Friday, September 09, 2022

कहानी के उस्ताद ने 91वें वर्ष में रखा कदम, सलाम और शुभकामनाएं

बात ‘गलता लोहा’ से शुरू करते हैं, जो शेखर जोशी जी की अपेक्षाकृत कम चर्चित कहानी है। पहाड़ के एक गांव में दो सहपाठी हैं- धनराम और मोहन। धनराम लोहार का बेटा है जो कुमाऊं में शिल्पकार यानी अछूत माने जाते हैं। मास्टर त्रिलोक सिंह उसे स्वाभाविक ही हिकारत से देखते हैं और पढ़ाने की बजाय काम में लगाए रखते हैं। मोहन गांव के गरीब किंतु सम्मानित पंडित जी का बेटा है और मास्टर जी का प्रेम पात्र है। आगे की पढ़ाई के लिए पंडित जी मोहन को लखनऊ में कार्यरत एक सम्बन्धी रमेश के साथ भेज देते हैं जहां मोहन पढ़ाई की बजाय रमेश के परिवार ही नहीं, मोहल्ले भर की बेगार करने को विवश है। कहानी की शुरुआत में मोहन लखनऊ से आकर धनराम के आफर में बैठा है जहां वह हंसिए की धार तेज करवाने गया है। दोनों अपने स्कूली दिनों और मास्टर त्रिलोक सिंह की यादों के साथ अतीत में जाते हैं। कहानी और फ्लैश बैक के अंत में दोनों वहीं आफर में बैठे हैं। हंसिए की धार तेज हो चुकने के बाद भी मोहन वहीं बैठा धनराम को लोहे की एक छड़ को गरम करके पीट-पीटकर गोल छल्ले में बदलने की कोशिश करते देख रहा है। एक हाथ से पकड़ी संड़सी में दबी लोहे की छड़ पर दूसरे हाथ का हथौड़ा पड़ता है लेकिन निहाई पर ठीक घाट में सिरा न फंसने के कारण लोहा उचित ढंग से मुड़ नहीं पा रहा है। फिर होता यह है कि मोहन ने “अपना संकोच त्यागकर दूसरी पकड़ से लोहे को स्थिर कर लिया और धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट मारते, अभ्यस्त हाथों से धौंकनी फूंककर लोहे को दुबारा भट्ठी में गरम करते और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोकते-पीटते सुघड़ गोले का रूप दे दिया।”

सामान्य रूप से देखने पर यह कहानी मोहन के पण्डित यानी सवर्ण खानदान का होने यानी लोहे को गलाती है अर्थात वर्ण-व्यवस्था पर प्रहार करती है। यह तो सचेत कहानीकार का मंतव्य है ही लेकिन इतना ही नहीं है। इस चेतना और प्रतिरोध की कहानियां तो वे और भी लिख चुके हैं- ‘समर्पण’ और ‘हलवाहा’। ‘गलता लोहा’ में वे इससे आगे जाते हैं। इन अंतिम पंक्तियों को देखिए- “धनराम की संकोच, असमंजस, और धर्मसंकट की स्थिति से उदासीन मोहन संतुष्ट भाव से अपने लोहे के छल्ले की त्रुटिहीन गोलाई को जांच रहा था। उसने धनराम की ओर अपनी कारीगरी की स्वीकृति पाने की मुद्रा में देखा। उसकी आंखों में एक सर्जक की चमक थी- जिसमें न स्पर्धा थी और न ही किसी प्रकार की हार-जीत का भाव।” यह जो ‘अपने लोहे के छल्ले की त्रुटिहीन गोलाई’ के लिए ‘अपनी कारीगरी की स्वीकृति’ पाने की इच्छा है और जो ‘एक सर्जक की चमक’ है, वही कहानीकार का मुख्य अभीष्ट है। और, मोहन से यह अनायास नहीं हो गया था। उसने बकायदा कारीगरी सीखी थी। इसका संकेत कहानीकार ने बीच में एक जगह मात्र दो पंक्तियों में दिया है। लखनऊ में रमेश के परिवार की बेगारी करते हुए उसे एक तकनीकी स्कूल में भर्ती करा दिया गया था और वहां डेढ़-दो वर्ष गुजारने के बाद मोहन “अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कारखानों और फैक्ट्रियों के चक्कर लगाने लगा।”

इसीलिए यह कहानी कामगारों की, श्रम के सौंदर्य और शिल्प के सम्मान की कहानी ठहरती है। अकारण नहीं है कि शेखर जी ने इस कहानी को ‘डांगरी वाले’ कथा-संग्रह में शामिल किया है, जिसमें उनकी कारखाना मजदूरों के जीवन, संघर्ष और वर्ग चेतना की कहानियां संकलित हैं। एक बार इस कहानी की चर्चा करते हुए उन्होंने मुझसे कहा भी था कि “इसमें मैं सर्जक और शिल्प के सम्मान की चेतना पाठकों तक पहुंचाना चाहता हूं।”

नई कहानी आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षरों में शामिल रहे शेखर जोशी निम्न एवं मध्य वर्ग के अति संवेदनशील तथा प्रगतिशील मूल्यों के प्रभावी प्रवक्ता कथाकार तो हैं ही, उनकी कथा भूमि के दो अन्य फलक भी बहुत स्पष्ट हैं। पहाड़ (कुमाऊं) के श्रम-साध्य, सरल, अभावग्रस्त जन-जीवन का जैसा यथार्थ चित्रण उन्होंने किया है, वह अद्वितीय है। उनकी दूसरी कथा भूमि कारखाने हैं जिसके श्रमिकों के जीवन-संघर्ष, शोषण, वर्ग चेतना, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा तथा गरिमा के वे विरले कथाकार हैं। कुमाऊं के जनजीवन के और भी कथाकार हुए, हालांकि शेखर जोशी उनमें विशिष्ट हैं, लेकिन कारखानों और श्रमिक वर्ग की कथाएं लिखने वाले हिंदी में लगभग नहीं हुए। किसानों को विषय बनाकर विपुल लेखन हुआ है। खूब कहानियां और उपन्यास लिखे गए हैं लेकिन कारखानों और श्रमिक जीवन के विविध पहलुओं को कथाओं में उतारने वाले साहित्यकार शेखर जोशी के अलावा हिंदी में लगभग नहीं हैं। उनके बाद इस्राइल, सतीश जमाली, शकील सिद्दीकी ने भी कुछ ऐसी कहानियां लिखीं लेकिन शेखर जोशी इस मामले में अद्वितीय ठहरते हैं।

