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Wednesday, December 08, 2021

इजा और सीजर

 

कल रात इजा फिर सपने में दिखाई दी। रसोई में मोटी-मोटी रोटी पका रही थी।

‘इजा, इतनी रात में रोटी क्यों पका रही है?’ मैंने पूछा।

‘किलै, सीजर खाल (क्यों, सीजर खाएगा)... भूखा मार दोगे उसे?’ रसोई की देहरी पर सीजर पसरा था, वैसे ही जैसे बैठा करता था। अगले पांव के पंजे भर रसोई के भीतर करके।

सुबह नींद खुली तो इतना ही याद रहा। सपने में आगे क्या हुआ, पता नहीं। इजा को इस दुनिया से कूच किए हुए साल भर होने को है। सीजर को गए पांच साल हो गए। इजा की फोटो उसके कमरे में टंगी है। सीजर की फोटो एक छोटे फ्रेम में लॉबी के आले में रखी है। इजा तो कभी-कभार सपने में आती रहती है। सीजर कल पहली बार दिखा। वैसे, फोटो देखकर उसकी अक्सर याद आती है। हम उसकी प्यारी आदतों को याद करते रहते हैं- ‘सीजर ऐसा करता था, सीजर वैसा करता था। बहुत प्यारा था हमारा सीजर।’

वर्षों पुरानी बात। बड़े बेटे ने, जब वह करीब आठ-दस साल का था, एक दिन अपनी मां से कहा था- ‘मां, सुकांत के यहां डॉगी ने पिल्ले दिए हैं। एक हम पाल लें?’

‘आमा नहीं मानेगी, बेटा।’

‘मां, प्लीज! लाने दो न। बहुत प्यारे पिल्ले हैं। प्लीज मां।’

तभी अपने कमरे से बाहर आती इजा की नड़क (डांट) सुनाई दी- ‘खबरदार रे, कुकुर झन लाया घर में (कुत्ता मत लाना घर में)’  

बेटा सहम गया और बड़ी याचना से अपनी मां को देखने लगा। लता ने मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया। बेटे की मनुहार उसका दिन पिघला रही थी लेकिन वह अपनी सास से अच्छी तरह परिचित थी।

‘आमा, प्लीज! लाने दो न। मेरे दो दोस्त एक-एक पिल्ला ले गए। अब एक ही बचा है।’

‘चुप रौ,’ इजा ने नाती को डपट दिया- ‘कुकुरै छूत हुंछि (कुत्ते की छूत होती है। कौन लाता है उसे घर में)

बेटा रुंआसा होकर एक किनारे बैठ गया। दिन भर उसका मुंह फूला रहा। लता ने मुश्किल से खाने के लिए मनाया। वह डबडबाई आंखों से ‘मां प्लीज-मां प्लीज’ करता रहा।

एक दिन स्कूल से आते समय बेटा अपनी गोद में एक प्यारा-सा नन्हा पिल्ला छुपाए हुए ले आया। उसे चुपचाप बेडरूम में बंद कर दिया।

‘आमा को नहीं बताएंगे। इसी कमरे में रखेंगे,’ शाम को उसने बताया। उसके धीमे स्वर में दृढ़ता थी। वह एक कटोरे में थोड़ा दूध निकाल लाया- ‘ले सीजर, पी!’ पिल्ला नन्हीं जीभ से दूध चाटने लगा। उसकी नन्हीं दुम लगातार हिल रही थी। दोनों बच्चों के लिए वह खिलौना जैसा हो गया। उससे लाड़ करते न अघाते।

‘इसका नाम सीजर रखा है मैंने,’ बेटे ने जानकारी दी। हलके भूरे रंग के सीजर के पंजे सफेद थे। नाक के पास काला बूटा। वह बहुत प्यारा लग रहा था। हमें भी उस पर लाड़ आने लगा लेकिन इजा का डर बना रहा। हमें पता था कि वे इसे घर में कतई नहीं रहने देंगी।

इजा बहुत छुआ-छूत मानती थीं। पहाड़ की पुरानी आदत। रसोई में सिर्फ एक धोती पहनकर जाती और अपना खाना खुद बनाती। बाबू के निधन के बाद वह और भी परहेजी हो गई थी। हम लोगों का छुआ पानी भी नहीं पीती थी। सुबह हमारे उठने से पहले उसके बहुत से इंतजाम हो जाते थे। एक जग और एक लोटे में फिल्टर से पानी भर कर रसोई के एक कोने में ढक कर रख देती। वही पानी पीती, उसी से चाय बनाती और खाना भी। लता के हाथ की पकाई पूरी, हलवा, वगैरह खा लेती लेकिन आटा सानते समय ध्यान से देखती कि उसी का पानी इस्तेमाल हो रहा है। स्वयं देखा न हो तो सुनिश्चित कर लेती- ‘तूने आटा किस पानी से साना?’ रोटी पकाने का तवा उसका अलग था। उसमें हमने एक लाल निशान बना रखा था, पहचान के लिए। खाना पकाने वाली सहयोगी कभी भूल से हमारी रोटियां इजा के तवे पर पका लेती तो उस दिन हंगामा मच जाता। इजा गुस्से में वह तवा पटक देती और खूब बड़बड़ाती। उस दिन अपनी कढ़ाई में रोटी पकाती। 

