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Sunday, April 23, 2017

सपा के ‘भ्रष्टाचार’ से योगी सरकार की छवि चमकाने का प्रयोग


उत्तर प्रदेश के आला अफसर जिन परियोजनाओं को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ड्रीम प्रॉजेक्ट कहते थे, चुनाव से पहले जिन्हें पूरा हुआ दिखाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया गया, वही परियोजनाएं अब उन अफसरों के लिए फंदा बन रही हैं. अपने जिन विकास कार्यों को अनोखी उपलब्धियां प्रचारित करके अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता में दोबारा आने की उम्मीद बांधे थे, उन्हें आज योगी सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार के कीर्तिमान साबित करने में पसीना बहा रहे हैं.
यूरोप के शहरों को नजीर बना कर राजधानी लखनऊ के विभिन्न इलाकों में अखिलेश सरकार ने जो सायकिल पथ बनाये थे, योगी सरकार उन्हें तोड़ने की तैयारी कर रही है. गलत भी नहीं है यह कहना कि अनेक जगह ये सायकिल पथ अनावश्यक और यातायात के लिए बाधा बन गये हैं. इस्तेमाल भी कोई नहीं करता.
नयी दिल्ली के इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर की तर्ज पर लखनऊ में बना जे पी इण्टरनेशनल सेण्टर, साबरमती रिवर फ्रण्ट से प्रेरित गोमती रिवर फ्रण्ट डेवलपमेण्ट प्रॉजेक्ट, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे, आई टी सिटी जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं अखिलेश सरकार की विकास-कथा का शीर्षक थीं. लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे के लिए अखिलेश चुनाव सभाओं में कहते थे कि यदि प्रधानमंत्री मोदी इस सड़क से गुजर जाएं तो वे भी समाजवादी पार्टी को वोट देने को मजबूर हो जाएंगे.
वोट तो उन्हें शाबाशी देने वालों ने भी नहीं दिया मगर मोदी जी की यूपी टीम अखिलेश के ड्रीम प्रॉजेक्ट्स की नींव से भ्रष्टाचार के बोल्डर खोद निकालने में जुट गयी है. एक-एक मद में हुए खर्च की जांच हो रही है. फाइलें, टेण्डर, भुगतान, वगैरह की पड़ताल हो रही है. बेईमानी और मनमानी के सबूत जुटाने के लिए मंत्री सीढ़ियों से  से पन्द्रह मंजिल तक चढ़ जाने का करिश्मा दिखा रहे हैं.
इस तरह भ्रष्टाचार-मुक्त पारदर्शी सरकार की छवि भी बन जा रही है.
नयी सरकारें पुरानी सरकार के काम-काज में मीन-मेख निकाला करती रही हैं. मामला विरोधी दल की सरकार का हो तो उपलब्धियां खारिज की जाती रही हैं. चुनाव प्रचार में वादे किये जाते हैं कि सत्ता में आने पर इस सरकार के सभी कार्यों की जांच करायी जाएगी. लेकिन आम तौर पर अमल नहीं किया जाता.
सन 2102 के चुनाव प्रचार में अखिलेश यादव हर सभा में ऐलान करते थे कि सत्ता में आने पर समाजवादी सरकार मायावती द्वारा लगायी गयीं पत्थर की मूर्तियों को ध्वस्त करा देगी. पत्थरों पर होने वाले खर्च की जांच कराएंगे.
सत्ता में आने पर उन्होंने एक भी मूर्ति को हाथ तक नहीं लगने दिया. जांच बैठाने की बात भी वे भूले रहे. इस पर आक्रोशित उनके एक अति-उत्साही समर्थक ने लखनऊ में मायावती की एक मूर्ति पर हथौड़े चला दिये थे. अखिलेश सरकार ने उस कार्यकर्ता से न केवल पल्ला झाड़ लिया, बल्कि रातोंरात भग्न मूर्ति को मायावती की नयी मूर्ति से ससम्मान बदल दिया था.
शीशे के घरों में रहने वाले दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते, राजनीति में बराबर सम्मानित इस सिद्धांत का योगी सरकार उल्लंघन कर रही है तो निश्चय ही बड़े कारण होंगे.
यूपी विजय के लिए मोदी और अमित शाह ने सारी ताकत झौंक दी थी तो इसीलिए कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है. 2019 के संग्राम के लिए यूपी जीतना जरूरी था. वह मोर्चा फतह हुआ. अब चिड़िया की आंख की तरह सिर्फ 2019 दिखायी दे रहा है.
महंत आदित्यनाथ योगी को मुख्यमंत्री बनाना उसी लक्ष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है. अगर उसी रणनीति में शामिल है पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार को महाभ्रष्ट साबित करना, तो क्या आश्चर्य.
अपनी कमीज की चमकदार सफेदी तभी उजागर होगी जब दूसरे की कमीज को बहुत मैली दिखाया जा सके. यूपी को बदलने का नारा है. भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी, वास्तविक विकास लाने वाली सरकार का चेहरा गढ़ना है. नये मानक बनाने हैं तो पुराने ध्वस्त करने होंगे.
गायत्री प्रसाद जैसे अखिलेश के मंत्रियों ने और यादव सिंह जैसे अखिलेश के इंजीनियरों ने तथा अनिल यादव जैसे अखिलेश के अफसरों ने मौके भी कम नहीं दिये हैं. योगी सरकार को सबूतों के लिए ज्यादा मेहनत करनी नहीं पड़ेगी.
2019 में भाजपा को हराने के लिए महागठबंधन बनाने की कवायद विपक्षी दल करने लगे हैं. उसका मुकाबला भी तो करना है. बन पड़ा तो ऐसे गठबंधन को महाभ्रष्टों का जमावड़ा सिद्ध करना होगा. जनता को बताना होगा कि ईमानदारी से काम करने वाली सरकार को उखाड़ने के लिए सारे बेईमान एक हो गये हैं.  ताकतवर क्षेत्रीय क्षत्रपों का ‘जातीय, पक्षपातपूर्ण और दागदार चेहरा’ जनता के सामने रखना है.
दिल्ली में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी है. यूपी की सत्ता पंद्रह साल बाद मिली है. इसका श्रेय भाजपा के नये, अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को जाता है. इस अवसर दीर्घावधि का बनाना है. यूपी ही नहीं, देश को बदलना है. 70 साल की बदहाली दुरुस्त करनी है. भाजपा सबसे अलग है, यह दिखा देना है.
मोदी से लेकर योगी तक आजकल इसी मिशन में लगे हैं. यूपी इसकी नयी प्रयोगशाला है. अपने ही कारणों से कांग्रेस और वाम दलों के पराभव के कारण भारतीय मध्य वर्ग को यह प्रयोग खूब भा रहा है, जिसके नायक नरेन्द्र मोदी हैं. 
-नवीन जोशी
(firstpost hindi, april 21, 2017) 


