
उद्घाटन के बाद कुछ समय तक शौकिया
सवारियों से मेट्रो गुलजार रही लेकिन धीरे-धीरे सवारियाँ कम होने लगीं. इन दिनों
हालत यह है कि अमौसी से मुंशी पुलिया मार्ग पर ज़्यादातर हिस्से में मेट्रो में बहुत
ही कम सवारियाँ दिखाई दे रही हैं. भारी-भरकम रकम खर्च करके खूब सवारियाँ न मिलें
और सड़कों पर वाहनों की रेलमपेल कम न हो तो क्या फायदा?
यह देखते हुए मेट्रो प्रशासन ने
यात्री बढ़ाने के उपाय खोजने शुरू किए. पहले उन्होंने मेट्रो रूट के आस-पास वाले
इलाकों से मेट्रो स्टेशनों तक शटल सेवाएं चलाने की कवायद की. एक तो यह प्रयास
कारगर नहीं हुआ, दूसरे इससे सवारियाँ बढ़ने
के लक्षण नहीं दिखाई दिये. तब जिला प्रशासन को एक नायाब सुझाव दे डाला कि मेट्रो
रूट पर ऑटो-टेम्पो चलाना बंद कर दिया जाए ताकि इस व्यस्त मार्ग की सवारियाँ मजबूरी
में मेट्रो से सफर करें. बीते मंगलवार को जिला प्रशासन ने इस क्रूर फैसले पर मुहर
लगा दी है.
ऑटो-टेम्पो वालों की यूनियन है.
इसलिए उनकी आपत्ति सुन ली गयी. कहा जा रहा है कि इस रूट पर चलने वाले ऑटो-टेम्पो
को नये रूट दिये जाएंगे. लेकिन जनता की कोई यूनियन नहीं है,
इसलिए उसकी तरफ से बोलने वाला कोई नहीं है. अमौसी-मुंशीपुलिया मार्ग
पर ऑटो-टेम्पो बंद होने से आम जनता कितनी परेशान होगी और मेट्रो में ही चलने की
बाध्यता उनकी कितनी जेब काटेगी, इसका अंदाज़ा न मेट्रो के
कर्ता-धर्ता लगाना चाहेंगे न जिला प्रशासन को इसमें दिलचस्पी है. परिवहन विभाग के
अनुसार ही इस मार्ग पर रोजाना करीब छह लाख लोग साढ़े तीन हजार ऑटो-टेम्पो से चलते
हैं.
असल बात यह है कि मेट्रो अत्यधिक
महंगी परियोजना है और वह लखनऊ जैसे ‘छोटे’
शहरों के लिए कतई उपयुक्त नहीं है. जी हाँ, मेट्रो
के लिहाज से लखनऊ छोटा ही कहलाएगा. लखनऊ ,इलाहाबाद, गोरखपुर, कानपुर, बनारस,
आदि शहरों को भी जरूरत सस्ती, सुलभ और नियमित
बस सेवा की है, जिस पर सरकारों का कतई ध्यान नहीं है.
लखनऊ में नव-धनाढ्यों की कमी नहीं है
लेकिन उन्हें सार्वजनिक परिवहन नहीं चाहिए. मध्य-वर्ग के जो लोग मेट्रो की सवारी
कर सकते हैं उन्हें अपने वाहन से चलने का सार्वभौमिक नशा है. बाकी बचे गरीब-गुरबे,
जिनकी संख्या सबसे ज़्यादा है, बल्कि एक तरह से
शहर ही उनका है, वे बस के इंतज़ार में घण्टों बैठे रहते हैं
या सस्ते ऑटो-टेम्पो का सहारा लेते है. उन्हें ‘आलीशान
मेट्रो’ नहीं, सस्ती एवं अच्छी बस सेवा
चाहिए.
मेट्रो को आम परिवहन का माध्यम बनाना
है तो उसे इतना सस्ता बनाइए कि गरीब-गुरबे भी यात्रा कर सकें. महंगा सौदा है तो
सब्सिडी बढ़ाइए. चुनाव जीतने के लिए कितनी ही मुफ्तिया चीजें दी जाती हैं. मेट्रो
को सस्ता क्यों नहीं कर सकते? अन्यथा,
मेट्रो हमारे शहरों के लिए अभी कई साल तक आम परिवहन का माध्यम नहीं
बनने वाली. वह खाली ही चलेगी और भारी घाटे में. हमें पूरी आशंका है कि लखनऊ मेट्रो
का अगला फेज निकट भविष्य में शायद ही शुरू हो.
शहर के छह लाख आम लोगों को प्रतिदिन
सस्ती ऑटो-टेम्पो सेवा से वंचित कर मेट्रो से चलने के लिए बाध्य करके प्रशासन बड़ा
अत्याचार करने जा रहा है. यह तुगलकी फैसला है. सड़कों को अराजक टेम्पो-ऑटो,
ई-रिक्शा और निजी बसों की रेलमपेल से बचाना है तो सस्ती, सुलभ और नियमित बस सेवा दीजिए या मेट्रो को सस्ता बनाइए.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 15 जून, 2019)
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