Tuesday, September 12, 2023

हिंदी कहानी में इसलिए अद्वितीय हैं शेखर जोशी

मैं अपनी बात शेखर जी के ‘कथा-समग्र’ में लिखी गई भूमिका के एक पैराग्राफ से शुरू करता हूं- ‘उन्होंने अपने लिए एक खामोश, शालीन, धैर्यवान और ‘थोड़ा लिखा-बहुत समझना’ वाली भाषा-शैली निर्मित की। उनकी कहानियां न चौंकाती हैं, न चमत्कृत करती हैं, न नारे लगाती या क्रांति करती हैं, न सैद्धांतिक बहसों में पड़ती हैं और न लम्बे विवरणों में ले जाती हैं। वे एक सामान्य, छोटे-से वाक्य या संवाद से शुरू होती हैं और धीर-गम्भीर-मंथर गति से चलते हुए लगभग चुपचाप पूरी हो जाती हैं। कहीं से भी आरोपित या बहुत श्रम करके लिखी गई नहीं लगतीं। कई बार लगता है- अच्छा, कहानी पूरी भी हो गई! और, तब उसके अर्थ खुलने लगते हैं। सहज-सरल शब्दों में कथाकार जो कह गया, वह पाठक के मन में अपना आकार और अर्थ बढ़ाने लगता है। परतें धीरे-धीरे खुलती हैं, गहरा अर्थ-बोध कराती जाती हैं और याद रह जाती हैं। उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही उनकी कहानियां भी लगती हैं- बहुत कम लेकिन सधा हुआ बोलने वाले, बिना उत्तेजित हुए अपनी अर्थपूर्ण बात कह जाने वाले, विनम्र, दोस्ताना और कहीं-कहीं व्यंग्य की हलकी-सी छौंक। कहानियां पढ़ते हुए जैसे हम शेखर जोशी को ही सुन रहे हों!’

शेखर जी बहुत सचेत कहानीकार हैं। उन्होंने लेखक बनने या प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं लिखा। लिखना उनके लिए समाज को बदलने की एक विनम्र कोशिश थी। इसलिए उनकी कहानियां सोद्देश्य हैं। वे समाज की नब्ज पर हाथ रखते हैं, व्याधि का निदान करने की कोशिश करते हैं, विसंगतियों और अंतर्विरोधों पर लिखते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए वे कोई नारेबाज या फॉर्मूलाबद्ध लेखन नहीं करते। यहां तक कि श्रमिकों और कारखानों की उनकी कहानियों में भी किसी गेट मीटिंग, आंदोलन या हड़ताल या नारेबाजी का उल्लेख नहीं मिलता यद्यपि शोषण की चेतना, असंतोष और प्रतिरोध के स्वर वहां पर्याप्त हैं। उनकी विशेषता ही यह है कि वे बड़ी से बड़ी बात कहते हुए बड़बोले कहीं से भी नहीं लगते, बल्कि बहुत सहज, सरल और चुपके से कहानी के रूप में वह विचार पाठक तक पहुंचा देते हैं। इसमें कहानी पूरी तरह बची रहती है, बल्कि खिल उठती है और उसका आस्वाद बचा रहता है।    

उनकी कई कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें वे वास्तव में जो कहना चाहते हैं, वह या तो शब्दों में नहीं कहते नहीं, या मात्र संकेत  देकर पाठक के निष्कर्ष निकालने के लिए छोड़ देते हैं। कमाल यह है कि जिस निष्कर्ष की ओर वे पाठक को ले जाना चाहते हैं, बिना किसी जोर-दबाव के, पाठक उसके अतिरिक्त दूसरा कोई निष्कर्ष निकाल ही नहीं पाता। अक्सर तो उनकी कहानी का मर्म उसकी घटनाओं में अंतर्गुम्फित होता है जिसे अलग से कहने की आवश्यकता रह ही नहीं जाती।  

जैसे, छोटे शहर के बड़े लोग में वे यह नहीं लिखते कि कस्बे के खां साहब ने बिल्कुल अचानक भीड़ के सामने यह बात क्यों कही कि मछली वाले का ठेला कल रात एक ट्रक ने बैक करते समय तोड़ दिया। तोड़ा था उसे साम्प्रदायिक घृणा से उन्मत्त एक व्यक्ति ने। यह बात सब जानते थे और मछली वाला भी लेकिन खां साहब बड़ी समझदारी से साम्प्रदायिक घटना को वाहनजनित दुर्घटना का रूप देकर साम्प्रदायिक तनाव से खौल रहे उस कस्बे को सद्भाव से भर देते हैं। यह बात कहीं लिखी नहीं गई है लेकिन पाठक ठीक-ठीक यही समझते हैं। संकेत है तो मात्र शीर्षक में कि इस छोटे से शहर के लोग वास्तव में कितने बड़े हैं।

बदबू उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और चर्चित कहानियों में है। जो नायक है, वह उस कारखाने में काम करते हुए अपने हाथों की बदबू को बनाए रखना चाहता है और बदबू गायब हो जाने की आशंका मात्र से परेशान हो जाता है। शेखर जी कहीं नहीं लिखते कि वह बदबू क्या है और क्यों वह उसे बचाए रखना चाहता है लेकिन कहानी में घटनाओं की बुनावट इतनी खूबसूरत और सहज है कि पाठक न केवल आसानी से समझ जाता है कि बदबू है क्या, बल्कि उस बदबू को खुद भी आत्मसात कर लेना चाहता है। यह बदबू की खुशबू है जो दूर तक और देर तक सुवासित होती रहती है।

