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Tuesday, January 22, 2019

क्षेत्रीय दलों के छुपे पत्ते



न तो सन् 2014 के आम चुनाव जैसी परिवर्तन की आंकाक्षा जोर मार रही है, न ही सत्ता-विरोधी लहर दिख रही है. 2019 का लोक सभा चुनाव कई तरह की सम्भावनाएँ ला सकता है. यदि भाजपा-नीत गठबंधन बहुमत पाता है या भाजपा और कांग्रेस में कोई दल सत्ता के करीब पहुँचता है तो स्थितियाँ असामान्य नहीं कही जाएँगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो? अगर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में से कोई इतनी सीटें नहीं जीत सका कि विभिन्न क्षेत्रीय दल किसी एक को समर्थन देकर सरकार बनाने में मदद करें, तब? देश ऐसे चुनाव परिणाम पहले भी देख चुका है जब क्षेत्रीय दलों के चुनावोपरान्त गठबंधन की सरकार बनाने में राष्ट्रीय पार्टी बाहर से समर्थन देने को मजबूर हुई.

छोटे-छोटे दलों की ‘खिचड़ी’ सरकारें स्थिर नहीं होतीं, यह भी हम खूब देख चुके हैं. इसके बावजूद यह एक बड़ी सम्भावना बनी रहती है. क्षेत्रीय दलों के नेताओं के मन में एक बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की महत्वाकांक्षा इसी कारण फलती-फूलती रही है. इस बार भी यह बहुत जोर मार रही हो तो कोई आश्चर्य नहीं.
विरोधी दलों की कोलकाता रैली में इस पर सभी सहमत थे और पुरजोर कह रहे थे कि देश तथा लोकतंत्र को बचाने के लिए भाजपा को हराना आवश्यक है. इस उद्देश्य के प्रति सभी ने संकल्प भी व्यक्त किया लेकिन ऐसी कोई राह नहीं निकाली कि वे भाजपा के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा या गठबन्धन बना लेंगे.

पहले भी लिखा जा चुका है और कोलकाता रैली के बाद फिर स्पष्ट हुआ है कि ज्यादातर क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में भाजपा को शिकस्त देने की हरचंद कोशिश करेंगे. उनमें किसी भी तरह का गठबंधन चुनाव बाद ही होने के आसार हैं. तेलुगु देशम और एनसीपी जैसे चंद दल ही हैं जो अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के साथ गठबन्धन करके भाजपा का मुकाबला करने वाले हैं.
कहा जा सकता है कि इसके पीछे क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा ही है. उनकी नजर चुनाव बाद पैदा होने वाली स्थितियों का अधिक से अधिक लाभ उठाने पर टिकी हुई है. इसीलिए वे चुनाव-पूर्व किसी प्रतिबद्धता से बच रहे हैं.

सीटों के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दो महत्त्वपूर्ण दलों, सपा और बसपा का गठबंधन हो चुका है. पिछले चुनाव नतीजों का सामान्य गणित, जो आवश्यक नहीं कि सही ही बैठे, कहता है कि इस गठबंधन से भाजपा को पचास सीटों तक का नुकसान हो सकता है. भाजपा के लिए यह बहुत बड़ा धक्का होगा. सपा-बसपा मान कर चलेंगे ही कि उनके पक्ष में इससे भी अच्छा परिणाम आएगा. मान लिया कि सपा-बसपा को उत्तर प्रदेश में 50 सीटें मिल जाती हैं तो क्या वह लोक सभा में एक बड़ी ताकत नहीं होगी? किसी राष्ट्रीय दल के बहुमत से काफी दूर रह जाने पर वह स्वयं सत्ता की दावेदार नहीं बनेगी?

समझा जा सकता है कि ममता बनर्जी की भाजपा विरोधी विपक्षी रैली को पूरा समर्थन देने के बावजूद मायावती स्वयं उसमें शामिल क्यों नहीं हुईं. उन्होंने अपना प्रतिनिधि भेजा. अखिलेश यादव वहाँ गये क्योंकि अभी वे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने के लिए काफी नये हैं. मायावती के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता.

इसी कारण ने राहुल गांधी को भी कोलकाता को विशाल विपक्षी मंच से दूर रखा हालांकि उनके एक से ज्यादा प्रतिनिधि वहाँ मौजूद थे. राहुल प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने जाते हैं. खैर, यहाँ हम भाजपा-विरोधी क्षेत्रीय क्षत्रपों की राजनीति की बात कर रहे हैं.