फ्रिज में सबसे ऊपर का खाना उसके नाम आरक्षित था। उसमें उसकी चीजें रखी रहतीं- दूध, दही, सना आटा, खाने की और चीजें। फ्रिज के नीचे के खाने हम लोगों के थे। हम अपना सामान रखते-निकालते लेकिन उसके हिस्से को छूना नहीं होता था। दूध की छूत नहीं मानती थी लेकिन जितनी बार दूध निकालना होता, कोशिश करती कि वह स्वयं निकाल कर दे। बहाना यह होता कि मलाई गजबजी जाती है। मलाई जमा करके घी बनाती थी और यथासम्भव वही इस्तेमाल करती।

हलद्वानी से रेखा-सतीश आते तो उन्हें याद दिलाना पड़ता कि फ्रिज के ऊपर की सेल्फ इजा की है। कोई संबंधी आ आते तो उन्हें सावधान करना पड़ता कि ऊपर रखी चीजें न छुएं। 

हम हंसते- ‘तू ये क्या ड्रामा करती है इजा? हम दस बार फ्रिज खोलते हैं, सामान निकालते-रखते हैं। उसमें नहीं होती छूत?’

‘चुप रौ,’ वह डपट देती या मुंह बनाकर अपने कमरे में चली जाती। जाड़ों के दिनों में तो अपना दूध, दही, पानी, वगैरह अपने कमरे में रख लेती थी। गर्मियों में फ्रिज में रखना लाचारी होती। खाने में भी कई तरह के नियम थे। टमाटर, गाजर यानी लाल रंग वाली सब्जियां नहीं खाती थी। प्याज-लहसुन भी नहीं। दाल-सब्जी छौंकने के लिए एक गमले में ‘दुन’ लगा रखा था, वही तोड़ लाती। पहाड़ से ‘धुंगार’ भी लाती या मंगाती। जम्बू-गंदरैणी भी इस्तेमाल करती। शिकार खाने का तो सवाल ही नहीं उठता था लेकिन हमारे खाने पर आपत्ति नहीं करती थी। बस, इतना ध्यान रखती कि जिन बर्तनों में मांस पकता, उन्हें बिल्कुल अलग रखा जाए।

तो, ऐसी परहेजी हमारी इजा कैसे अनुमति देती कि घर में कुत्ता पाला जाए? बिल्ली होती तो अलग बात थी। वह आराम से रसोई में जा सकती है। कुत्ता रसोई की तरफ कदम भी बढ़ा दे तो इजा मुंह का कौर भी थूक दे!

बड़ी मुश्किल। एक रात किसी तरह नटखट सीजर को कमरे में बंद रखा। दूसरी सुबह बेटे को मनाया- ‘एक दिन रख लिया, बहुत हुआ। आज तू इसे वापस कर आना।’

‘बिल्कुल नहीं,’ बेटा अड़ गया- ‘मैं इसे पालूंगा। देखो तो कित्ता प्यारा है। आमा के पास नहीं जाना, हां सीजर!’ वह उसे पुचकारने लगा।

लाड़ हमें भी उस पर आ रहा था। था भी बहुत ही मोहिला। रात उसे एक मचिया पर दरी बिछाकर सुलाया। वह गुड़मुड़ी होकर सो गया। बेटा बीच-बीच में उठकर उसे देखता तो सीजर फौरन उठकर पूंछ हिलाने लगता। बेटे के पास पहुंचने के लिए कूं-कूं करने लगता। छोटा इतना था कि बिस्तर पर चढ़ नहीं सकता था। हम कमरे में जाते तो छोटी-सी दुम हिलाते हुए पीछे-पीछे लग जाता, पैरों से उलझ पड़ता। बच्चों से तो वह दूर ही नहीं होना चाहता था। नन्हीं कंजी आंखों से उसे देखता और तेज-तेज पूंछ हिलाता रहता। उनके लिए वह प्यारा खिलौना बन गया था।

घर में तिनका भी हिले तो इजा को पता चल जाता था। यहां तो एक नन्हा प्राणी अपनी मोहिली अदाओं से हम सबको रिझाए हुए था।

‘बाहर फेंक आ इसको,’ इजा गरजी। सीजर पता नहीं कब कमरे से लॉबी में निकल आया था। लॉबी से ही लगी रसोई थी। इजा की चीख पर सहमा सीजर उन्हें देखे जा रहा था। बेटा बड़ी मुश्किल से इस आश्वासन पर स्कूल गया कि सीजर को बाहर नहीं किया जाएगा।

‘यहां आएगा तो तेरे खुट (पैर) टोड़ दूंगी,’ इजा ने सीजर को बड़े गुस्से में चिमटा दिखाया। वह पता नहीं क्या समझा, पूंछ हिलाते हुए रसोई की तरफ बढ़ा। तत्काल उसे पकड़ कर कमरे में बंद किया गया।