मृत्यु कहानी देखिए, कहानीकार अपने पात्रों से मृत्यु की कई हृदयविदारक घटनाएं कहलवाता है। उसी समय वहां एक छोटी-सी घटना होती है। एक आदमी घर की घंटी बजाता है। घर की मालकिन दरवाजा खोलकर आगंतुक से कुछ कहती है और वह लौट जाता है। घऱ में बैठे लोग फिर बातें करने लगते हैं। जो इस बीच बहुत कम समय के लिए हुआ, उस पर कोई बात नहीं करता, जबकि उस नामालूम-सी लगने वाली घटना में ही एक भयावह मृत्यु हो गई है, जिसमें किसी के प्राण तो नहीं जाते लेकिन वहां उपस्थित लोगों की चेतना, गरिमा और प्रतिरोध का उनका स्वर दम तोड़ देते हैं। कहानीकार यह सब कुछ नहीं कहता, जिसे कहने के लिए उसने कहानी बुनी। वह मात्र एक वाक्य लिखकर कथा समाप्त कर देता है कि “हममें से किसी ने भी मृत्यु के उन क्षणों की चर्चा नहीं की, जिनके हम तीनों संयुक्त रूप में साक्षी रहे थे।” क्या आज भी हम अपने चारों ओर रोज ऐसी कितनी ही मौतें नहीं देख रहे?

इस कहानी में एक और मृत्यु की ओर इशारा है। घर की जो मालकिन है, शकुन, जो बाथरूम में छुप गए अपने पति के लिए झूठ बोल देती है कि वे तो ट्रेन रोकने के लिए स्टेशन ही गए हैं, वह कॉलेज के दिनों की एक सचेत, स्वतंत्र व्यक्तित्व एवं प्रगतिशील विचारों वाली लड़की थी, आज मात्र पति की चेरी, एक गृहस्थन है। पति ने उसे नौकरी भी नहीं करने दी। उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व और प्रतिभा की भी मृत्यु यहाँ हुई है। ध्यान दीजिए कि इस कहानी में दो प्रकार की मौतें हैं—एक वे मौतें जिनकी चर्चा कहानी के पात्र खुलकर कर रहे हैं और दूसरे वे, जिनकी चर्चा कोई नहीं कर रहा। यही अचर्चित मौतें हैं जो समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक हैं। कहानीकार का फोकस वहीं है। जिन प्रसंगों के माध्यम से और जिस खामोश शैली में शेखर जी इन मौतों की सूचना बिना पाठक तक पहुंचाते हैं, वह विशिष्ट है।   

‘किस्सागो’ जिसकी चर्चा कम ही हुई है। वह एक लेखक की कहानी है और सोद्देश्य एवं यथार्थ लेखन के बारे में महत्त्वपूर्ण बात कहती है। बचपन से ही बड़े काल्पनिक और रहस्य-रोमांच से भरपूर किस्से सुनाने वाला किस्सागो बाद में शहर जाकर लेखक बन जाता है। कहानी में कुछ रोमांचक किस्से सुनाए भी गए हैं। एक बार यह लेखक किसी गमी में अपने गांव पहुंचता है और उस गरीब परिवार के गुमसुम हो गए बच्चे को खुश करने के उद्देश्य से बाहर ले जाकर एक रोमांचक कहानी गढ़ता है। बच्चा कभी सुन रहे होने का संकेत देने के लिए हां-हूं करता है और कभी कहीं खो जाता है। चलते-चलते बच्चे को रास्ते के किनारे एक सूखी टहनी दिखती है जिसे वह लपककर उठा लेता है और घसीटते हुए ले चलता है। लेखक के कथा सुनाने में खड़-खड़ की ध्वनि व्यवधान डालती है। वह बच्चे को टोकता है- ‘इस लकड़ी को क्यों लिए चल रहे हो नन्नू, बेकार खड़-खड़ हो रही है।’ बच्चा जवाब देता है –‘घर में ईंधन नहीं है दद्दा, बारिश भी होने वाली है।’ इसके बाद दो लाइनें और हैं, जिनमें बताया गया है कि कहानीकार की कल्पना गड़बड़ा गई है, फिर भी वह उसे समेटने की कोशिश कर रहा है। इसी के साथ कहानी समाप्त हो जाती है। देखिए कि कहां से कहानी शुरू हुई थी और कहां जाकर पूरी हुई और जो कहना-बताना था वह कैसे बिना लिखे कह डाला! कहानी में अगर जीवन का यथार्थ नहीं है तो वह निरी कल्पना है, गप्प है, निरर्थक है। बच्चे के सूखी लकड़ी उठाकर कर खड़-खड़ करते हुए चलने और छोटी सी उम्र में घर की चिंता करने के बीहड़ यथार्थ की तुलना में उस लेखक की बड़ी मेहनत से कल्पित कथा का कोई अर्थ नहीं है। इसका संकेत शेखर जी कहानी में एक जगह देते हैं। गांव के दिनों में जब किस्सागो अपनी “कल्पना में सम्भव-असम्भव कुछ भी जोड़ लेता तो बूढ़े बुबु के अनुभवी कान सही वक्त पर खोटे और खरे की पहचान कर लेते। उनका घुटनों पर झुका, पंखी में लिपटा सिर ऐसे मौकों पर जोर-जोर से हिलने लगता। और, जब किस्सागो कुछ ज़्यादा ही दूर की कौड़ी लाने की कोशिश करता तो बुबु थोड़ा सा सिर उठाकर हाथ की लकड़ी से आग को कुरेदने लगते या ठीठों को इनारे-किनारे से खिसकाकर केंद्र में पहुंचा देते।”