 





Wednesday, March 01, 2017

बाल न बांका हुई सकै गर नाम प्रजापति होय!

नवीन जोशी
नाम गायत्री प्रजापति, राज्य यू पी और ठिकाना समाजवादी पार्टी हो तो क्या कहने. गायत्री प्रजापति आजकल यूपी की राजनीति और प्रशासन में छाए हुए हैं. आजकल कहना उनके साथ अन्याय करना होगा. वे तो लम्बे समय से सत्ता के गलियारों और परिवार के बरामदों से लेकर स्वर्णिम खदानों तक छाए हुए हैं. हाँ, आजकल उनकी पूछ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है. पुलिस उनके दर्शन को तरस रही है. वे हैं कि सामने होकर भी पुलिस को दर्शन नहीं देते.
दरअसल, मध्य फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि गायत्री प्रजापति का स्थान कारागार होना चाहिए. कारागार को धन्य करने के लिए पुलिस प्रजापति की तलाश में है. वह उनके सरकारी बंगले में जाती है तो सरकारी सुरक्षा गारद बताती है कि वे महोदय वहां नहीं हैं. विधायक निवास वाले अंगरक्षक कहते हैं कि मंत्री जी अपने चुनाव क्षेत्र में हैं. चुनाव क्षेत्र भी उनका ठहरा जगप्रसिद्ध अमेठी. अमेठी के गदगद कार्यकर्ता पुलिस को बताते हैं कि गायत्री जी लखनऊ चले गए. लखनऊ में वे अक्सर एक खास ठिकाने पर विराजमान पाए जाते हैं. उनकी एक बहुप्रसारित फोटो है जिसमें वे मुलायम के चरण दोनों हाथों से पकड़े हुए कैमरे की तरफ मुस्करा रहे हैं. ये चरण उन्हें पार्टी से परिवार तक शक्तिशाली बनाते रहे. अब पुलिस इस ठिकाने तो जा नहीं सकती.
बात इतनी सी है कि एक महिला ने आरोप लगाया कि प्रजापति ने उनके साथ रेप किया. उनकी नाबालिग बेटी से भी रेप की कोशिश की. उनके विरुद्ध मुकदमा लिख लिया जाता तो जाता तो वे प्रजापति कैसे होते. अंतत: सुप्रीम कोर्ट को उनका स्मरण करना पड़ा. मुकदमा लिखा गया. इस सबके बावजूद प्रजापति जी मंत्री पद पर शोभायमान है. मुख्यमंत्री महोदय उन्हें मंत्रिमण्डल से निष्कासित करने की सोच भी नहीं सकते. एक बार जोश में उन्हें बर्खास्त करके देख लिया था, फौरन वापस लेना पड़ा. मुलायम के चरणों में बैठ कर मुस्कराते हुए फोटो तभी का है. पार्टी में विवाद के दिनों भी वे शिवपाल के साथ नेता जी के इर्द-गिर्द डटे रहे थे. निष्कासन और पुन: शपथ ग्रहण के बाद वे अखिलेश के पैर छूना भी नहीं भूलते.
हत्या जैसे संगीन आरोपों वाले मुख्तार अंसारी, कई बर्खास्त मंत्री और टिकट वंचित सपा नेता प्रजापति से रश्क करते हैं. अखिलेश ने कभी डी पी यादव को दूर किया तो कभी चचा शिवपाल की सिफारिश के बावजूद मुख्तार अंसारी और उनकी पार्टी को दुत्कार दिया. मगर रेप के आरोपी प्रजापति अब भी मंत्री पद पर आसीन हैं, सपा की शान बढ़ा रहे हैं और अमेठी से पार्टी के सुयोग्य प्रत्याशी  हैं. सपा के नए सुप्रीमो और लोकप्रिय मुख्यमंत्री स्वयं उनके प्रचार के लिए गए.
अमेठी की चुनावी जन सभा में अखिलेश के पहुंचने तक प्रजापति मंच से अपने सुकर्मों का बखान कर रहे थे. भावुक होकर रो रहे थे कि रेप का आरोप और कारागार भेजने का निर्णय उनके साथ कितना बड़ा अन्याय है. अखिलेश जब सभा मंच पर आए तो प्रजापति का तेज सहन नहीं कर सके. मुख्यमंत्री के भाषण तक प्रदीप्त-मुख प्रजापति मंच के सामने बैठे रहे.
प्रजापति के लिए गम्भीर आरोप कोई नए तमगे नहीं हैं. उनके खिलाफ संगीन आरोपों की मोटी फाइल प्रदेश के पूर्व लोकायुक्त ने एकाधिक बार सरकार के पास कार्रवाई के लिए भेजी थी. लोकायुक्त ने अपनी जांच में आरोप सही पाए थे. सरकार उस फाइल को अब तक मजबूत अल्मारी में सुरक्षित रखे है. इस प्रसंग के कुछ रोचक क्षेपक भी हैं.
कोई देढ़-दो वर्ष पहले सोशल साइट्स पर एक ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें एक सख्श फोन पर अमिताभ ठाकुर को धमकियां दे रहा है कि अपनी हरकतें बंद कर दो वर्ना बुरा हाल करुंगा. पुलिस महानिरीक्षक अमिताभ का आरोप था कि यह धमकी मुलायम सिंह यादव ने दी. आवाज मुलायम की जैसी थी. पृष्ठभूमि यह कि अमिताभ ठाकुर और उनकी एक्टिविस्ट पत्नी नूतन गायत्री प्रजापति के अवैध धंधों की पड़ताल कर रहे थे. अमिताभ ने इस पर मुलायम के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई. चंद रोज बाद अमिताभ के खिलाफ एक महिला ने रेप का मुकदमा लिखा दिया. अमिताभ के खिलाफ जांच अब तक चल रही है जबकि गायत्री प्रजापति शफ्फाक खादी में मंत्री रहते हुए ठसके से चुनाव लड़ रहे हैं.
गायत्री प्रजापति होने का महत्व इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि वर्तमान सपा सरकार में उन्होंने चार बार मंत्री पद की शपथ ली. पहली बार राज्यमंत्री पद की, फिर स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री की, उसके बाद कैबिनेट मंत्री की और बर्खास्त होने के बाद पुन: कैबिनेट मंत्री की.
सपा के सर्वेसर्वा रहे मुलायम और उनके प्रभवशाली भ्राता आज हाशिए पर हैं लेकिन उनके शरणागत गायत्री प्रजापति का बाल बांका न हुआ.
(http://www.bbc.com/hindi/india-39130767)




