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Friday, March 25, 2022

विरोधी दल के नेता की चुनौती मुख्यमंत्री से कम नहीं

उत्तर प्रदेश में समय-समय पर सत्तारूढ़ दलों के विरुद्ध सक्रिय विरोधी दल के नेताओं की प्रभावशाली भूमिका का स्मरण करें तो राजनारायण सिंह, गेंदा सिंह, त्रिलोकी सिंह, चरण सिंह, सत्यप्रकाश मालवीय, गिरधारी लाल, कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव के नाम विशेष रूप से सामने आते हैं। ये नेता सदन में तो मान्यता प्राप्त विरोधी दल के नेता के रूप में सक्रिय रहते ही थे, जनता के मुद्दों पर सड़क पर भी जूझते रहते थे। वामपंथी नेता कभी यह संवैधानिक दर्ज़ा नहीं पा सके लेकिन जब तक उनकी साख जनता के बीच थी, उन्होंने सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध खूब आंदोलन किए। हाल के दशकों में मुलायम सिंह यादव के अलावा और कोई सशक्त विपक्षी नेता दिखाई नहीं देता जिसने सदन से लेकर सड़क तक प्रदर्शन किए, धरने दिए, लाठियां खाईं और जेल काटी।     

मुख्यमंत्रियों की सफलता-असफलता की चर्चाएं होती हैं लेकिन विपक्षी नेताओं की भूमिका का उल्लेख अक्सर नदारद रहता है। क्या अब राजनीति में प्रभावशाली विपक्षी नेता नहीं होते?  जो नेता मुख्यमंत्री के रूप में चर्चित या विवादित होता है, वह चुनाव हार जाने पर विरोधी दल के नेता के रूप में सक्रिय क्यों नहीं दिखाई देता? क्या सभी पार्टियां सरकार में आने के लिए चुनाव लड़ती हैं और हार जाने पर अगले चुनाव की प्रतीक्षा करने लगी हैं? मायावती और अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रूप की प्रशंशा या आलोचना अक्सर होती है लेकिन विपक्षी नेता के रूप में उनकी भूमिका कैसी रही? या, क्या वे इस रूप में सक्रिय दिखाई भी दिए?    

2022 में यह अच्छा संकेत है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोक सभा की सदस्यता छोड़कर अपने लिए उत्तर प्रदेश में विरोधी दल के नेता की भूमिका चुनी है। 2017 के विधान सभा चुनाव में पराजय के बाद,  हालांकि तब उन्होंने स्वयं विधान सभा चुनाव नहीं लड़ा था, वे प्रदेश में विपक्षी नेता के रूप में सक्रिय नहीं रहे। 2019 में लोक सभा चुनाव में पार्टी की बड़ी हार के बाद भी सिर्फ एक सांसद ही बने रहे और 2022 के विधान सभा चुनाव से चंद महीने पहले ही विपक्षी नेता के रूप में मैदान में उतरे थे।

भाजपा आज केंद्र और प्रदेश में भी मजबूत बहुमत वाली सत्तारूढ़ पार्टी है। ऐसे में मजबूत विपक्ष भी आवश्यक है। मतदाताओं ने भाजपा को भारी बहुमत से सत्ता में बैठाया है तो समाजवादी पार्टी को सशक्त विरोधी दल के रूप में विधान सभा में भेजा है। पिछली विधान सभा में सपा विधायकों की संख्या काफी कम थी, लेकिन वह मुख्य विरोधी दल के रूप में तो थी ही। सपा अपनी इस भूमिका में लगभग अनुपस्थित रही। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और कोरोना काल के हाहाकार में उसकी भूमिका, मीडिया को दिए गए बयानों के अलावा, याद करने पर भी दिखाई नहीं देती। अखिलेश यादव एक बार सड़क पर धरने पर बैठ गए थे उसके अलावा और किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन स्मरण में नहीं है।

सपा सरकार में आ जाती तो अखिलेश के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां होतीं लेकिन विपक्षी नेता के रूप में जिम्मेदारी कम बड़ी नहीं हैं। क्या वे योगी सरकार को उसके दूसरे कार्यकाल में प्रभावी ढंग से उन मुद्दों पर घेर सकेंगे जो समाज को सर्वाधिक प्रभावित कर रहे हैं? क्या वे सरकार की नीतियों-कार्यक्रमों-कार्यान्वयनों पर विभागवार नज़र रखने का तंत्र अपनी पार्टी के भीतर विकसित कर सकेंगे? ‘उनका बयान आया है कि वे ‘जनता के लिए संसद से सड़क तक’ लड़ेंगे। अगर मुख्य विरोधी दल के नेता की भूमिका वास्तव में निभा सके तो न केवल यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए मजबूत नींव का काम करेगा बल्कि लोकतंत्र के लिए भी शुभ होगा। देखते हैं।   

(सिटी तमाशा, नभाटा, 26 मार्च, 2022) 

                  

           

Friday, March 11, 2022

सशक्त विपक्ष की आमद भी एक उम्मीद

तो, चुनाव तमाशा पूरा हुआ। यूं, राजनीति आज वहां पहुंच गई है जहां लगता है कि सतत चुनाव हो रहे हैं। यह पांच साला लोकतांत्रिक उत्सव नहीं रह गया। संसद के चुनाव हों, विधानसभाओं के या नगर एवं ग्राम पंचायतों के, पार्टियां हर हमेशा चुनावी मोड में दिखाई देती हैं। सबसे अच्छा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है। पांच राज्य विधानसभाओं के परिणाम आने के अगले ही दिन वे गुजरात में रैली करने पहुंच गए। वहां जल्दी ही चुनाव होने हैं। मोदी जी चुनाव जिताने वाला सबसे कामयाब चेहरा जो बन गए हैं।