बचपन में मां की मृत्यु के बाद बालक शेखर जोशी अपने मामा के पास सुदूर केकड़ी (राजस्थान) भेजे गए थे। शुरुआती पढ़ाई केकड़ी और फिर अजमेर में हुई। कच्ची उम्र में पहाड़ से विस्थापन ने उनके मन में गांव-घर-नदी-पहाड़-पेड़ और वहां की विविध स्मृतियां गाढ़ी बनाए रखीं। इण्टर की पढ़ाई के बाद रक्षा मंत्रालय की ‘कोर ऑफ इलेक्ट्रिकल एण्ड मैकेनिकल इंजीनियर्स’ में प्रशिक्षण के लिए चयन हो गया। लिखना-पढ़ना यानी साहित्यिक संस्कार स्कूली पढ़ाई के दौरान ही विकसित हो चुके थे। दिल्ली में प्रशिक्षण (1951-54) के दौरान ‘होटल वर्कर्स यूनियन’ से सम्पर्क हुआ जो अति संवेदनशील इस युवक में सामाजिक-राजनैतिक और वर्ग-चेतना के विकास का आधार बना। वहीं 1954 में ‘दाज्यू’ लिखी गई। 1955 में इलाहाबाद के आयुध कारखाने में तैनाती मिली। इलाहाबाद तब साहित्य और साहित्यकारों का भी अद्भुत संगम था। दिन भर कारखाने में ‘डांगरीवालों’ का साथ और छुट्टी के दिन लेखकों के बीच। भैरव प्रसाद गुप्त के सम्पादन में ‘कहानी’ पत्रिका की धूम थी। इस पत्रिका के 1956 के वार्षिकांक के लिए हुई कहानी प्रतियोगिता में कमलेश्वर की ‘राजा निरबंसिया’, अमरकांत की ‘डिप्टी कलक्टरी’ और आनंद प्रकाश जैन की ‘आटे का सिपाही’ को संयुक्त रूप से दूसरा पुरस्कार मिला था। (कहा गया था कि प्रथम पुरस्कार लायक कोई कहानी नहीं पाई गई। भैरव जी के बारे में शेखर जी के संस्मरण मेंइसका रोचक वर्णन है।) शेखर जोशी की कहानी ‘कविप्रिया’ भी इस विशेषांक के लिए भेजी गई थी लेकिन वह बाद के अंक में प्रकाशित हुई। तब वे ‘चंद्रशेखर’ नाम से लिखते थे। यही वास्तव में उनका पूरा नाम है। तो, ‘कहानी’ के 1956 के उस विशेषांक को पढ़ने के बाद शेखर जी ने सम्पादक के नाम यह चिट्ठी लिखी थी-

“कहानी का विशेषांक देखा। बंगला तथा अन्य प्रांतीय भाषाओं के वृहद वार्षिकांक देखकर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का पाठक जो कमी अनुभव करता है, उसे आपके विशेषांक किसी हद तक पूरा कर देते हैं। इस वर्ष प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानियों को पढ़ने का विशेष आकर्षण था। ‘राजा निरबंसिया’ और ‘डिप्टी कलक्टरी’ में जो गहराई है, वह ‘आटे का सिपाही’ में नहीं आ पाई। प्रथम दोनों कहानियों को दुबारा पढ़ने पर भी पहले की सी ताजगी मिलती है।

“एक साधारण पाठक की हैसियत से मुझे जो कमी इस विशेषांक को देखकर ही नहीं, वरन्‍ हिंदी कथा साहित्य को पढ़कर खलती है, वह यह कि जहां हमारा लेखक उच्च वर्ग के ड्राइंग रूम, मध्यम वर्ग की गृहस्थी, गांवों के खेत-खलिहान, निम्न वर्ग की झोपड़ियों और वेश्याओं की गलियों में अपनी सूक्ष्म दृष्टि लेकर बेझिझक चला जाता है, वहां वह लेखक एक ऐसे वर्ग की अनायास ही उपेक्षा कर देता है, जो उसकी रचनाओं को पढ़कर उसमें अपनी छाया भी देखना चाहता है। यह वर्ग है कारखानों, फैक्ट्रियों और मिलों में काम करने वाली श्रमिक जनता का।” (संतोष कुमार चतुर्वेदी, ‘अनहद’, जनवरी 2014) बाद में इसे और स्पष्ट करते हुए शेखर जी ने बताया कि “पसीने का भी अपना एक रिश्ता होता है। मजदूर जीवन के अपने सुख—दुख होते हैं, अपनी समस्याएं होती हैं जिस पर किसी ने कलम नहीं उठाई।’ (शेखर जोशी से मुरलीधर सिंह की बातचीत, ‘अनहद’, जनवरी 2014)

खैर, भैरव जी ने ‘कहानी’ के अगले अंक में यह पत्र प्रकाशित ही नहीं किया बल्कि, उसी दौरान शेखर जोशी से परिचय होने पर उन पर ही यह जिम्मेदारी डाल दी कि वे ही क्यों नहीं इस विषय पर कहानियां लिखते। यहीं से शेखर जी के कहानीकार ने अपनी नई कथा भूमि पर पैर रखा। भैरव जी की सलाह पर ही वे शेखर जोशी नाम से लिखने लगे।  

कारखानों और श्रमिकों की कथा- भूमि उनकी कितनी जानी-पहचानी थी! कारखाने की नौकरी के शुरुआती दिनों के बारे में उन्होंने लिखा है- “कामकाजी दुनिया से यह मेरा पहला साक्षात्कार था। बल्कि यह कहना अधिक संगत होगा कि मैं अब इस दुनिया का एक हिस्सा बन गया था। अब तक की मेरी दुनिया बहुत सीमित रही थी। अपना कहने को घर-परिवार और नाते-रिश्ते के ही लोग थे। शेष दुनिया मेरे लिए बाहरी थी। जो कामकाजी लोग थे, जो हल चलाते, मकानों की चिनाई करते, बढ़ईगीरी करते, लोहा पीटते, बर्तन बनाते, वे हमारे लिए अस्पर्श्य थे। यहां तक कि दैनंदिन जीवन में उनका स्पर्श हो जाने के बाद घर में प्रवेश करने से पहले हमें पानी के छींटे देकर शुद्ध किया जाता। अब मैं स्वयं उनमें से एक था। मोची, लोहार, बढ़ई, वैल्डर, मोल्डर, ठठेर, खरादिए, मिस्त्री, रंगसाज मेरे गुरु थे। मैंने उनसे दीक्षा ली थी। मुझे याद आता है, अपहोल्स्टर शॉप में जहां कैनवास और चमड़े का सामान बनता था, वहां एक सप्ताह के प्रशिक्षण के दौरान मेरा पहला शिक्षक एक बूढ़ा मोची था जिसने चमड़े के रोल में से एक लम्बी पट्टी काटकर उसमें रांपी से एक सीधी लकीर खींचकर सुए और तागे से सीधी सिलाई (गंठाई) करने की जब मुझे शिक्षा दी तब मैंने कैसा थ्रिल अनुभव किया था। उस्ताद की पैनी निगाह मेरे काम पर टिकी थी और सिलाई के एक भी टांके के लीक से बाहर होने पर कैसी असंतुष्ट आवाज उनके गले से निकल पड़ती थी!” (‘जुनून’, स्मृति में रहें वे, पृष्ठ 142)