Saturday, January 21, 2017

मुलायम-युग के बाद नया चोला पहन रही सपा



दृश्य 2007: गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री हैं मुलायम सिंह यादव और विधान सभा चुनाव का सामना कर रहे हैं. लखनऊ में अपने बंगले से सुबह जल्दी निकलते हैं औरअंधेरा होने के बाद लौटते हैं. एक दिन में नौ-दस चुनाव सभाएं. हेलीकॉप्टर एक जगह 30 मिनट से ज्यादा नहीं रुकता. बंगले में वापस आकर नेताओं-कार्यकर्ताओं-मीडिया से मिलने का लम्बा सिलसिला. सोने के लिए मुश्किल से चार घंटे. चुनाव सभाओं में कभी हरयाणा से चौटाला को ला रहे हैं तो कभी आंध्र से चंद्र बाबू नायडू को, असम से गोस्वामी तो कर्नाटक से बंगरप्पा.

दृश्य 2012: विपक्षी नेता के रूप में बहुमत वाली मायावती सरकार के खिलाफ तूफानी चुनाव प्रचार. युवाओं की कमान बेटे अखिलेश को दी है तो खुद अपनी चुनाव सभाओं में सपा प्रत्याशियों को मंच पर खड़ा करके जनता के सामने उनसे माफी मंगवा रहे हैं-‘इन्होंने गलती की थी और आपने सजा दे दी. अब आप इन्हें माफी दे दो और जितवा दो.’

साल 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन से पहले मुलायम ने काफी पापड़ बेले, बड़ी उठा-पटक झेली और सपा को यू पी की ताकतवर पार्टी बनाने के लिए जबर्दस्त मेहनत की. गांव-देहात तक साइकिल चलाई और धर्मशाला में सोए. इस तरह लोहिया के इस चेले की साइकिल बड़ी धमक से एकाधिक बार यूपी की सत्ता तक पहुंची. यू पी का यह नेता देश का भी बड़ा नेता बना. क्षेत्रीय दलों और वामपंथियों के बीच सम्मान से स्वीकारा जाने वाला.

लेकिन मुलायम नामधारी यह देहाती पहलवान राजनीति में भी अपना चरखा दांव चलाता रहा. कभी दुश्मनों से दोस्ती की और दोस्तों को चित किया. इसी वजह से एक बार प्रधानमंत्री की दौड़ में आगे होकर भी उसे दगा मिली.
बढ़ती उम्र और कतिपय बीमारियां भी मुलायम को घर नहीं बैठा सकीं. उनके तेवर और दांव-पेंच चलते रहे. बेटे को यूपी की कमान सौंप कर वे केंद्र की राजनीति में जमना चाहते थे. प्रधानमंत्री बनने का सपना अब भी कुनमुना रहा था. लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि मुलायम का अपना पसंदीदा दांव उनके अपने ही बेटे ने उनके खिलाफ लगा दिया.

विपरीत परिस्थितियों में भी ठसक से रहने वाले मुलायम आज अपने ही बनाए अखाड़े में चित हैं. 2017 के विधान सभा चुनाव में वे सेनापति नहीं हैं, संरक्षक हैं. आदेश देने वाले नहीं, मजबूरी में आशीर्वाद देने वाले पिता. अब बेटा है सेनापति और सर्वे-सर्वा. टिकट के लिए मुलायम के दर पर अब भीड़ नहीं है. उलटे, वे बेटे को छोटी-सी लिस्ट थमा कर निवेदन कर रहे हैं कि इन्हें टिकट दे देना.