काफी सोच-विचार के बाद तय हुआ कि सीजर बाहर बरामदे में रहेगा। घर के अंदर उसे नहीं आने देंगे। वहीं उसका बिस्तर, खाने और पानी का बर्तन रख दिया गया। वह वहां रुकता तब न! जैसे ही उसे बरामदे में करके दरवाजा बंद किया, वह जाली के दरवाजे से मुंह लगाकर कूं-कूं-कूं करने लगा। अपने नन्हे पंजे से दरवाजा खुरचने लगा। जोर-जोर से पूंछ हिलाकर मनुहार करने लगा। था भी बहुत छोटा और मां से पहली बार बिछुड़ा था। उस पर ममता आ गई। थोड़ी देर बाद ही उसे भीतर ले आया गया।

उसे कमरे में बंद रखना सम्भव न था। वह घर भर में घूमता। जहां से किसी की आवाज सुनता, पूंछ हिलाते हुए उधर ही भागता। इजा ने एक तरह से समझौता कर लिया था। वे जान गईं थीं कि वह इसी घर में रह जाने वाला है। सीजर और उनके बीच एक तनातनी बनी रहती जिसे दूर करने के लिए सीजर पूंछ हिलाने और उनके पीछे-पीछे दौड़ने में कोई कसर न छोड़ता। वे ‘हड़ि” कहकर उसे घुड़क देतीं। हम यह ध्यान रखते कि जब इजा रसोई में हो तो सीजर उस तरफ न जाने पाए। इजा भी उसे चिमटा दिखाकर डराती- ‘यां मत आना हां, खबरदार!’ इतने दिनों में सीजर भी समझ गया था कि उसे रसोई में नहीं जाना है। वह ज़ल्दी-ज़ल्दी बड़ा होने लगा था।

‘सीजर, हट वहां से,’ एक दिन मैंने उसे रसोई के दरवाजे पर खड़े देखा तो डपटा। इजा अपना खाना पका रही थी।

‘रूंण दे (रहने दे,) नहीं आता रसोई में,’ इजा ने कहा तो सुखद आश्चर्य से मेरे चेहरे पर हंसी खिल गई। एक और सुबह देखा कि इजा रसोई में है और सीजर रसोई के दरवाजे पर बैठा है। दोनों पंजे आगे करके उस पर अपनी थूथन टिकाए वह लगातार इजा को देखे जा रहा था।

‘बैठे रहना हां, अभी दूंगी!’ इस बार इजा सीजर से संबोधित थीं और प्यार से। सीजर ने इजा का दिल जीत लिया था। खा चुकने के बाद उन्होंने उसे उसका हिस्सा दिया। फिर यह रोज का नियम बन गया। जब तक इजा रसोई में रहती वह द्वार पर बैठा रहता। कभी अंदर जाने की कोशिश उसने नहीं की। उस समय हमारे बुलाने-पुचकारने पर भी वह न हिलता।

कुछ दिन बाद वह इजा के कमरे की देहरी पर भी ऐसे ही बैठने लगा। कमरे के एक कोने में मंदिर था। इजा सुबह-शाम दिया जलाती, आरती करती और घण्टी बजाती। घण्टी की आवाज सुनते ही सीजर सब कुछ छोड़कर उस कमरे की देहरी पर जा बैठता। अगले दो पैर देहरी से तनिक भीतर और उन पर थूथन टिकाए। पूजा करने के बाद इजा बच्चों को प्रसाद देती थी। चंद इलायची दानों का वह प्रसाद अब सीजर के हिस्से भी आने लगा। बल्कि, सबसे पहले सीजर को देती फिर बच्चों के लिए रखती।

‘तू तो सबसे पहले सीजर को प्रसाद देती है,’ एक दिन मैने हंसते हुए कहा।

‘क्या करूं, नहीं दिया तो मुख ही मुख देखे रहता है।’ इजा मुस्कराई और सीजर को प्यार करने लगी। दोनों में अब सम्वाद भी होने लगा था। दसेक महीने में सीजर अच्छा खासा बड़ा हो गया था।

नवरात्र के दिनों में इजा पास के एक मंदिर में कीर्तन सुनने जाती। लौटते समय उसके हाथ के दोने में प्रसाद होता। पहले उसे बच्चों के लिए रख दिया जाता था। अब सीजर हक जताने लगा। उसे पूरा दोना चाहिए होता। बड़े होते बच्चे यूं भी पंजीरी, बताशा और कटा केला खाने में ना-नुकुर करते थे। सीजर की मौज हो गई। वह इजा के इंतज़ार में फाटक पर बैठा रहता। नवरात्र के बाद इजा खाली हाथ आती तो बेचैन होता। उछलकर अगले दोनों पैर उसके कंधों पर रख देता। तब इजा उसे कुछ न कुछ खाने को दे देती।  

इजा से हमारी कम ही बात होती थी। उसे जो भी कहना होता, हमें सुनाते हुए सीजर से कहती- ‘पेंशन लेने जाना था। कब जाएं, सीजर?’, ‘सीजर, आज हाथ-पैर बहुत चड़क रहे रे। कुछ दवाई होती...।’ ‘त्रिलोचन के यहां मिलने जाना था, तू ले जा देगा सीजर?      