ममता बनर्जी हाल के महीनों में भाजपा-विरोधी क्षेत्रीय नेताओं की अग्रिम पंक्ति में रही हैं. कोलकाता रैली का आयोजन उन्होंने बंगाल में वामपंथियों के मुकाबले भाजपा-विरोध की अपनी शक्ति दिखाने के लिए ही नहीं, राष्ट्रीय फलक पर अपनी धमक जताने के लिए भी किया. वर्तमान लोक सभा में विपक्ष में कांग्रेस के बाद तृणमूल कांग्रेस सबसे बड़ा दल है. 2019 के लिए वे अपने दाँव क्यों नहीं  चलेंगी? ऐसी स्थितियाँ भी तो बन सकती हैं जब क्षेत्रीय  क्षत्रपों को नेतृत्त्व के लिए उनके नाम पर राजी होना पड़े. देवेगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल की तुलना में ममता बनर्जी कहीं ज्यादा परिचित और सक्रिय नाम नहीं है क्या? मायावती और ममता बनर्जी में चुनाव करना पड़े तो अन्य क्षेत्रीय दल किसके पक्ष में खड़े होंगे?

कांग्रेस तीन राज्यों में सत्ता में वापस अवश्य आ गयी है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुकाबले अकेली पार्टी होने के बावजूद उसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में उसने बेहतर प्रदर्शन किया है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल जैसे बड़े राज्यों में उसके पैर उखड़े हुए हैं. उत्तर-पूर्व में उसका सफाया है. पिछले लोक सभा चुनाव में वह मात्र 44 सीटों पर सिमट गयी थी. इस बार आखिर उसे कितना फायदा हो जाएगा? कुछ अजूबा घटित हो तो नहीं कह सकते, वर्ना सौ-सवा सौ सीटें पाना उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी.

भाजपा दो सौ के आंकड़े से काफी नीचे रह जाए तो भी कांग्रेस इस स्थिति में सत्ता की दावेदारी कैसे कर सकेगी? स्वाभाविक है कि वह भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए क्षेत्रीय दलों को समर्थन देने को विवश होगी. यह बड़ा कारण है कि क्षेत्रीय दल फिलहाल कांग्रेस का नेतृत्त्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. उलटे, वे कांग्रेस से स्वयं समर्थन की आशा लगा रहे हैं. सपा-बसपा ने कांग्रेस को गठबंधन में शामिल नहीं करने के बावजूद सोनिया और राहुल गांधी की सीटों पर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला क्या यूँ ही किया है?

आसन्न आम चुनाव के परिणामों की ऐसी सम्भावनाएँ क्षेत्रीय दलों की महत्त्वाकांक्षाओं को हवा दे रही हैं. इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भाजपा के विरुद्ध एक मंच पर इतनी बड़ी जुटान होने के बावजूद महागठबंधन की सम्भावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही. ये क्षेत्रीय दल भाजपा को हराना चाहते हैं लेकिन उसके लिए अपने राजनैतिक हितों की तिलांजलि नहीं दे सकते. भाजपा को परास्त करने की रणनीति के साथ-साथ उन्हें अपने लिए अधिकतम सम्भावनाओं के द्वार खोले रखने हैं.

यह विरोधाभास आज की चुनावी रजनीति का सत्य है. सत्य यह भी है कि इसमें राजनैतिक अस्थिरता, उठापटक और जल्दी-जल्दी चुनाव के खतरे शामिल हैं. जनता का बड़ा वर्ग मोटे तौर पर अस्थिरता और अवसरवादी राजनीति स्थिति पसंद नहीं करता लेकिन जातीय-धार्मिक-क्षेत्रीय गोलबंदियों से प्रभावित मतदान ऐसी स्थितियाँ ले ही आता है. ऐसी सम्भावना भाँप कर ही भाजपा नेता अब जनता को ‘खिचड़ी’, ‘स्वार्थी’ और ‘अस्थिर सरकारों’ से आगाह करने में लग गये हैं.

यानी, सभी दल अपने कुछ पत्ते छुपा कर खेल रहे हैं.