मुलायम का यह हश्र दयनीय है. यहां इस विश्लेषण में जाने का समय नहीं है कि उनकी यह गति क्यों हुई. संक्षेप में सिर्फ इतना कि इसके लिए कोई और नहीं वे खुद दोषी हैं. उन्होंने समय और स्थितियां के अनुकूल आचरण करने में भूल की. सन 2012 की चुनाव सभाओं में जब वे कह यह रहे थे कि यह चुनाव युवाओं का है और वे ही सपा की सरकार बनाएंगे, तो फिर क्यों भूल गए कि युवा बेटे को सत्ता सौपने के बाद उसकी राह में रोड़े नहीं लगाने चाहिए. बेटा बगावत नहीं करता तो अपना राजनैतिक भविष्य डुबो बैठता. खैर.
अब पूछा जा सकता है कि मुलायम के ‘सुप्रीमो’ न रह जाने के नफा-नुकसान हैं? पार्टी की चुनाव-सम्भावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा? चुनाव प्रचार का दृश्य कैसा होगा?  

इस बात पर सभी राजनैतिक विश्लेषक एकमत हैं कि मुलायम के नेतृत्व में सपा का जो नतीजा इन चुनावों में निकलता, अखिलेश के कमान सम्भालने के बाद उससे अच्छा ही रहेगा. अखिलेश की बगावत उनकी लोकप्रियता का ग्राफ काफी बढ़ा है.

वैसे भी, जिन हालात में अखिलेश पिता मुलायम को अपदस्थ कर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उससे काफी हद तक सवालों के उत्तर मिल जाते हैं. चुनाव आयोग ने भी माना कि सपा का भारी बहुमत अखिलेश गुट के साथ है. मुलायम अपने पक्ष में कोई दस्तावेज ही पेश नहीं कर सके. साफ है कि लगभग सारी पार्टी अखिलेश के साथ चली गई. जो चंद नेता मुलायम के साथ रह गए थे वे भी चुनाव आयोग के निर्णय के बाद उधर हो लिए. बचे शिवपाल और अमर सिंह तो वे खुद ही अंतर्धान हो गए हैं. इस चुनाव में तो उनकी कुछ नहीं चलने वाली. अमर सिंह को पार्टी से बाहर ही समझिए.

पार्टी में दो-फाड़ होता तो कयास लगाए जा सकते थे कि किस गुट का क्या अंजाम होगा. साइकिल चुनाव चिह्न जब्त हो जाता तो बड़े सवाल खड़े हो जाते. अपने पूर्व कथन के मुताबिक अगर मुलायम अखिलेश के खिलाफ चुनाव लड़ते तो अद्भुत और अभूतपूर्व नजारा बनता. इस सब की नौबत नहीं आई. पूरी पार्टी अब अखिलेश के पीछे एक है. ‘नेता जी’ बदल गए हैं. इसके साथ पार्टी का चेहरा भी थोड़ा बदला है. इसलिए कुछ परिवर्तन तो अभी होने लगे हैं.

टिकट वितरण का निर्णय अखिलेश और रामगोपाल कर रहे हैं. अपराधी प्रवृत्ति वाले कुछ खास नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा, यह साफ है. हवा भांप कर माफिया अतीक अहमद ने खुद ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया है. मुख्तार अंसारी भी टिकट नहीं पाएंगे, यद्यपि ये सब अब अखिलेश के पाले में हैं. यह देखना रोचक होगा कि अखिलेश ऐसे तत्वों से किस हद तक पार्टी की ‘सफाई’ कर पाते हैं क्योंकि मुलायम के जमाने से सपा में अपराधी नेताओं की भरमार है. सभी दागियों को टिकट वंचित करना सम्भव नहीं होगा. मुख्तार के भाई टिकट पा सकते हैं. चुनाव जीताऊ उम्मीदवार भी तो चाहिए. इसी कारण उन पूर्व मंत्रियों में भी कुछ को टिकट मिलेगा जिन्हें अखिलेश ने ही अपनी सरकार से हटा दिया था.

कुछ महीने पहले जब पिता-पुत्र टकराव चरम पर था, एक मंच से मुलायम ने मुख्यमंत्री बेटे को लताड़ते हुए कहा था- ‘हैसियत क्या है तुम्हारी, सिर्फ साफ-सुथरी छवि से चुनाव जिता सकते हो?’ अखिलेश को अब अपनी हैसियत ही साबित करनी है. मुलायम शीर्ष पर होते तब भी सपा को यह चुनाव अखिलेश की निजी छवि और सरकार की उपलब्धियों के आधार पर लड़ना था. मतदाताओं को स्वाभाविक रूप से यह संदेश भी मिल गया है कि अखिलेश के काम-काज में अब रुकावट डालने वाला कोई नहीं होगा.

कांग्रेस से तालमेल करने की अखिलेश की सोची-समझी रणनीति पर अमल हो गया है. मुलायम शायद राजी नहीं होते.