क्या आपको ‘उस्ताद’ कहानी के बीज, आस्वाद और परिवेश याद आने लगे? लेकिन ठहरिए। कारखाने का वह जो जीवन था, वह इस कथाकार के भीतर कैसे उतर रहा था, कैसी छवियां गढ़ रहा था, कैसे रूपक और बिम्ब बना रहा था, कैसे हुनर और रिश्तों के पेच सीख रहा था, श्रम के सौंदर्य की कैसी-कितनी परतें उसके सामने खुल रही थीं, शोषण और उसके कितने रूप वह देख रहा था, उसका जायजा लेने के लिए यहां एक लम्बा उद्धरण देना चाहूंगा- “अपनी ढीली डांगरी पहनकर हम लोग वर्कशॉप के अलग-अलग विभागों में बिखर जाते। एक अद्भुत विस्मयकारी दुनिया हमारे चारों ओर फैली हुई थी। ... आर्मर शॉप के दूसरी ओर आरा मिल, बढ़ई शॉप और सिलाई शॉप थी और दूसरी ओर पेण्ट शॉप। लम्बे भारी लकड़ी के स्लीपर आरा मशीन के ऊपर मिनटों में चिरान होकर सुडौल तख्तों में बदल जाते। दांतेदार तवों या लम्बी दांतेदार पट्टियों वाली ये दैत्याकार मशीनें पलक झपकते ही उन भारी स्लीपरों को डबलरोटी की तरह काट देतीं और आरी के दोनों ओर लकड़ी का बुरादा आटे के ढेर में परिवर्तित हो जाता। लकड़ी के चिरान की भी अपनी एक सौंधी गंध होती है- तवे में सेंकी जाती रोटियों की खुशबू की तरह, और आरा मशीन का अपना संगीत होता है- किसी पहाड़ी झरने की झिर्र-झिर्र-सा। ... पेण्ट शॉप में स्प्रे मशीन से उठती सतरंगी फुहारों के बीच बदरंग काठ-कबाड़ को नया रूप मिलता। जो लोहा-लंगड़ कुछ समय पहले मुरझाए, बदरंग रूप में एक कोने में उपेक्षित-सा पड़ा रहता, वही रंगों का स्पर्श पाकर नई दुलहन-सा खिल उठता। नाक-मुंह और सिर पर कपड़ा लपेटे आरा मिल के कारीगर और पेण्ट शॉप के रंगसाज अपनी नकाबपोशी में रहस्यमय लगते। ... यार्ड के बाद मशीन शॉप थी जहां बीसियों खराद, मिलिंग, होनिंग, बोरिंग, ग्राइण्डर, ड्रिलिंग और दूसरी कई तरह की मशीनें कतारों में स्थापित की गई थीं। हर मशीन का अपना संगीत चलता रहता और जब प्राय: सभी मशीनें चालू हालत में होतीं तो पूरे शेड में एक अद्भुत आर्केस्ट्रा बज उठता। हर धातु का अपना सरगम होता है। उसी खराद पर अगर लोहा कट रहा हो तो उसकी कर्कशता कांसे या पीतल की खनकदार आवाज से बहुत भिन्न होती है। ग्राइण्डर पर कच्चे लोहे और ऊंचे किस्म के स्टील की रगड़ से पैदा होने वाली आवाज ही अलग नहीं होती, बल्कि उनकी फुलझड़ियों की चमक भी अलग-अलग रंगत की होती है। ... एसेम्बली लाइन में जहां अलग-अलग स्टेज पर विभिन्न कलपुर्जे गाड़ियों की चेसिस में जुड़ते, वहां इलेक्ट्रिक शॉप के अपेक्षाकृत शांत वातावरण में विभिन्न प्रकार के बिजली उपकरणों का काम होता था। मशीनों का संगीत यहां भी था लेकिन मद्धिम सुर में। वह भले डायनामो की धूं-धूं हो या बीच-बीच में हॉर्न की पिपहरी। ... ढलाईघर का अपना विशेष आकर्षण था। लोहे की चौखटों में शीरे में गुंथी रेत के बीच लकड़ी के पैटर्न बिठाकर विभिन्न आकार में सांचे बनाए जाते और उन चौखटों में धातुओं को पिघलाकर डाल देने पर उन सांचों के आकार की वस्तुएं तैयार हो जातीं। धातुओं को पिघलते और तरल होकर पानी की तरह बहते देखना कम रोमांचक नहीं होता। विशेष रूप से तब, जब उस पिघले पदार्थ से सांचे के गर्भ में एक नई आकृति का जन्म हो रहा हो। धातु के ठंडा हो जाने पर चौखटों को खोलते हुए कारीगर को वैसी ही उत्सुकता होती है जैसे प्रसूतिगृह में किसी बच्चे के जन्म के समय मां को होती होगी क्योंकि इस प्रक्रिया में जरा सी असावधानी आकृति को विरूपित कर सकती है, हवा का प्रवेश आकृति के शरीर में छिद्र पैदा कर सकता है और अपर्याप्त तरल पदार्थ उसे विकलांग कर सकता है। ... वेल्डिंग शॉप से ही सटा हुआ लोहारखाना था जहां दसियों छोटी-बड़ी भट्टियों में आंच धधकती रहती और ठंडा काला लोहा गर्म होकर नारंगी रंग में बदल जाता। निहाई पर संड़सी की गिरफ्त में और घनों की लगातार चोटों के बीच लोहार द्वारा इधर-उधर घुमाए जाने के बाद वह लौह पिण्ड एक इच्छित आकार ले लेता। भारी घन चलाते हुए दो-दो लोहारों का क्रमश: एक ही लक्ष्य पर अचूक चोट करना और उन्हीं चोटों के बीच तीसरे व्यक्ति द्वारा लौह पिण्ड को अपनी इच्छानुसार संचालित करते देखना भी एक अनोखा अनुभव होता। इस लय-ताल में थोड़ा भी असंतुलन बहुत महंगा पड़ सकता है लेकिन यही कारीगरी है जो दर्शक को एक युगल-नृत्य का आभास कराती है।” (हमारा कोहिनूर, स्मृति में रहें वे, पृष्ठ 155-56)

इस ‘अद्भुत’ वातावरण में कहानीकार रोजी-रोटी के वास्ते ही पहुंचा था। और कोई विकल्प होता तो वह साहित्य से बहुत दूर की इस दुनिया को छोड़ने को तैयार भी था। प्रशिक्षण के लिए चयन के समय भरे गए बॉण्ड को तोड़ने की ऐवज में चुकाने के लिए चार हजार रुपए होने का सवाल ही न था। लिहाजा सुबह जल्दी तैयार होकर भागने, दिन भर कारखाने की नौकरी करने और देर शाम लौटने का यह सिलसिला जारी रहा। इसी के बीच समय निकालकर लेखन भी चलता रहा। जब भैरव जी के कहने पर कारखानों और मजदूरों के जीवन पर लिखना शुरू किया तो यह पूरा वातावरण उनके भीतर जीवंत हो उठा। दिल्ली में होटल वर्कर्स यूनियन के सानिध्य में जो वर्गीय चेतना प्रस्फुटित हुई थी, उसने मशीनों के पीछे के तेल-कालिख पुते चेहरों और दफ्तरों की कुर्सियों में धंसे गोरे-चमकदार चेहरों को पढ़ना सिखाया। यहीं उन्हें कथा-सूत्र मिलते गए और एक से एक चरित्र भी- “... तेल और कालिख से सने कपड़ों  में ऐसी विभूतियां छिपी थीं, जिन्होंने मेरी जिंदगी को नया ही अर्थ दे दिया। यह मेरा एक आत्मीय संसार  बन गया। हमारी रचनात्मकता, हमारे संघर्ष, हमारी खुशी और हमारा दर्द सब साझा था। यहीं मुझे  ‘उस्ताद’ मिले जो न चाहते हुए भी अंतिम क्षणों में अपने शागिर्द को काम का गुर सिखाने को मजबूर थे, यहीं हाथों की ‘बदबू’ में मैंने जिजीविषा की तलाश की। यहीं ईमानदार लेकिन ‘मेंटल’ करार दिए गए लोग थे, यहीं विरोध की चिंगारी लिए ‘जी हजूरिया; किस्म के लोग थे, यहीं ‘नौरंगी मिस्त्री’ था और यहीं मैंने श्यामलाल का ‘आशीर्वचन’ सुना और इन सबको अपनी कहानियों में अंकित कर पाया।” (“डांगरीवाले’ संग्रह की भूमिका, 1994)     

