Tuesday, January 02, 2024

कहानी/ मुहब्बत जिंदाबाद

नवीन जोशी

हमारा यह पेड़ पता नहीं कब इत्ता बड़ा हो गया! कुछ समय पहले तक तो छोटा-सा दिखता था। बच्चे उस पर आसानी से लटकते, चढ़ते और कूदते थे। उसकी डालें पकड़ कर झूलते थे। बच्चों के खेल में शामिल होकर अक्सर वह खुशी से दोहरा हो रहता। थक-हारकर बच्चे घर चले जाते तो वह भी आराम करता और सुबह फिर सीधा खड़ा नजर आता था। कॉलोनी आबाद ही हो रही थी। जब हम यहां अपने मकान में रहने आए तो पार्क उजाड़ था। बाद में नगर निगम ने चारदीवारी बनवा दी। बहुत दिन तक पार्क उजाड़ ही पड़ा रहा तो कॉलोनी वालों ने अपनी सोसायटी बनाई और एक माली रखकर उसकी देखभाल शुरू की। चारों तरफ सजावटी पौधे और फूल वाली झाड़ियां लगवाईं। बीच में क्यारियां बनवाकर गुलाब लगाए। मौसमी फूलों की जगह बनाई। कोने वाला यह पौधा अपनी तरह का अकेला ही था। पार्क के कोने में शायद अपने आप उग आया होगा। माली ने ही इसे पाल लिया। कहता था- ‘पीपल है। शुभ होता है। रहने दीजिए।’ वह भी बेशर्मी से बढ़ता रहा। बच्चों से उसकी खूब दोस्ती हो गई। क्यारियां कुचलने के लिए जब वे माली और बड़ों से डांट खाते तो कोने में पीपल के साथ खेलने चले आते। उसकी पतली-पतली डालों में बाहें डालते, उसके पत्तों को एक-दूसरे के गालों में छुआते और उसके चारों तरफ नाचते। बच्चों के साथ वह भी बड़ा होता रहा। उसकी बढ़वार अच्छी और तेज रही। बच्चों के कद को पीछे छोड़कर उसकी शाखें ऊंची उठती गईं। बच्चों के गालों से अधिक उसके पत्ते चमकीले हुए। उसने धरती के दिल में जगह बनाई और मिट्टी का कसकर आलिंगन किया। जवाबी मुहब्बत ने उसे खुशमिजाज बनाया तो उसने किलक कर बच्चों को अपने कांधों पर बैठाना शुरू किया। बच्चों को उसकी सवारी खूब भाई।खिलखिलाते हुए वे उस पर चढ़ते और कूदने की प्रतियोगिता करते। पीपल अपनी शाखाएं झुका-झुका कर बच्चों के खेल में शामिल होता। कुछ ने उसके पत्ते की नकल अपनी आर्ट कॉपी पर उतारी और उसमें वैसे ही रंग भरे। कुछ ने उसका पत्ता तोड़कर स्क्रैप बुक में चिपकाया और लिखा- हमारा दोस्त पीपल।

फिर गिलहरियां आई और पेड़ से बच्चों की तरह मुहब्बत कर बैठीं। वे उस पर चढ़ती-उतरती और शाखों के बीच अचानक उचककर अगले पंजों से मुंह पोंछती। फिर किलकारी मारते हुए एक-दूसरे का पीछा करते-करते पास की झाड़ियों में छुप जातीं। गिलहरियों की मस्ती की देख कौवे चले आए और हमारी सुबह की उबासियों में कां-कां-कां की ताजगी भरने लगी। बासी रोटीके टुकड़े के लिए वे दरवाजे की तरफ गरदन तिरछी करके देखा करते। कौओं के बाद फाख्ता आए या हो सकता है वे चुपचाप उनसे पहले आ गए हों। जिस दिन उनकी ‘घू-घुघ्घू-घू’ सुनी उस दिन पत्नी मायके की याद में भावुक हो गई। हलके भूरे-बादामी रंग वाला चित्तीदार शॉल ओढ़े हुए फाख्ते पेड़ की फुनगियों से लहरदार उड़ान भरते हुए छत की मुंडेर पर बैठने लगे। पेड़ अपनीबिरादरी बढ़ाते गया। कभी कोई लम्बी पूंछ वाला रिश्तेदार उससे भेंट करने चला आता। कोई चोंच में लाल रंग दाबे और कोई गले में नीला दुपट्टा ओढ़ेउसकी शाखों पर मेहमान बना अकड़ा फिरता। रह-रहकर तीखी सीटी बजाने वाली बित्ते भर की रंग-बिरंगी चिड़ियां तो जैसे पेड़ ने खुद ही पैदा कर दी थीं। 

 

पेड़ के दोस्त बच्चे भी बड़े हुए तो उनके सपनों में तितलियां आने लगीं। उनका पीछा करने वे दूर-दूर उड़ गए। पेड़ उनकी मुहब्बत सहेजे आस-पास के मकानों की छतों से ऊपर निकल आया, जैसे अपनी ऊंची लहराती शाखों से उनकी परवाज पर खुशी मनाता हो। उसकी कुछ भुजाओं ने चौतरफा झुककर एक खूबसूरत आशियाना भी चुपके-चुपके बना लिया जिसके घेरे में उसनेसबके बचपन की मधुर स्मृतियों को पनाह दी। या क्या पता, उसके रेशों में भी हार्मोन के हरकारे सनसनी उत्पन्न करने लगे हों। जमीन तक झुक आई उसकी बाहों का घेरा मुहब्बतों की पनाहगार बन गया।

वह भूल गया होगा कि मुहब्बत करने वाले और उनके शरणदाता गुनाहगार घोषित होते आए हैं। या, उसने इसकी परवाह ही नहीं की होगी। 

 

*  * *

 

“त्यागी जी, बाहर आइए तो जरा,” घण्टी के लगातार बजने के साथ ही गर्जना सुनाई दी। चाय का कप लेकर सुबह का अखबार खोलकर बैठा ही था। सुबह आराम से पढ़ना हो नहीं पाता। जरूरी खबरें सरसरी तौर पर देखीं और पन्ने पलट लिए। जाड़े में वैसे ही नींद देर से खुलती है या यूं कह लीजिए कि रजाई छोड़ने का मन नहीं होता। ऑफिस टाइम से पहुंचने के लिए साढ़े आठ तक घर छोड़ देना पड़ता है। कब कहां जाम मिल जाए, कब किस वीवीआईपी का मूवमेण्ट हो रहा हो और सीटियां बजाते सिपाही पंद्रह-बीस मिनट तक ट्रैफिक रोक दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। अधीनस्थ कर्मचारियों को समय से न आने के लिए टोकना हो तो खुद समय से पहुंचना जरूरी है। सो, चुनिंदा खबरें विस्तार से या कोई लेख आराम से पढ़ने के लिए शाम को ही इतमीनान मिलता है।

 

‘त्यागी जी!’ इस बार जोर से पुकारने के साथ गेट की कुण्डी भी खड़खड़ाने लगी।

‘देखिए तो कौन है,’ किचन से पत्नी ने चिढ़कर पुकारा। 

मैं गुस्से से लगभग फनफनाते हुए बाहर दौड़ा- “कौन है भाई, एक बार घण्टी बजाने से नहीं होता?”

“अरे, शुक्ला जी! कुमार साब! क्या हो गया?” आवाज में गुस्सा न झलके इसके लिए बहुत यत्न करना पड़ा। गेट पर चार-पांच पड़ोसी खड़े थे। पता नहीं क्या समस्या आन पड़ी है।

‘क्या सचिव जी, आपके रहते पार्क में यह सब क्या हो रहा?” शुक्ला जी के तेवर पड़ोसी वाले नहीं थे।

“और ठीक आपके घर के सामने!” यह कुमार साब थे, जिनकी आवाज में तंज भरपूर था।

“अरे यार, आप लोग तो सीधे हमलावर हो गए। उन्हें बताइए तो,” मित्तल जी ने साथ वालों को टोका। मैं सचमुच सदमे में था। पड़ोसियों ने इस तरह पहले कभी बात नहीं की थी।

“आप ही बता दीजिए न,” शुक्ला जी की भौंहें तनी हुई थीं।

“क्या हुआ, मित्तल जी?’ मैंने उन्हीं की ओर देखा।

“पीपल के नीचे देखिए। बेंच पर।”

“देखिए-देखिए, कैसी बेशर्मी से चिपके बैठे हैं।”

“टोका भी जा चुका है लेकिन कोई असर नहीं। रोजाना का किस्सा हो गया।”

“किसी-किसी शाम तो दो-तीन जोड़े बैठे रहते हैं।”

“अजी, दिन में भी आने लगे हैं। वाइफ बता रही थी।”

“सुन रहे होंगे लेकिन हिल नहीं रहे। कैसा बेशर्म जमाना आ गया!”