मुलायम की अखिल भारतीय स्वीकार्यता की कमी अखिलेश को नहीं खलने वाली. लालू, ममता बनर्जी समेत कुछ अन्य बड़े नेता अखिलेश का प्रचार करने आने वाले हैं. कलह के समय मुलायम के ज्यादातर राष्ट्रीय दोस्त अखिलेश का ही पक्ष ले रहे थे.

और, यह नहीं मानना चाहिए कि मुलायम चुनाव प्रचार वास्ते नहीं निकलेंगे. उनकी भूमिका भीष्म पितामह से ज्यादा ही होने वाली है. उधर चाचा शिवपाल भी घर बैठे नहीं रहेंगे. उन्हें भी अपना भविष्य देखना है.

सत्ता में वापस आ गए तो अखिलेश की बल्ले-बल्ले होनी ही है. अन्यथा पिता व चाचा की तरफ से पराजय के लिए इंगित किए जाएंगे. लेकिन सपा में अब मुलायम-युग नहीं लौटेगा. चुनाव के बाद वह क्रमश: नया अवतार लेगी. 

-नवीन जोशी
(प्रभात खबर, 22 जनवरी 2017) 




मुलायम-पुत्र की बजाय कोई और बगावत करता तो?


नवीन जोशी

कई बार मेरे मन में यह ख्याल आता है कि अगर अखिलेश मुलायम के बेटे न होकर तेज-तर्रार सपा नेता मात्र होते तो क्या मुलायम के खिलाफ बगावत कर पाते? करते तो क्या अधिसंख्य सपा सांसद, विधायक और दूसरे नेता-कार्यकर्ता उनका साथ देते? और, क्या अंतत: विजयी अखिलेश को मुलायम उसी तरह आशीर्वाद देते जैसे कि अब हार मानने के बाद दे रहे हैं? उदाहरण के लिए, क्या आजम खां ऐसी बगावत कर सकते थे? तौबा-तौबा!

यानी राजनैतिक दलों में नेतृत्व हस्तांतरण या हथियाने के लिए रक्त-सम्बंधी होना जरूरी है.

जवाब में नरेंद्र मोदी का ख्याल आता है. मोदी जी ने भाजपा के बूढ़े नेतृत्व के खिलाफ बगावत ही की, हालांकि उसका स्वरूप खुली चुनौती की बजाय लम्बी व्यूह-रचना थी. मोदी की टीम ने बहुत चतुराई और रणनीति से आडवाणी जी को हाशिए पर डाल कर पूरी भाजपा पर कब्जा कर लिया. लेकिन सवाल उठता है कि यदि अटल- आडवाणी का कोई रक्त-सम्बंधी भाजपा में नम्बर दो की हैसियत में होता तो क्या मोदी यह तख्ता पलट कर पाते? भाजपा नेता और कार्यकर्ता तब किसका साथ देते?

बात जाहिर है कि राहुल गांधी पर आएगी. उन्हें कांग्रेस में मां सोनिया के बाद नम्बर दो की हैसियत से काम करते हुए काफी समय हो गया है. अब पार्टी अध्यक्ष बनाने की बात चल रही है. मगर राहुल में नेतृत्व की क्षमता दिखाई नहीं देती. बल्कि, अक्सर वे मजाक का पात्र बन जाते हैं. कांग्रेस की युवा पीढ़ी में राहुल से काबिल कई युवा हैं. कुछ सयाने कांग्रेसी भी राहुल की तुलना में  कहीं ज्यादा योग्य और नेतृत्व सम्भालने में सक्षम हैं लेकिन कोई इस बारे में सोच भी नहीं सकता, बगावत करना तो दूर. इंदिरा गांधी की तरह सोनिया भी अपने बेटे के अलावा किसी और को नेतृत्व देने का ख्याल दिल में लाएं भी क्यों!