‘आज क्या साग पकाएं?’ वह सीजर से पूछती- ‘झोली खाएगा, झोली?’ वह पकौड़ी वाली झोली (कढ़ी) का बड़ा खवैया बन गया था। पहले उसे एक ग्रास देने वाली इजा अब उसके कटोरे में ज़्यादा खाना देने लगी थी। डॉक्टर की सलाह के अनुसार हमने उसका दो टाइम का खाना बांध रखा था। इजा भी उसे सुबह शाम खिलाने लगी। जो खाना बचता वह भी उसके कटोरे में डाल देती। आम खाती तो गुठली सीजर के हिस्से। घी बनाती तो बचा मट्ठा और कढ़ाई की खुरचन तक सीजर के पेट में जाने लगे। हम मना करते तो इजा नाराज हो जाती- ‘दो ही रोटी देते हो उसे। भूखा रहता है वह।’

नतीजा यह हुआ कि उसका पेट खराब रहने लगा। बीमारी में वह खाना छोड़ देता तो इजा पुचकार-पुचकार कर अपने हाथ से उसे खिलाती। मिठाई का शौकीन हो गया था। सो, मिठाई के साथ रोटी मींज कर खिलाती। सीजर उसके हाथ से खा लेता मगर फिर उलटी कर देता। डॉक्टर के पास ले गए। उन्होंने हिदायत दी कि इसे समय पर ही खाना दें और ज़्यादा बिल्कुल नहीं। इजा मानती तब न! उसने नाराज़ होते हुए कहा- ‘कैसा डॉक्टर है जो कम खिलाओ कहता है। शिबौ, भूखा रह जाता है बिचारा।’

हमारे बहुत कहने पर उसने नाराज़ होकर एक-दो दिन सीजर को कुछ नहीं दिया। सीजर उसका मुंह ताकता और पीछे-पीछे लगा रहता। वह गुस्से से हमें सुनाती- ‘कुछ नहीं दूंगी तुझे, मुझे डांट पड़ती है।’ दो दिन बाद दोनों का लाड़ फिर शुरू हो जाता। घर में जो भी चीज आती उसका एक हिस्सा सीजर के पेट में जाता रहा। पर्व-त्योहारों, बच्चों के जनम बार पर पुए, सिंगल, पूरी, हलवा पकता। खुशबू मिलते ही सीजर बौरा जाता। अपना कटोरा दांतों में दबाए लॉबी में चक्कर लगाता और रसोई की तरफ टकटकी लगाए रहता। वह पुए का बहुत ही शौकीन ठहरा और दरिया दिल इजा। वह सीजर को पिठ्यां लगाती और उसके सिर पर हरेला भी धरती। पकवान उसके इतना मुंह लग गए थे कि एक-दो बार मंदिर में रखा भगवान का हिस्सा चुपके से चट कर आया।

‘क्यों, मंदिर के पुए कहां गए?’ वह पूछती। बच्चों पर या घर में काम करने वाले लड़के बूबा पर शक करती। वे समझ जाते- ‘सीजर, तूने चुराए ना पुए?’ सीजर आंख नहीं मिलाता और मुंह चुराने लगता लेकिन इजा मानती ही नहीं थी कि सीजर मंदिर में जाकर पुए टपका सकता है।

हम पति-पत्नी दिन भर बाहर रहते। बच्चे स्कूल जाते। घर में अकेली इजा का सीजर पूरा साथ देता। वे उससे बातें करती रहतीं। राम चरित मानस पढ़तीं या भजन गातीं तो सीजर देहरी पर बैठा सुनता रहता। वे सो जातीं तो चौकीदार की तरह सतर्क रहता। फाटक से कोई घण्टी बजाता तो इजा के उठने से पहले सीजर भौंकता हुआ पर्दा हटाकर बैठक की खिड़की से झांक आता। उसके भौंकने के अंदाज और पूंछ के हिलने से इजा समझ जाती कि कोई परिचित आया है या अजनबी खड़ा है।

बूबा सुबह-शाम सीजर को बाहर घुमाने ले जाता। यही उसके निवृत्त होने का समय भी था लेकिन इजा दिन में कई बार बूबा को टोकती- ‘जा, उसे बाहर ले जा। पिशाब लगी है उसे।’  

गर्मियों में पहाड़ जाती तो फोन पर सीजर का हाल पूछना नहीं भूलती- ‘उसे ठीक से खाना देना, हां! भूखा मत मार देना।’ उसे हमेशा यही लगता था कि हम सीजर को कम खिलाते हैं।