 

अपने गेट पर खड़े-खड़े मैं देख सकता था। ठीक सामने कोने में हमारे पीपलके पेड़ की नीचे तक झुक आई घनी शाखाओं की आड़ में, जहां पार्क के बीचों बीच लगे हाई मास्ट एलईडी लाइट की रोशनी के बावजूद अंधेरा रहता है, बेंच पर लड़के-लड़की का जोड़ा एक दूसरे से सटकर बैठा था। यहां सब आक्रोश में जोर-जोर से बोल रहे थे। उन तक ये आवाजें जरूर पहुंच रही होंगी। या तो वे जान-बूझकर अनसुना कर रहे थे या अपने में ही इतना खोए हुए थे कि और कुछ देख-सुन नहीं पा रहे थे। लड़के का एक हाथ लड़की के कंधे पर था। लड़की रह-रहकर खिलखिला रही थी और लड़के के सिर में चपत लगा रही थी। यह कोई अजूबा दृश्य नहीं था। पार्कों में, सड़क किनारे और ढाबों-रेस्त्राओं में आजकल यह आम बात है।

 “कॉलोनी के सचिव का यही काम रह गया कि वह प्रेमी जोड़ों को हाँका करे?” मैं अपनी आवाज में मजाकिया पुट देते हुए मुस्कराया भी। जिस तरह घण्टी और गेट की कुण्डी खड़खड़ाई गई थी, उसका गुस्सा मेरे भीतर अब भी लहरा रहा था।

“त्यागी जी, बात मजाक की नहीं है। बहू-बेटियों वाला मुहल्ला है।”

“एक दिन की बात हो तो इग्नोर भी करें। हमारी वाइफ ने तो शर्म के मारे पार्क में घूमना छोड़ दिया है।”

“चलिए भगाते हैं इनको,” शुक्ला जी ने ललकारा।

“चलिए सचिव महोदय, आगे-आगे चलिए,” मित्तल जी ने मेरा हाथ खींचा। मुझे साथ जाना पड़ा। एकाएक हमें सामने खड़ा देखकर दोनों सकपका गए लेकिन अपनी जगह बैठे रहे। शरम-ओ लिहाज, मर्यादा, परिवार की इज्जत, सच्चरित्रता, आदि-आदि के रटे-रटाए प्रवचन उन्होंने चुपचाप सुन लिए और ‘जी, अंकल जी’ कहकर चलते बने। प्रवचनों का उन पर कोई असर नहीं पड़ा था। जाते हुए भी वे एक-दूसरे का हाथ थामे हुए थे।

‘बेशर्मी देखी!’ शुक्ला जी पीछे से गरजे। 

 

कॉलोनी की सोसायटी के सचिव पद से इस्तीफा देने का फैसला लेते हुए मैं घर लौट आया। मैंने चुनाव के समय ही मना किया था लेकिन मुझ पर फैसला लाद दिया गया कि बारी-बारी सबको बनना ही है। पार्क की देख-रेख के लिए माली है। एक चौकीदार है। हिसाब-किताब के लिए कोषाध्यक्ष है। करना ही क्या है? चल भी ठीक ही रहा था लेकिन अब यह! इस जमाने में लड़के-लड़कियों को मिलने-बैठने से कोई रोक सकता है क्या! यहां नहीं बैठेंगे तो कोई और कोना तलाश लेंगे। इस शुक्ला का लड़का नहीं ले आया एक कायस्थन! बिना मिले-जुले, पार्क या रेस्त्रां या मल्टीप्लेक्स में गए ही हो गई लव मैरिज! बड़ा मॉरल पुलिसिंग करता फिर रहा! नहीं करनी ऐसी सचिवगीरी। यहां अपने ही काम के लिए टाइम कम पड़ जाता है।

 

* * *   

पार्क के चारों गेटों पर ताले लगा दिए गए। एक चाबी माली को और बाकी आस-पास के घरों में दे दी गईं। समिति की मीटिंग में तय हुआ कि सुबह छह बजे ताले खोले जाएंगे और शाम को आठ बजे बंद कर दिए जाएंगे। दिन में माली रहता है तो भी एक ही गेट खोला जाए। बाहरी ‘आवारा, बदतमीज’लड़के-लड़कियों का आना रुक जाएगा तो फिर ढील दी जा सकेगी। मेरा इस्तीफा हवा में उड़ा दिया गया था- “आप तो दिल में ले लेते हैं, त्यागी जी। समस्या का समाधान चाहिए, मैदान छोड़ने से क्या होगा।”

गेट पर लगे ताले समस्या का समाधान नहीं कर पाए। पार्क की चारदीवारी इतनी ऊंची नहीं थी कि लड़के-लड़कियों की पेंगें रोक पाती। कुछ ही दिन में पता चल गया कि शाम को ताला लगने के बाद भी दीवारें फलांगी जानें लगी हैं। दीवार के सहारे चार ईंटों का रद्दा काफी था। कई बार तो लड़के-लड़कियों के स्कूली या पिट्ठू बैग़ या दो-चार किताबें मदद कर देते। कॉलोनी की महिलाओं की खोजी नजरों ने जो देखा या पुरुषों ने सरे शाम पाया, वह फिर एक अनौपचारिक मीटिंग का मुद्दा बना। माली को ऐसे आवारा-बेशर्म लड़के-लड़कियों को पार्क से भगाने के निर्देश दिए गए। चंद रोज में ही माली ने हाथ खड़े कर दिए- “साहब, कौनू-कौनू तौ मान जावत है, कौनू लड़ै लागत है। मुला करत कछु नाहीं साहब, बस बइठ रहत हैं देर तलक, बतियात है।फूलौ नाहीं तोड़त।”      

फूल तोड़ते तो 

उतनी खतरनाक बात नहीं थी। पार्क में चिपटा-चिपटी करने वाले लड़के-लड़कियां जाने क्या-क्या तोड़े दे रहे थे। इसे चलने नहीं दिया जा सकता था। कॉलोनी के बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ने, विशेष रूप से बहू-बेटियों के बिगड़ने का खतरा तो था ही। बूढ़े माली को निहायत नासमझ और बेवकूफ घोषित करते हुए नए उपायों पर विचार किया जाने लगा।   

“पेड़ के नीचे अंधेरे कोनों वाली बेंचें हटा दी जाएं।”

“नहीं-नहीं। बेंच हमें नहीं चाहिए क्या? उन बेशर्मों का क्या है, नीचे घास या मिट्टी में ही बैठ जाएंगे।”

अंतत: दोष उस पीपल का पाया गया जो बढ़ते-बढ़ते इतना छतनार हो गया था कि बिल्कुल नीचे आ गई शाखाओं से अच्छी-खासी आड़ हो गई थी। इसी कारण पार्क के बीच में लगी तेज एलईडी लाइट की रोशनी भी वहां नहीं पहुंचती। पेड़ को छंटवाना होगा। इसी आड़ और अंधेरे में अड्डा बना लिया है मजनुओं ने।

माली ने पीपल के पेड़ पर बांका लगाने से साफ मना कर दिया- “पीपल पर हथियार न चलाव साहब। पाप लागी। कौनू मुसलमान बुलाया जाई।” कोई मुसलमान ढूंढ लिया जाता लेकिन पाया गया कि कुछ डालें छांटने से ही बात नहीं बनने वाली। 

“नगर निगम से बात की जाए कि वह पेड़ को छंटवा दे।”

“वन विभाग से कहना पड़ेगा।”

“वन विभाग से परमिशन लेना नगर निगम का काम है।”

 

इलाके के सभासद ने सलाह दी कि बड़े पेड़ों से आस-पास के मकानों और बिजली के तारों को खतरा होने की अर्जी लिखी जाए। इसी आधार पर नगर निगम वन विभाग से पेड़ों की छंटाई की अनुमति ले पाएगा। सचिव के नाते आवेदन पत्र पर मुझे हस्ताक्षर करने पड़े। मैं आनाकानी कर रहा था लेकिन पत्नी ने कहा कि इस पेड़ ने धूप भी रोक रखी है, छंटाई हो जाएगी तो जाड़ों में नीचे बरामदे तक अच्छी धूप आएगी। 

 

* * * 

जाड़ों के छोटे दिनों में दफ्तर से आते-आते अंधेरा हो जाता है। तो भी घर के सामने कार से उतरते ही लगा कि जैसे आज रोशनी फूटी पड़ रही है। कॉलोनी का आकाश जैसे हट गया हो! इतना खुला-खुला लगा कि जैसे कहीं और पहुंच गया होऊं। गेट बंद करते हुए ध्यान गया कि पार्क का पीपल ही नहीं, कॉलोनी की सड़कों के किनारे लगे गुलमोहर, अमलतास, बॉटल ब्रश के पेड़ भी मुण्डे हो गए हैं। पीपल की जगह तो सिर्फ ठूंठ खड़ा था। शायद ही किसी डाली पर पत्ते बचे हों। आठ-दस फुट के तने से निकली कुछ मोटी शाखाओं के ठूंठ कबंध की तरह वीभत्स दिख रहे थे। मेरा मुंह देखते ही पत्नी बताने लगी‌- “सारे मकानों से लोग निकल आए थे। किसी ने इधर की डाल कटवाई, किसी ने उधर की। सभी को अचानक याद आ गया कि बड़े पेड़ों से धूप रुक रही है। किसी को अपने बरामदे में पत्ते गिरने की शिकायत हो गई। किसी को लगा कि आंधी में कोई डाल टूटकर उनके मकान पर न गिर जाय। पूरी दो डाला लकड़ी लाद ले गए ठेकेदार के लोग।”