पता नहीं नेहरू अपनी एकमात्र पुत्री इंदिरा की ताजपोशी करते या नहीं. उनकी मृत्यु अचानक हुई. शायद तब के दिग्गज कांग्रेसी ऐसा न होने देते. अन्यथा शास्त्री जी प्रधाननमंत्री कैसे बनते. खैर. घुट्टी में राजनीति पीने वाली इंदिरा ने 1969 में ‘बूढ़ी चौकड़ी’ के खिलाफ बगावत कर कांग्रेस के बड़े धड़े पर कब्जा किया और जल्द ही खुद कांग्रेस बन गईं. उसके बाद किसी की हिम्मत उन्हें चुनौती देने की नहीं हुई. बहू होने के बावजूद मेनका का क्या हश्र हुआ? राजीव के समय में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बगावत की लेकिन वह पार्टी पर कब्जा करने से ज्यादा बाहर जाकर नया दल बनाना था. कांग्रेस पूरी राजीव के साथ ही रही. एक बार विश्वनाथ प्रताप ने बयान दे दिया था कि कांग्रेस में ना द तिवारी बेहतर प्रधानमंत्री बनने के काबिल हैं. तब तिवारी जी को राजीव के प्रति अपनी वफादारी साबित करने में पसीने छूट गए थे. वही तिवारी जी आज अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने के लिए किस गति को प्राप्त हुए हैं !

बाद में ‘प्रधानमंत्री मटीरियल’ तिवारी जी और अर्जुन सिंह ने बगावत की थी लेकिन वह सोनिया से ज्यादा नरसिंह राव के खिलाफ थी. दोनों को बाद में वापस सोनिया ही की शरण जाना पड़ा क्योंकि उनका साथ और किसी कांग्रेसी ने नहीं दिया.
अब तो वंशवाद की कटु आलोचक भाजपा भी उसी राह पर चल पड़ी है. (नभाटा, 22 जनवरी, 2017)






Sunday, January 08, 2017

कभी ‘गार्जियन’ रहे शिवपाल से अखिलेश की क्यों ठनी?