जमाना बीत गया। बच्चे बड़े होकर बाहर चले गए। सीजर बूढ़ा हो गया। इजा की भी अच्छी उम्र हो गई थी। हालांकि वह स्वस्थ और सक्रिय थी लेकिन बुढ़ापे के कष्ट घेरे रहते। सीजर की उसे अब और भी चिंता होने लगी थी। अपने हाथ-पैरों में दर्द होता तो सीजर के पैर सहलाती- ‘तेरे भी चड़क हो रही होगी ना?’ सीजर का बुढ़ापा उसके पैरों से आया। चलने में लड़खड़ाने लगा। धक्के जैसे लगते। सीमेण्ट की फर्श पर रहने-चलने से पैर उतने मजबूत नहीं रहे जितने बाहर खुले में दौड़ने से होते। वैसे भी उसे हमारे यहां तेरह बरस हो रहे थे। लगभग पूरी उम्र। कुछ समय बाद सुबह-शाम बाहर ले जाना भी मुश्किल हो गया। उसने खाना भी छोड़ दिया। इजा उसका हाल देखकर ‘शिब-शिब’ करती और उदास हो जाती। डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाए लेकिन बता दिया कि अब इलाज से कोई लाभ नहीं होगा।

एक सुबह सीजर खड़ा ही नहीं हो सका। ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा था। पुकारने पर धीरे से पलकें उठाता, फिर शिथिल पड़ जाता।

‘मरता है ये अब,’ इजा रोने लगी।

सीजर का अंत समय जानकर हमने कुत्तों का अंतिम संस्कार कराने वाली एजेंसी को फोन किया। डॉक्टर ने उसका नम्बर दे रखा था। उनके आने तक सीजर शांत हो चुका था। हम सब उदास थे। इजा उसके पास बैठी, उसे प्यार करती और रोती रही। उसकी स्थिर पुतलियां इजा की तरफ ही टिकीं थीं।

वे सीजर को उठा ले गए। हमने नम आंखों से उसे विदा किया। इजा को चुप कराना मुश्किल हो गया था। जिस दिशा में सीजर को ले गए थे, उस तरफ देखते हुए वह विलाप करती रही- ‘जा, सीजर जा, आराम से जाना। तेरे कारण मैंने कितनी डांट खाई, कितनी टुकाई खाई, अब जा।’ सिसकियां रोकने के लिए उसने आंचल मुंह में ठूंस लिया था।

सीजर की बहुत याद आती। लगता वह अभी पूंछ हिलाता किसी कोने से निकल आएगा। उसकी एक फोटो फ्रेम में लगाकर लॉबी के आले में रख दी। इजा खाना बनाते-खाते, दिन भर में कई बार उसे याद कर रोती। बच्चे छुट्टियों में घर आए तो उनके सामने सीजर को याद कर खूब रोई। छोटे बेटे ने कहा- ‘आमा, रोओ मत. हम एक और सीजर ला देंगे।’

इजा भड़क गई। रोना भूल कर गरजी- ‘खबरदार, अब  किसी को मत लाना। कुत्ते का बच्चा हो, चिड़िया का पोथिला हो, प्राणी हुआ। बड़ा मोह हो जाता है। मत लाना, मैंने कह दिया।’

भीतर जाकर सीजर की फोटो के पास खड़े होकर वह फिर आंसू बहाती रही थी।

और, कल रात वह सपने में सीजर के लिए रोटी पकाती दिखी। सीजर और इजा के किस्से हम अब भी अक्सर कहते-सुनते हैं।

('पुरवासी'- 2021. अल्मोड़ा)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

      

 

 

 

         

 

             

  

 

 

 

 

 

 

Saturday, March 06, 2021

इज स्वीण्यां देखींछ आब, पुछैं- घर कब हिटलै?

बेई रात इज फिर स्वीण्यां देखीणी। पुछणैछी- ‘आब घर कब हिटलै?’

‘घर’  मल्लब हमर गौं, पहाड़क हमर घर। अढ़तीस साल बटी इज म्यार दगाड़ यां लखनऊ रूंछी। फिर ले वी तें ‘घर’ पहाड़ै छी। बाबूलि घर-परिवार सैतणैं तें लखनऊ में नौकरी करी। लखनऊ में ‘ड्यर’ भ्यो। ‘घर’ पहाड़ै रय जै कें इजालि सैंतौ, पौर्या। आब उ घर ले हमनै तें स्वीण है ग्यो।

बाबू लखनऊ रूंछी। इज पहाड़ में। साल में एक-डेढ़ म्हैणै छुट्टी ल्ही बेर बाबू ‘घर’ जांछी। असौजा म्हैण बुति-धाणि में इजाक दगड़ करणैं तें। तबै उं दगाड़ रूंछी। बाकि पुर साल बाबू लखनऊ और इज पहाड़। उनरि भेट, कुशव-बात, दुख-तकलीफ, रीस-झगड़, लाड़, एक-दुसरै फिकर सब चिट्ठिन में हुंछी। उछ्याटन चिट्ठी ऊंण-जाण में पनर-बीसेक दिन या म्हैण-डेढ़ म्हैण ले लागि जानेर भाय। चिट्ठी पुजण जाणै बाबू लखनऊ में और इज गौं में फुराड़ी रूंनेर भाय।