“देखा त्यागी जी,” प्रफुल्लित शुक्ला जी, कुमार साब और मित्तल जी पार्क का मुआयना करके आ पहुंचे- “न रहा बांस, न बजेगी बांसुरी! अब नहीं दिखेंगे कोई रोमियो-फोमियो।”

रोज की तरह सुबह हुई लेकिन वह इतनी उदास पहले कभी नहीं लगी थी।कां-कां-कां करके पीपल को गुलजार रखने वाले कौवे लाइन से बिजली के तारों पर मातमपुरसी में बैठे थे। फाख्ता के तीन-चार जोड़े ‘घू-घुघ्घू-घू’बोलना भूलकर पास के मकानों की मुडेरों पर हैरान-परेशान चारों तरफ गरदनें घुमा रहे थे। गौरैयों का झुण्ड उजाड़ दी गई बस्ती के बाशिदों की तरह पार्क की चारदीवारी पर सदमे में बैठा था। झाड़ियों में बसने वाली नन्हीं-नन्हीं चिड़ियां भी फुदक-फुदक कर माजरा समझने की कोशिश कर रही थीं। सतबहिनी का गिरोह रुदालियों की तरह विलाप करते नहीं थक रहा था। गिलहरियां पेड़ के ठूंठ से ऊपर का रास्ता न पाकर पूंछ खड़ी करके हैरान थीं। सुबह की हवा में स्तब्धता थी। सब कुछ बेसुरा और बेताला लग रहा था।

 

देस बिराना हो गया था। सो, धूप आते-आते चिड़ियों ने पंख फड़फड़ाए और किसी दूसरी दिशा में निकल गए। गिलहरियों ने झाड़ियों से ही संतोष कर लिया। शायद ही किसी ने इस ओर ध्यान दिया हो। बड़े संतोष से यह अवश्यनोट किया गया कि पार्क बहू-बेटियों और मान-मर्यादा के लिए सुरक्षित हो गया है।         

* * * 

कॉलोनी का जीवन अपनी रफ्तार चलता रहा। याद रह जाने या ध्यान देनेलायक विशेष घटनाएं नहीं घटीं। हां, कॉलोनी में ‘लव जिहाद’ का एक सनसनीखेज मामला होते-होते बच गया। मित्तल साब की लड़की और उसका पुराना क्लास फैलो अकरम शादी की ज़िद ठान बैठे थे, जिन्हें दोनों परिवारों ने अखबारों से मय सबूत दर्जनों उदाहरण दे-दे कर किसी तरह समझाया-मनाया। अब तो मित्तल साब सजातीय विवाह सकुशल निपटा कर हनुमान जी के घनघोर भक्त बन चुके हैं। कुमार साब का लड़का आईआईटी में चुन लिया गया तो उन्होंने बढ़िया दावत दी थी। पत्नी ने दिन में ही फोन करके कोटा में कोचिंग कर रहे हमारे बेटे को यह खबर जिस अंदाज में सुनाई, उससे बेटा भड़क गया था और उसने हफ्तों उसका फोन नहीं उठाया। शुक्ला जी की बहू रागिनी ने बहुत समझाए जाने के बाद भी विवाह पंजीकरण के समय न केवल अपने नाम के आगे ‘श्रीवास्तव’ ही दर्ज़ करवाया, बल्कि मजिस्ट्रेट के सामने अपने पति से पूछ लिया कि ‘तुम लिखोगे अपने नाम के आगे श्रीवास्तव?’ उसके इस तेवर पर कई दिन तक ‘बाप रे!’ से शुरू करके घर-घर टीका-टिप्पणियां और लम्बी पंचायतें होती रहीं। बस, ऐसे ही कॉलोनी का जीवन चल रहा था और मौसम आ-जा रहे थे।

 

वह अप्रैल के एक इतवार की सुहानी सुबह थी जब बहुत पहचानी ‘घू-घुघ्घू-घू, घू-घुघ्घू-घू’ ने ध्यान खींचा। बहुत दिनों बाद फाख्ते का एक जोड़ा घर के सामने बिजली के तारों पर अगल-बगल बैठा दिखा।

‘आज यहां कहां भटक आए, यार?’ उनसे उलाहना-सा करते हुए मैंने पार्क में खड़े पीपल के ठूंठ की ओर देखा। अरे, वाह! ये कब हो गया! आश्चर्य और आनंद से मन पुलकित हो आया। ठूंठ बना दी गई शाखाओं पर सैकड़ों कल्ले उग आए थे। काटी गई मोटी शाखाओं के इर्द-गिर्द खूबसूरत घने गुलदस्ते-सेसजे हुए थे। कुछ नई टहनियों की बढ़वार अच्छी थी। वे झुरमुट से सिर ऊपर निकाले आसमान की तरफ लपके पड़ रहे थे। हजारों की संख्या में ताजे, हरे-धानी, चमकदार कोमल पत्ते हवा में खुशी से नाच रहे थे। एक फाख्ता तार पर से उड़ा और पेड़ के ऊपर गोल चक्कर काट कर नए पत्तों के बीच जा बैठा। उसने दो बार ‘घू-घुघ्घू-घू’ की आतुर पुकार लगाई तो उसका साथी भी उड़कर उसके पास जा पहुंचा। पीपल के ताजे कोमल पत्तों के बीच बैठा फाख्ते का जोड़ा गरदन फुला कर चोंचें लड़ाने लगा। उनके मटमैले-भूरे चित्तीदार पंख धानी गुलदस्ते के बीच क्या ही खूब फब रहे थे। तभी झाड़ियों में छुपी गिलहरी ने किलकारी मारी। फाख्ता पत्तों के बीच और भी दुबक गए। 

 

पेड़ ने ठूंठ बने रहने से इनकार करते हुए बगावत कर दी थी। यही नहीं, उसने अपनी मुहब्बतों को भी आवाज दे दी थी।    

 

(NBT, Mumbai के दीपावली विशेषांक, 2023 में प्रकाशित)     

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Sunday, December 17, 2023

अभिनय और संगीत पियूष की रगों में दौड़ता था

“कोमलांगी सिया प्यारी तू कहाँ? ढूँढता फिरता तुझको मैं यहाँ।” मंच पर राम का विलाप चल रहा है। सीता के आग्रह पर स्वर्ण मृग का आखेट करने गए राम लौटकर कुटिया में सीता को नहीं पाते। उन्हें मालूम नहीं है कि रावण ने छल करके सीता का हरण कर लिया है। उसी छल से लक्ष्मण भी सीता को अकेला छोड़कर उनके पीछे चले आए थे। अब दोनों भाई जंगल-जंगल सीता को खोज रहे हैं। ‘वर्षा विगत शरद ऋतु आई’ और राम का धैर्य जवाब देने लगा है। ‘पिया हीन’ उनका हृदय फटा जा रहा है। किसी अत्यंत करुण राग में निबद्ध गीत गाते हुए राम का व्याकुल स्वर खचाखच भरे मुरलीनगर के मैदान में एकाग्र चित्त बैठे दर्शकों का हृदय भी विदीर्ण कर रहा है। महिलाएं आंचल से आंखें पोछ रही हैं। उस दृश्य में तो वे सिसकने लगती हैं जब युद्ध के मैदान में लक्ष्मण को शक्ति लग गई है और संजीवनी बूटी लेने गए हनुमान अब तक लौटे नहीं हैं। लक्ष्मण का सिर गोद में रखे हुए राम सिसक रहे हैं- “रण बीच अकेला तड़पूं भैया, अंखिया खोल-खोल-खोल।” यह 1970 के दशक में मुरलीनगर में कुमाऊं परिषद की रामलीला का अविस्मरणीय दृश्य है।

वह पियूष पाण्डे का स्वर होता था जो राम के पात्र का पर्याय बन गया था। अपनी किशोरावस्था में तभी हमने पियूष पाण्डे का नाम सुना था। शास्त्रीय संगीत पर आधारित उस दौर की इस प्रख्यात रामलीला में राम की भूमिका कई किशोरों-युवाओं ने निभाई लेकिन पियूष पाण्डे जैसा राम कोई नहीं बन सका। इसीलिए वे कई-कई वर्ष राम बनते रहे। 1951 में जन्मे पियूष ने छह साल की उम्र से रामलीला में अभिनय करना शुरू कर दिया था और शत्रुघ्न से लेकर अंगद तक कई भूमिकाएं निभाईं लेकिन राम के रूप में पियूष की अदाकारी एवं गायकी को दर्शक कभी नहीं भूल सके। आज जब पियूष हमारे बीच से अनंत यात्रा पर चले गए हैं तो भी उनके उसी रूप की स्मृतियां उस पीढ़ी के दिल-दिमाग में ताज़ा हो रही हैं।