वर्षों, बल्कि दशकों बाद भाजपा की रिकॉर्ड विजय के अलावा उत्तर प्रदेश के चुनाव ने एक और काम किया है। इस राज्य की चौकोणीय चुनावी लड़ाई सीधे-सीधे दो पार्टियों के संग्राम में बदल गई। भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिला और समाजवादी पार्टी ताकतवर विपक्ष के रूप में उभरी है। यह दृश्य दशकों बाद दिख रहा है। अब तक यहां चार प्रमुख दल सता के दावेदार होते थे। तीस साल से अधिक समय से सत्ता से बाहर रहने के बावजूद राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण कांग्रेस की ठीक-ठाक उपस्थिति रहती थी। सपा, बसपा और भाजपा बाकी तीन मजबूत दावेदार थे। अधिकतर सीटों पर तिकोना संघर्ष तो होता ही था। इस बार भाजपा और सपा की सीधी लड़ाई हुई।

कांग्रेस के हालात पर वर्षों से कहा जा रहा है इसलिए दोहराने की आवश्यकता नहीं। मगर बसपा का सीटों के मामले में कांग्रेस से भी पिछड़ जाना चौंकाता है। वोट प्रतिशत उसका कांग्रेस से बहुत अधिक है लेकिन सीट वह एक ही जीत पाई। चुनाव प्रचार में मायावती के बहुत देर से उतरने पर पहले भी सवाल खड़े किए जा रहे थे लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि उनके समर्पित मतदाताओं में भी उनकी अपील बहुत कमजोर हुई है। सभी राजनैतिक विश्लेषक बार-बार यह चेता रहे थे कि मायावती को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनके दलित मतदाता कहीं नहीं गए हैं। उनको मिला वोट प्रतिशत पिछली बार से भी दस प्रतिशत कम हो गया। राजनीति में मायावती और बसपा की भावी जगह पर लम्बे समय तक चर्चा की जाएगी।

एक और बात जो बहुत साफ है और स्वीकार की जानी चाहिए कि हमारा समाज आज बहुत बंटा हुआ है। चुनाव के समय जिस ध्रुवीकरण की कोशिश राजनैतिक दल करते हैं, वह अब स्थाई हो गया है। हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन और विरोध जन मानस में घर कर गया है। जो लोग यह कह रहे थे कि इस चुनाव में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण नहीं हो पाया, वे नतीजों में उसे देख सकते हैं। ध्रुवीकरण अब सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं रह गया। वह घर की बैठकों, दावतों, चाय अड्डों, खेत-खलिहानों और सोशल मीडिया में हर वक्त की बहस और विवादों का मुद्दा है।

और किस तरह व्याख्यायित किया जा सकता है कि जनता के बड़े-बड़े, ज्वलंत मुद्दे मतदाता के मानस को प्रभावित नहीं कर रहे! जीवन की रोजाना की जद्दोजहद पर समाज का यही बंटवारा हावी है। अन्यथा, एक साल से अधिक चला किसानों का आंदोलन, लखीमपुर कांड, कोरोना की दूसरी लहर का हाहाकार, वगैरह को भुला देने वाली आखिर वह कौन सी बात थी? बड़े-बड़े दावों के साथ दलबदल करने वाले क्यों चुनाव हार गए? और क्यों, भाजपा विरोधी वोट लगभग एकमुश्त समाजवादी पार्टी के साथ हो गए? समाज के इस विभाजन को अनदेखा करना हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती की उपेक्षा करना होगा।

फिलहाल, यह देखना सुखद है कि आज जब विपक्ष छीझ रहा है तब दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार के सामने विधान सभा में विरोधी दल की सशक्त उपस्थिति होगी। विरोधी दल के नेता के रूप में अखिलेश यादव को अपने पिता की इसी भूमिका का इतिहास याद रखना होगा।

(चुनाव तमाशा, नभाटा, 12 मार्च, 2022)                     

Sunday, February 17, 2019

मोदी की प्रशंसा करना मुलायम को और दयनीय बनाता है



वर्तमान लोक सभा की अंतिम बैठक में समाजवादी पार्टी के लाचार संरक्षक मुलायम सिंह यादव की एक टिप्पणी सुर्खियों में है. सपा समेत विपक्ष के सभी नेता बगलें झांकते हुए उनके बयान पर सफाई देने में लगे हैं और भाजपा नेताओं की बांछें खिली हुई हैं. मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक, इसे तूल दिये पड़ा है. मुलायम के बयान के विविध अर्थ लागाये जा रहे हैं.

आखिर मुलायम ने कहा क्या? उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शुभकामनाएँ देते हुए कामना की कि आप फिर प्रधानमंत्री के रूप में वापस आएँ. हम आपको धन्यवाद देते हैं कि आपने सबके साथ मिलकर काम किया. हमने जब भी आपसे किसी काम के लिए कहा, आपने उसी वक्त आदेश दिये. इसके लिए आपका सम्मान करते हैं.
आखिर मुलायम की इस टिप्पणी में ऐसा क्या है कि विपक्ष के लिए आसमान टूट पड़ा और भाजपा को वरदान प्राप्त हो गया? इस बयान को यदि मुलायम की पिछले दो-तीन साल की स्थितियों और लोक सभा की विदाई बैठक के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इसमें तूफान खड़ा करने जैसी कोई बात नहीं है.

