोलिंग होगी...। सौभाग्य से एक बहुत ही कुशल टूलमेकर हमारे पास थे, मोईन भाई, जिनका पूरे प्रदेश में टूलमेकर के रूप में नाम था। उनकी बनाई हुई डाइस, पंचेस.... अलग-अलग गाड़ियों की चेसिस बनती थी, बॉडी बनती थी, ऐसे कि आप उनको खोल के फिर जोड़ सकें, फोल्डिंग करके। जैसे, एक गाड़ी की बॉडी आई, बूचड़खाने से (बकरों की) खाल उतार के अलग-अलग यूनिट्स को देने के लिए, ड्रेस्ड मीट कैरियर। उसमें बीस-पच्चीस बकरे लटकाने के लिए ऊपर हुक लटके हुए थे। ड्रॉइंग बनाने वालो ने कुछ असावधानी से छत पर ध्यान नहीं दिया। जब उसका रोड टेस्ट करने के लिए पच्चीस-पच्चीस किलो के बोरे लटका कर उसे चलाया गया तो छत बैठ गई। फिर उसे सपोर्ट करने के लिए ड्रॉइंग में नया बदलाव किया गया। तो, इतना सृजनात्मक था, हर चीज, कि देख के तबीयत प्रसन्न हो जाती थी। ये जरूर है कि पढ़ने-लिखने के लिए समय नहीं मिला लेकिन काम में ताजगी रही।

(मेरी सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘शेखर जोशी- कुछ लेखन की, कुछ जीवन की’ में प्रकाशित उनके अंतिम इण्टरव्यू का एक अंश। पुस्तक मँगाने के लिए सम्पर्क करें‌ नवारुण प्रकाशन, फोन/व्ट्सऐप- 9811577426)   

Saturday, July 09, 2022

हमारे 'दाज्यू' और सबके ‘उस्ताद’ को बधाई

जाने-माने वयोवृद्ध कथाकार शेखर जोशी को ‘अमर उजाला’ समूह का ‘आकाशदीप’ सम्मान देने की घोषणा हुई है। यह सम्मान समग्र साहित्यिक योगदान के लिए दिया जाता है। आने वाली 10 सितम्बर को नब्बे साल पूरे करने जा रहे शेखर जोशी आज भी लेखन में सक्रिय हैं यद्यपि आंखों की असाध्य बीमारी ने यह काम बहुत मुश्किल कर दिया है। एक विशेष आकारवर्धक शीशे से वे नया लेखन पढ़ने की कोशिश करते हैं और इसी तरह थोड़ा-थोड़ा लिख भी लेते हैं। इन दिनों मुख्य रूप से कुमाऊंनी में लिख रहे हैं। साहित्यिक लेखन से उनके अद्यतन रहने का ताजा उदाहरण यह है कि अंतराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से समानित गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ का अंग्रेजी संस्करण (जो उनकी पोती ले आई थी) न केवल ‘उलटा-पुलटा’ एवं उसका क्थासार जाना है, बल्कि गीतांजलि श्री और डेजी रॉकवेल के बारे में जानकारी भी हासिल कर ली है। गीतांजलि श्री को बधाई देते हुए वे यह भी पूछते हैं कि जब डेजी रॉकवेल ने वर्षों पहले भीष्म साहनी के ‘तमस’ का अंग्रेजी अनुवाद किया था, तो वह पुरस्कार समिति के संज्ञान में क्यों नहीं आया?     