पियूष ही नहीं, उनका पूरा परिवार संगीत-अभिनय निपुण रहा है। नौकुचियाताल (नैनीताल) के सिलौटी गांव से लखनऊ आ बसे पीताम्बर पांडे ने 1930 के दशक में मैरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक (आज का भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद किया था। यही तब वहां की सर्वोच्च डिग्री होती थी। ‘पित्दा’ के नाम से मशहूर पीताम्बर पाण्डे गायन और वादन निपुण थे और तत्कालीन सचिवालय के कई आईसीएस अधिकारियों के बच्चों को संगीत की शिक्षा दिया करते थे, जिसके प्रमाण पत्र आज भी एक संदूक में सुरक्षित हैं। लखनऊ में 1941 में हुए पहले अंतर्राष्ट्रीय संगीत सम्मेलन की आयोजन समिति में वे भी शामिल थे। तब उनके छोटे से घर में कई वाद्य यंत्र रखे रहते थे। वे ही कुमाऊं परिषद की रामलीला के संगीत उस्ताद थे। संगीत का जुनून उन पर इतनी हावी रहा कि उन्होंने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया लेकिन उनकी सभी नौ संतानों के डीएनए में संगीत खूब रचा-बसा और पल्लवित हुआ। छह लड़के और तीन लड़कियां, सभी गायन-वादन में बिना विधिवत प्रशिक्षण या डिग्री के भी पारंगत हुए। किताबी शिक्षा से अधिक संगीत ही उन सबकी पहचान बना और सभी ने रामलीलाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही आकाशवाणी में भी खूब भागीदारी की।

पीताम्बर पाण्डे और विद्या देवी की पांचवें नम्बर की संतान पियूष सबसे अलग, जुनूनी और जिम्मेदार निकले। रामलीलाओं में उनका उल्लेखनीय प्रदर्शन उन्हें आकाशवाणी-दूरदर्शन और फिर शहर की रंग संस्थाओं की ओर ले गया। 1975 में बंसीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ जी ने कुमाऊंनी-गढ़वाली बोलियों के नाटक मंचन के उद्देश्य से ‘शिखर संगम’ संस्था बनाई तो पियूष ने पहले ही नाटक ‘मी यो गयूं मी यो सटक्यूं’ में शहरी पहाड़ी-प्रवासी के किरदार में जान डाल दी थी। अगले नाटक ‘पुंतुरि’ (निर्देशन शशांक बहुगुणा) में अल्मोड़िया पाण्डे ज्यू के नौकर रेबाधर के रूप में उन्होंने ऐसा प्राणवान अभिनय किया कि दर्शक उनके मुरीद हो गए। ‘शिखर संगम’ संस्था बंद होने के बाद 1978 में जो दूसरी संस्था ‘आंखर’ गठित हुई, पियूष उसके न केवल मुख्य कर्ता-धर्ता बने, बल्कि अनेक नाट्य प्रदर्शनों का सबसे चर्चित अभिनेता भी वही साबित हुए। ‘आंखर’ ने कानपुर, भोपाल, नैनीताल, अल्मोड़ा, मुरादाबाद में भी अपने कुमाऊंनी नाटक मंचित किए। ‘आंखर’ नाम से ही कुमाऊंनी-गढ़वाली बोली की पत्रिका भी प्रकाशित की गई जिसमें प्रकाशक के रूप में पियूष का नाम छपता था। शंकरपुरी, फूलबाग, लखनऊ का उनका घर ही ‘आंखर’ का स्थाई पता होता था। ‘मोटर रोड’, ‘चंदन’, ‘ब्या है ग्यो’, ‘ह्यूना पौण’ समेत कुछ और कुमाऊंनी नाटकों का उन्होंने निर्देशन किया। ‘आंखर’ ने देवेंद्र राज ‘अंकुर’ के निर्देशन में शेखर जोशी की चार कहानियों (दाज्यू, बोझ, व्यतीत एवं कोसी का घटवार) का कुमाऊंनी में मंचन किया तो पियूष अभिनय से लेकर आयोजन तक में स्तम्भ की तरह खड़े रहे।'कोसी का घटवार' में उन्होंने 'गुसांई' की भूमिका अदा की थी। 1982 में उन्होंने हिमांशु जोशी के उपन्यास ‘कगार की आग’ के कुमाऊंनी नाट्य रूपांतर का निर्देशन किया। मैंने उन्हीं के साथ दैनंदिन चर्चा करते हुए और पूर्वाभ्यास के बीच ही इस उपन्यास का कुमाऊंनी नाट्य रूपांतर किया और गीत लिखे थे। यह ‘आंखर’ का उत्कर्ष काल था तो अभिनेता के रूप में पियूष के मंजने और परिपक्व होने का समय भी।

यही वह दौर था जब पियूष ‘अंकुर’ जी, उर्मिल कुमार थपलियाल और शशांक बहुगुणा जैसे प्रयोगशील निर्देशकों की नज़रों में चढ़ चुके थे। ‘लक्रीस’ के वह सक्रिय सदस्य व अभिनेता ही नहीं, कर्ता-धर्ता भी थे। ‘लक्रीस’ ने ‘मनोशारीरिक रंगमंच’ के सर्वथा नए प्रयोग करते हुए 'खड़िया का घेरा' और ‘तुगलक’ जैसे नाटकों का मंचन किया जिनमें पियूष ने देह से अभिव्यक्ति की नई रंग-भाषा सीखी। फिर पियूष ने करीब-करीब इसी शैली में 'दर्पण' के लिए 'सृष्टि' नाटक का निर्देशन किया। संगीत की दक्षता और नैसर्गिक अभिनय क्षमता ने उन्हें उर्मिल थपलियाल का एक प्रिय अभिनेता बनाया जो लोक संगीत को अपने नाटकों का मुख्य आधार बना रहे थे। उर्मिल उन दिनों नौटंकी की पुरानी परम्परा को नागरी नौटंकी के रूप में नया संस्करण देने में लगे थे। पियूष उनकी स्वाभाविक पसंद बने। 'यहूदी की लड़की', ‘हरिश्चन्नर की लड़ाई’, ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ और ‘हम फिदाए लखनऊ’ जैसे प्रदर्शनों में उन्होंने पियूष की प्रतिभा का शानदार उपयोग किया। ‘हरिश्चन्नर की लड़ाई’ को पियूष अपना प्रिय नाटक मानते थे। उर्मिल ने अपने दादा भवानीदत्त थपलियाल जी के 1911 में लिखे गए गढ़वाली नाटक ‘प्रह्लाद’ के लोक-संगीत-प्रधान-मंचन में भी पियूष को भूमिका दी थी। इन प्रदर्शनों ने पियूष को नैसर्गिक, जीवंत एवं प्रतिभाशाली अभिनेता साबित किया। ‘दर्पण’ के लिए उन्होंने शंकर शेष के नाटक ‘कोमल गांधार’ का भी निर्देशन किया था। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों के लिए भी कुछ नाट्य-कार्यशालाएं एवं नाट्य प्रदर्शन किए।

प्रतिभा और क्षमता के अनुपात में पियूष के अभिनीत या निर्देशित नाटकों की सूची बहुत छोटी है। इसका मुख्य कारण उनका अत्यंत संकोची और अतिरिक्त स्वाभिमानी होना रहा। संकोच का एक बड़ा कारण उनकी सीमित स्कूली शिक्षा थी तो स्वाभिमान की अतिरिक्त सतर्कता ने उन्हें अग्रिम पंक्ति में आने से रोके रखा। अपनी पहल पर तो वे कोई प्रस्ताव रख ही नहीं सकते थे, बल्कि प्रस्ताव मिलने पर पीछे हटने लगते थे। जो नाटक उन्होंने किए, उसके लिए संस्थाओं/निर्देशकों ने उन्हें एक तरह से पकड़कर रखा। बहुत संकोची होना उनकी प्रतिभा के शिखरारोहण की राह में उनका शत्रु ही था।

कुमाऊं परिषद की जिस रामलीला ने उन्हें पहचान दी, लखनऊ के उत्तराखण्डियों की वह सबसे पुरानी संस्था 1980 के बाद न केवल निष्क्रिय हो गई बल्कि अपने अस्तित्व के संकट से जूझने लगी थी। लक्ष्मण भवन, हुसेनगंज स्थित उसका कार्यालय मुकदमेबाजी में फंस गया। करीब बीस वर्ष तक पियूष उसे बचाने के लिए लगभग अकेले अदालतों और वकीलों के दफ्तरों तक दौड़ते रहे। संस्था के संसाधन और सहयोगी बिखर गए थे और पियूष की अपनी आमदनी का कोई स्थाई माध्यम नहीं था। तब भी उन्होंने वर्षों तक लगभग अकेले मुकदमा लड़ा। कुमाऊं परिषद की अदालती पराजय और अंतत: संस्था का विलोपन उनकी स्थाई पीड़ा थी। उनकी प्रतिभा का बेहतर उपयोग कर सकने वाली ‘लक्रीस’ और ‘आंखर’ भी तब तक निष्क्रिय हो चुके थे। यदा-कदा उर्मिल थपलियाल और ‘दर्पण’ उनका रचनात्मक प्रयोग करते रहे। उसमें भी पियूष का संकोच अक्सर आड़े आ जाता था।