नवीन जोशी
अभी-अभी अपनी स्थापना की स्वर्ण जयंती मना चुकी समाजवादी पार्टी अगर आज टूटी है (सिर्फ औपचारिकता ही बाकी है)  तो इसकी वजह अखिलेश और शिवपाल का झगड़ा ही है.
आखिर, अखिलेश के अपने चाचा से रिश्ते क्यों और कब से बिगड़े? अपने जिस भाई को मुलायम सबसे ज्यादा मानते हैं, उसी चाचा शिवपाल से अखिलेश की कबसे ठनने लगी?
अखिलेश के बचपन के पन्ने बताते हैं जब पिता मुलायम राजनीति में घनघोर व्यस्त रहा करते थे तो अखिलेश की घर और स्कूल की पढ़ाई की देख-रेख शिवपाल और उनकी पत्नी सरला ही करती थीं. राजनीति के बीहड़ों में लड़ते हुए जब मुलायम सिंह की जान तक को खतरा था तो उन्होंने तब अपने एक मात्र पुत्र अखिलेश को सुरक्षा कारणों से स्कूल से निकाल कर घर बैठा दिया था. 1980 से 1982 के उन दो सालों में चाची सरला उसे घर पढ़ाया करती थीं. अखिलेश की मां बीमार रहती थीं.   
सन 1983 में जब अखिलेश को धौलपुर मिलिट्री स्कूल में भर्ती कराया गया तो चाचा शिवपाल ही उन्हें इटावा से वहां लेकर गए थे. भर्ती की सारी औपचारिकताएं शिवपाल ने पूरी कीं क्योंकि मुलायम को फुर्सत नहीं होती थी. स्कूल में अखिलेश के गार्जियन शिवपाल और सरला यादव थे. चाचा-चाची ही अखिलेश से मिलने धौलपुर जाया करते थे.
बीते सितम्बर में जब चाचा-भतीजे का झगड़ा सड़क तक आया तब मुलायम ने कहा भी था कि अखिलेश को शिवपाल ने ही पाला है. साथ में उन्होंने यह भी जोड़ा था कि समाजवादी पार्टी बनाने में शिवपाल का बहुत बड़ा योगदान है. तब मुलायम यही बताने की कोशिश कर रहे थे कि अखिलेश और शिवपाल के रिश्ते कितने पुराने और मजबूत हैं और यह भी कि शिवपाल पार्टी के लिए कितने जरूरी हैं.
अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद मुलायम न चाचा-भतीजे के रिश्ते बचा सके, न पार्टी.  मुलायम के लिए यह बहुत कष्टकारी समय होगा.
जब शिवपाल समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में मुलायम के कंधे से कंधा मिला कर चल रहे थे तब मैसूर के इंजीनियरिंग कॉलेज में अखिलेश की दिलचस्पी पढ़ाई के अलावा सिर्फ खेल और कुछ फिल्मों में थी. समाजवादी पार्टी के गठन की खबर उन्हें अखबारों से देखी थी. राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी न थी. मैसूर से इंजीनीयरिंग में ग्रेजुएशन करके वे पोस्ट ग्रेजुएशन करने आस्ट्रेलिया चले गए.
पिता का भी कोई इरादा अखिलेश को राजनीति में लाने का न था. समाजवादी नेता के तौर पर में वे राजनीति में वंशवाद के सख्त खिलाफ थे. अखिलेश पढ़ाई पूरी करके आस्ट्रेलिया से लौटे और 1999 में “गर्ल फ्रेण्ड’  डिम्पल से उनकी शादी कर दी गई. वे हनीमून के लिए गए ही थे कि पिता मुलायम ने फोन करके बताया कि तुम्हें चुनाव लड़ना है. यह बिल्कुल अचानक हुआ और पिता की खाली की गई कन्नौज सीट से चुनाव जीत कर वे लोक सभा पहुंच गए.