‘नौरंगी बीमार है’ अकेली ऐसी कहानी है जिसके पाठकों ने ही नहीं, कुछ समीक्षकों ने दो सर्वथा विपरीत पाठ किए हैं। खजांची की असावधानी से नौरंगी को वेतन के साथ दो सौ रु अतिरिक्त मिल गए हैं- मिल ही गए हैं, ऐसा निश्चित तौर पर नहीं बताया गया है। सभी को संदेह है कि नौरंगी के हाथ ही लगे हैं। नौरंगी का व्यवहार स्वयं भी सन्देह उत्पन्न करता है लेकिन कुछ रोज बीमारी का बहाना करने के बाद वह एक सुबह सिर ऊंचा  किए नौकरी पर हाजिर हो जाता है जैसे कुछ हुआ ही न हो। एक पाठ यह किया गया है की नौरंगी को दो सौ रु अधिक नहीं मिले थे, वह शक किए जाने के कारण शर्म से गड़ा हुआ छुट्टी पर चला गया था और बाद में यह तय करके कि ईमानदार को तानों और शक से क्या परेशान होना, वह सिर ऊंचा किए नौकरी पर आ जाता है। दूसरा पाठ या निष्कर्ष यह है कि नौरंगी को ही अतिरिक्त रु मिले थे और उसने दबा लिए। शुरू में वह अपराध बोध से शर्मशार रहा लेकिन अफसरों के भ्रष्टाचार के किस्से याद कर-कर उसे इतनी ताकत मिल गई कि वह शर्म को पचाकर ठाठ से नौकरी पर आ गया। अर्थात वह भी भ्रष्ट हो गया। शेखर जी बताते थे कि इस कहानी वे यह दिखाना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे आता है। यही यथार्थ है। ‘पहल’ सम्मान ग्रहण करते समय दिए गए वक्तव्य में उन्होंने कहा भी था कि मेरे लेखन का आधार मेरे चारों ओर बिखरा हुआ यथार्थ रहा है।

तो, यह हैं हमारे शेखर जोशी। मेंटल, दौड़, हेड मासिंजर मंटू, जी हजूरिया, नौरंगी बीमार है, भद्रलोक का नीड़, सहयात्री, प्रतीक्षित, डांगरीवाले जैसी कई कथाएं हैं जिनमें जीवन के यथार्थ के साथ उनका यह कथा-कौशल अत्यंत सुंदर और प्रभावी रूप में व्यक्त हुआ है। ये कहानियां जितनी खामोशी से शुरू हुई थीं, उतनी ही चुपचाप पूरी हो गईं। इन खामोशियों में एक गूंज है जो कहानी समाप्त होने के बाद देर तक अनुगूंजों में बनी रहती है। इसीलिए पचास-साठ-सत्तर साल बाद भी उनकी कहानियां याद की जाती हैं। 

शेखर दाज्यू का उनके प्यारे शहर में सादर स्मरण।

- न जो, 12 सितम्बर, 2023

(10 सितम्बर 2023 को इलाहाबाद में आयोजित 'शेखर जोशी स्मृति आयोजन' के लिए तैयार किया गया वक्तव्य लेकिन फिर वहां उनके जीवन पर आधारित दूसरा ही वक्तव्य देना पड़ा। इस आलेख को उसी सुबह 'जनसंदेश टाइम्स' ने प्रकाशित किया था)

 

 

       

 

Thursday, September 07, 2023

सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण संरक्षण समिति पर सरकार का कब्जा

मोदी सरकार किस प्रकार स्वतंत्र और उच्चाधिकर प्राप्त संस्थाओं की स्वायत्तता छीनकर उन्हें अपने नियंत्रण में ले रही है, इसका और उदाहराण, बल्कि मामला सामने आया है। सन 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक केंद्रीय उच्चाधिकार समिति (सीईसी) बनाई थी जो इस पर नज़र रखती थी कि सरकार पर्यावरण की सुरक्षा के बारे में दिए गए निर्णयों का ठीक से पालन कर रही है या नहीं। यह समिति अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च को सौंपती थी यानी उसके प्रति जवाबदेह थी। उस रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय सरकार को निर्देश देता था या मनमाने निर्माण पर रोक लगाता था। इसी कारण कई सरकारी परियोजनाओं पर अदालत ने सरकार को फटकार भी लगाई थी। 2008 में इस समिति का पुनर्गठन किया गया था। इसी साल मार्च में समिति ने पर्यावरण को क्षति पहुंचने के कारण कश्मीर के पत्नी टॉप पर एक सम्मेलन-संकुल का निर्माण करने के विरुद्ध रिपोर्ट दी थी हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी थी। यह सुप्रीम कोर्ट को भी अच्छा नहीं लगा होगा लेकिन इससे यह साबित होता है कि यह समिति कितनी अधिकार प्राप्त थी।

यह सरकार इस समिति को कैसे बर्दाश्त करती! जिस प्रकार भी हुआ हो, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति को केंद्र सरकार के हवाले कर दिया है यानी समिति अब पर्यावरण मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होगी और उसी को अपनी रिपोर्ट देगी। विभिन्न परियोजनाओं में पर्यावरण संरक्षण मानकों का उल्लंघन होने के मामले अब कोर्ट नहीं, सरकार यानी पर्यावरण मंत्रालय स्वयं देखेगा। स्वाभाविक है कि इस समिति का अब कोई महत्त्व नहीं रह गया है। इस बारे में आज Indian Express ने अपने पहले पृष्ठ पर बड़ी खबर छापी है।

यहां यह भी याद करना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी ही एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति उत्तराखण्ड में बन रही ऑल वेदर चार धाम फोर लेन परियोजना और बड़े बांधों की निगरानी के लिए भी बनाई थी जिसके अध्यक्ष रवि चोपड़ा थे। रवि चोपड़ा समिति ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट दी थी कि संवेदनशील पहाड़ों पर साढ़े पांच मीटर से अधिक चौड़ी सड़क बनाना खतरनाक होगा। तब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि सड़क की चौड़ाई समिति की सिफारिशों के अनुरूप रखी जाए। मोदी सरकार को यह कैसे स्वीकार होता! आखिर यह प्रधानमंत्री का 'ड्रीम प्रॉजेक्ट' है। सो, तिकड़में लगाई गईं। समिति के सरकारी सदस्यों ने अपनी राय बदली और सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने तर्क दिया कि यह इलाका चीन सीमा से लगा है और सेना को सीमा पर आधुनिक टैंक, आदि पहुंचाने के लिए दस मीटर से चौड़ी सड़क की आवश्यकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अपनी मर्जी के अनुसार चौड़ी सड़क बनाने की अनुमति दे दी। खिन्न होकर रवि चोपड़ा ने समति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। यह भी उल्लेखनीय है कि सेना के एक बड़े अधिकारी ने कहा था कि सीमा तक आधुनिक टैंक आदि पहुंचाने के लिए साढ़े पांच मीटर चौड़ी सड़क पर्याप्त है। हाल की भारी बारिश में इसी फोर लेन पर कई जगह भूस्खलन हुए। एक जगह तो सौ मीटर फोर लेन अलकनंदा में समा गई।