गिर्दा भी पियूष को बहुत पसंद करते थे। 1980 के शुरुआती वर्षों में दोनों का सम्पर्क अंतरंग हो गया था। नैनीताल से लखनऊ आने का कार्यक्रम बनते ही पियूष के लिए गिर्दा का पोस्टकार्ड और बाद में फोन आ जाता था कि ‘आ रहा हूं’। गिर्दा की लखनऊ यात्रा के दिनों और शामों में जब हम अखबार के अपने काम में व्यस्त होते तो दोनों रिक्शे में बैठकर कभी अमीनाबाद के झण्डे वाले पार्क या जीपीओ पार्क या किसी धर्मशाला के कमरे में दोपहर से देर रात तक बात करते रहते थे। बातचीत के केंद्र में संगीत और मध्य में सुरा के गिलास होते। पियूष गिर्दा से कुमाऊंनी लोक संगीत की बारीकियां समझने का प्रयत्न करते तो गिर्दा अपनी अबूझ-सी प्रयोगशीलता उन्हें समझाने में जूझते दिखते थे। हम सबकी तरह पियूष गिर्दा से सम्मोहित रहते और गिर्दा बाद में शिकायत करते थे कि लखनऊ वालों को पियूष का बहुत बढ़िया उपयोग करना चाहिए। सचमुच, पियूष की प्रतिभा का बेहतर उपयोग नहीं ही हो पाया। उनके जाने के बाद यह अनुभूति गहरी होकर परेशान करने लगी है। ऐसी कितनी ही प्रतिभाओं के योगदान से समाज वंचित होता रहता है और पश्चाताप ही हमारे साथ रह जाता है।     

पिछले कोई डेढ़ दशक से जयपुरिया स्कूल, गोमतीनगर, लखनऊ ने ‘ड्रामा डायरेक्टर’ के रूप में अनुबंधित करके उनकी प्रतिभा का सदुपयोग करना शुरू किया। बच्चों को समझाना-सिखाना उनकी पसंद का काम था और उन्होंने बहुत रुचि से विद्यार्थियों को नाट्य-प्रशिक्षण देना शुरू किया। बच्चों ने उनके निर्देशन में कई अच्छी प्रस्तुतियां दीं और प्रतियोगिताओं में पुरस्कार पाए। जयपुरिया स्कूल के साथ उनका अनुबंध अंतिम समय तक जारी रहा। इससे उनके जीवन में तनिक स्थायित्व और आर्थिक निर्भरता आई थी। महानगर रामलीला समति की वार्षिक रामलीला में भी पिछले कई वर्षों से वे कलाकारों को मांजने-संवारने का काम कर रहे थे। कई नए कलाकारों को उन्होंने तैयार किया। कैंसरग्रस्त होने के बावजूद बीते नवरात्र में भी उन्होंने इस रामलीला की तालीम का संचालन किया था। तब गले में उभरी गांठ इतनी खतरनाक नहीं लगती थी। डॉक्टरों ने भी कैंसर के ठीक हो जाने का विश्वास जताया था। दिसम्बर के पहले हफ्ते तक वे ठीक थे। दस दिसम्बर के बाद अचानक तबीयत बिगड़ने लगी। रक्त कोशिकाओं ने जवाब देना शुरू कर दिया था। 16 दिसम्बर की सुबह उनका जीवन एक कहानी भर रह गया।

अब पियूष नहीं हैं तो उनके न होने का शून्य रह-रहकर साल रहा है।

   - न जो, 17 दिसम्बर, 2023, चित्र- 'पुंतुरि में पियूष, फोटो- सुरेंद्र श्रीवास्तव            

             

Tuesday, October 31, 2023

पृथ्वी पर 15 वर्ष लम्बी वह ठंडी काली रात!

 

हमारी पृथ्वी से डायनासोर समेत कई जीव एवं वनस्पति प्रजातियों के लुप्त होने का कारण नए शोध और अध्ययन से अब और भी स्पष्ट हुआ है। इसके अनुसार करीब छह करोड़ साठ लाख वर्ष पहले एक विशाल उल्कापिण्ड पृथ्वी से टकराया था। यह टक्कर इतनी भयानक थी कि धूल के घने बादलों ने पृथ्वी को पूरी तरह ढक लिया था। धूल की यह गाढ़ी परत पृथ्वी के ऊपर करीब पंद्रह वर्ष तक बनी रही। इस परत को सूर्य की किरणें नहीं भेद सकीं। धरती पर अंधेरा छा गया और लगातार गिरते तापमान के कारण सुदीर्घ शीतकाल छाया रहा। शुरुआती 620 दिन तो धुप्प अंधेरा और भीषण शीत रहा।धूप न मिलने से पेड़-पौधों के लिए आवश्यक फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया नहीं हो सकी और वे मरते गए। फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया में वनस्पतियां धूप की सहायता से पानी और कार्बन डाइऑक्साइड को तोड़कर अपना भोजन बनाती हैं। यह प्रक्रिया दो वर्ष तक तो पूरी तरह ठप हो गई थी। इस प्रकार एक विनाशलीला शुरू हुई जिसमें पृथ्वी पर उस समय उपलब्ध 75 फीसदी जीव एवं वनस्पति प्रजातियां विलुप्त होने लगीं थीं। इन्हीं में डायनासोर जैसे विशालकाय प्राणी भी थे जो पूरी तरह विलुप्त हो गए। इस विनाशलीला में जहां कई प्रजातियां सदा के लिए विलुप्त हो गईं, वहीं पृथ्वी पर स्तनपायी जीवों का विकास भी प्रारम्भ हुआ था। 

यह नया शोध-अध्ययन बेल्जियम की रॉयल ऑब्जर्वेटरी में किया गया। इसके प्रमुख अध्ययनकर्ता विज्ञानी सेम बर्क सेनेल हैं। ब्रिटेन, अमेरिका और नीदरलैण्ड्स के विज्ञानी भी इस अध्ययन में शामिल थे। उनके अध्ययन के निष्कर्ष बीते सोमवार को प्रतिष्ठित एवं विश्वसनीय विज्ञान पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस' में प्रकाशित हुए हैं।

विज्ञानी करीब चालीस साल पहले से इस सम्भावना पर शोध कर रहे थे कि किसी विशाल उल्कापिण्ड के पृथ्वी से टकराव से जो पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हुआ उसी के कारण डायनासोर और अन्य प्रजातियां समाप्त हुई होंगी। अब इसकी पुष्टि हो गई है। यह भी स्पष्ट हुआ है कि पृथ्वी पर आया शीतकाल या हिमयुग कितना लम्बा चला था। 

पहले के अध्ययन यह पता लगा चुके थे कि एक विशाल उल्कापिण्ड पृथ्वी के साथ मैक्सिको के युकेंटन प्रायद्वीप के पास टकराया था। एक विशाल गड्ढा बना जो चिक्सुलुब कहलाता है और वर्तमान में उस प्रायद्वीप के नीचे कहीं दफ्न है। डॉ सेनेल ने बताया कि टक्कर के बाद धूल का जो घना बादल पृथ्वी पर छाया रहा उसमें सिलिका, कार्बन और सल्फर बड़ी मात्रा में थे। ये कण अत्यंत महीन थे, करीब एक माइक्रोमीटर आकार के। इसे ऐसे समझें- मनुष्य के सिर के एक बाल की मोटाई 20 से 200 माइक्रोमीटर तक होती है। इतनी बारीक धूल की घनी पर्त बरसों बरस पृथ्वी पर छाई रही थी। टक्कर के बाद के शुरुआती आठ वर्ष अत्यंत कठिन थे।औसत वैश्विक तापमान में 25 डिग्री सेंटीग्रेड की गिरावट आ गई थी। उस समय धरती पर तापमान शून्य से तीन से सात डिग्री नीचे रहा था। सिलिकेट मिश्रित धूल की घनी पर्त के नीचे फोटोसिंथेसिस बिल्कुल नहीं हो पाती। इस घातक धूल से पूरी तरह उबरने में अनेक वर्ष लगे। टक्कर से पहले का तापमान पाने में तो पृथ्वी को करीब बीस वर्ष लगे। 

(The Telegraph, 01/11/2023 में प्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित। चित्र नेट से।)


Wednesday, October 25, 2023

आज के गांव-गिराम-किसान की प्रामाणिक कथा - अगम बहै दरियाव

शिवमूर्ति जी का नया उपन्यास 'अगम बहै दरियाव' पढ़कर जितना उद्विग्न हूं उतना ही प्रसन्न भी। 

उद्विग्न इसलिए हूं कि भारतीय ग्रामीण-कस्बाई समाज, हमारी प्रशासनिक व्यवस्था, जातीय शिकंजे और राजनीति के विद्रूप का जैसा सच्चा एवं निर्मम चित्रण उन्होंने किया है, वह देखा-भाला व सुना-सुनाया होकर भी 'स्वतंत्रता के अमृतकाल' में इतनी तीव्रता से भेदता है कि आह भी नहीं निकल पाती। प्रसन्नता इसलिए कि हिंदी में गांव और किसान और दलित-पिछड़ी जातियों के संघर्षों के प्रामाणिक लेखन की बड़ी कमी को यह उपन्यास पूरा करता है। शिवमूर्ति जी को बहुत-बहुत बधाई। वैसे, उपन्यास पढ़ना समाप्त करने के तत्काल बाद उन्हें फोन करके बधाई देने से अपने को रोक न सका था। 