पहली बात यह कि राजनीति के हिसाब से अवस्था ज्यादा नहीं होने के बावजूद मुलायम पर उम्र हावी हो गयी है. वे अस्वस्थ भी रहते हैं. अक्सर भावुक हो जाते हैं और कुछ भी बोल देते हैं. समाजवादी पार्टी में विभाजन के बाद से दोनों धड़ों के बीच किसी तरह अपना संतुलन साधने कोशिश में उनके अजब-गजब बयान मीडिया की सुर्खियाँ बनते रहते हैं. कभी पुत्र अखिलेश को लताड़ते हैं और भ्राता शिवपाल के मंच पर उन्हें आशीर्वाद देते हैं. उसके चंद दिन बाद अखिलेश के साथ खड़े होकर इशारों में शिवपाल की आलोचना करते हैं. हर बार मीडिया इसे कभी उनका अखिलेश का साथ देने और कभी शिवपाल को मजबूत करने के रूप में देखता है.

तो, लोक सभा में उन्होंने जो कहा पहले तो उसे राजनैतिक मतभेद भुलाकर सबके मंगल की कामना करने के रूप में देखा जाना चाहिए, जैसी कि अनतिम बैठक की परिपाटी है. सभी सदस्य इस अवसर पर वैचारिक मतभेदों के बावजूद परस्पर निंदा-आलोचना से बचते हैं. विदाई भाषण में तारीफें ही की जाती हैं. इसलिए अगर वे प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की खुलकर  प्रशंसा कर गये तो आश्चर्य नहीं.  हाँ, उनके फिर से प्रधानमंत्री बनने की कामना को राजनैतिक चश्मे से देखा जा रहा है जो इस चुनावी वर्ष में स्वाभाविक है. इसे अधिक से अधिक राजनैतिक वानप्रस्थ की ओर अग्रसर  मुलायम की भावनाओं के अतिरेक से अधिक नहीं समझा जाना चाहिए. मुलायम का राजनैतिक समर्पण तो यह कतई नहीं है.

दूसरी बात यह कि, विपक्षी नेता अपने निजी या पार्टी के कामों के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्रियों  से अनुरोध करते हैं, यह कोई छुपी बात नहीं है. ‘हमने जब भी किसी काम के लिए कहा, आपने उसी समय आदेश दिये’ कहना इसी संदर्भ में था. मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप मेंआदित्यनाथ योगी के शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर उपस्थित होकर भी मुलायम ने चौंकाया था. याद कीजिए कि उस मंच पर मुलायम मोदी के कान में कुछ फुसफुसाए थे. कई दिन तक उस फोटो के साथ मीडिया में यह चर्चा होती रही थी कि आखिर मुलायम ने मोदी से कहा क्या होगा!

यह भी याद करना चाहिए कि 2014 में मोदी सरकार के शपथ ग्रहण में अमित शाह ने मुलायम को पीछे की कुर्सी से खुद लाकर आगली पंक्ति में बैठाया था. मुलायम के पोते तेजप्रातप यादव की शादी के समारोह में मोदी आशीर्वाद देने पहुँचे थे. यह सब राजनैतिक शिष्टाचार हैं जो बरते ही जाने चाहिए. इनका अर्थ यह नहीं कि मोदी मुलायम पर कृपालु हैं या मुलायम भाजपा-विरोध का अपना विचार त्याग कर मोदी-समर्थक हो गये हैं.

हमने ऊपर मुलायम की अवस्था और अस्वस्थता की चर्चा की थी. उनकी राजनैतिक पारी अब अधिक शेष नहीं है. जो मुलायम 1980 और 90 के दशक में भाजपा-विरोधी राजनीति के शिखर-नेता थे, वह 2019 में विपक्ष ही नहीं अपनी पार्टी के भी हाशिए पर हैं. मोदी को उनसे आज  कोई खतरा नहीं है. बल्कि, मुलायम ही उनसे व्यक्तिगत सहयोग और कृपा के आकांक्षी हो सकते हैं. इसलिए उन्होंने मोदी की तारीफ के पुल बांध दिये हों तो भी आश्चर्य नहीं.

मुलायम अब लाचार नेता हैं. वे एक ऐसे राजनैतिक परिवार के मुखिया हैं जहाँ शक्ति के कम से कम तीन ध्रुव हैं. बड़े बेटे अखिलेश को स्वयं उन्होंने मुख्यमंत्री बनाया और उस छोटे भाई की नाराजगी मोल ली जिसने उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाजवादी पार्टी को खड़ा किया था. उस भाई से वे अलग नहीं हो सकते, इसलिए उसका साथ देना भी मजबूरी है. तीसरा शक्ति केंद्र उनकी दूसरी शादी से जन्मा रिश्ता है. तीनों केंद्र अति महत्वाकांक्षी हैं. मुलायम तीनों के बीच झूलने को मजबूर हैं. इसीलिए उनकी बातों को अब बहुत गम्भीरता से नहीं लिया जाता.   