बहरहाल, 'सीईसी' के पुनर्गठन के बारे में पर्यावरण मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर दी है जिससे साफ है कि समिति निष्प्रभावी हो जाएगी। अधिसूचना के अनुसार समिति सरकार को रिपोर्ट देगी, सुप्रीम कोर्ट का उससे कोई मतलब नहीं होगा।। समिति के सदस्य कौन होंगे, यह सरकार तय करेगी। समति में अब पहले की तरह दो स्वयं सेवी संगठनों के प्रतिनिधि नहीं होंगे। समिति का खर्च भी सरकार ही वहन करेगी और जिसे 'विषेषज्ञ' कहेगी, उसे इसका सदस्य बना देगी। अधिसूचना में स्पष्ट कहा गया है कि यह समिति केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करेगी। अगर सरकार को समिति के सुझाव स्वीकार नहीं होते तो सरकार का ही निर्णय अंतिम माना जाएगा। 

इसी के साथ वह दौर अब समाप्त हो गया है जब पर्यावरण के मामलों में सरकार की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट की नज़र रहती थी। याद कीजिए कि पिछले ही दिनों सरकार ने वन कानून 1980 में संशोधन करके यह सुनिश्चित कर दिया है कि सीमांत क्षेत्रों में एक सौ किमी के दायरे में किसी भी परियोजना के लिए वन कानून के प्रावधान लागू नहीं होंगे। प्राकृतिक रूप से सम्पन्न जैव विविधता वाले वनों में भी सरकार 'राष्ट्रीय हित' के नाम पर मनमाना निर्माण कर सकेगी। संसद में ये संशोधन बिना बहस पारित कर दिए गए थे। वन कानून के नए प्रावधानों ने गोदावर्मन मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मानक भी निष्प्रभावी कर दिए हैं। 

जल-जंगल-जमीन से लगातार उजाड़े जा रहे आदिवासी/ग्रामीण समुदाय अब विस्थापन के विरुद्ध किसी कानूनी सहायता पाने के हकदार लगभग नहीं रह गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की सम्भावना न्यूनतम कर दी गई है। प्रकृति के प्रकोप से पहाड़ों पर निरंतर जारी विनाशलीला के बावजूद सरकारें कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं। मोदी सरकार तो किसी भी तरह की निगरानी या हस्तक्षेप सहन करने को तैयार नहीं है। 

-न जो, 08, सितम्बर, 2023


 

Thursday, August 03, 2023

विनाशकारी परिणामों वाला वन अधिनियम संशोधन विधेयक

(पिछली पोस्ट में Indian Express में प्रकाशित रवि चेल्लम के लेख की चर्चा की थी। इस महत्त्वपूर्ण लेख का हिंदी अनुवाद https://nainitalsamachar.org ने प्रकाशित किया है। उसे यहां साभार दिया जा रहा है। अनुवाद किया है- उमेश तिवारी 'विश्वास' ने। इस बीच वन अधिनियम (संरक्षन एवं संवर्द्धन) संशोधन विधेयक राज्य सभा में भी पारित हो गया है। दोनों सदनों में इस विवादास्पद विधेयक कोई बहस नहीं हुई। राष्ट्रपति की सहमति मिलते ही यह कानून बन जाएगा और वनों की सरकारी एवं कॉरपोरेटी लूट का रास्ता खुल जाएगा। अत्यंत चिंताजनक है यह।)

भारत की मात्र 21 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र है और इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि केवल 12.37 प्रतिशत भूमि ही प्राकृतिक वनों से आच्छादित है। हमें 33 प्रतिशत वन आवरण के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना होगा।