(प्रभात खबर, 23 जनवरी, 2019)    

 
 

    
      

Tuesday, July 24, 2018

राहुल की गठबंधन-परीक्षा



कांग्रेस ने यह मान कर ठीक ही किया कि 2019 के आम चुनाव में में नरेंद्र मोदी को वह अकेले दम नहीं हरा सकती. इसके लिए विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करना जरूरी है. राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद सम्भालने के बाद हुई पहली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का यह स्वर बहुत महत्त्वपूर्ण कहा जाना चाहिए. निर्वाचित सांसदों के हिसाब से सबसे बड़ी पार्टी बनने पर गठबंधन के नेता के रूप में राहुल को पेश करना सिर्फ औपचारिकता है. आज अत्यंत सीमित सांसद संख्या के बावजूद कांग्रेस अखिल भारतीय उपस्थिति वाली पार्टी है. कई राज्यों में वह भाजपा के सीधे मुकाबले वाला दल है. क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर वह भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रीय गठबंधन बना और चला सकती है. 2004 से लेकर 2014 तक यूपीए उसी के कारण चला. कांग्रेस आगे भी ऐसा कर सकती है.

यह सिर्फ सम्भावना है. राहुल गांधी के लिए पहली चुनौती यहीं से शुरू होती है. परस्पर विरोधी हितों और महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय दलों के नेताओं को एक मंच पर लाना आसान काम नहीं है. कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस से टकराव है. कई दलों का भाजपा से कांग्रेस सरीखा तीखा विरोध नहीं है. भाजपा-विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन बनाने के लिए राहुल को वहां सहयोग की कीमत अपनी जमीन छोड़ कर चुकानी पड़ेगी. वे किस-किस के लिए कितनी जगह खाली करेंगे? फिर स्वयं कांग्रेस के लिए कितना स्थान बचा रहेगा, जबकि इस समय उसे अपने पुनरुत्थान के लिए संघर्ष करना है.

अब जबकि सोनिया गांधी नेपथ्य में हैं, अत्यन्त महत्वाकांक्षी चंद क्षेत्रीय नेता क्या राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकर करने को सहज ही तैयार हो जाएंगे? कांग्रेस कार्य समिति के फैसले पर देवेगौड़ा की सहमति को छोड़ कर सभी क्षेत्रीय नेता मौन हैं. ममता बनर्जी ने पहले ही भाजपा विरोधी ‘फेडरल फ्रण्ट’ की तैयारी का ऐलान कर दिया है. सम्भावना है कि इसमें वे कांग्रेस को भी शामिल करेंगी लेकिन अपनी पहल की बागडोर राहुल को क्यों थमा देंगी?  तेलंगाना के चंद्रशेखर राव की तरह चंद्र बाबू नायडू राष्ट्रीय भूमिका के आने के संकेत दिये हैं. नवीन पटनायक भाजपा और कांग्रेस से बराबर दूरी बनाए रखने की रणनीति पर चल रहे हैं.

बिहार में राजद के छोटे भागीदार के रूप में उनकी दोस्ती चल जाएगी लेकिन उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश उन्हें कितनी जगह देंगे? सपा-बसपा दोनों मिल कर भाजपा को हराने की स्थिति में हैं तो वे कांग्रेस को शामिल करेंगे भी या नहीं? करेंगे तो दूसरे राज्यों में उसकी कितनी बड़ी कीमत मांगेंगे? यानी क्षेत्रीय क्षत्रपों के अलग-अलग राजनैतिक स्वार्थ हैं. कांग्रेस के साथ कोई रियायत वे नहीं करने वाले. राहुल की परीक्षा यह है कि उन्हें कांग्रेस को खड़ा करना है और गठबंधन भी बनाना है. यह डगर सचमुच फिसलन भरी है.

दिखता तो है कि पिछले एक साल में राहुल ने अपने को नरेंद्र मोदी से सीधे मुकाबले के लिए तैयार किया है. गुजरात चुनाव से लेकर हाल के अविश्वास प्रस्ताव तक वे क्रमश: रणनीति बदलते एवं आक्रामक होते आये हैं. इसमें भाजपा से ज्यादा क्षेत्रीय दलों के लिए स्पष्ट सन्देश है कि 2019 में भाजपा को रोकना है तो कांग्रेस ही उस मोर्चे की धुरी बन सकती है और राहुल उसके स्वाभाविक नेता हैं. क्षेतीय दल इस संदेश को कितना ग्रहण कर रहे हैं?