'अगम बहै दरियाव' पढ़ना शुरू करने के साथ ही 'गोदान', 'मैला आँचल', 'राग दरबारी', 'धरती धन न अपना', 'कब तक पुकारूं, और 'बेदखल' व 'पाहीघर' जैसे उपन्यास साथ चलने लगते हैं। यह इस उपन्यास की कमजोरी नहीं, खूबी है कि यह उन सबके मुद्दों को नए संदर्भों एवं वर्तमान स्थितियों में उठाता है और उनसे आगे निकल जाता है। 'गोदान' 1935 में आया था अर्थात स्वतंत्रता से पूर्व और यहां उल्लिखित अन्य उपन्यास  स्वतंत्रता के पश्चात लेकिन, अगर मैं गलत नहीं हूं तो, 1970-75 से पहले लिखे गए थे। उसके बाद भारतीय समाज में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है। राजनीति से लेकर आर्थिक नीतियों तक में भारी उलट-पुलट हो गई। विकास कहते हैं जिसे, वह भी अपनी अन्तर्निहित बर्बादियों के साथ खूब नमूदार हुआ है। गांव और खेती-किसानी भी बदले हैं लेकिन किसानों के शोषण, उपेक्षाओं और अनेकानेक संकटों का शिकंजा कतई ढीला नहीं हुआ है। खेती घाटे का पेशा ही नहीं है, अगर सीमांत या लघु किसान हैं तो पूरी मरन है। 'अगम बहै दरियाव' 1970 के दशक से लेकर आज तक के उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज की प्रामाणिक कथा है, जिसके केंद्र में आम किसान हैं जो अपने कष्ट और संकट सीधे होरी और गोबर के समय विरासत में पाए चले आ रहे हैं। 

1980-90 के दशकों के बाद भारतीय समाज में विदेशी पूंजी आई, बाजार विकराल हुए और दलित पिछड़े समाज में अपने शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध राजनैतिक-सामाजिक चेतना भी आई। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद पिछड़ों को सभी क्षेत्रों में ताकत मिली। दलित राजनैतिक चेतना के विकास ने दलित जातियों को आवाज उठाने की हिम्मत दी और सत्ता का स्वाद चखाया, हालांकि यह परिवर्तन भी नव-सामंतवाद और ब्राह्मणवाद का शिकार होता गया। किसान के हिस्से क्या आया? एम एस पी का दिखावा, बीजों व उर्वरकों की आड़ में ठगी, ऋण का जाल और ऋण-माफी की राजनैतिक चालें। समर्थन मूल्य पर अनाजों की ठीक-ठाक खरीद की भी व्यवस्था 'अमृत काल' तक पहुंच चुकी आज़ादी नहीं दिला सकी। देश भर में पिछले दशकों में किसान आत्महत्याओं का भयावह आंकड़ा क्या बताता है? 'अगम बहै दरियाव' में एक पांड़े जी हैं, बैंक वाले जिन्हें सपने दिखाकर ट्रैक्टर के लिए ऋण दिलवाते हैं और अपने खेतों की नीलामी से लेकर क्या-क्या नरक नहीं झेलकर पांड़े जी अंतत: अपने प्यारे महुए के पेड़ की डाल से धोती का फंदा कसकर लटक जाते हैं।  ये पांड़े जी तो बाभन थे लेकिन थे तो किसान ही! और जो बाभन नहीं हैं और कहने  भर को किसान हैं लेकिन मजूरी से किसी तरह नमक-रोटी खा पाते हैं, उनका तो जीवन हर ओर से घुट रहा है। ठाकुर छत्रधारी की साजिशों के चलते छोटी-छोटी जोत वाले किसानों के एकाध खेत भी उनके कब्जे में जा रहे हैं और एक संतोखी हैं जो छत्रधारी के खास थे लेकिन उसने उनका भी खेत हड़प लिया तो वे ठान लेते हैं मर जाएंगे लेकिन अदालत से न्याय पाकर छत्रधारी से अपना खेत छुड़वाएंगे। छोटी से लेकर बड़ी अदालत तक संतोखी के पक्ष में फैसला देती हैं और 28 साल बद वह दिन आता है जब प्रशासन खेत में कब्जा भी दिला देता है लेकिन संतोखी को तो कब्जा नहीं मिलता क्योंकि छत्रधारी के बंदूकची खेती करने दें तब तो! थाना ही नहीं, पूरा प्रशासन और समाज का ऊपरी तबका छत्रधारी के साथ है। अदालत की भी नहीं मानी जाने पर संतोखी की शिकायत पर थाना प्रभारी कहते हैं कि यह बंदूक सबसे बड़ी अदालत है। आखिर बत्तीस साल बाद खेत संतोखी के कब्जे में तब आता है जब जंगू 'डकैत' छत्रधारी को धमकी देता है। और, यह जंगू कौन है? वह भी छत्रधारी का सताया-उजाड़ा दीन-हीन दलित है जिसने फूलन की राह पर चलकर गरीबों-शोषितों को न्याय दिलाने की ठानी है लेकिन जो राजपूतों-ब्राह्मणों की सरकार के निशाने पर है। मान्यवर और बहनजी के राजनैतिक पटल पर आगमन के बाद दलित समाज में जो उत्साह पैदा होता है,और जो एकता दिखती है और उनके सत्ता पाने के बाद जो हौसले बुलंद होते हैं और उसके विरुद्ध जो विष-वमन होता है, उस सबका बेहतरीन चित्रण शिवमूर्ति करते हैं और फिर यह भी कि 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश' है वाले बेमेल राजनैतिक गठबंधन के बाद और टिकट व जन्मदिनों के बहाने भारी वसूली अभियानों के कारण किस तरह दलित जनता का मोहभंग होता है। तूफानी जैसा चरित्र इस उत्थान-पतन का जीवंत गवाह है।

'अगम बहै दरियाव' विशाल कलेवर का उपन्यास है, 586 पेजों में बहुत सारे चरित्र हैं और उतनी ही कथाएं जो किसी न किसी सूत्र से अंतर्गुम्फित हैं। एक गांव के बहाने यह पूरा भारत है, कम से उत्तर भारत का आज का ग्रामीण समाज तो यह है ही। विशाल आकार और व्यापक फलक वाले इस उपन्यास की उपयोगिता इसे पढ़कर ही जानी जा सकती है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए।

शिवमूर्ति की ग्रामीण जन-जीवन पर अद्भुत पकड़ है। इस उपन्यास के पात्र केवल ग्रामीण जन ही नहीं हैं, यहां पेड़-पौधे, फसलें, पशु-पक्षी, हवा-पानी भी पात्रों की तरह आते हैं और उनका व्यवहार मन को छू जाता है। एक-दो प्रसंगों का उल्लेख अवश्य करूंगा। भूसी चौधरी भेड़ें चरा रहे हैं और एक पेड़ के नीचे कमरी बिछाकर बैठे हैं। अब देखिए- "भेड़ें दूर तक चर रही हैं। दो भैंस थोड़ी दूर पर खड़ी हैं। एक भैंस के सींग पर बैठा कौआ उसकी बरौनियों से किलनी बीन निकाल रहा है। भैंस ने मुदित होकर पलकों को हल्के से झपका लिया है। आनंद से उसकी पूंछ तनिक उठ गई है,,, कौआ उठकर दूसरी भैंस के सींग पर बैठ गया। पहली भैंस थूथन उठाकर कौए के पास ले गई और नाक से दो बार सूं-सूं किया। यानी फिर मेरे पास आ जा। इस पर दूसरी भैंस ने गुस्से की मुद्रा बनाई और कान खड़े कर दिए, ताकि कौआ वापस न जाकर कान की किलनियां निकाले।" इसी प्रसंग आगे माठा बाबा भूसी के पास आते हैं। उन्हें एक बार भूसी के गामा नाम के सिंघाड़ा भेड़े ने ठोकर मार-मार कर गिरा लिया था लेकिन अब गामा बैकुंठ सिधार गया है। उसकी चर्चा आगे बढ़कर भेड़ों की रखवाली करते कुत्तों और घात में बैठे भेड़ियों तक जा पहुंचती है, जो अब खत्म हो गए हैं। भूसी बताते हैं कि एक बार खैरा (भेड़िया) उनके भेड़ के बच्चे को मुंह में दबा ले गया था और उन्होंने दौड़कर उसे छुड़ा लिया लेकिन... "मैंने पास जाकर देखा। बच्चे के गले पर दांत धंस गए थे। उसे मर ही जाना था। मैंने सोचा कि इसने इतना जोखिम उठाकर अकेले दम शिकार किया है। इसके मुंह का कौर छीनना ठीक नहीं। बच्चे को छोड़कर लौट आया।... भूसी थोड़ी देर तक खैरा की याद में खोए रहे। फिर बोले- "सब खतम हो गए। वे होते तो दुनिया और सुंदर होती।" 