कभी क्षेत्रीय दलों और वामपंथियों के बीच सम्मान से स्वीकारा जाने वाला तथा प्रधानमंत्री पद का बड़ा दावेदार यह समाजवादी पहलवान आज अपने ही अखाड़े में चित है. विपरीत परिस्थितियों में भी ठसक से रहने वाले मुलायम अब न सेनापति रहे और न संरक्षक के रूप में प्रभावशाली.

मुलायम का यह हश्र दयनीय लगता है. मोदी की अतिरेक भरी प्रशंसा करना उन्हें और भी दयनीय बनाता है.  

(news18.com, 14 फरवरी, 2109) 



Monday, March 05, 2018

कितनी दूर तक चलेगी सपा-बसपा जुगलबंदी ?


उत्तर प्रदेश के दो लोक सभा उप-चुनावों- गोरखपुर और फूलपुर- में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को बहुजन समाज पार्टी के समर्थन और फिर राज्य सभा चुनावों में सपा के समर्थन से बसपा प्रत्याशी को जिताने के समझौते की घोषणा चौंकाने वाली ही नहीं, ऐतिहासिक भी है.

मायावती या उनका प्रत्याशी सपा के समर्थन से राज्य सभा जाएंगे, यह इतिहास का खुद को दोहराना रहा है या कोई नयी इबारत लिखी जाने वाली है?

पचीस वर्ष पहले सन 1993  में उग्र हिंदुत्त्व की लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने से रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में चुनावी करार हुआ था. यह समझौता ऐतिहासिक इस मायने में था कि पिछड़ों और दलितों के आक्रामक समाजिक रिश्ते चुनावी गठबंधन में बदल गये थे. बसपा के संस्थापक अध्यक्ष कांशीराम और तब सपा के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव की यह रणनीति सफल हुई थी. बाबरी मस्जिद ध्वंस का ‘श्रेय’ और अयोध्या में राम मंदिर बनाने के संकल्प के साथ चुनाव लड़ने वाली भाजपा तब सत्ता से वंचित रह गयी थी, हालांकि सबसे ज्यादा विधायक उसी के जीते थे.

जून 1995 में सपा-बसपा नेताओं की हिंसक झड़पों और राज्य अतिथि गृह में मायावती पर हमले के बाद यह समझौता टूट गया था. भाजपा ने इस लड़ाई का खूब फायदा उठाया. अपने समर्थन से एकाधिक बार मायावती की सरकार बनवाकर उसने सपा-बसपा की दरार चौड़ी कर दी. पिछले 23 वर्षों में चुनावी दोस्ती की बात कौन कहे, मुलायम और मायावती ने एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखा.

अखिलेश के नेतृत्त्व में आई नरमी 

सन 2016 में समाजवादी पार्टी के आंतरिक कलह के बाद मुलायम सिंह के नेपथ्य में जाने और पार्टी की कमान अखिलेश यादव के हाथ आने के बाद इन तल्ख रिश्तों में कुछ मुलायमियत के संकेत मिले थे. 2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने के प्रस्ताव पर अखिलेश ने बसपा के साथ मेल-मिलाप की सम्भावना पर हामी भरी थी, हालांकि तब मायावती ने प्रस्ताव सिरे से खारिज कर दिया था. फिर सपा और कांग्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा था.

मायावती के रुख में बदलाव तब दिखा जब बिहार में नीतीश कुमार के भाजपा के साथ चले जाने के बाद लालू यादव ने भाजपा-विरोधी दलों की बड़ी रैली पटना में बुलाई और अखिलेश के साथ मायावती को भी आमंत्रित किया. मायावती रैली में तो नहीं गईं लेकिन भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने के प्रस्ताव पर सहमत दिखीं. तब उन्हंने कहा था कि बसपा भाजपा-विरोधी मोर्चे में शामिल हो सकती है बशर्ते सीटों का बंटवारा पहले कर लिया जाए. उसके बाद बात आयी-गयी हो गयी थी.

दिसम्बर 2017 में गुजरात में भाजपा की पुन: विजय के बाद  उत्तर प्रदेश में होने वाले दो लोक सभा उप-चुनावों में विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने की चर्चा चली थी. गोरखपुर और फूलपुर लोक सभा सीटें क्रमश:  मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद वर्मा के इस्तीफे से खाली हुई हैं. यह भी चर्चा थी कि फूलपुर से मायावती को संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी बनाया जाए तो भाजपा को हराया जा सकता है. मायावती ने कुछ मास पूर्व राज्य सभा में अपनी बात ठीक से रखने का मौका नहीं दिये जाने का आरोप लगा कर सदन से इस्तीफा दे दिया था.

वोटों का गणित

इसी दौरान राज्य सभा चुनाव का गणित भी चर्चा में रहा. बसपा अपने मात्र 19 विधायकों के बल पर एक भी राज्य सभा सीट नहीं जीत सकती. उधर 47 विधायकों वाली सपा के पास अपना एक प्रत्याशी जिताने के बाद 10 वोट बचते हैं. अगर ये दस वोट बसपा को मिल जाएं तो चंद और वोट (कांग्रेस से) जुटाकर बसपा राज्य सभा की एक सीट जीत जाएगी. अन्यथा आसार हैं कि भाजपा जोड़-तोड़ से राज सभा की नौवीं सीट भी जीत लेगी. आठ सीटें जीतने की स्थिति में वह आराम से है.   