हालिया वन संरक्षण अधिनियम में संशोधन से भारत के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का खतरा है।
लगभग 1970 के दशक की शुरुआत से, सामूहिक रूप से मानव जनित पर्यावरणीय क्षति और हमारे जीवन पर पड़ने वाले इसके प्रभाव का एहसास बढ़ा है। उदाहरण के लिए, जंगल की आग की बढ़ती घटनाएं, तीव्र गर्मी के लंबे स्पैल, अत्यधिक वर्षा की घटनाएं, शक्तिशाली और बार- बार आते चक्रवात, जैव विविधता का बड़े पैमाने पर नुकसान, पारिस्थितिक तंत्र का विघटन और कई बार इन सब की सम्मिलित विभीषिका ने अरबों लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। असमय मृत्यु, बीमारियों की बढ़ती घटनाएं, बुनियादी ढांचे का विनाश, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, हवा और पानी की घटती गुणवत्ता उन प्रभावों के कुछ उदाहरण हैं जिन्हें हम आज भुगत रहे हैं। इस चुनौती का चरणबद्ध रूप से सामना करने के प्रयासों  के तहत, वैश्विक स्तर पर, दर्जनों बहुपक्षीय पर्यावरण समझौते किए गए हैं।  कई देशों, विशेषकर भारत ने पर्यावरण की रक्षा और उसकी बहाली के लिए मजबूत नीतियां और कानून बनाए हैं।
इसी संदर्भ में, मैं सरकार के वन संरक्षण संशोधन विधेयक, 2023 को लेकर बेहद चिंतित हूं, जिसे इस सप्ताह की शुरुआत में लोकसभा में पारित किया गया।  भारत की केवल 21 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र है और इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि केवल 12.37 प्रतिशत में ही प्राकृतिक वन बरकरार हैं। हमें 33 प्रतिशत वन आवरण के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।  इसके अतिरिक्त, देश के सबसे अधिक जैव विविधता वाले हिस्से, पूर्वोत्तर राज्यों के वन क्षेत्र में  2009 से 2019 के बीच 3,199 वर्ग किमी की शुद्ध गिरावट देखी गई है। वन क्षेत्र में जहां मामूली  वृद्धि हुई भी है, उसका बड़ा भाग वाणिज्यिक वृक्षारोपण और शहरी पार्कों के रूप में मिलेगा जिसकी उपादेयता शेष बच गए प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के मुकाबले नगण्य ही कही जाएगी।
वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के साथ-साथ टी एन गोडावर्मन बनाम भारत संघ (1996) के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार प्रदान किया है।  आज आवश्यकता बेहतर और अधिक प्रभावी कार्यान्वयन की है।  जो चीज़ ख़राब ही नहीं, उसे ठीक करने का प्रयास क्यों करना ?  खासकर तब, जब इस कानूनी ढांचे ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की है।
मेरी बड़ी चिंताओं में: वन क्षेत्रों का पुनर्वर्गीकरण, सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा उद्देश्यों के बहाने परियोजनाओं के लिए छूट,  चिड़ियाघरों, सफ़ारी पार्कों और पारिस्थितिक पर्यटन गतिविधियों के लिए छूट और स्थानीय समुदायों को अशक्त बनाना शामिल हैं।
मैं संक्षेप में इसे यूं समझाऊंगा कि वन संरक्षण अधिनियम (एफसीए) केवल  25 अक्टूबर 1980 को या उसके बाद  सरकारी रिकॉर्ड में “जंगल” के रूप में दर्ज क्षेत्रों पर लागू होगा। मुझे डर है कि यह संशोधन टी एन गोडावर्मन केस में सुप्रीम कोर्ट के 1996 के फैसले को अमान्य कर देगा जिसमें न्यायालय ने जंगल की व्याख्या इसकी व्यापक शब्दकोशीय परिभाषा के आधार पर की है, सभी जंगलों को एफसीए के दायरे रखा है और इसे केवल आधिकारिक तौर पर घोषित इलाकों तक सीमित नहीं किया है।  यदि इन क्षेत्रों को अवर्गीकृत किया जाता है, तो परिणामस्वरूप हजारों वर्ग किमी जंगलों की कानूनी सुरक्षा समाप्त हो जायेगी। इससे संभावित बड़ी आपदा का अनुमान लगाया जा सकता है क्योंकि हमारे वनों का 1,97,159 वर्ग किमी हिस्सा रिकॉर्डेड (घोषित) वन क्षेत्रों के बाहर है। जिसका अर्थ है कि हमारे 7,13,789 वर्ग किमी के कुल वन क्षेत्र का 27.62 प्रतिशत हिस्से के कानूनी संरक्षण खो बैठने का खतरा है।
पारित संशोधन में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के 100 किमी के भीतर सुरक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण हेतु वन संबंधी अनापत्ति की आवश्यकता को खत्म करने का प्रस्ताव है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से कुछ के अधिवास हैं; इनमें पूर्वोत्तर के जंगल, लद्दाख और स्पीति के उच्च स्थलीय  रेगिस्तान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अल्पाइन वन, घास के मैदान और पश्चिम का उष्ण कटिबंधीय झाड़ियों वाला भूभाग और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं। सैन्य सुरक्षा के बरक्स पारिस्थितिक सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिससे हमारे नागरिकों की भलाई जुड़ी हुई है। अतएव, फास्ट-ट्रैकिंग की आवश्यकता के बावजूद पर्यावरणीय मूल्यांकन तथा  सुविज्ञ और संतुलित निर्णय लेने की गुंजाइश बची रहनी चाहिए।
हमारा प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते अप्रत्याशित मौसम पैटर्न के खिलाफ बफरिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के नुकसान के फलस्वरूप अधिक मानव विस्थापन होगा और आंतरिक सुरक्षा के जोखिम बढ़ जाएंगे।
चिड़ियाघर या सफ़ारी पार्क को जंगल नहीं कहा जा सकता। प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र जटिल कार्यशील इकाइयाँ हैं और एक बार नष्ट हो जाने पर, उन्हें पुनर्स्थापित करना बहुत मुश्किल होता है।  विज्ञान अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहा है कि ये कैसे कार्य करते हैं।  चिड़ियाघर और सफारी पार्क मनुष्यों द्वारा सृजित स्थिति में संरक्षण, शिक्षा और मनोरंजन के उद्देश्यों से बनाए गए हैं।  इन्हें बनाने की संस्तुति देकर प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट करना सर्वथा अनुचित है।  इसके बजाय, हमें वनाच्छादित स्थलों से दूर विज्ञान-आधारित और विश्व स्तरीय संरक्षण केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखना चाहिए। पर्यावरण-पर्यटन से रोजगार पैदा करना एक महत्वपूर्ण पूरक गतिविधि हो सकती है परंतु इसे संस्तुति/मंजूरी से छूट देना सही नहीं है, क्योंकि यह इंगित करता है कि पर्यटन को प्रकृति पर प्राथमिकता मिलेगी।  कई मामलों में, इकोटूरिज्म परियोजनाओं के चलते बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ है, जिसने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
केंद्र सरकार को “किसी भी अन्य उद्देश्य” के लिए मंजूरी लेने से छूट देने वाले प्रावधान के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि इससे वन भूमि पर कई अनपेक्षित गतिविधियों का द्वार खुल सकता है, जिनके लिए अब अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाओं को मंजूरी प्रक्रिया से छूट देने का मतलब यह होगा कि अधिकांश पर वनवासियों से पूछा तक नहीं जाएगा। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण औजार था जिससे वनवासियों द्वारा अपना पक्ष रखने का अधिकार सुनिश्चित होता है। अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वनाधिकार मान्यता) अधिनियम 2006 ने  ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय समुदायों की स्वतंत्र एवम सुविज्ञता से बनी सहमति और पूर्वानुमति को अनिवार्य बनाया है – एक अधिकार जिसे उन्होंने वर्षों के संघर्ष के बाद हासिल किया है।  एफसीए में प्रस्तावित यह संशोधन विधेयक संभवतः जनजातीय समूहों और अन्य वन वासियों के अधिकारों पर कुठाराघात करेगा।
अंततः, बिल की प्रस्तावना में जिन सराहनीय लक्ष्यों और उद्देश्यों की बात की गई है, प्रस्तावित संशोधन उनसे मेल नहीं खाते। इससे इस संशोधन की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। एफसीए के भौगोलिक दायरे को असामान्य रूप से घटा कर, छूट की श्रेणी में आने वाली परियोजनाओं के प्रकारों/संख्या को बढ़ाकर और स्थानीय समुदायों की भूमिका को निर्णय लेने में अत्यधिक सीमित करके, अधिनियम अपने उद्देश्यों की दिशा में आगे जाने के बजाय एक कदम पीछे जाता है, जिसे हर कीमत पर टाला जाना चाहिए।