मी इज-बाबुक फुरड़्याट देखन-देखनै ठुल भयूं। स्कूला किताबन दगै मील यो फुरड़्याट ले घोगौ। बाबू कम बलांछी। मनै मन लागि रूंछी उनर दुशंत्याट। चुपचाप दिवार उज्यांण चै रौल। पें उनार मुख में छपि जांछी उनरि फिकर। जब भौतै फिकर है गई तब सज्योलि कूंछी- ‘भौत दिन है ग्यान, तेरि इजै चिट्ठी नि ऐ।’ मी समझि जानेर भयूं कि आज बाबू भौत फुराड़ी रईं। फिर उं ह्वाक भरि बेर बैठि जांछी। ह्वाकै गुड़-गुड़ में लुकै दिछीं आपणि फिकर।

इज भौत बलानेर भे। उ आपण मन में के धरनेर नि भे। जब मी जेठा म्हैण स्कूलै छुट्टी में घर जांछ्यूं, तब सब कै दिनेर भे आपणि मनै बात, फिकर, दुशंत्याट, उड़भाट, जि ले भ्यो। बाबूकि चिट्ठी नि आई त उ रात-रात भरि बिज रूनेर भे। उड़भाट हुनेर भ्यो उकें। आदु रात में उठि बेर पाणी गिलास में तेलाक त्वाप खितनेर भे। तेला त्वाप पाणि में डुबनेर नि भ्या। तब उ कूनेर भे- ‘त्यार बाबू कुशलै छन।’ यसीकै मनौ संताप मिटै बेर उ दिसाण में खिती जानेर भे। नीन फिर ले उनेर नि भे। दिसाण में वल्टी-पल्टी बेर रात काटि दिनेर भे। रात ब्याई बटी कामै-काम। बुति-धाणि में फिकर ले दबि जानेर भ्या। रात में चुपचाप ऐ बेर फिर दबूनेर भ्या।

परदेस में बाबूक और पहाड़ में इजाक यो फुरड़्याट म्यार मन में किलै चारि गैंठी रौ। जब म्यर ब्या भ्यो, यें लखनौ में, तब मील इज थें कय- ‘आब तु लखनौ ऐ जा। सब दगाड़ै रूंल।’

‘घरक कि होल? कसी होल?’ पैल फिकर योई भे। बड़ि मुश्किललि उ मानि गे। बाबू रिटायर है बेर ‘घर’ जूंल, वैं रूंल कूनेर भ्या। तब उनरि नौकरी छनै छी। रिटायर हुंण तक उं ले राजि है ग्या। त, सन 1982 बटी इज हमार दगाड़ लखनौ ऐ गे। साल में एक-द्वि फ्यार, या जब ले मन में ऐ, पहाड़ जानेरै भे। रिटायर हुण है द्वि साल पैली बाबू कें दिलै बीमारी है पड़ी। हार्ट अटैक भ्यो। उ बखत बचि गाय मगर वापस पहाड़ जाण लैक नि रै। यसि कै पहाड़ छुटि ग्यो। इज-बाबू हमार दगाड़ लखनौ रै गाय। द्विय्यै बैठीं-बैठी ‘घरै’ बात करनेर भ्या। हमर घर-गौं, स्वार-बिरादर, गाड़-भिड़, हाव-पाणि… ‘दिगौ-दिगौ’ कूनेर भ्या। खूब चिट्ठी-पत्री करनेर भ्या।

फिर 1994 में एक रात बाबू सितियै रै ग्यान। नीनै में हार्ट फेल। हमार दागड़ इज इकली रै गे। भे उ खूब छालि। लखनौ में इकलै सब जाग घुमि ऊनेर भे। जब मन ऐ पहाड़ न्है जानेर भे। हल्द्वाणि-नैनताल सतीशा यां, चेलिना यां, आपण मैत, बैणीना यां। ‘घर’ जै बेर आपण बोटा नारीड., च्यूड़, खजी खाज, चूख लखनौ ल्ही ऊनेर भे। क्वे दगड़ चैनेर नि भ्यो उंकें। जां जालि वें दगड़ू बणै ल्हिनेर भे। रूनेर लखनौ भे मगर हल्द्वाणिक दगड़ून थें बात करि बेर तीर्थ यात्रा पोग्राम बणि जानेर भय। च्यालना मुख चै रूंण नि भ्यो कि तीर्थ करै द्याल। बस में बैठि बेर गंगा सागर, प्रयाग-नासिक कुम्भ, सबै तीर्थ करीं वील। नेपाल जाणै गे। खजुर-गुड़ पापड़ि बादि बेर द्वि-द्वि म्हैणै तें न्हें जानेर भे। सब काम आपण हातलि। खुश है बेर बतूनेर भे- ‘सब घुमि हालो मील, देखि राखौ मील।’ मोबाइल चलूण ले फौरन सिखौ। फिर त रतै-ब्याव ‘हैलो-हैलो’ भे। सब जाग बात, सबनाक हाल-चाल ल्हिनेर भे। दुन्नि भरी खबर रूनेर भ्या वी पास।

