
सन 1951
में मौसम विभाग बना और तभी से अधिकतम-न्यूनतम तापमान दर्ज करना शुरू हुआ. राजस्थान
के फलोदी कस्बे में 23 मई 2016 को अब तक देश का सर्वाधिक तापमान,
51 डिग्री सेल्सियस पाया गया है. हमारे इलाहाबाद के लिए 48.6 डिग्री सर्वाधिक है.
आने वाले दिनों में और भी ज़्यादा तापमान दर्ज हो तो आश्चर्य नहीं. इस पृथ्वी को हम
उसी दिशा में ले जा रहे हैं.
लखनऊ में
मौसम विभाग के उपकरण अमौसी में लगे हैं, जहाँ अपेक्षाकृत
खुली जगह है. कंक्रीट का जंगल इतना घना नहीं हौ, जितना
बाकी शहर में. इसलिए जो तापमान वहाँ 44.8 डिग्री दर्ज किया गया, वह
तारकोल की सड़कों और कंक्रीट की इमारतों के बीच निश्चित ही 45 डिग्री पार होगा.
साल-दर-साल
सूरज उतनी ही आग उगलता रहा है. उसकी भट्ठी कभी कम या ज़्यादा नहीं जलती. तापमान बढ़ने
के लिए उसे दोष देना बेकार है. हमारा वायुमण्डल उसकी लपटों को रोक पाने में कमजोर
होता गया है. धरती में में भी तापमान बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती गयी है. और, ‘विकास’
करते मनुष्य ने
धरती पर आग उगलने वाले उपकरण बना लिए. सूरज की गर्मी में धरती की गर्मी मिलती गई.
तापमान के रिकॉर्ड टूटते गये.
इस तरह का
कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि किसी शहर के कुल वातानुकूलन संयंत्र, वाहन
और अन्य उपकरण अपने दिन-रात के उत्सर्जन से उसका तापमान कितना बढ़ा देते होंगे. इसे
महसूस किया जा सकता है जब आप किसी घर या दफ्तर में लगे एसी के पीछे से गुजरें. एक
लू तीखी धूप से निकलती है, एक इन संयंत्रों से. दोनों मिलकर शहर का तापमान बढ़ा रहे
हैं. इसे थोड़ा भी कम कर सकने वाली हरियाली
भी गायब होती गयी है.
इसी लखनऊ
शहर में सरकारी दफ्तर हों या निजी कोठियाँ 1970 के दशक तक गर्मियों में खस की
चट्टियों-पर्दों का प्रयोग करते थे. भीगी खस से गुज़रने वाली गर्म
हवा इतनी शीतल हो जाती थी कि आज के एसी शरमा जाएँ. भीषण गर्मी में दफतरों के
बरामदे ही नहीं आस-पास का इलाका भी शीतल-सुखदाई रहता था.
सन 1975
में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा ने सचिवालय के अपने कक्ष में पहला
एसी लगवाया था. उत्तर प्रदेश का वह एकमात्र एसी देहरादून के उस डाक बंगले से
निकलवा कर लाया गया था,
जहाँ नेहरू जी
अपनी बीमारी के दिनों आराम करने जाया करते थे. आने वाले सालों में धीरे-धीरे
सचिवालय ही नहीं,
सारे सरकारी दफ्तरों
में एसी लगने लगे. आज खस का नाम भी लोग भूल गये होंगे. सरकारी दफ्तरों के
गलियारे-बरामदे अब एसी का इतना तेज गर्म भभका छोड़ते हैं कि वहाँ एक मिनट खड़ा रहना
मुश्किल है.
शहर की हवा
में हम कितनी गर्मी और जहरीली गैसें छोड़ रहे हैं, इसकी
चिंता शायद ही कोई करता होगा. इससे
वातावरण की वह ओज़ोन परत छीज रही है जिससे सूरज कीअतिशय गर्मी और खतरनाक किरणें ऊपर
ही रुक जाती थीं. फ्रिज और दीवारों का
रासायनिक पेण्ट हमारे घर-भीतर का तापमान कितना बढ़ा देते हैं, इसका
अनुमान शायद ही किसी को हो. इनसे अन्य दुष्प्रभाव भी होते हैं. आधुनिक होने के
पैमाने ऐसे बना दिये गये हैं कि सुराही का पानी पीने वाले का मज़ाक बनाया जाता है.
विकास के हमारे
ढर्रे ने जहाँ इस धरती को लगातार गर्म करने काम किया है वहीं गर्मी बर्दाश्त करने
की हमारी क्षमता भी घटा दी है. प्रकृति की ओर वापसी का कोई रास्ता दिखाई नहीं
देता.
(सिटी तमाशा, 01 जून, 2019)
No comments:
Post a Comment