उप-चुनावों का मत-गणित भी रोचक है. 2014 के लोक सभा चुनाव में गोरखपुर में भाजपा को मिले मत (51.80%) सपा ( 21.75%) और बसपा (16.95%) को मिले कुल मतों से काफी ज्यादा थे. मगर 2017 के विधान सभा चुनाव में सपा+कांग्रेस और बसपा  के कुल वोट पांच में से चार विधान सभा क्षेत्रों में भाजपा से अधिक थे.

यही हाल फूलपुर लोक सभा सीट का भी था. आसन्न उप-चुनाव में कांग्रेस ने भी अपने प्रत्याशी खड़े किये हैं. राज्य में कांग्रेस की पतली हालत को देखते हुए कहा जा सकता है कि सपा-बसपा के वोटर एकजुट रहे तो भाजपा के लिए चुनाव कतई आसान न होगा.

इस सम्भावना पर दोनों तरफ से कोई बोल नहीं रहा था, भीतर-भीतर बातचीत अवश्य चल रही थी. मायावती दोनों लोक सभा सीटों के बसपा कोआर्डिनेटरों से लगातार सम्पर्क में थीं.
तीन मार्च को त्रिपुरा, नगालैण्ड और मेघालय के चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में आते ही लगता है कि सपा-बसपा को साथ आने की जरूरत शिद्दत से महसूस होने लगी. अखिलेश यादव पहले से ही एकता के पक्ष में थे. मायावती को भी वक्त की नजाकत समझ में आ गयी और समझौते का ऐलान हो गया.

मगर दोनों तरफ सतर्कता भी

इस समझौते की घोषणा अखिलेश ने की न मायावती ने. स्थानीय नेताओं ने इस सहमति का ऐलान किया. दोनों फिलहाल इसे घोषित रूप से बहुत महत्त्व नहीं दे रहे. इसकी कुछ खास वजह हैं. एक तो यही कि दोनों के रिश्तों की खटास अभी पूरी मिटी नहीं है. दोनों के जनाधार वाली पिछड़ी और दलित जातियां परम्परागत टकराव वाली हैं. दोनों मिलकर भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकते हैं, इस आशंका से समझौता तोड़ने की साजिशें बाहर-भीतर से हो सकती हैं. सतर्कता स्वाभाविक है.

मायावती ज्यादा सावधान हैं. जब मीडिया में यह कयास लगाये जाने लगे कि सपा-बसपा का यह चुनावी समझौता 2019 के लोक सभा चुनाव तक जा सकता है तो उन्होंने तुरन्त सफाई दी कि बसपा ने किसी पार्टी से चुनावी समझौता नहीं किया है. हम सिर्फ भाजपा को हरा सकने वाले मजबूत उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं.
मायावती इस चुनावी रणनीति को परखना चाहती हैं. वे जानती हैं कि उनके कहने पर दलित वोट सपा की तरफ चला जाएगा. उनकी चिंता यह होगी कि सपा का वोटर बसपा का साथ देता है या नहीं. फिर, दलित वोटों में भाजपा की सेंध भी उनकी चिंता का बड़ा कारण होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछड़ों (यानी सपा) का साथ देने की बजाय दलित वोटर भाजपा के साथ जाना चाहें? भाजपा इस जोड़-तोड़ में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली.

2019 की सम्भावनाएं

बड़ा सवाल स्वाभाविक ही यह उठ रहा है कि क्या सपा-बसपा की यह जुगलबंदी 2019 के लोक सभा चुनाव में किसी बड़े भाजपा विरोधी मोर्चे का आधार बनेगी? त्रिपुरा के नतीजों से चिंतित ममता बनर्जी से लेकर तेलंगाना के टी चंद्रशेखर राव और भाजपा से खिन्न चल रहे तेलुगु देशम के नेता ऐसी सम्भावना पर चर्चा कर ही रहे हैं. सपा-बसपा का साथ आना इस मुहिम को और हवा दे सकता है.

बिहार में एक-दूसरे के धुर विरोधी लालू और नीतीश भाजपा को हराने के लिए एक मंच पर आये और सफल हुए थे. उत्तर प्रदेश में कट्टर शतुत्रा पालने वाले सपा-बसपा को साथ लेना विपक्षी एकता के सूत्रधारों को सबसे कठिन लगता रहा है. आज जब वे स्वयं परस्पर सहमति तक पहुंचे हैं तो आगे की राह आसान बन सकती है.
उत्तर प्रदेश की 80 लोक सभा सीटें दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने की राह आसान करती हैं. अगर यहां भाजपा के मुकाबले तगड़ा मोर्चा बने तो 2019 की लड़ाई कांटे की हो जाएगी. इसकेलिए सपा-बसपा की दोस्ती अनिवार्य होगी.

विपक्षी एकता के लिए मायावती के रुख में आते सकारात्मक परिवर्तन का संकेत यह भी है कि उन्होंने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को समर्थन देने की पेशकश की है. उन्होंने कहा है कि अगर यूपी में कांग्रेस के साथ विधायक बसपा को समर्थन दें तो  बसपा मध्य प्रदेश से राज्य सभा के चुनाव में कांग्रेस को समर्थन दे सकती है. दरअसल, बसपा को यूपी से अपने प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए सपा के समर्थन के अलावा कांग्रेस की मदद भी चाहिए होगी. मध्य प्रदेश में बसपा के चार विधायक हैं. हाल के उप-चुनावों में जहां कांग्रेस जीती, वहां बसपा ने अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये थे.