पै बखत कै कें छाड़ौ? इजकि ले उमर हुनी गे। अठासी पुर करीं पछारि कभतै हिटन-हिटनै धाक लागण बैठीं। कमजोर ले है गे। फाम गजबजीण लागी। बैंक में दस्तखत ट्याड़-म्याड़ हुंण बैठी। बैंक मैनेजरलि एक दैन कौ- ‘माता जी, अब आप अंगूठा लगाना शुरू कर दो। दस्तखत नहीं हो पाते।’

‘कब्बी नहीं लगाया मील अंगूठा,’ इजालि ट्यड़ मूख बणा। मील समझा तब बुरुंट्ठी टेकण पड़ौ। उ दिन भौत उदास भे। कय तो के नि वील मगर मील देख हाछी वीक मुख में। वील चितै हाछी कि आब उमर है गे। बुरुंट्ठी में लागी स्याई मिटण में टैम लागौ। उ स्याई वीक मन में बैठि गेछी शैद।

‘नब्बे बरस हुनी आब तुकें,’ मील वीथें कौ- ‘कब तक नि हुनी बुड़ी?’

आंचवक टुक मुख में दबै बेर वील कौछी- ‘आजि नब्बे त है रईं!’ वीकि हंसि मी कें आजि ले याद छ। उ योई सोचछीं कि नब्बे क्वे खास उमर न्हांति। दुसारन थें ‘बुड़-बुड़ी’ कूनेर भे- ‘जरा, खिमान्दै बुड़ी कें देखि ऊं।’ हम हंसनेर भ्या- ‘उ बुड़ी न्हाति, तेरि ब्वारी लागैं।’

एक दिन क्याप्प जस भ्यो। इज सब भुलि गे। हमन कें ले नि पछ्याण। भ्यार भाजनेर भे। एक्कै रट भे- ‘घर हिटो, घर हिटो।’ एक चद्दर में आपण द्वि लुकुड़ बादि बेर बाटि लागीं भे- ‘हिटो घर, हिटो घर।’

‘योई त छ हमर घर।’

‘न्ना, यो न्हांति हमर घर,’ डाड़ मारण बैठी- ‘म्यार गोर-बाछ भुख छन। नानतिन दूध बिना टणटणी रईं। हिटो घर।’ कतु धान्‍ करीं। समझा–बोत्या मगर ना, उई रट। भाजण में कतु बखत पतेड़ी पड़ी। खैर, डॉक्टरलि जांच कराईं। सोडियम-पोटेशियम कम है गोछी। एक हफ्त में इलाजलि ठीक है गे मगर ‘घर’ मल्लब पहाड़ै फाम सोडियमै कमी ले नि भुलै सकि। आखिर तक वीक लिजि घर मल्लब पहाड़ भ्यो।

परार साल घर भितेरै धांक लागि बेर द्वि-तीन बखत लफाई पड़ी। हांट-भांटन लागी, घुन में पीड़ भे। मी एक भली भलि स्टिक ल्ही बेर आयूं- ‘ले, यो जांठ थामि बेर हिटिए।’ जांठ थामण में ले वील नखारै करीं। जांठ थामण मल्लब बुड़ीण। यो वीकें मंजूर नि छी। हफ्त में द्वि दिन सत्संग जानेर भे। के है जावो, सत्संग छोड़नेर नि भे। क्वे भेट करण हुं आयो होलो त वीथें ले कै देलि- ‘म्यर सतसंग’क टैम है गो। तुम बैठो।’ नजीकै भ्यो, माठू-माठ न्है जानेर भे। कभतै मील पुजै दी। सतसंग जाणै तें जाठ थामण बैठी मगर घर भितेर नि थामि। लोटीनी रै, लागनी रै। मेरि ब्वारि थें कूनेर भे- ‘मील पहाड़ौ पाणि पी राखौ, घरै धिनाई खै राखी। तबै मेरि हड्डी मजबूत छन।’

बात ठीकै कूंछि मगर उमर है गई त पहाड़ौ हाव-पाणि-धिनाइ कि करछी! 14 अगस्ता दिन अपणै कम्र में यसी लफाई पड़ी कि ठाड़ि नि है सकि। ढ्यांग में लागी। हड्डीक चार टुकुड़। ऑपरेशन करण पड़ौ। डॉक्टरलि रॉड-पेच लगै बेर हड्डी जोड़ि दे। कोरोनालि अलग आफत करि राखछी। खैर-खैर कै बेर घर ऐ। ठीक हुणैछी मगर दिसाण में पड़ी-पड़ी खाण-पिण छोड़ि दे। पनर दिन बाद पांच सितम्बरा रत्तै ब्याण प्राण छाड़ि देईं। ‘घर’ या ‘ड्यर’ जि ले छि सब यें रै गो। घर-घर करन-करनै इज न्है गे ‘भगवाना घर’। यसै कूनी क्याप!