कारखानों, मिलों और उद्योगों में नौकरी और भी रचनाकारों ने की होगी। ये जीवनानुभव किसी लेखक की कीमती और विशेष पूंजी हो सकते हैं लेकिन इन्हें यादगार, प्रभावशाली एवं कालातीत कहानियों में ढालने के लिए जो कहानी कला, दृष्टि, शिल्प और भाषा का अनुशासन उन्होंने अपनाया, वही शेखर जोशी को विशिष्ट बनाता है। कारखानों के संगीत, सृजन के सौंदर्य, कामगारों के कठिन जीवन और शोषण के विरुद्ध उनके प्रतिरोध एवं संघर्ष को मुखर बनाने या कथा को स्वयं बोलने देने के लिए वे लगभग मौन या शांत भाषा, सहज-सरल शब्द और वैसा ही चुप्पा शिल्प चुनते हैं ताकि शब्दों के शोर या कहन की कलाबाजी में मूल कथ्य दब न जाए। यही कारण है कि उनकी कहानियां कोई चमत्कार पैदा नहीं करतीं, न ही चौंकाती हैं। वे धीरे-धीरे, अत्यंत सरल-साधारण अंदाज में खुलती हैं और पाठक के भीतर इस तरह चुपचाप पैठती जाती हैं कि उनका असर क्रमश: गहरा होता जाता है। उनकी कहानियां पढ़ते हुए अक्सर ही लगता है कि कहानी से लेखक गायब है या कहीं नेपथ्य से चुपचाप संचालन कर रहा है। इसीलिए संजीव कुमार ने उन्हें ‘दबे पांव चलने वाली कहानियों के सृजेता’ कहा है (‘शेखर जोशी की कहानियां’ संकलन की भूमिका, नेशनल बुक ट्रस्ट)

उनका रचना-समय स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात क्रमश: टूटते सपनों यानि मोहभंग का समय था। वह कल-कारखानों-मिलों के खुलने का समय था और ताकतवर मजदूर संगठनों के सक्रिय होने, आक्रामक आंदोलनों और हड़तालों का दौर भी। वाम दलों के श्रमिक संगठन काफी उग्र और देश भर में फैले हुए थे। लेकिन हम शेखर जोशी की कारखानों-कामगारों की कहानियों में इन संगठनों/आंदोलनों की नारेबाजी पाते हैं न हड़तालें। वहां न तो पर्याप्त वेतन, बोनस, काम के नियत घंटों एवं अन्य सुविधाओं की मांग के लिए आक्रामक भाषण हैं, न ट्रेड यूनियन नेताओं की राजनीति व आरोप-प्रत्यारोप, और न ही मालिकों के साथ उनकी साठगांठ या दलाली के बहु-प्रचलित किस्से। ‘क्रांति’ की बात तो छोड़िए, वे किसी ट्रेड यूनियन या रूटीन ‘गेट मीटिंग’ का जिक्र भी नहीं करते। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे इस सबसे आंख मूंद लेते हैं। वास्तव में उनकी कहानियों में मालिकों-प्रबंधकों की साजिशें व चालाकियां, मजदूरों के शोषण और उनके प्रतिरोध के स्वर इस तरह अन्तर्गुम्फित हैं कि वे बिना शोर-शराबे के, जैसा कि उनकी विशिष्ट शैली है, अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुए हैं। प्रतिरोध दर्ज़ करने की उनकी शैली कहानी को न नारेबाज बनाती है, न आरोपित, बल्कि उससे कहानी के तत्व और भी प्राणवान हो उठते हैं। उदाहरण के लिए हम यहां कुछ कहानियों की चर्चा करेंगे।

‘बदबू’ शेखर जी की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कहानियों में है। दिन भर कारखाने में मशीनों के साथ  काम करने वाले मजदूर छुट्टी के समय मिट्टीतेल से हाथों में लगी चिकनाई व कालिख छुड़ाते हैं और फिर साबुन से हाथ धोते हैं। ‘वह’ (पात्र का नाम नहीं है) नया आया है और परेशान है कि बार-बार साबुन से हाथ धोने के बाद भी मिट्टीतेल की बदबू जा नहीं रही। बाकी श्रमिक बताते हैं कि धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी। वे इसके अभ्यस्त हो चुके हैं। इसलिए उन्हें बदबू महसूस होना बंद हो गया है। एक दिन उसको लगता है कि उसे भी बदबू लगना बंद हो गया है। वह चिंतित हो उठता है और फिर से नाक के पास हाथ ले जाकर सूंघता है। उसे बड़ी राहत मिलती है कि उसे भ्रम हुआ था, बदबू अब भी आ रही है। बदबू का आते रहना मानवीय जिजीविषा का बचे रहना है। यह कहानी का प्राण है लेकिन जिजीविषा की प्रतीक यह बदबू वास्तव में है क्या?

कहानी पढ़ते हुए हमें पता चलता है कि मशीनों के साथ काम करते समय बीड़ी-सिगरेट पीना मना है। एक श्रमिक बुद्धन को साहब बीड़ी पीते देख लेते हैं। बचने के लिए वह जलती बीड़ी मुंह के अंदर धर लेता है। उसके साथी उसके करतब पर अचम्भित हैं और चुहल करते हैं। उधर चीफ साहब सभी मजदूरों को एक स्थान पर एकत्र कर बुद्धन की पोल खोलते हैं।

“साहब बोले, ‘कारखाने में इतनी कीमती चीजें पड़ी रहती हैं, किसी भी वक्त आग लग सकती है। एक आदमी की वजह से लाखों का नुकसान हो सकता है। हम ऐसी गलतियों पर कड़ी से कड़ी सजा दे सकते हैं।’ बुद्धन को कड़ी चेतावनी के साथ एक रुपए का दण्ड देने की साहब ने घोषणा कर दी। तभी भीड़ में से किसी ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘साहब, आग तो सभी की बीड़ी-सिगरेट से लग सकती है।’

“सैकड़ों विस्मित आंखें उस ओर उठ गईं जिधर से आवाज आई थी। साहब कुछ कहें, इससे पहले वही व्यक्ति बोला, ‘अफसर साहबान तो सारे कारखाने में मुंह में सिगरेट दाबे घूमते रहते हैं।’

“भीड़ में एक भयानक खामोशी छा गई। इस मुंहजोर नए आदमी की उद्दण्डता देखकर साहब का मुंह तमतमा उठा। बड़ी कठिनाई से उनके मुंह से निकला, ‘ठीक है, हम देखेंगे’ और जाते-जाते उन्होंने तीखी दृष्टि से उसकी ओर देखा जैसे उसकी मुखाकृति को अच्छी तरह पहचान लेने का प्रयत्न कर रहे हों।”