मायावती जाएंगी राज्य सभा या कोई और?       

यह प्रश्न भी स्वाभाविक है कि सपा के सहयोग से बसपा किसे राज्य सभा भेजना चाहती है? क्या मायावती उम्मीदवार होंगी? कुछ महीने पहले ही उन्होंने राज्य सभा से त्याग पत्र दिया है. ऐसे में यही सम्भावना ज्यादा लगती है कि वे अपने भाई आनंद कुमार को राज्य सभा भेजेंगी, जिसे उन्होंने हाल में पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है.

मायावती के अगले कदम का आकलन करना हमेशा कठिन रहा है. पार्टी को मजबूत करने में ज्यादा समय देने के लिए वे खुद अलग रह कर आनन्द को चुनाव लड़ा सकती हैं. या क्या पता, इस आशंका से कि भाजपा विरोधी मुहिम का हिस्सा बनने पर मोदी सरकार आय से अधिक सम्पति के मामलों में सीबीआई को उनके पीछे लगा सकती है, वे पुन: राज्य सभा पहुंच कर विशेषाधिकार का एक कवच ओढ़ने की सोच रही हों.    


 (https://hindi.firstpost.com/politics/support-akhilesh-yadav-samajwadi-party-in-byelection-may-be-a-long-term-strategy-of-mayawati-93954.html)

Tuesday, December 05, 2017

निकाय चुनाव: यूपी सही में क्या बोली?