उसी के बाद अखिलेश ने राजनीति और समाजवादी पार्टी की गतिविधियों में दिलचस्पी लेना शुरू किया. वरिष्ठ पत्रकार सुनीत ऐरन ने अखिलेश यादव पर लिखी अपनी पुस्तक में एक जगह अखिलेश को यह कहते उद्धृत किया है-“मैं राजनीतिक पिता का बेटा न होता तो आज फौजी होता.”
शिवपाल तब तक समाजवादी पार्टी में बहुत प्रभावशाली हो चुके थे. मुलायम अपने इस सबसे छोटे भाई पर बहुत भरोसा करते रहे. उन्हें अघोषित रूप से अपना वारिस मानते रहे. अखिलेश चाचा शिवपाल का बहुत सम्मान करते थे. अंदरखाने भी किसी खटास के लक्षण नहीं दिखते थे.
2009 के लोक सभा चुनाव में सपा के खराब प्रदर्शन के बाद अखिलेश ने समाजवादी पार्टी में ज्यादा रुचि लेनी शुरू की. पार्टी की छवि बदलने की छोटी-छोटी कोशिशें उन्होंने करनी चाहीं. तब शिवपाल यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे.
अपराधी पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति में प्रश्रय देने और कानून खराब कानून व्यवस्था के लिए समाजवादी पार्टी की सरकार की हमेशा आलोचना होती रही है. अखिलेश ने इस छवि से निजात पानी चाही. राजनीति में बहुत अनुभवी नहीं होने के बावजूद एक जुनून उनमें था. मुलायम सिंह ने जो भी सोचा हो, उसी साल (2009) पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद शिवपाल से लेकर अखिलेश को दे दिया.
अखिलेश पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में खूब सक्रिय हुए. उन्होंने अपनी युवा टीम खड़ी की और सपा का रूपांतरण शुरू किया. शिवपाल ने कोई आपत्ति या नाराजगी तब व्यक्त नहीं की लेकिन इसे अखिलेश के साथ उनके रिश्तों में खटास पैदा होने की शुरुआत मान सकते हैं.
अखिलेश लगातार सक्रिय और मजबूत होते गए. अमर सिंह को भी अनेक कारणों से उन्होंने पसंद नहीं किया.शिवपाल के प्रति भी शायद तभी से राय बदलनी शुरू हुई हो.
 2012 के विधान सभा चुनावों में अखिलेश की खूब चली. डी पी यादव को कैसे उन्होंने किनारे किया यह किस्सा खूब प्रचलित है. तभी से उनकी एक अलग और साफ-सुथरी छवि बननी शुरू हुई. यह शिवपाल और मुलायम की छवि से भिन्न थी.
2012 के चुनाव में सपा को विधान सभा में पूर्ण बहुमत मिलने का श्रेय अखिलेश के हिस्से आया और बिल्कुल अचानक ही मुलायम ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाना तय किया. शिवपाल ने मुलायम के इस प्रस्ताव का सख्त विरोध किया. मुलायम ने कैसे उन्हें मनाया और साढ़े चार साल कैसे सरकार में खीचतान चली, यह सब ताजा इतिहास है.
चाचा-भतीजे के बचपन से चले आ रहे मीठे रिश्ते एक बार कड़ुवे हुए तो फिर बात बिगड़ती चली गई. (BBC, Dec 31, 2016)