यह ‘मुंहजोरी’ नहीं, प्रतिरोध था और ठीक निशाने पर लगा था। फिर होता यह है कि “उस दिन छुट्टी के बाद लौटते हुए दो-तीन नौजवान उसके साथ हो लिए। प्रत्यक्ष रूप से किसी ने बीड़ी वाली घटना को लेकर उसकी सराहना नहीं की, यद्यपि उनके व्यवहार और उनकी बातों से उसे लगा जैसे उन्हें यह अच्छा लगा हो और वे उसके अधिक निकट आना चाहते हों। कटघरे से निकलकर एक नौजवान बुदबुदाया, ‘सालों को शक रहता है कि हम टांगों के साथ कुछ बांधे ले जा रहे हों, इसीलिए अब यह उछल-कूद का खेल कराने लगे हैं|’ (छुट्टी के समय मजदूरों को कूदते हुए गेट के बाहर जाना होता था।)

‘इनका बस चले तो ये गेट तक हमारी नगा साधुओं की-सी बारात बनाकर भेजा करें’, दूसरे ने उसकी बात का समर्थन किया।

‘खीर खाए बामणी, फांसी चढ़े शेख, नहीं देखा तो यहां आकर देख! छोटे साहब की गाड़ी के पिस्टन अंदर बदले गए हैं, खुद मैंने अपनी आंखों से देखा’, पहले वाले ने आवेश में आकर कहा।”

यह असर हुआ उस ‘सीनाजोरी’ का। मजदूरों में अपने हालात की चर्चा होने लगी और बात फैलती गई। स्वाभाविक ही उसकी शिकायत हुई और वह चीफ साहब के सामने पेश किया गया। साहब उसे बाल-बच्चों का हवाला देकर समझाते हैं कि ऐसी बातों में नहीं पड़ना चाहिए। वह जवाब देता है कि उसने ऐसा कोई खतरनाक काम नहीं किया। साहब उसे घेरते हैं कि कल रात उसके घर मीटिंग हुई थी या नहीं। वह कहता है, मीटिंग नहीं, दो-चार दोस्त मिलने आए थे। वह अब भी शांत बने रहने की कोशिश में है।

‘सुनो जवान! यार दोस्तों की महफिल में गप्पें होती हैं, ताश खेले जाते हैं, शराब पी जाती है लेकिन स्कीमें नहीं बनतीं।’ इस बार स्वर कुछ अधिक सधा हुआ था।

‘साहब, लोगों को मकान की परेशानी होती है, छुट्टियों का ठीक हिसाब नहीं, छोटी-छोटी बातों पर जुर्माना हो जाता है। यही बातें आपसे अर्ज़ करनी थीं। यही वहां भी सोच रहे थे।’

साहब घाघ हैं। वे आजमाया हुआ दांव चलते हैं-

“मैं कौन होता हूं, जो तुम लोग मुझसे यह कहने के लिए आते हो?  मैं भी तो भाई, तुम्हीं लोगों की तरह छोटा-मोटा नौकर हूं।” इस पर वह दृढ़ स्वर में कहता है- “तो जो हमारी बात सुनेगा उसी से कहेंगे साहब।”

एकाएक साहब बौखला कर कुर्सी पर उछल पड़े- ‘तुम बाहरी पार्टियों के एजेंट हो, ऐसे लोग ही हड़ताल करवाते हैं। मैं एक-एक को सीधा करबा दूंगा। मैं जानता हूं तुम्हारे गुट में कौन-कौन है। आइंदा ऐसी बातें मैं सुनना नहीं चाहता।” 

मजदूरों के परस्पर मेल-जोल, समस्याओं पर बातचीत और सवाल उठाने से प्रबंधक बहुत डरते हैं। उनकी नीतियों और चतुराई से मजदूर दबे रहते हैं। वे चुपचाप अपना काम करते हैं। वे अपनी स्थितियों के इतने आदी हो गए हैं कि उन्हें मिट्टीतेल से हाथ के बाद उसकी बदबू नहीं आती। लेकिन यह जो नया ‘वह’ आया है, जिसने साहब लोगों के कारखाने में खुलेआम सिगरेट पीने पर सवाल उठाया है, जिसने छुट्टियों का ठीक हिसाब नहीं रखने, जरा-जरा सी बात पर जुर्माना लगाने, वेतन से अकारण कटौती हो जाने, छुट्टी के समय उछल-उछलकर गेट से बाहर की अमानवीयता, आदि पर सवाल उठाया है, वह इस बदबू का अभ्यस्त नहीं होना चाहता। वह कहानी के अंत में डरता है कि कहीं वह भी इसका आदी तो नहीं हो गया! लेकिन नहीं, उसके हाथों से अब भी कैरोसीन की बदबू आ रही है।

यह बदबू नहीं, वास्तव में खुशबू है। वर्ग चेतना, शोषण के विरुद्ध सचेत-सतर्क होने की चेतना की खुशबू। यह बनी रही तो दूर तक जाएगी। तो, नारेबाजी, शोर-शराबे, गेट मीटिंग और ट्रेड यूनियन गतिविधियों का क्रांतिकारी शब्दों में बखान किए बिना कहानीकार मजदूरों के शोषण के विरुद्ध उनके साथ खड़ा नज़र आता है। कहानी मजदूरों में उस जागृति का विस्तार करती चलती है जो अंतत: उनके एक होने, आवाज उठाने और संघर्ष करने की ओर जाएगी। यह चेतना पाठक के मन में भी अमिट छाप छोड़ती है। यह शेखर जोशी का नायाब कौशल है कहानी कहने का कि अपनी बात भी पूरे प्रभाव से कह दी गई और कहानी के तत्व भी खिल-खिल उठे। कुछ भी आरोपित नहीं। बहुत सहज, याद रह जाने वाली कहानी। इसीलिए 60-65 साल बाद भी बहुत याद की जाती है।

‘सीढ़ियां’ कहानी में ‘टी ब्रेक’ के दौरान मजदूरों का एक जगह एकत्र होकर चाय पीते हुए बातचीत करना प्रबंधन को डराता रहता है। मैनेजमेण्ट की बैठक में इस पर चिंता व्यक्त की जा चुकी है कि एक साथ बैठकर वे कोई योजना न बनाने लगें। कहीं वे कोई यूनियन न बना लें और प्रबंधन के खिलाफ सक्रिय हो जाएं। मध्यम स्तर के अधिकारी की मार्फत उन्हें चाय के समय इकट्ठा न होने देने के लिए तरह-तरह के उपाय करवाए जाते हैं। हालांकि मजदूर कोई साजिश नहीं कर रहे, किसी आंदोलन की तैयारी नहीं कर रहे, लेकिन चूंकि प्रबंधन को पता है कि उनका शोषण हो रहा है और वे इसके खिलाफ उठ खड़े हो सकते हैं, इसलिए वह डरता रहता है।