सृष्टि के सह-जीवन के सम्मान के इस दर्शन की हमारे कथा-साहित्य में घोर अनुपस्थिति है लेकिन शिवमूर्ति के यहां यह अपने सुन्दर रूप में है। भेड़िए, बाघ, सांप, आदि मनुष्य के दुश्मन घोषित हैं और हमारे मुहावरों ने इस दृष्टि को पाला-पोषा है किंतु यह सृष्टि उनके होने से भी होती है और सुंदर होती है। 'अगम बहै दरियाव' में ऐसे कई प्रसंग हैं। एक और प्रसंग है जब पहलवान के बछड़े को कसाई खरीदने आया है। वे सोचते हैं कोई  किसान ले जाता तो बैल बनाकर खेत जोतता लेकिन अब तो खूंटे से बैल गायब ही होते जा रहे हैं। वे बेचना नहीं चाहते लेकिन मजबूरी आ पड़ी है। कसाई पगहा पकड़कर बछड़े को ले नहीं जा पा रहा। गाय अलग रंभा रही है। वह समझ रही है कि जो उसके बछड़े को ले जा रहा है, वह कम से कम किसान नहीं है। जानवर यह खूब समझते हैं, निगाह पहचान लेते हैं। तो, बछड़ा जोर लगाकर कसाई को पटककर पगहा छुड़ाकर लौट आया है। कसाई मिट्टी में सना हुआ आकर पहलवान से कहता है- "आप उसका पगहा खुद मेरे हाथ में पकड़ाइए और दूर तक हंकवा दीजिए। इससे जानवर जान जाएगा कि मालिक ने अपनी मर्जी से उसे सौंपा है। तब उसका जोर अपने आप आधा रह जाएगा। तभी उसे ले जा पाऊंगा।"

अवध क्षेत्र की कथा-भूमि वाले इस उपन्यास में शिवमूर्ति ने अवध की बोली-बानी और लुप्त होते जा रहे शब्दों का अत्यंत सुंदर-मोहक उपयोग किया है। अवधी गीतों, कहावतों और लोकगीतों का उपयोग कथा रस को आत्मीय तो बनाता ही है, जिसे कहते हैं 'चार चांद लगा देना' वैसा भी करता है। 

हिंदी समाज की कृपणता के बावजूद उम्मीद है कि शिवमूर्ति जी का यह उपन्यास चर्चित होगा और बहुत दूर तक अपनी छाप छोड़ेगा।

-न जो, 25 अक्टूबर, 2023

 


Wednesday, October 18, 2023

औरतों को अब कोई दुख नहीं हैं न!

'बनास जन' पत्रिका के माध्यम से पल्लव उल्लेखनीय और दस्तावेजी काम कर रहे हैं। दो मास पहले हरिशंकर परसाई पर उन्होंने पठनीय-संग्रहणीय अंक निकाला था। पहले भी वे कई रचनाकारों पर ऐसे अंक निकाल चुके हैं। 'बनास जन' का ताज़ा अंक (64) यूं तो 'सामान्य अंक' है लेकिन उसमें कुछ महत्त्वपूर्ण आलेख हैं। रांघेय राघव के शताब्दी वर्ष में वेंकटेश कुमार का लेख सप्रमाण बताता है कि विलक्षण प्रतिभा के धनी इस रचनाकार की साहित्यिकारों-समीक्षकों ने किस तरह उपेक्षा की। विद्यापति की चर्चित 'अश्लील दृष्टि' के विपरीत स्त्रियों की साहसिक और स्वतंत्र प्रेम-दृष्टि पर कमलानंद झा, सूरदास, बल्लभाचार्य और बल्लभ सम्प्रदाय पर माधव हाड़ा और प्रेमचंद की उपस्थिति पर उमाशंकर चौधरी के लेख ध्यान खींचते हैं लेकिन अंक अभी मिला ही है और इन्हें पढ़ा जाना है। 

'बनास जन' के इस अंक में जिन दो लम्बी कविताओं ने तत्काल ध्यान आकृष्ट किया और पढ़वा ले गईं, वे हैं आशीष त्रिपाठी की 'गहनों की दुकान पर' और प्रभात की 'नीलम मर जाएगी तो इण्डिया खाली थोड़े हो जाएगा'। अंक खोलते ही दोनों कविताओं के शीर्षकों ने पकड़ा और फिर उनकी विषय वस्तु ने। इस तात्कालिक टिप्पणी का आशय फिलहाल इन कविताओं की तनिक चर्चा करना है। 

दोनों लम्बी कविताओं का केंद्र हमारे समाज की आम लड़की या कहिए कि स्त्रियां हैं। 'गहनों की दुकान पर' में आशीष त्रिपाठी गहनों और खरीदारों से लकदक भरे एक विशाल शो रूम में अपनी बारी की प्रतीक्षा में सकुचाई बैठी मां-बेटी का बयान करते हैं, जो अपने को वहां बिल्कुल अवांछित पाते हैं लेकिन चूंकि इस बेटी की शादी तय हुई है और लड़के वालों की ओर से ठीक-ठाक मांग आई है, इसलिए अपनी औकात के बाहर के इस शोरूम से खरीदारी करना उनकी विवशता है। शोरूम में प्रतीक्षारत मां-बेटी प्रकटत: चुप बैठी हुई हैं लेकिन भीतर-भीतर अपने से संवादरत हैं और उसी से हमारे समाज में महिलाओं-लड़कियों की स्थिति, निम्न मध्यम्वर्गीय परिवारों की विवशताएं, प्रेम की आकांक्षा एवं दुविधाएं, समाज के हालात और मानव मन के अंतर्द्वंद्व खुलते हैं- "उसका ध्यान गया अपनी साड़ी की ओर/ दुकान में खरीदारी करती/ ज़्यादातर औरतों की तुलना में/ वह कितनी मामूली थी/ और उसकी सस्ती चप्पल में तो/ जैसे झलकती थी उसकी पूरी बेचारगी/ उसकी बेटी का सलवार सूट भी कितना औसत-सा था...।"  इस कविता में जो बेटी है, जिसका ब्याह तय हुआ है, उसमें बार-बार की दिखाई, होने वाले ससुरालियों की पड़ताल और दहेज की मांगों के विरुद्ध प्रतिरोधी चेतना के संकेत तो मिलते हैं लेकिन परिवार के हालात शायद उसको साहस नहीं देते और वह सब करती जा रही है जो कहा जा रहा है। उसके भीतर प्रेम की आंकाक्षा भी फड़फड़ाती दिखती है, जो विश्वविद्यालय के दिनों में एक लड़के के यह कहने पर कि तुम बिना गहनों के ही सुंदर लगती हो, मुग्ध तो होती है लेकिन कुछ पूछने या कहने का साहस नहीं कर पाती। हाल के दशकों में स्त्रियों में आई चेतना और प्रतिरोध के उनके तीखे होते स्वरों के बावजूद हमारे शहरी-कस्बाई-ग्रामीण समाज में ऐसी बेटियों की अभी बहुत बड़ी संख्या है जिनके सपने स्वयं अपने ही कदमों से कुचल दिए जाने के लिए ही कुलबुलाते हैं। यह कविता इसी समाज का मार्मिक आख्यान है।

प्रभात की कविता में नीलम, जो एक बेटे की मां भी है, मायके में परित्यक्ता का जीवन जी रही है और मां से लेकर रिश्तेदारों तक की आंखों में बहुत खटक रही है। उसका दोष मात्र इतना है कि ससुराल में सास, जेठ और पति द्वारा दासी की तरह सताई-पीटी जाती हुई उसने एक बार मायके आते हुए मात्र इतना कह दिया था, पति नाम के पुरुष से कि 'लेने आओगे तो आऊंगी' और वह कभी नहीं आया। उसका अन्यत्र ब्याह कर दिया गया। इसलिए नीलम मायके में ससुराल से भी अधिक प्रताड़ना झेलती को विवश है, इतनी कि अपनी दुसह वेदना के कारण पागल तक ठहरा दी गई और एक दिन मर गई लेकिन ऐसी स्त्रियां मरती कहां हैं! वे हर जगह पाई जाती हैं- "कुछ का कहना है वह मरी नहीं/ ना ही मरेगी कभी/ और मरी भी कभी तो/मरेगी तब मरेगी/ फिलहाल उसके मरने की कोई आस नहीं/ वह दिखती रहेगी पृथ्वी पर जहां-तहां/ आस पड़ोस में घर में अखबार में।"  नीलम के माध्यम से कवि 'औरतों के दुखों' के बारे में लिखे जाने को, विशेष रूप से कविताओं को प्रश्नांकित करता भी दिखता है- "... कवि बनना ठीक रहेगा/ जब मैं कवि बन जाऊंगी/ औरतओं के दुखों के बारे में/ ऐसा-ऐसा लिखूंगी/ कि सब सोच में पड़ जाएंगे/ औअर्तों को कभी दुख न दे पाएंगे/ .... चुपचाप वह घर के बाहर जाकर खड़ी हो जाती/ हरेक से पूछती/ अब औरतों को कोई दुख नहीं न?/ सब जानने लग गए थे उसे मुहल्ले में/ हंसते हुए कहते- 'नहीं, कोई दुख नहीं है'/ 'पता है यह कैसे हुआ/ क्योंकि मैंने औरतों के दुखों के बारे में लिखा'।"

दोनों कविताओं की विषय-वस्तु अथवा काव्य-वस्तु नई नहीं है। काव्य-शिल्प में वे प्रतीकों, बिम्बों और सांकेतिकता की अपेक्षा कहानियों जैसा वर्णनात्मक वितान लिए हुए हैं लेकिन इनमें काव्य-संवेदना अत्यंत गहन है, गहरे तक छू जाती हैं, झिझोड़ती हैं और पश्न पूछती हैं। 

'बनास जन' के इस अंक के बारे में फिलहाल इतना ही।

-न जो, 19 अक्टूबर, 2023

Friday, October 13, 2023

सपने हैं, सपनों का क्या!