बहरहाल, शेखर दाज्यू ने पहली कहानी ‘राजे खत्म हो गए’ नाम से 1952 या 53 में लिखी थी। दूसरे विश्व युद्ध में हमारे पहाड़ों से हजारों युवा फौज में गए थे। उन दिनों कुमाऊं मोटर ओनर्स यूनियन की मोटरें फौजियों से इतनी भरी रहती थीं कि आम सवारियों को जगह नहीं मिल पाती थी। जब उनकी उम्र करीब दस साल रही होगी तो एक दिन गांव से पैदल अल्मोड़ा जाते हुए उन्होंने जगह-जगह मोटर के इंतजार में फौजियों को खड़े देखा। उनको विदा देने के लिए उनके परिवार की बहुत सी महिलाएं भी वहां थीं। पुरुष कम दिखाई देते थे। जैसे ही गाड़ी आती, फौजी बक्सा पकड़कर चट से गाड़ी के अंदर बैठ जाते लेकिन जैसे ही गाड़ी चलती थी, तो पीछे जो रुलाई फूतती थी, वह इतनी दर्दनाक होती थी कि उनके बाल मन में वह अमिट रह गई। गांवों में बहुत-सी विधवाएं भी वे देखते थे। उस कहानी में एक बुढ़िया है  जो अपने बेटे का इंतजार कर रही है। वह इस भ्रम में है कि बेटा ज़िंदा है और आएगा लेकिन बेटा पता नहीं कब शहीद हो चुका है। गांव में एक मंत्री जी आए हुए हैं। उन्होंने दही खाने की इच्छा व्यक्त की। लोग दही लेने के लिए बुढ़िया के पास पहुंचे। बुढ़िया ने बड़ी खुशी से दही की हाँडी उनको दे दी और कहा- अच्छा, राजे आए हैं!  कभी मेरा राजा भी आएगा। नैरेटर कहता है कि मैंने उससे कहा नहीं लेकिन राजे तो खत्म हो गए हैं। शेखर जी की यह कहानी तब ‘समास’ पत्रिका में छपी थी लेकिन उनके किसी संग्रह में शामिल नहीं है। वे इस पहली कहानी को अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘कोसी का घटवार का बीज मानते हैं। उनकी दूसरी कहानी ‘आदमी और कीड़े’ को धर्मयुग की कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला था। वह भी किसी संग्रह में नहीं है। 

तीसरी कहानी ‘दाज्यू’ ने शेखर जोशी को कहानीकार के रूप में बड़ी प्रसिद्धि दिलाई। आज भी उसकी चर्चा होती है। उसे लिखे जाने का भी रोचक किस्सा है। 1951 से 1955 तक वे दिल्ली में आयुध कारखाने की ट्रेनिंग के दौरान रहे। पहाड़ी की नराई लगती थी। एक इतवार को अखबार में ‘पर्वतीय जन विकास समिति’ की बैठक की सूचना छपी थी। वे साइकिल लेकर वहां पहुंच गए। वहां होटलों में काम करने वाले पहाड़ी लड़कों की बैठक चल रही थी। हुआ ये था कि कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी सी जोशी को पता चला था कि ये पहाड़ी लड़के दिन में होटलों में काम करने के बाद शाम को सस्ते होटलों में जाकर बिगड़ रहे हैं, जबकि बड़े प्रतिभावान हैं। कामरेड जोशी ने इन लड़कों को एकजुट करने और उनकी रुचि का परिष्कार करने के लिए ‘पर्वतीय जन विकास समिति’ नाम से सांस्कृतिक संस्था बनवा  दी। बाद में ब्लिट्ज के सम्पादक हुए नंद किशोर नौटियाल उस समिति के एक मासिक बुलेटिन का  सम्पादन करते थे। शेखर जोशी भी उससे जुड़ गए और टिप्पणियां लिखने लगे। जब उसका वार्षिकांक  निकालने की योजना बनी तो नौटियाल जी ने शेखर जोशी से एक ऐसी कहानी लिखने को कहा, जिसमें  पात्र होटल वर्कर हों। तब ‘दाज्यू’ कहानी लिखी गई। पी सी जोशी ने वह कहानी पढ़ी और प्रभावित हुए। बाद में 1955 में इलाहाबाद जाने पर वहां के साहित्यकारों के बीच उन्होंने ‘दाज्यू’ पढ़ी जिसे खूब सराहना मिली। तभी उपेंद्र नाथ अश्क ने ‘दाज्यू’ कहानी अपने ‘संकेत’ संकलन में प्रकाशित की। फिर तो उनकी ख्याति फैलती गई और उन्होंने एक से एक कहानियां हिंदी साहित्य को दीं, जिनमें मजदूरों और कारखानों के जीवन पर ‘उस्ताद’, ‘बदबू,’ ‘मेण्टल’, ‘नौरंगी बीमार है’, ‘आशीर्वचन’, ‘हेड मासिंजर मंटू’ उनकी प्रसिद्ध कहानियां भी हैं। श्रमिकों पर यादगार कहानियां लिखने वाले वे अकेले हैं। साथ-पैंसठ साल पहले लिखी गई उनकी कहानियां आज भी जगह-जगह उद्धृत की जाती हैं। यह उपलब्धि विरल है। ‘कोसी का घटवार’ तो गुलेरी जी की जग प्रसिद्ध कथा ‘उसने कहा था’ के समकक्ष ठहराई जाती है।

शेखर दाज्यू को इस सम्मान के लिए बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं कि उनके रचनातरत रहते हम उनकी जन्म शताब्दी मनाएं।  

 - न जो, 09 जुलाई, 2022