“वे लोग बाहर चाय पी रहे हैं, किसी ऊंचे पत्थर या लकड़ी पर टिके हुए, जमीन पर पैर फैलाकर बैठे हुए, एक-दूसरे के कंधे पर टिके हुए। कोई बीड़ी या सिगरेट फूंक रहा है- उन्मुक्त, जमीन पर लेटकर। उन्हें लगा कि वे उनके चैम्बर की ओर ही घूर रहे हैं या कि उनकी चर्चा का केंद्र वही हैं। चाय का समय समाप्त हो जाने पर अलसाकर वे लोग उठेंगे और झुण्ड बनाकर धीरे-धीरे अपने काम पर लौटेंगे। उन्हें आशंका लगी रहती थी कि न जाने वे लोग ऐसे ही समय कोई नई योजना बना लें और एक-एक कर वह भीड़ उनके चैम्बर के गिर्द जमा हो जाए।”

ऐसी ही मौकों पर उस अधिकारी को वर्षों पहले देखी हिचकॉक की फिल्म ‘बर्ड्स’ याद आती है‌-

“किसी निर्जन टापू पर एक मकान में घिरे हुए कुछ लोग और मकान के बाहर रेलिंग पर असंख्य- असंख्य निरीह-सी दिखाई देने वाली चिड़ियां। फिर वे फुदक-फुदक कर मकान के निकट आने लगती हैं और अचानक ही वे आक्रामक हो उठती हैं और उन्होंने मकान को घेर लिया है। वे चिड़ियां कार की छत पर, हुड पर और खिड़कियों पर जमा हो गई हैं। इतना ही नहीं, बंद दरवाजों, खिड़कियों और रोशनदानों के शीशों पर अपनी चोंचों से बार-बार प्रहार कर रही हैं। कुछ चिड़ियां चिमनी की राह मकान में घुसने का प्रयत्न कर रही हैं। बार-बार चोंच की ठोकर खाकर कुछ शीशे टूट गए हैं और चिड़ियों का एक रेला क्षत-विक्षत होकर कमरों में घुस गया है। हजारों-हजार चिड़ियां घर के अंदर फड़फड़ा रही हैं और लोग अपनी सुरक्षा के लिए बेतहाशा भाग रहे हैं...।”

इस कथा में जो मध्यम श्रेणी का मैनेजर है, उसकी जड़ें मजदूरों में ही हैं। उसका बाप गांव-जवार का माना हुआ तरखान था लेकिन अब उसका वर्ग बदल गया है। इसीलिए जब उसने मजदूरों से अपनी काम की जगह पर ही चाय पीने को कहा और मजदूरों ने भोलेपन से जवाब दिया कि- ‘यहां खुले में चाय पीना अच्छा लगता है, साहब!’ तो उसके मुंह से निकला था- ‘मुझे मालूम नहीं था कि तुम्हें नाली में रहना ही अच्छा लगता है।’ इस अपमानजनक बात से मजदूरों में असंतोष फैलाना स्वाभाविक था, हालांकि वह चुपके और धीमे-धीमे ही व्यक्त होता रहा। उसे लगता है कि उससे गलती हो गई है। इसलिए वह अपने केबिन की सीढ़ियां उतरकर मजदूरों के बीच जाकर अपने कहे की सफाई देने की सोचता रहता है, उनकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह जो वर्ग चरित्र है, उसी की प्रतीक वे सीढ़ियां हैं, जो उसे और मजदूरों को अलग करती हैं। वह सीढ़ियां नहीं उतर पाता।  

‘मेण्टल’ एक ऐसे पुराने सीधे, सरल, समर्पित और हुनरमंद कारीगर की कथा है जो निर्देश मिलने पर अपने निर्धारित काम के अलावा कारखाने के ही सामान से साहबों के घरेलू इस्तेमाल के लिए तरह-तरह की खूबसूरत चीजें बनाकर देता है। कारीगर जानते हैं कि साहब लोग यह चोरी से करते हैं लेकिन कुछ कहते न थे। बल्कि, उस बेगार के काम की तारीफ अफसर और उनके घरवाले करते तो उन्हें अपने हुनर पर गर्व ही होता था। उनमें अपने अधिकारों की या संघर्ष के लिए कोई चेतना नहीं है लेकिन अपने काम के प्रति गौरव-बोध और आत्मसम्मान तो है ही। एक दिन छोटे साहब के साथ कारखाने का दौरा करने आए बी ओ साहब उस हुनरमंद भोले कारीगर को छेड़ बैठे-

‘यहां बैठे-बैठे क्या कर रहे हो?’ उन्होंने उसे टोका।

‘साहब एक औजार की जरूरत पड़ गई थी, वही लेने आया था।’ वह बोला।

‘नहीं-नहीं, मुझे देखकर तुम औजार का बहाना बना रहे हो। तुम जरूर रोटी खाने आए थे। वह डिब्बा यहां क्यों रखा है?’ उन्होंने अपने मजाकिया मूड में रौब दिखाया होगा।

‘साहब मैं तो रोज ही घर से खाना खाकर आता हूं। इतने साल हो गए कभी यहां खाना लेकर नहीं आया। यह किसी दूसरे का डिब्बा है।’ उसने सफाई दी। 

‘तो इसका मतलब है कि डिब्बा ही नहीं, यह टूलकिट भी किसी और का है। तुम उसका औज़ार चुरा रहे थे।’ साहब ने अपनी तबदीली की खुशी में एक और रद्दा जमाया। उसे मालूम होना चाहिए था कि साहब अपनी खुशी जाहिर करने के लिए यह मजाक कर रहे हैं लेकिन न मालूम छोटे अफसर की हंसी देखकर उसे गलतफहमी हुई या क्या हुआ कि हमेशा का चुप्पा, सीधा-साधा हमारा साथी जवाबदेही पर उतारू हो गया।

‘आपने मुझे चोर कैसे कहा साहब?’ वह हकलाने लगा।

‘आपने मुझे चोर कहा?’

‘मैं चोर हूं?’

हम लोग गुल-गपाड़ा सुनकर बीच-बचाव करने की सोच ही रहे थे कि वह भागा-भागा मोचीखाने से एक थैला उठा लाया। यह बी ओ साहब के स्कूटर के लिए बन रहा रैक्सीन का थैला था। उसे हवा में नचाता, वह बी ओ साहब के पीछे-पीछे दौड़ता हुआ चिल्लाने लगा-

‘चोर मैं हूं कि आप हैं? यह थैला मेरा बन रहा है कि आपका?’

कहानी की शुरुआत इस हुनरमंद साथी के ‘मेण्टल’ हो जाने से होती है जिसका कारण यही घटना है जो कहानी के अंतिम दृश्य में खुलती है। इस कहानी में शेखर जोशी जी की बहुत जानी-पहचानी कथा-प्रविधि प्रयुक्त हुई है यानी व्यंग्य। हलके व्यंगात्मक पुट लिए कहानी अफसरों के भ्रष्टाचार और श्रमिकों के भीतर पलता चुप्पा आक्रोश बहुत प्रभावी ढंग से चित्रित करती है। पाठक यह भी जान जाते हैं कि श्रमिक अपने उस साथी की चीख को उसके आक्रोश का विस्फोट न समझकर उसका पागल हो जाना मानते हैं (या ऐसा दिखाते हैं) किंतु इस सम्बोधन को तनिक शालीन बनाने के लिए उसे ‘मेंटल’ कहते हैं। और, जब डॉक्टर उस साथी की जांच के बाद उसे स्वस्थ घोषित करते हैं, तो कहानी इस तरह खत्म होती है कि “ऐसे मरीज को डाक्टर ड्यूटी के लिए फिट कर दे, क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है?”     