Friday, July 28, 2023

प्राकृतिक वनों में सरकार को खुली छूट!

“देश का वनाच्छादित क्षेत्र बढ़ाने और कार्बन उत्सर्जन कम करते रहने के अंतरराष्ट्रीय वायदे को निभाने के लिए” मोदी सरकार जो नया वन (संरक्षण और संवर्धन) विधेयक लाई है और जिसे बीते बुधवार को लोक सभा ने ध्वनिमत से पारित कर दिया है, यदि कानून बन जाता है तो न केवल सरकार को प्राकृतिक वनों में ‘विकास’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर कई तरह के निर्माण करने की छूट मिल जाएगी, बल्कि वनों में रहने वाले या उन पर आश्रित आदिवासी/ग्रामीण समाजों के सिर पर निरन्तर मंडराता विस्थापन का खतरा कई गुणा बढ़ जाएगा। वन अधिनियम 1980, जिसमें संशोधन प्रस्तावित हैं, के अनुसार वनक्षेत्र में किसी भी प्रकार के निर्माणों के लिए सरकार को पर्यावरण मंत्रालय से हरी झण्डी लेनी होती है और प्रभावित होने वाले ग्रामीण समाजों से उनकी सहमति भी लेनी होती है। नए संशोधनों के बाद यह औपचारिकता भी नहीं रह जाएगी। पूर्वोत्तर भारत से लेकर हिमाचल और उत्तराखण्ड के प्राकृतिक वन और जैव विविधता पर खतरा बहुत बढ़ गया है।

लोक सभा में पारित हो चुके वन अधिनियम संशोधनों के प्रमुख उद्देश्यों में कहा तो यही गया है कि देश का वनाच्छादित क्षेत्रफल बढ़ाने की बड़ी जरूरत है लेकिन जो प्रावधान किए गए हैं उनसे इस उद्देश्य की सचमुच पूर्ति होने की संभावनाएं दूर-दूर तक नहीं हैं, बल्कि यह लक्ष्य उन उद्देश्यों में परिलक्षित ही नहीं होता। इन संशोधनों के बाद “देश की अंतराष्ट्रीय सीमाओं पर सड़कों, रेलवे लाइनों और सामरिक महत्त्व के अन्य निर्माणों” के लिए सरकार को खुली छूट मिल जाएगी। यहां यह नोट किया जाना चाहिए कि देश की सीमाओं से लगे क्षेत्रों में ही सर्वाधिक प्राकृतिक वन हैं, जो जैव-विविधता से भरपूर हैं। देश की सुरक्षा के मुद्दे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन जैव विविधता से सम्पन्न ये वन भी देश की सुरक्षा, पर्यावरण एवं उसके लिए सबसे आवश्यक जैव विविधता के लिए कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। अगर इन क्षेत्रों में सैन्य या अन्य सामरिक महत्त्व की परियोजनाएं चलानी हैं तो उस पर संसद और उसके बाहर गहन विचार-विमर्श एवं विशेषज्ञों से सलाह की आवश्यकता है और वनों पर निर्भर समुदायों के जीवन का मुद्दा भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। पूर्व में इन्ही कारणों से सरकारी परियोजनाओं को भी पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी को अनिवार्य बनाया गया था और आदिवासी समाजों की सहमति को भी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 1996 में टी एन गोदावर्मन बनाम केंद्र सरकार मामले में प्राकृतिक वनों को बचाने के लिए महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए थे।

‘वन’ या ‘वनाच्छादित क्षेत्र’ की सरकार की समझ या दावेदारी में बड़ा खोट है। वह सरकारी और निजी बंगलों, रिसॉर्टों, उद्यानों, आदि को भी ‘वनक्षेत्र’ में शामिल कर लेती है और इस तरह दिखा देती है की वनक्षेत्र बढ़ रहा है। (देखें - https://apne-morche-par.blogspot.com/2023/03/blog-post.html ) वास्तविक रूप से वन उन्हें माना जाना चाहिए जहां प्राकृतिक रूप से वन हों और उनमें पूरी जैव विविधता हो, यानी ऐसे जंगल जो प्राकृतिक रूप से विकसित हुए हों, या मानव प्रयत्नों से भी विकसित हुए हों तो, उनमें वन्य जीव-जंतु-कीट-पतंगे, विविध प्रकार की वनस्पतियां, एक-दूसरे को पोषित करने वाले जैविक कारोबार अबाध चलते हों। यह भी कह सकते हैं कि जिन जंगलों में सृष्टि के विराट रूप के सूक्ष्म दर्शन होते हों उन्हें वास्तविक वन कहा जाना चाहिए। इस धरती पर जीवन को सिर्फ हरियाली नहीं चाहिए, पूर्ण जैव विविधता चाहिए। इसी को वास्तविक पर्यावरण संरक्षण कहा जाता है। दुर्भाग्य से सरकार और सामान्य समझ वालों के लिए पेड़ लगाना/बचाना ही पर्यावरण बचाना हो गया है। इसीलिए सरकार वनों के अपने आंकड़ों में मंत्रियों की कोठियों की हरियाली भी शामिल कर लेती है।