भाजपा इस खतरे को अच्छी तरह पहचानती है. इसीलिए नरेंद्र मोदी लगातार न केवल कांग्रेस पर हमलावर हैं बल्कि क्षेत्रीय दलों को सावधान करते रहते हैं कि कांग्रेस किस तरह अपने सहयोगी दलों को छलती रही है और आगे भी ऐसा करेगी. वह क्यों चाहेगी कि कांग्रेस के नेतृत्त्व में उसके विरुद्ध कोई गठबंधन बने. गठबंधन की राहुल की राह बहुत कुछ निर्भर करेगी वर्षांत में होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधान सभा चुनाव नतीजों पर. अगर कांग्रेस वहां भाजपा से सत्ता छीन पाती है तो उसके लिए 2019 की राह ही नहीं, क्षेत्रीय दलों का नेतृत्त्व पाना भी आसान हो जाएगा.

मोदी के विरुद्ध राहुल की दूसरी बड़ी तैयारी चुनावी मुद्दे चुनने में दिख रही है. यह महत्त्वपूर्ण होगा कि मोदी सरकार के खिलाफ वे क्या-क्या मुद्दे लेकर जनता के बीच जाते हैं. 2014  की तुलना में लोकप्रियता कम होने के बाद भी मोदी चुनाव जिताऊ नेता बने हुए हैं. जनता का एक बड़ा वर्ग उनसे निराश नहीं हुआ है. जो विफलताएं हैं भी, उन पर आक्रामक हिंदुत्त्व का भाजपा-संघ का एजेण्डा हलके नशे की तरह तारी है. इसलिए गुजरात चुनाव के समय राहुल गांधी ने उदार-हिंदुत्त्व का जो चोला पहना था, वह उतारा नहीं है. बल्कि, उन्होंने इधर लगातार यह दिखाने की कोशिश की है कि कांग्रेस को भी हिंदुत्त्व से प्रेम है किंतु किसी के प्रति नफरत भरा नहीं. अविश्वास प्रस्ताव पर अपने धारदार भाषण में जब वे नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद देते हैं कि ‘आपने मुझे हिंदू होने का मतलब समझाया, आपने मुझे कांग्रेस होने का मतलब समझाया’ तब वे जनता को सायाश यही संदेश दे रहे थे. इसी के बाद वे देश में जगह-जगह नफरत में मारे जा रहे लोगों की चर्चा करते हैं, सबसे मुहब्बत करने और स्वयं नरेद्र मोदी से भी नफरत नहीं करने की बात कहते हुए प्रधानमंत्री के गले लग जाते हैं.

इसमें चाहे जितनी नाटकीयता देखी जाए, चाहे जितना वितण्डा खड़ा किया जाए, असल में यह मोदी के खिलाफ एक राष्ट्रीय विमर्श चुनने का राहुल का योजनाबद्ध प्रयास था. इसमें उग्र हिंदुत्त्व और नफरत की राजनीति के मुकाबले बहुलतावादी भारतीय संस्कृति का मुद्दा जनता के सामने रखने का प्रयास दिखाई देता है. वह कितना प्रभावी होगा, यह अलग बात है.

राहुल को कांग्रेस की बागडोर ऐसे समय मिली है जब पार्टी विपक्ष में और सबसे कमजोर हालत में है जबकि मुकाबले में बहुत ताकतवर नेता तथा सत्तारूढ़ दल है. यह विपरीत स्थितियां उनकी राजनीति और नेतृत्त्व कौशल के लिए बड़ा अवसर भी बन सकती हैं. कांग्रेस में दूसरे नम्बर की हैसियत से वे एक दशक से ज्यादा गुजार ही चुके हैं. अब परीक्षा का समय है. उनके लिए अच्छी बात यह है कि कांग्रेस की जड़ें अखिल भारतीय और गहरी हैं.  

भाजपा आज देश भर में चाहे जितना छाई दिख रही हो, उसकी अखिल भारतीयता अपेक्षाकृत नयी है. अनुकूल हवा-पानी पाते ही कांग्रेसी जड़ों को पनपने में देर नहीं लगेगी. यह अनुकूलता भाजपा के अपने अंतर्विरोधों से, क्षेतीय दलों के साथ गठबंधन की रणनीति से और राहुल की अब तक की कांग्रेस-दीक्षा से सम्भव हो सकती है. कांग्रेस को लगभग खत्म कर चुकने का दावा करने के बावजूद भाजपा का कांग्रेस-भय इसी कारण बना हुआ है.  
(प्रभात खबर, 25 जुलाई, 2018)