यह व्यंग्य है, मजदूरों का अपने पर भी और व्यवस्था पर भी। पाठक के भीतर तो वह चुभता ही है।

‘जी हजूरिया’ बहुत चापलूस एक श्रमिक की कहानी है। प्रबंधकों को खुश रखने का कोई अवसर वह नहीं छोड़ता। चापलूसी की अति के कारण ही उसका नाम ‘जी हजूरिया’ पड़ गया है। कारखाने के रोजमर्रा काम-काज, उत्पीड़न के किस्सों और हंसी-मजाक के बीच कहानी चलती है। तभी अत्यंत गरीब एक कारीगर की मौत हो जाती है। उसके परिवार के पास अंतिम संस्कार के लिए भी कुछ नहीं है। श्रमिक प्रबंधक से निवेदन करते हैं कि वेलफेयर फण्ड या कैंटीन फण्ड से ही कुछ रकम दे दी जाए। साहब टालते हैं, असमर्थता जताते हैं। श्रमिकों में आक्रोश है लेकिन कुछ कह नहीं पाते। उनके बीच जी हजूरिया भी खड़ा सब सुन रहा है।

“जाते-जाते साहब फिर बोले- ‘हमें तो जैसे नियम-कानून हैं, वैसे ही चलना पड़ेगा। आप लोग चंदा कर लीजिए, चार-आठ आना भी एक आदमी दे तो बहुत हो जाएगा। बल्कि मैं तो कहूंगा, आप लोगों को हर महीने कुछ न कुछ चंदा करके जोड़ रखना चाहिए। कब किसके लिए जरूरत पड़ जाए, क्यों गलत कह रहा हूं?’

जी हजूरिया इस बार अपना आक्रोश नहीं सम्हाल पाया। खंखार कर बोला, ‘आप जानकार आदमी हैं हुजूर,  आप कुछ गलत थोड़े न कहेंगे। भला किताबी कानून के आगे हम मनई की जान की क्या औकात।’

कहानी का जो मर्म है, वह यहां नहीं है। असल कथा यह है कि चापलूसी के लिए कुख्यात जी हजूरिया  की बात बाकी श्रमिक ठीक से सुन नहीं पाए। वे यही समझे कि इस बार भी उसने चापलूसी की कोई  गहरी बात ही कही होगी और उसे घृणा से देखते रहे।    

ऐसा ही मासूम प्रतिरोध ‘हेड मासिंजर मंटू’ में भी है। मंटू बहुत चुस्त, मेहनती लेकिन खुद्दार चपरासी है। उसके सेवा भाव और स्मार्टनेस के किस्से मशहूर हैं। उसकी खुद्दारी यह है कि “दूसरे चपरासियों की तरह हाथ का कौर हाथ में और मुंह का कौर मुंह में छोड़कर लंच टाइम में मंटू बड़े बाबू की पुकार पर हाजिर नहीं हो जाता।” उसका प्रसिद्ध डायलॉग है- “ब्लडी मंटू मासिंजर- लंच टाइम, प्राइबिट टाइम। सरकारी टाइम, सरकारी काम। मंटू बोलेगा- यस सर, अटींसन मंटू हाजिर।” एक दिन साहब की मेज से उनका कलम गायब हो गया। इस बारे में मण्टू से एकाधिक बार पूछताछ हो गई तो उसका अहम आहत हो गया- “दस साल की नौकरी में हमने कभी एक पाई इधर-उधर नहीं किया। चटर्जी साहब, जेम्स साहब का कीमती चीज दफ्तर में पड़ा रहता था लेकिन हमने कभी कोई चीज नहीं छुआ। ब्लडी चार पैसे की कलम के लिए साला हमारा बदनामी होता है।” और, मंटू ने अपना विरोध कैसे व्यक्त किया? उसने अगली सुबह मैनेजर साहब का अपमान करने के लिए उन्हें सलाम नहीं किया, जिसे साहब ने नोटिस भी नहीं किया होगा। साहब को रोज की तरह सलाम न करके मंटू की खुद्दारी और प्रतिरोधी चेतना कितनी खूसूरती से बयान हो गई! तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार संक्रमण की तरह रिस-रिस कर कैसे नीचे तक पहुंचता है, यह बताने के लिए ‘नौरंगी बीमार है’ कहानी का रोचक वितान ताना गया है। कारखाने में वेतन वितरण के दिन साहब की गलती से दो सौ रु किसी को अधिक दे दिए गए। शक ही है कि वे नौरंगी को मिले और वह छुपा गया। वैसे, नौरंगी की ईमानदारी असंदिग्ध है। उससे तरह-तरह से पूछताछ होती है। सुराग लेने के लिए उसके साथियों को उसके घर भी भेजा जाता है। नौरंगी के व्यवहार से भी उस पर शक गहराता जाता है। उसका बीमार होना और छुट्टी पर जाना सन्देह को और गहरा कर देता है। नौरंगी अपनी ओर उठती निगाहों से परेशान भी है। पूछताछ और साथियों के छेद-भेद लेने के क्रम में वह कारखाने के अफसरों के भ्रष्टाचार के इतने किस्से सुनता है कि उसे दो सौ रु हड़प जाना बहुत सामान्य लगने लगता है। यह अहसास होते ही वह एक सुबह काम पर हाजिर हो जाता है- “चुस्त-दुरस्त! जैसे इस बीच कुछ हुआ ही न हो। वह सीना ताने शॉप में घुसा और अपने ठीये पर पहुंच गया।” कहानीकार अपनी तरफ से कुछ नहीं बताता कि वे दौ सौ रु नौरंगी को ही मिले या नहीं लेकिन स्थितियां और शीर्षक यही संकेत करते हैं। शेखर जी अक्सर अपनी कहानियों में निष्कर्ष पाठकों के विवेक पर भी छोड़ देते हैं।

शेखर जोशी जी की कथाओं के मजदूर क्रांतिकारी नहीं है, ‘जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा’ जैसे नारे वे नहीं लगाते, भाषण नहीं देते, फैक्ट्री बंद नहीं कराते, तीखी बहस नहीं करते, सैद्धांतिक वाम वैचारिकता उनमें नहीं दिखती। वे सीधे-सरल, आम देहाती-शहरी, ईमानदार मेहनतकश हैं। उन्हें शोषण-उत्पीड़न का विस्तृत जाल नहीं पता लेकिन वे जानते हैं कि उनके साथ अन्याय होता है और प्रबंधक लोग भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। वे यदा-कदा या किसी घटना के समय अपने साथ होने वाले अन्याय और साहबों की ज्यादती की बातें करते हैं, कभी नाराजगी भी दिखाते हैं लेकिन कोई संगठन नहीं बनाते। इसे आश्चर्य की तरह कहा या पूछा जा सकता है कि जिस दौरान वे लिख रहे थे तब देश भर में उग्र ट्रेड यूनियनों और हड़तालों का दौर था, तो भी उनकी कहानियों में ट्रेड यूनियन, हड़ताल या गेट मीटिंगों का जिक्र भी नहीं मिलता। इसका एक ही उत्तर हो सकता है कि वाम विचार, प्रगतिशील मूल्यों और वर्ग चेतना के प्रति सजग कथाकार होने के बावजूद वे ‘दुनिया के मजदूरो एक हो’ जैसे आंदोलन या क्रांति जैसा कुछ भी आरोपित नहीं करते। उनके यहां वर्ग चेतना और प्रतिरोध की लहर कथा प्रसंगों में अंतर्धारा की तरह चुपचाप बहती है। एक बार उनसे यह सवाल पूछा भी गया था, जिसके जवाब में उन्होंने कहा था- “मैं स्वीकार करता हूं कि उद्योग जगत में ट्रेड यूनियनों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है और एक जमाने में मजदूर संगठनों में बहुत मिलिटेंसी थी। अगर आपने मेरी आशीर्वचन, सीढ़ियां, बदबू, आदि कहानियां पढ़ी हों तो उन संघर्षों की थोड़ी झलक आपको मिल जाएगी। ये जरूर है कि फार्मूले के तौर पर लिखी गई कहानियां मेरे यहां नहीं हैं।” (शेखर जोशी से मुरलीधर सिंह की बातचीत, अनहद, जनवरी 2014)