उतर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में “विपक्ष का सफाया करने वाली विजय” का सिंहनाद करने के लिए भारतीय जनता पार्टी एक विजेता टीम मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्त्व में गुजरात पहुंच रही है. वहां यह संदेश देना है कि भाजपा सरकारों को जनता कितना पसंद कर रही है और जो कांग्रेस गुजरात-विजय का दिवास्वप्न देख रही है वह राहुल गांधी की अमेठी में नगर निकायों की एक सीट नहीं जीत सकी.
क्या वास्तव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के नगर निकायों में विपक्ष का सफाया कर दिया है, जैसा कि उसके नेताओं के अलावा मीडिया का बड़ा तबका भी बता रहा है? क्या खुद विपक्ष ने, विशेष रूप से बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने, इन चुनाव नतीजों को गौर से देखा और विश्लेषित किया है? आखिर वे क्यों ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगाकर ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ की कहावत चरितार्थ कर रहे हैं?
विपक्ष को खिसियाने की कतई जरूरत नहीं है. उसे तो भाजपा से सवाल पूछना चाहिए कि आखिर वह सिर्फ 16 नगर निगमों के चुनाव नतीजों का प्रचार कर क्यों फूली नहीं समा रही? नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के परिणामों की बात क्यों नहीं कर रही? बल्कि, विपक्ष चाहे तो इन चुनाव नतीजों से संदेश ग्रहण कर 2019 के लिए भाजपा के मुकाबले साझा मंच बनाने की पहल कर सकता है. हैरत है कि न मायावती और न ही अखिलेश यादव ने इस तरह देखा और सोचा है. लगता है वे भाजपाई प्रचार के सामने असहाय-से हो गये हैं.
क्या कहते हैं नतीजे
सोलह नगर निगमों में मेयर के 14 पद भाजपा ने जीते हैं. पार्षदों के करीब 46 फीसदी पद भी उसे हासिल हुए हैं. यह निश्चय ही बड़ी जीत है लेकिन यह कोई नई बात नहीं. नगर निगमों में भाजपा का पहले से ही कब्जा रहा है. 2012 में जब न मोदी राष्ट्रीय परिदृश्य नें थे, न योगी और यूपी में शासन समाजवादी पार्टी का था, तब के 12 नगर निगमों में मेयर के दस पद भाजपा ने जीते थे. पार्षदों में भी उसी का बहुमत था. इसलिए इस बार की विजय विशेष नहीं जबकि मुख्यमंत्री योगी समेत पूरा मंत्रिपरिषद चुनाव प्रचार में जुटा था. अकेले योगी ने ही 26 चुनाव सभाएं कीं. अखिलेश यादव और मायावती दोनों ही प्रचार करने नहीं निकले.
बड़े शहरी क्षेत्र से बाहर निकल कर नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के नतीजों पर निगाह डालते ही भाजपा की प्रचण्ड विजय का दावा फीका पड़ने लगता है. नगर पालिका परिषदों के 198 अध्यक्ष पदों में सिर्फ 70 भाजपा जीत सकी. बाकी 128 पद निर्दलीयों और विपक्षी दलों के हिस्से आये. परिषद सदस्यों के 5261 पदों में मात्र 922 (17.53%) भाजपा जीती. यहां निर्दलीयों ने 3380 (64.25%) पद जीते. सपा, बसपा ने बहुत खराब प्रदर्शन नहीं किया. नगर पंचायत अध्यक्ष के 438 पदों में भाजपा को सिर्फ 100 (22.53%) पर जीत मिली. सपा ने 83, बसपा ने 45 और निर्दलीयों ने 182 (41.55%) पद हासिल किये. पंचायत सदस्यों के 5434 पदों में केवल 664 (12.22%) भाजपा ने जीते. निर्दलीयों ने 3875 (71.31%), सपा ने 453 और बसपा ने 218 पद जीते.
निश्चित ही भाजपा ने पिछली बार की तुलना में बेहतर नतीजे हासिल किये. सभी राजनैतिक दलों में वह शीर्ष पर रही लेकिन निर्दलीयों ने उसे बहुत पीछे छोड़ा. मोदी और योगी राज में पूरा जोर लगाने के बाद मिली यह जीत “विपक्ष का सफाया करने वाली” तो नहीं ही है. बल्कि 2014 के लोक सभा और इसी वर्ष मार्च में हुए विधान सभा चुनावों के परिणामों की तुलना में भाजपा का यह प्रदर्शन फीका ही कहा जाएगा.
मुस्लिम मतदाताओं का रुझान
लोक सभा और विधान सभा चुनाव में भारी पराजय झेल चुकी बसपा की निकाय चुनावों से वापसी हुई है. दो नगर निगमों के मेयर पद उसने भाजपा से छीन कर जीते और दो में दूसरे नम्बर पर रही. इससे साबित हुआ कि शहरी इलाकों में भी उसका प्रभाव बढ़ा है. एक और महत्त्वपूर्ण संकेत यह है कि भाजपा को हराने के लिए कुछ जिलों में मुसलमानों ने एकजुट होकर बसपा को वोट दिये. दलित-मुस्लिम एका से ही बसपा को बढ़त मिली. विधान सभा चुनाव में मायावती ने इसके लिए पूरा जोर लगाया था. क्या अब उस प्रयोग का असर हो रहा है? समाजवादी पार्टी के लिए यह चिंता की बात होगी. मुलायम सिंह यादव ने कुछ दिन पहले आगाह भी किया था कि पार्टी नेतृत्त्व मुसलमानों को अपने साथ बानये रखने के प्रयास नहीं कर रहा. असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने भी पहली बार यूपी में अपना खाता खोला है. निकाय चुनावों में कई स्थानीय कारक महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं के रुझान में परिवर्तन के संकेत इससे मिलते हैं.
समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन नगर निगमों में खराब रहा लेकिन नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में उसने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया. पार्टी नेतृत्त्व ने पता नहीं क्यों इन चुनावों को गम्म्भीरता से नहीं लिया. अखिलेश यादव और दूसरे प्रमुख नेता चुनाव प्रचार के लिए निकले ही नहीं, जबकि भाजपा ने मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों को प्रचार में झौंक रखा था. मायावती ने भी न तो प्रचार किया और न ही मतदान. नतीजों के आधार पर भाजपा के दावों की पोल खोलने से भी उन्हें परहेज-सा है.
विपक्षी एकता के सूत्र
भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की वकालत करने वालों के लिए ये नतीजे उत्साहवर्धक संदेश देते हैं. निकाय चुनावों में मतदाता का रुझान सर्वथा स्थानीय मुद्दों और सम्बंधों से तय होता है. इसके बावजूद ये नतीजे संकेत देते हैं कि यदि भाजपा के मुकाबले विरोधी दलों का महागठबंधन बने तो वह 2019 में उसे कड़ी टक्कर दे सकता है. सप-बसपा भी मिलकर लड़ें तो भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है लेकिन इन दलों के साथ आने में रोड़े ही रोड़े हैं.
राज्य में पहली बार निकाय चुनाव पार्टी और चुनाव चिह्न के आधार पर लड़े गये हैं. पहले राजनैतिक दल निर्दलीयों को अपना बताने के दावे किया करते थे. इस बार उनकी जमीनी ताकत की तस्वीर खुली है. नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में 65-70 प्रतिशत निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं. 
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत सुधरने के संकेत अब भी नहीं हैं. निकाय चुनावों में उसका प्रदर्शन बहुत दयनीय रहा. सोनिया की रायबरेली ने लाज रखी लेकिन राहुल की अमेठी में कहीं उसके प्रत्याशी ही नहीं थे और जहां थे, वहां हार गये. वाम दलों ने भी कई प्रत्याशी उतारे थे. साबित यही हुआ कि उत्तर प्रदेश में उनका जनाधार समाप्त प्राय है. ‘आप’ को भी कोई खास सफलता नहीं मिली.
(प्रभात खबर, 06 दिसम्बर, 2017)





Wednesday, March 01, 2017

बाल न बांका हुई सकै गर नाम प्रजापति होय!

