
2019 के चुनाव में नरेंद्र मोदी एक ‘कल्ट’ के रूप में उभरे हैं. उन्हीं की छवि से अकेले
भाजपा को तीन सौ से ज़्यादा और एनडीए को साढ़े तीन सौ सीटें मिली हैं. देश के
अधिसंख्य राज्यों में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें हैं. राज्य सभा में अभी
सत्तारूढ़ दल बहुमत में नहीं है लेकिन एक साल में यह भी उसे हासिल हो जाएगा. तब
सरकार अपने मनचाहे विधेयक पारित करा सकती है.
इन हालात में सशक्त विपक्ष की बड़ी
जरूरत है जो न केवल सरकार पर चौकस निगाह रख सके बल्कि स्वस्थ और रचनात्मक आलोचना
से उसकी सहायता भी कर सके. आज हमारे पास सशक्त विरोधी दल तो छोड़िए,
लोक सभा में आधिकारिक प्रतिपक्ष के रूप में भी कोई पार्टी नहीं है.
ले-दे कर कांग्रेस है लेकिन वह 2014 में जीती मात्र 44 सीटों को इस बार 52 तक ही
ले जा सकी. ये उतनी भी सीटें नहीं हैं कि लोक सभा में उसके नेता को प्रतिपक्ष के
नेता का संवैधानिक दर्जा मिल सके.
यहाँ यह भी कहना है कि संख्या बल ही
सशक्त विपक्ष की गारण्टी नहीं है. नेहरू-युग में जब कांग्रेस बहुत ताकतवर थी और
कोई दूसरा राष्ट्रीय दल उनके आस-पास भी नहीं था, तब
विपक्ष के कई धुरंधर नेता अकेले दम कांग्रेस सरकार पर अंकुश रखने में सफल थे. लोहिया
का गैर कांग्रेसवाद उसी दौर की उपज था. 1971 की प्रचण्ड विजय के बाद जब इंदिरा
गांधी निरंकुश होती गईं और 1975 में उन्होंने देश पर आपातकाल थोप कर संविधान को
निलम्बित कर दिया तब छोटे-छोटे दलों ने एक होकर उन्हें जबर्दस्त चुनौती दी और
सत्ता से बाहर किया. कांग्रेसी वर्चस्व को संयुक्त विपक्ष की सशक्त चुनौतियाँ
मिलने के एकाधिक उदाहरण ताज़ा इतिहास में हैं.
क्या आज कांग्रेस इस स्थिति में है
कि वह मोदी सरकार को, जो और भी शक्तिशाली
होकर सत्ता में लौटी है, संसद से सड़क तक चुनौती दे सके?
पिछले दिनों राहुल गांधी ने
कहा था कि हमारे 52 एमपी मोदी सरकार को चैन से बैठने नहीं देने के लिए काफी हैं.
ऐसा हो सके तो लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण ही होगा लेकिन क्या आज कांग्रेस की हालत
को देखते हुए उनकी बात पर भरोसा होता है?
सोलहवीं लोक सभा में जब कांग्रेस 44
सीटों पर सिमट गई थी तो कहा गया था कि वह अपने सबसे कठिन दौर में है. सत्रहवीं लोक
सभा में उसके आठ और सांसद जीत कर आ गये. इसके बावजूद कांग्रेस अब कहीं ज़्यादा
गम्भीर संकट से गुजर रही है. देश की यह सबसे पुरानी और गहरी जड़ों वाली पार्टी फिर
कैसे खड़ी होती है, यह समय बताएगा लेकिन
फिलहाल तो खुद पुराने खांटी कांग्रेसी नेता पार्टी के भविष्य के प्रति चिंतातुर
हैं.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली
ने चंद रोज पहले यूँ ही नहीं कहा कि राहुल गांधी या तो पार्टी के अध्यक्ष पद से
इस्तीफा वापस लें या कोई सुयोग्य विकल्प दें लेकिन कांग्रेस के भीतर का असंतोष
तत्काल दूर करने के उपाय करें. उनकी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की चिंता के
पर्याप्त कारण हैं. तेलंगाना में कांग्रेस के 12 विधायक सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र
समिति में शामिल हो गये. महाराष्ट्र में कांग्रेस विधायक दल में टूट के आसार हैं.
कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर कबसे घमासान मचा है, विधायक
पाला-बदल कर रहे हैं और जद (एस) गठबन्धन तोड़ने की धमकी तक दे चुका है.
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलौत
और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट खुलेआम लड़ रहे हैं. मध्य प्रदेश और राजस्थान की
कांग्रेस सरकारों को खुद कांग्रेसी विधायक कब अल्पमत में ले आएं,
कहा नहीं जा सकता. एकमात्र कांग्रेसी राज्य पंजाब में, जो मोदी लहर को रोकने में कामयाब रहा, कांग्रेस के
भीतर लड़ाई चल रही है. उत्तर- पूर्व के राज्यों में ज़्यादातर पुराने कांग्रेसी
पार्टी छोड़ चुके हैं. उत्तर प्रदेश में दो साल से पूर्णकालिक कांग्रेस अध्यक्ष
नहीं है. बिहार में भी विधायक दल में असंतोष की खबरें आती रहती हैं. जम्मू-कश्मीर,
हरियाणा, झारखण्ड सभी जगह आपसी लड़ाइयाँ हैं.
कोई एक राज्य ऐसा नहीं दिखता जहाँ कांग्रेस आज बेहतर संगठन और सक्रियता के लिए जानी
जाती हो.
पार्टियों में असंतोष और झगड़े नई
बात नहीं हैं. भाजपा में भी कई राज्यों में बहुत असंतोष हैं लेकिन वहाँ पार्टी
नेतृत्व उसे नियंत्रित करने में देर नहीं लगाता. कांग्रेस नेतृत्व ने हाल में किसी
राज्य में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे लगे कि वह संगठन की समस्याओं के समाधान के
लिए सजग और सक्रिय है.
चुनावों में बड़ी पराजय के बाद से
राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर कोप-भवन में हैं. कुछ नेता उन्हें
मनाने में लगे हैं. उधर पार्टी बिखर रही है. राहुल के अलावा किसी और को अध्यक्ष
चुनना हो तो वह निर्णय शीघ्रातिशीघ्र किया जाना चाहिए. समस्या यह है कि इंदिरा
गांधी के बाद कांग्रेस इस कदर नेहरू-गांधी वंश पर आश्रित होती गयी कि आज के कांग्रेसी
उस परिवार के सदस्य के अलावा किसी और को अपना नेता चुनने की कल्पना तक नहीं कर
सकते.
राहुल गांधी करें या कोई और,
कांग्रेस को अपना घर सम्भालते हुए न केवल नये सिरे से खड़ा करना है
बल्कि उनकी मुख्य चुनौती उस विचार को देश भर में फिर से अच्छी तरह प्रसारित करने
की है जिसे वह ‘आयडिया ऑफ इण्डिया’ कहते
हैं. आज देश में मतदाताओं का विशाल युवा वर्ग ऐसा है जिसने कांग्रेसी मूल्यों के
पराभव, पार्टी के क्षरण और उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के
गम्भीर आरोपों के दौर में आंखें खोली हैं. इसी दौरान भाजपा और आरएसएस के विविध
संगठनों के ज़रिए कट्टर हिंदुत्व एवं उग्र राष्ट्रवाद का विचार तेजी से फैला है.
इस पीढ़ी को सही-सही पता ही नहीं कि
कांग्रेस किन मूल्यों की पोषक रही है. उदाहरण के लिए, जब भाजपा की तरफ से नेहरू का छवि-मर्दन किया गया,
तब कांग्रेस यह बताने में विफल रही कि नेहरू की इस देश को वास्तविक देन क्या है.
सशक्त प्रतिपक्ष बनने या सत्ता में
वापसी के लिए आज की कांग्रेस को अपनी ‘कांग्रेसियत’
पहले खुद पहचाननी होगी. उसके पास स्वतंत्रता आंदोलन और इस
विविधतापूर्ण देश की बहुलता के सम्मान की विरासत है. उन्हीं मूल्यों के कारण ही आज
उसकी और भी ज़्यादा ज़रूरत है.
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