28 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रवि चेलम (मेटास्ट्रिंग फाउण्डेशन के सीईओ और बायोडाइवर्सिटी कोलाबरिटिव के कोआर्डिनेटर) के लेख के अनुसार देश में मात्र 12.37 प्रतिशत प्राकृतिक वन बचे हैं, हालांकि वनाच्छादित क्षेत्र 21 प्रतिशत है। 33 प्रतिशत वन क्षेत्र का लक्ष्य पाने के लिए लम्बा किंतु समझदारी भरा सफर तय करना है। बड़ी चिंता की बात यह है कि पूर्वोत्तर भारत के प्राकृतिक वन सर्वाधिक जैव विविधता वाले हैं और वहां 2009 से 2019 के बीच 3199 वर्ग किमी वनक्षेत्र कम हो गया है और जो वनक्षेत्र बढ़ा है, वह व्यावसायिक वृक्षारोपण और शहरी पार्कों के रूप में है।

वन अधिनियम -1980 और 1996 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने प्राकृतिक वनों को सुरक्षित रखने में काफी हद तक मदद की है। इन प्रावधानों पर और भी ईमानदारी से अमल किए जाने की आवश्यकता है लेकिन यह सरकार पूर्व की अपेक्षाकृत बेहतर व्यवस्था को बदल करके अपने लिए खुली छूट लेने जाने रही है। वन अधिनियम तो बदल ही जाएगा 1996 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी एक किनारे करने का रास्ता खुल जाएगा।

मोदी सरकार वन अधिनियम को कितना महत्त्व देती रही है इसए समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। उत्तराखण्ड में मोदी का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कहे जाने वाली ऑलवेदर चारधाम रोड परियोजना के लिए कानून के मुताबिक पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति की आवश्यकता थी क्योंकि उसमें हजारों पेड़ों की बलि होनी थी। इस कानून से बचने के लिए सरकार ने करीब 900 किमी की इस ऑलवेदर रोड को नौ छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया क्योंकि एक सौ किमी से कम सड़क के लिए अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित रवि चोपड़ा कमेटी की सिफारिशों की भी अनदेखी करने का रास्ता निकाल लिया गया था जिससे खिन्न होकर रवि चोपड़ा ने समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना ठीक समझा।

यह है मोदी सरकार का पर्यावरण प्रेम। इस बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए इंडियन एक्सप्रेस का यह लेख देखें-

https://indianexpress.com/article/opinion/columns/ravi-chellam-writes-why-protecting-indias-forests-should-be-a-part-of-national-security-8857475/

-       - न. जो, 29 जुलाई, 2023        

Thursday, June 01, 2023

अद्भुत किस्सागोई के साथ बड़े सवाल उठाती कहानियां

“मैं आज भी कहानीकार कम, किस्सागो ज़्यादा हूं।” यह सुभाष पंत का बयान है जो उन्होंने ‘इक्कीसवीं सदी की एक दिलचस्प दौड़’ शीर्षक अपने कहानी संग्रह की भूमिका में दर्ज़ किया है। एक दौर था जब कहानी या उपन्यास के लिए किस्सागोई आवश्यक तत्व माना जाता था। कालांतर में जब हिंदी कहानी विभिन्न ‘आंदोलनों’ के खांचों में बांटी गई, तब कहानी में यथार्थ के नाम पर घटनाओं के लम्बे विवरण, दृश्यात्मकता, विचार, शिल्प की बाजीगरी, आदि-आदि महत्वपूर्ण एवं आधुनिक तत्व माने जाने लगे। किस्सागोई नेपथ्य में चली गई। बिना किस्सागोई के कहानी कैसे कही जा सकती है, यह अब कोई नहीं कहता या पूछता।

सुभाष पंत बेहतरीन किस्सागो हैं और उनकी कहानियां गवाह हैं कि अपने समय का यथार्थ, वैचारिक प्रतिबद्धता, ज्वलंत मुद्दों और हाशिए के लोगों के साथ खड़ा होना किस्सागोई में भी खूबसूरती से दर्ज़ किया जा सकता है। कहा जाना चाहिए कि किस्सागोई के कारण ही सुभाष पंत बड़े और सशक्त कथाकार हैं। उनकी यह किस्सागोई हालात पर करारे व्यंग्य से लेकर ‘जादुई यथार्थ’ तक जाती है। इस प्रक्रिया में भाषा बरतने का उनका कौशल चमत्कृत करता है और कहानी पाठक को विचलित कर जाती है। 