 

साल-दो साल पहले जब पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड) के नैनी-सैनी हवाई पट्टी से विमान सेवा शुरू होने की खबर पढ़ी थी तो दिल-दिमाग स्मृतियों के झंझावात में फँस गया था. (कुछ दिन यह सेवा चली और फिर ठप हो गई थी) इस सुंदर पर्वतीय घाटी में छोटे विमानों के उड़ने-उतरने लायक यह हवाई पट्टी बने करीब पच्चीस वर्ष हो गये. वह शायद 1998 या 99 का साल था जब मैं उस पर खड़ा था. पहाड़ों की गोद में बनी हवाई पट्टी देखने की उत्कंठा थी. देख कर निराशा ही हुई. आस-पास चर रहे ग्रामीणों के जानवर हवाई पट्टी से आ-जा रहे थे. चारों ओर लगी तार-बाड़ उन्हें रोकने में कामयाब नहीं थी. 

तब तक उत्तराखण्ड राज्य नहीं बना था. पर्वतीय विकास विभाग के बड़े बजट से, जिसमें केन्द्र सरकार का भी अच्छा योगदान होता था, हवाई पट्टी बना कर उत्तर प्रदेश सरकार उसे भूल चुकी थी. सन 2000 में उत्तराखण्ड अलग राज्य बन गया. राज्य बनने के 18 वर्षों में वहाँ कांग्रेस और भाजपा की सरकारें अदल-बदल कर आती रहीं. कभी-कभार उन्हें इस हवाई-पट्टी की याद आती थी. कभी उसकी मरम्मत और कभी उद्घाटन की औपचारिकता के साथ शीघ्र विमान सेवा शुरू करने की घोषणाएँ भी हुईं जिन्हें जल्दी ही भुला दिया जाता रहा. बहरहाल, हवाई पट्टी बनने के दो दशक से ज्यादा समय बाद नैनी-सैनी से हवाई सेवा शुरू हो गयी.

इस खबर से मन में झंझावात उठने का सम्बंध बीस साल पहले उस हवाई पट्टी पर खड़े-खड़े देखे गये सपने से है. मैं सोचने लगा था कि कंक्रीट के जंगल बन गये महानगरों में तमाम शारीरिक-मानसिक व्यथाएँ झेलते रहने की बजाय हम अपने गाँव ही में रहते. गाँव अच्छी सड़कों से जुड़े होते. हम सुबह अपनी छोटी कार से या बस सेवा से इस हवाई अड्डे तक आते. हेलीकॉप्टर या विमान से बड़े शहरों की अपनी नौकरी में जाते और शाम को गाँव वापस लौट आते. गाँव का शुद्ध हवा-पानी मिलता. अपने खेतों का कीटनाशक-रसायन-विहीन अन्न और शाक-भाजी खाते. सेहत ठीक रहती और परिवार के साथ जीवन बीतता. शहर भी जनसंख्या के दवाब में चरमारने से बचे रहते. पहाड़ी शिखरों तक बढ़िया नेटवर्क होता. हमारे बच्चे इस तेज नेटवर्क के सहारे दुनिया भर से जुड़े होते. फुर्सत में मैं भी अखरोट या बांज वृक्ष के नीचे बैठ कर लैपटॉप पर कहानी या लेख लिख लेता और सम्पादकों को ई-मेल कर देता.... साथ आये स्थानीय मित्रों ने वापस चलने का आग्रह करते हुए उस दिन मेरा स्वप्न भंग कर दिया था.

इतने वर्षों में वह स्वप्न मैं कभी भूला नहीं. लखनऊ की चौतरफा अराजकता, घातक प्रदूषण, अनियंत्रित यातायात, मिलावटी खान-पान और  पत्थर होते आपसी रिश्तों से त्रस्त मन अक्सर सोचता है कि आखिर मेरा सपना साकार क्यों नहीं हो सकता था. तरक्की का वही रास्ता हमने क्यों चुना जिसमें शहर विकराल होते गये और गाँवों को लीलते गये? तमाम आधुनिक सुख-सुविधाओं से गाँवों को विकसित करने की राह क्यों नहीं चुनी गयी? प्रकृति को बचाते हुए उसकी गोद में सुखपूर्ण मानव जीवन क्यों सम्भव नहीं था? गाँव में रहते हुए हम शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और टेक्नॉलॉजी की सुविधाएँ क्यों नहीं पा सके? क्यों भीख माँगने के लिए भी शहरों का रुख करना पड़ता है? क्यों ऐसा हो गया कि घर के भीतर एयर-प्यूरीफायर लगाकर फेफड़े बचाने पड़ रहे हैं? खूबसूरत सपने के बाद हकीकत देख कर मन व्यथा से भर उठता है.

जब पिथौरागढ़ से विमान सेवा शुरू होने का समाचार पढ़ा तो व्यथा और गहरी हो गयी थी. कुछ वर्ष पहले मैं अपने छोटे बेटे के आग्रह पर उसे ‘अपना गाँव’ दिखाने ले गया था. पिथौरागढ़ जिले का वह हरा-भरा खूबसूरत दूरस्थ गाँव हमसे कबके छूट गया. मोटर रोड से साढ़े तीन किमी का पहाड़ी रास्ता पार कर जब हम ‘अपने’ गाँव पहुँचे तो पलायन से उजड़े वीरान या खण्डहर मकानों ने हमसे लाख उलाहने किये. कभी चहल-पहल से ग़ूँजता गाँव मात्र सात व्यक्तियों के रहने से किसी तरह जीवित मिला. इन में एक साठ वर्ष से ऊपर और बाकी सत्तर-अस्सी साल वाले हैं. सीढ़ीनुमा खेतों में फसलें नहीं, कंटीले झाड़-झंखाड़ उगे थे. जंगल फैलते-फैलते मकानों तक बढ़ आये हैं. गाँव के सारे कुत्ते बाघों के पेट में चले गये. बाघों के डर से गाय-भैंस धूप में भी गोठ से बाहर नहीं बांधे जाते. बंदरों और जंगली सुअरों के आतंक से क्यारियों में साग-भाजी उगाना भी बंद हो गया. चार मील दूर राशन की दुकान से गल्ला ढोया जाता है.             

हमने बहुत धीरे से अपने मकान का बंद दरवाजा धकेला था. मकड़ियों के जालों से भरा ‘खोली’ का रास्ता पार कर हम भीतर दाखिल हुए. घर तो वह रहा नहीं लेकिन मकान की दीवारें, बल्लियाँ और छत के पाथर ठीक-ठाक मिले. भीतर के कमरे में जहाँ हमारे कुलदेवता का ठीया था, वहाँ स्थापित मेरे हाथ की नाप की वेदी, जो मेरे यज्ञोपवीत के समय बनायी गयी थी, मौजूद थी. क्या देवता अब भी वहाँ होंगे? पास में ही वह थूमी तो साबूत है जिस पर बंधी रस्सी को नचा-नचा कर ईजा ‘नय्यी’ में दही फेंट कर मक्खन बिलोती थी. हथचक्की पता नहीं कहाँ गयी लेकिन उसकी ‘घर्र-घर्र’ मेरे कानों में गूँजने लगी थी. उसी के साथ बचपन, किशोरावस्था और जवानी के दिनों की सैकड़ों ध्वनियाँ भी...

“तुम्हारे मकान में नल लगाने वाले मजदूर रहे. बिजली वाले भी. लीपते थे, चूल्हा जलाते थे. उस धुएँ से मकान बचा है.” एक बहन ने बताया तो मैं वर्तमान में लौटा. अच्छा, अब गाँव में बिजली आ गयी है, जब उजाला करने वाले नहीं रहे. घरों तक नल भी आ गये. आधे-अधूरे शौचालय बने दिखे. मोबाइल का सिग्नल है. यह ‘विकास’ की निशानियाँ हैं. गाँव का उजड़ना किस ‘विकास’ की निशानी है?

लौटने के बाद से गाँव अक्सर मेरे सपनों में आता है. विमान सेवा शुरू होने के बाद सपने बढ़ गये हैं और दर्द भी. जानता हूँ, उन विमानों से पर्यटक, प्रवासी तथा अधिकारी उतरेंगे और ‘दौरा’ करके राजधानियों को लौट जाएंगे. उस हवाई पट्टी पर उतरने वालों का गाँवों से कोई रिश्ता न होगा. समय के साथ विमानों की आवा-जाही बढ़ेगी. उधर, गाँव में हमारा मकान एक दिन चुपचाप ढह जाएगा.

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