
हर बार यह मांग की जाती है कि ऐसा कड़ा
कानून बने और ऐसी सख्त सजा मिले कि फिर कोई किसी लड़की को बुरी नज़र से देखे भी नहीं.
गुस्से में यह मांग करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि सिर्फ कड़ा कानून बनने से सख्त सजा
नहीं मिल जाती. उसके लिए घटना के तत्काल बाद पुलिस की चुस्ती, हर कोण से पड़ताल और ईमानदारी से सबूत जुटाए जाने की जरूरत होती है. सख्त से
सख्त कानून भी बिना सबूतों के अभियुक्तों न अपराधी ठहरा सकता है, न सजा दे सकता है.
पुलिस की हीला-हवाली,
प्रभावशाली अपराधियों के समक्ष समर्पण और आकंठ भ्रष्टाचार के कारण ही
जांच-पड़ताल लचर होती है या रिपोर्ट ही दर्ज नहीं की जाती. अपराधी इसी कारण बच जाते
हैं या वर्षों अदालत में मुकदमा लम्बित रहता है. इसलिए आक्रोश वर्तमान पुलिस-व्यवस्था
और सरकारी तंत्र पर होना चाहिए.
उन्नाव का ताज़ा जघन्य काण्ड देख लीजिए.
उसमें पुलिस की भूमिका पर गौर कीजिए. क्या यह आक्रोश का विषय नहीं है कि बलात्कारियों
के खिलाफ लड़की की शिकायत पर पुलिस ने तीन महीने तक रिपोर्ट ही दर्ज़ नहीं की?
उन्नाव और रायबरेली पुलिस तक लड़की ने शिकायत की मगर किसी ने ध्यान नहीं
दिया. पुलिस की खामोशी का कारण यह था कि अभियुक्त प्रभावशाली हैं. तीन महीने बाद अदालत
के निर्देश पर एफआईआर लिखी गई. प्रभावशाली लोगों को भरोसा रहता है कि उनका कुछ नहीं
बिगड़ेगा. वर्ना जमानत पर छूटा अभियुक्त लड़की को मारकर जला डालने का दुस्साहस कैसे कर
सकता था?
यही सबसे बड़ा मुद्दा है. अगर पुलिस बिना
किसी दबाव में आए तत्काल रिपोर्ट लिखे, जांच
करे तो अपराधी बच नहीं सकते. उन्हें बचाने में पुलिस की बड़ी भूमिका होती है. कुलदीप
सेंगर वाला उन्नाव का मामला हो चिन्मयानंद वाला, हर बार यही साबित
होता है कि पुलिस आम उत्पीड़ित के पक्ष में खड़ी नहीं होती. बलात्कार और हत्या जैसे क्रूर
मामलों में भी नहीं.
तो, सख्त
से सख्त कानून बनने से भी क्या होगा? सही और त्वरित पड़ताल एवं
कार्रवाई हो तो वर्तमान कानूनों में भी अपराधियों को कड़ी सजा मिल सकती है. कई फैसलों
में अदालतें बड़े क्षोभ के साथ पुलिस की लचर कार्यप्रणाली पर टिप्पणी कर चुकी हैं कि
सबूतों के अभाव में अभियुक्तों को छोड़ना पड़ रहा है..
इसलिए आंदोलन इस मुद्दे पर होना चाहिए
कि पुलिस किसी भी तरह के बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होकर काम कर सके,
ऐसी व्यवस्था बनाई जाए. पुलिस सुधारों की अनेक सिफारिशों और न्यायालयों
के निर्देशों में भी यह बात कही जा चुकी है. राजनैतिक हस्तक्षेप ने हमारे पुलिस तंत्र
को आंख मूंदना सिखा दिया है. इसलिए सत्ता-तंत्र राजनैतिक दल भी बराबर दोषी हैं.
हैदराबाद की ‘मुठभेड़’ में बलात्कार के अभियुक्तों के मारे जाने की
खुशी सरकार और पुलिस की असफलता को तो छुपाती ही है, शासन-तंत्र
को बर्बर हो जाने की स्वीकृति भी देती है. यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति है.
(सिटी तमाशा, नभाटा, 07 दिसम्बर, 2019)
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