घर सुनसान है गो। इज छि त घर में औरी हकाहाक हुंछी। रत्तै ब्याण, चार बाजी बटी घर बिजि जांछी। नाण-ध्वीण, पुज-पाठ, रस्या में खन-मन। हमार बिजण जाणै वीक आदु दिन है जांछी।

इज छी त घर में क्वे नड़क्यूणी-बतूणी छि। ‘आज हर्याव ब्वीण छ। आज बिरुड़ हालण छन। झट्ट नै बेर आ, यो जौं तिनाण ख्वार में धरि द्यूंल। बामण दसौरा कागज दी जै रौछी, द्वार लै लगै दे। आज त्यर जनमबार हुंछ, बग्वावक हई छै तु। मुन्नी कें भिटौइ भेजी त्वील? फोन करि दिनै, मिली नि मिलि?’

‘आज अभीख होलि। भोल त्यार बाबू शराद हुंछ,’ पातड़ इजाक सिरानै रूनेर भ्यो। भास्करानंद लोहनि ज्यू पातड़ भेजंछी। सतीश हल्द्वाणि बटी रामदत्त ज्यूक पातड़ लूंछी। पातड़ टैम पर नि आयो त सतीशै आफत। द्विय्यै पातड़न में के फरक भयो त बतै दिनेर भे- ‘सातूं नौर्त गलि रौ। होलि पछी गे ऐला साल।’ फोन उनेर भ्या- ‘आमा से पूछ कर बता दीजिए, पुन्यू का व्रत कब करना है?’

‘किलै, तै कें एकादशि-पुन्यू ले याद नि रूंनी? है गे पै, पुरी पाड़लि,’ इज सबन कें नड़क्यै दिनेर भे। अस्सी सालक भतिज पूरन कें ले- ‘काखी मुख लै कतु म्हैण बाद ऊणौछै?’

इज गिदारि ले छी। घर में मल्लब गौं में त ब्या-काजन में वीक बिना कामै चलनेर नि भ्यो। शकुनाखर,  कर्माक सब गीत गैनेर भे। स्वर जस ले भ्यो, पुर गैनेर भे। लखनौ आई बाद यां ले बामणन कें टोकि दिनेर भे- ‘पैली यो करो, तुमलि यस त करै नै। हमार यां यस करनी, यस नै!’ होलिन में सबन है पैली पुजि जालि। घर में ढोलुक ल्ही बेर गैण लागलि। रामलिल देखणौक औरै शौक। हमन थें कजि ले करलि- ‘तुम चुपचाप रात में रामलिल देखण ग्या हुनेला, मी कें नि ल्ही गया।’ 

इज छी त हमि आपण बोलि में बलाछियां। देसि फुकन-फुकनै वीक सामणि जिबड़ लटपटै जांछी। वीक मुख तिर पहाड़ि में आफी-आफी बलाई जांछी। उ सबन थें कुमाऊंनी बलानेर भे। घर में काम करणी नानतिन हो या फाटक लै आई क्वे मांगणी, के पुछणी, के बेचणी। छंजरा दिन एक ‘पण्डित’ ऊंछी, तेल और डबलक दान मांगणी। क्वे छंजर नि ऐ सको त दुसार छंजर सवाल हुनेर भ्यो- ‘पैल छंजर कां रैये ला तू? मी डबल ल्ही बेर चै रैछ्यू।’ उ कौल- ‘माता जी, गांव गया था।’

म्यार दगड़ू आला तो पैली पहाड़ि में बलालि, फिर देसि में। म्यार नानतिन पहाड़ि भली कै समझनी। बाबू उनन थें हिंदी बलांछी मगर इजालि कबै हिंदी में बात नि करि। तीन-चार नानतिन घरौ काम-काज करणै तें हमार यां सालों साल रईं। उनन थें ले पहाड़ि में बलांछी। सब इजाकि बोलि समझि जांछी। द्वि-चार शब्द ले बलाण भै ग्याछी। कै थें रिसै जाली त गाइ-मैकि ले करि दिनेर भे‌- ‘नि खै जालै तु, कयूं मानण छाड़ि हालौ त्वील म्यर।’ उ हंसल, फिर इज कैं मनाल- ‘माता जी, गुस्सा मत हो, अभी आपका काम करता हूं।’ डाक में क्वे कुमाऊंनी पत्रिका आली त पुरि पढ़लि। फिर बतालि यसि कविता लेखि राखी, यह कहानि लेखि राखी। भल लेखि राखौ।

इज छी त हमरि एक खास पछ्याण छी। वी दगाड़ हमरि उ पछ्याण ले न्है गे।

आब इज स्वीण्यां देखींछ। स्वीण में उ हमार गौंक कुड़ में देखीं। कभतै चाख लिपण देखीं, कभतै छां फानण, कभतै घा गढ्यव ल्ही बेर ग्वैटून ऊंण देखीं। लखनौ वाल घर में कमै देखीं और जब देखी गई तो योई पुछैं- ‘आब घर कब हिटला ला, ढील नि हुणई?’

उ घर ले, जै थें इज ‘आपण घर’ कूंछी, हमार लिजी स्वीण है गो।

('कुमगढ़,' जनवरी-फरवरी 2021 में प्रकाशित)