नवीन जोशी
नाम गायत्री प्रजापति, राज्य यू पी और ठिकाना समाजवादी पार्टी हो तो क्या कहने. गायत्री प्रजापति आजकल यूपी की राजनीति और प्रशासन में छाए हुए हैं. आजकल कहना उनके साथ अन्याय करना होगा. वे तो लम्बे समय से सत्ता के गलियारों और परिवार के बरामदों से लेकर स्वर्णिम खदानों तक छाए हुए हैं. हाँ, आजकल उनकी पूछ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है. पुलिस उनके दर्शन को तरस रही है. वे हैं कि सामने होकर भी पुलिस को दर्शन नहीं देते.
दरअसल, मध्य फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि गायत्री प्रजापति का स्थान कारागार होना चाहिए. कारागार को धन्य करने के लिए पुलिस प्रजापति की तलाश में है. वह उनके सरकारी बंगले में जाती है तो सरकारी सुरक्षा गारद बताती है कि वे महोदय वहां नहीं हैं. विधायक निवास वाले अंगरक्षक कहते हैं कि मंत्री जी अपने चुनाव क्षेत्र में हैं. चुनाव क्षेत्र भी उनका ठहरा जगप्रसिद्ध अमेठी. अमेठी के गदगद कार्यकर्ता पुलिस को बताते हैं कि गायत्री जी लखनऊ चले गए. लखनऊ में वे अक्सर एक खास ठिकाने पर विराजमान पाए जाते हैं. उनकी एक बहुप्रसारित फोटो है जिसमें वे मुलायम के चरण दोनों हाथों से पकड़े हुए कैमरे की तरफ मुस्करा रहे हैं. ये चरण उन्हें पार्टी से परिवार तक शक्तिशाली बनाते रहे. अब पुलिस इस ठिकाने तो जा नहीं सकती.
बात इतनी सी है कि एक महिला ने आरोप लगाया कि प्रजापति ने उनके साथ रेप किया. उनकी नाबालिग बेटी से भी रेप की कोशिश की. उनके विरुद्ध मुकदमा लिख लिया जाता तो जाता तो वे प्रजापति कैसे होते. अंतत: सुप्रीम कोर्ट को उनका स्मरण करना पड़ा. मुकदमा लिखा गया. इस सबके बावजूद प्रजापति जी मंत्री पद पर शोभायमान है. मुख्यमंत्री महोदय उन्हें मंत्रिमण्डल से निष्कासित करने की सोच भी नहीं सकते. एक बार जोश में उन्हें बर्खास्त करके देख लिया था, फौरन वापस लेना पड़ा. मुलायम के चरणों में बैठ कर मुस्कराते हुए फोटो तभी का है. पार्टी में विवाद के दिनों भी वे शिवपाल के साथ नेता जी के इर्द-गिर्द डटे रहे थे. निष्कासन और पुन: शपथ ग्रहण के बाद वे अखिलेश के पैर छूना भी नहीं भूलते.
हत्या जैसे संगीन आरोपों वाले मुख्तार अंसारी, कई बर्खास्त मंत्री और टिकट वंचित सपा नेता प्रजापति से रश्क करते हैं. अखिलेश ने कभी डी पी यादव को दूर किया तो कभी चचा शिवपाल की सिफारिश के बावजूद मुख्तार अंसारी और उनकी पार्टी को दुत्कार दिया. मगर रेप के आरोपी प्रजापति अब भी मंत्री पद पर आसीन हैं, सपा की शान बढ़ा रहे हैं और अमेठी से पार्टी के सुयोग्य प्रत्याशी  हैं. सपा के नए सुप्रीमो और लोकप्रिय मुख्यमंत्री स्वयं उनके प्रचार के लिए गए.
अमेठी की चुनावी जन सभा में अखिलेश के पहुंचने तक प्रजापति मंच से अपने सुकर्मों का बखान कर रहे थे. भावुक होकर रो रहे थे कि रेप का आरोप और कारागार भेजने का निर्णय उनके साथ कितना बड़ा अन्याय है. अखिलेश जब सभा मंच पर आए तो प्रजापति का तेज सहन नहीं कर सके. मुख्यमंत्री के भाषण तक प्रदीप्त-मुख प्रजापति मंच के सामने बैठे रहे.
प्रजापति के लिए गम्भीर आरोप कोई नए तमगे नहीं हैं. उनके खिलाफ संगीन आरोपों की मोटी फाइल प्रदेश के पूर्व लोकायुक्त ने एकाधिक बार सरकार के पास कार्रवाई के लिए भेजी थी. लोकायुक्त ने अपनी जांच में आरोप सही पाए थे. सरकार उस फाइल को अब तक मजबूत अल्मारी में सुरक्षित रखे है. इस प्रसंग के कुछ रोचक क्षेपक भी हैं.
कोई देढ़-दो वर्ष पहले सोशल साइट्स पर एक ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें एक सख्श फोन पर अमिताभ ठाकुर को धमकियां दे रहा है कि अपनी हरकतें बंद कर दो वर्ना बुरा हाल करुंगा. पुलिस महानिरीक्षक अमिताभ का आरोप था कि यह धमकी मुलायम सिंह यादव ने दी. आवाज मुलायम की जैसी थी. पृष्ठभूमि यह कि अमिताभ ठाकुर और उनकी एक्टिविस्ट पत्नी नूतन गायत्री प्रजापति के अवैध धंधों की पड़ताल कर रहे थे. अमिताभ ने इस पर मुलायम के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई. चंद रोज बाद अमिताभ के खिलाफ एक महिला ने रेप का मुकदमा लिखा दिया. अमिताभ के खिलाफ जांच अब तक चल रही है जबकि गायत्री प्रजापति शफ्फाक खादी में मंत्री रहते हुए ठसके से चुनाव लड़ रहे हैं.
गायत्री प्रजापति होने का महत्व इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि वर्तमान सपा सरकार में उन्होंने चार बार मंत्री पद की शपथ ली. पहली बार राज्यमंत्री पद की, फिर स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री की, उसके बाद कैबिनेट मंत्री की और बर्खास्त होने के बाद पुन: कैबिनेट मंत्री की.
सपा के सर्वेसर्वा रहे मुलायम और उनके प्रभवशाली भ्राता आज हाशिए पर हैं लेकिन उनके शरणागत गायत्री प्रजापति का बाल बांका न हुआ.
(http://www.bbc.com/hindi/india-39130767)