इस संग्रह में ‘कमीज’ कहानी पढ़िए या ‘मामूली बात’ या ‘बूढ़े रिक्शाचालक का चित्र’ या ‘सड़क पार खड़ा बूढ़ा’, पंत जी का भाषाई कौशल चमत्कृत करता है लेकिन एक पल को भी हम यह नहीं भूलते कि कहानीकार, बल्कि किस्सागो, किसके साथ खड़ा है, वह कहां चोट कर रहा है या हमारे समय का कौन सा सत्य खोलकर रख दे रहा है। ‘कमीज़’ कहानी में जन्मदिन पर पिता को बेटी द्वारा भेंट की गई एक ब्राण्डेड कमीज के माध्यम से बहुत खूबसूरती और गहरी संलग्नता के साथ मुहल्ले के उस सामान्य दर्जी के अप्रासंगिक होते जाने की कथा कही गई है। अपने वृहद संदर्भों में कहानी बाजार के सुरसा मुंह में समाते आम लोगों की कथा बन जाती है। अपने समय के इस कटु यथार्थ को बयां करने में पंत जी की किस्सागोई देखिए- “… ढीली फिटिंग के बावजूद उसमें आक्रामक उत्तेजना थी। शोख, गुस्सैल पर मोहक लड़की की तरह। उनके साथ समझौता करना होता है। मैंने भी किया और कमीज़ पहन ली। उसे पहनते ही मैंने महसूस किया कि मैं बदल गया हूं। मैं ज़्यादा संस्कारित, सभ्य और कीमती हो गया हूं। बड़प्पन की ऐंठ से मेरी छाती फैल गई। सीना गदबदाने लगा और आंखों की झिल्लियां फैल गईं। मेरे पीछे ताकतें थीं। आला दिमाग, श्रेष्ठ अभिकल्प और महानायक थे। मैं सतह से ऊपर उठ चुका था।”  

‘बूढ़े रिक्शा चालक का चित्र’ में एक कलाकार राजभवन के सामने सूर्योदय का चित्र बनाने के लिए जिस रिक्शाचालक को जल्दी-जल्दी चलने के लिए कह रहा है, वह कई दिन से भूखा है और राजभवन तक पहुंचते-पहुंचते भूख के मारे लुढ़क जाता है। कलाकार की संवेदना जागती है और वह सूर्योदय का दृश्य भूलकर उस रिक्शाचालक का चित्र बनाने लगता है। उसे यह चित्र बनाते देखकर “सम्भ्रांत घर की दो कोमल और सुंदर महिलाएं, जो बहुत रोमानी मूड में शैंपेन, ब्रिज और पुरुष मित्रों की बातें करते हुए क्लब जा रही थीं” डर गईं और “पीपल के पत्ते की तरह थर-थर कांपीं, चीखकर सड़क पर गिर पड़ी और बेहोश हो गईं।” कलाकार गिरफ्तार कर लिया गया, उसे आतंकवादी ठहराया गया और अदालत में मामला सुनते हुए न्यायमूर्ति ने भी माना कि उसका अपराध बहुत गम्भीर है क्योंकि- “मैंने अभी देखा कि भूख से दम तोड़ते आदमी की बात सुनते ही न्यायालय में उपस्थित एक भद्र महिला के सिर की टोपी जमीन पर गिर पड़ी।” जाहिर है कलाकार ने जघन्य अपराध किया था। हमारे समूचे तंत्र की अमानवीयता और न्यायविमुखता पर करारी टिप्पणी है यह कहानी लेकिन उसका ढांचा पंत जी इतनी भाषाई जादूगरी से रचते हैं कि आप ‘आह’ भी ‘वाह’ के साथ कह पाते हैं। कहानी पढ़ते हुए लग सकता है कि कथाकार अपने विषय से असम्पृक्त है, दूर खड़ा होकर केवल देख रहा है, तटस्थ ही नहीं, मौज लेते हुए भी, लेकिन वास्तव में वह अपनी सम्पूर्ण संवेदना के साथ गहरे संलग्न है और इस व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहा है। ऐसा ही ‘सड़क पार खड़ा बूढ़ा’ में है। बूढ़ा इस देश का एक सामान्य आदमी है, गरीब और निरीह जो एक राजधानी की सड़क अनेक कोशिशों के बाद भी पार नहीं कर पा रहा। सड़क पर किसी भी राजधानी की तरह का दृश्य उपस्थित है। एक सुन्दरी अवतरित होती है और ‘कैट वॉक’ के अंदाज़ में सड़क पार कर जाती है। बूढ़ा भी उसकी देखादेखी सड़क पार करने लगता है लेकिन कहां उस सुंदरी का लचकदार हाथ और कहां बूढ़े का झुर्रियों भरा याचक हाथ! अंत में एक शवयात्रा उधर से निकलती है और बूढ़े की बांछें खिल जाती हैं। अब कोई बाधा नहीं है, वह सोचता है लेकिन कथाकार या कि स्थितियां बहुत बेरहम हैं। कथा का समापन इस तरह होता है – “महोदय, यहां रुककर गम्भीरता से सोचना होगा। दरअसल, यह शवयात्रा का मामला बहुत पेचीदा है। क्या ऐसी शवयात्रा सचमुच निकली? या बूढ़े ने ऐसा कोई सपना देखा? या थकान के कारण विभ्रमित मन ने उसे ऐसा दिखाया? या फिर यह आने वक्त की एक झलक है। इसमें कौन सी बात सत्य है, इस बाबत फिलहाल कुछ भी कहा जाना बहुत मुश्किल है।”

संग्रह की अन्य कहानियों- ‘रल्दूराम के जीवन का अंतिम दिन’, ‘चक्र’, ‘एक का पहड़ा’, ‘छगन भाई का हाथी’, ‘इक्कीसवीं सदी की ईके दिलचस्प दौड़’, ‘जिन्न’, ‘कथानायक’, ‘मक्का के पौधे’, ‘रुक्मा की कहानी’, और ’सीमांत’, में भी उनकी किस्सागोई का यह नायाब कौशल देखा जा सकता है। अपने विषय और पात्रों के चयन के साथ यह शैली उन्हें विशिष्ट एवं निरंतर प्रासंगिक कथाकार बनाती है।

('इक्कीसवीं सदी की एक दिलचस्प दौड़', कहानीकार- सुभाष पंत, काव्यांश प्रकाशन। सम्पर्क- 9412054115, 7300554115)

- न जो, 01 जून, 2023