फॉर्मूले के तौर पर नहीं लिखना ही शेखर जोशी की ताकत है। कई बार उनके मजदूर क्रांति विरोधी ठहरते हैं। निम्न और निम्न-मध्य वर्गीय इन श्रमिकों में वे सारी मानवीय कमजोरियां हैं जो वास्तव में होती हैं लेकिन वे अपने काम को और हुनर को प्यार करते हैं, उनमें आत्मसम्मान कूट-कूटकर भरा है। वे अपनी डांगरी से बहुत प्यार करते हैं। डांगरी का जिक्र कई कहानियों में बड़े लाड़ एवं गर्व के साथ आता है- “कपड़ों की बचत के लिए मोटे-झोटे वस्त्रों के ऊपर ड्यूटी जाते हुए डांगरी डाल लेते जो उनके अनुसार सरकारी वर्दी थी। जैसे पुलिस की होती है, मिलिट्री के सिपाही की होती है, जिससे उसकी पहचान बनती है।” इसीलिए जब परमेश्वर के बेटे ने ‘बाबू के डांगरी वाले साथियों’ पर कुछ तंज कर दिया तो बात उसके मन में गहरे गड़ जाती है (‘डांगरीवाले’)

शेखर जोशी ने अपने कामगार साथियों से प्यार किया, उन्हें सम्मान दिया और सम्मान पाया। इसीलिए वे उनके जीवन में बहुत गहराई से झांक सके और उसे कहानियों में उकेर सके। ‘उस्ताद’ कहानी लिखना क्या इस आत्मीय रिश्ते के बिना सम्भव होता? 1988 में जब उन्होंने समय से पहले अवकाश ग्रहण कर लिया तो भी अपना कारखाना और साथ के लोग बहुत याद आते रहे। इसी स्मृति से जन्मी ‘आशीर्वचन’ कहानी जो बहुत खूबसूरती और सादगी से कारखाने के बदलते जीवन, श्रम और शिल्प की कद्र, आत्मसंतोष, कारखाने के बदलते माहौल और संघर्ष की परम्परा को रेखांकित करती है। वे स्मृतियां आज भी उनमें गहरे बसी हैं और अक्सर उन दिनों का और उन लोगों का जिक्र करते हैं। ‘आशीर्वचन’ की रचना प्रक्रिया के बारे में उन्होंने लिखा है- “अवकाश ग्रहण करने के बाद लगा कि मैं औद्योगिक परिवेश को कितना मिस कर रहा हूं। वहां जो आत्मीत सम्बंध थे, वे रक्त सम्बंध से अधिक थे। वहां काम करने वालों के सम्बंध पारिवारिक संबंधों जैसे हो गए थे।...मेरी पीढ़ी का हर आदमी जो कारखाने में काम करता था, श्यामलाल है। ... कारीगर एक तरह का रचनाकार होता है। नौकरी से विदा का दिन है। एक तरह से उसके सृजनात्मक जीवन में विराम है। मशीनी माहौल में भी रचनात्मकता है। वहां से हटना सृजनात्मकता से हटना है।” अभी चंद वर्ष पहले कारखाने की गहन स्मृतियों ने उनसे ‘विश्वकर्मा पूजा’ शीर्षक से एक काव्य-रिपोर्ताज लिखवा लिया (2017 में ‘पहल’ में प्रकाशित) जिसमें सभी धर्मों-जातियों के श्रमिकों द्वारा विश्वकर्मा पूजा मनाए जाने का रोचक-मार्मिक विवरण दर्ज हुआ है।

पचास-साठ साल पहले लिखी गई कहानियों के लिए शेखर जोशी आज भी ससम्मान याद किए जाते हैं। उनकी अंतिम कहानी ‘छोटे शहर के बड़े लोग’ को लिखे हुए करीब तीस वर्ष हो गए। इतनी अवधि में अधिकतर कथाकार भुला दिए जाते हैं लेकिन शेखर जी की कहानियां आज भी बहुत उद्धृत की जाती हैं। श्रमिकों, कारखानों और औद्योगिक स्थितियों में तबसे बहुत उलटफेर हो गया है। तो भी उनकी कहानियां प्रासंगिक बनी हुई हैं। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। हिंदी में ऐसा बहुत कम लेखकों के साथ हुआ है।             

शेखर जी ने 10 सितंबर 2022 को 91वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है। एक लाइलाज बीमारी से आंखों की रोशनी क्षीण हो जाने के बावजूद वे अंगुलियों के सहारे से कलम चलाकर छोटे-छोटे किस्से और कविताएं लिख लेते हैं। आकारवर्धक शीशे की सहायता से थोड़ा-थोड़ा पढ़ते भी हैं। ‘आकाशवाणी’ सुनकर समाचारों से भी अद्यतन रहते हैं। इस कामना के साथ कि वे रचनारत रहते हुए अपनी जन्म शताब्दी मनाएं, उनकी लेखकीय जिजीविषा को सलाम। 

-नवीन जोशी 

(‘आजकल’ पत्रिका के सितम्बर, 2022 अंक में प्रकाशित लेख का तनिक सम्पादित रूप)              

                        

Monday, August 22, 2022

और भी जीवित हुआ है गिर्दा

आज शाम, बल्कि कुछ देर पहले ही 'म्योर पहाड़-म्येरि पछ्याण' ग्रुप में नई-पुरानी पीढ़ी को गिर्दा को याद करते हुए सुनना उत्तराखंडी समाज में गिर्दा की धड़कन को अनुभव करना था। सबने गिर्दा को अपने-अपने ढंग से याद किया। अधिकतर ने उनकी कविताएं-गीत-गजल सुनाए। गिर्दा कुमाउनी की खसपर्जिया शैली में लिखता बोलता था। आज वह कभी पछाईं में बोल रहा था, कभी सोर्याली में गुनगुना रहा था, कभी जोहारी लटक के साथ आंदोलित हो रहा था। इनमें कुछ गिर्दा के साथ के लोग थे और कुछ ने उन्हें देखा भी नहीं था लेकिन वे उसे ऐसे याद कर रहे थे जैसे कि वर्षों उसके साथ रहे हों। याद करने वालों से जाने-अनजाने उसके कुछ शब्द बदल गए थे, कुछ शब्दों ने दूसरी उप-बोलियों में नया रूप धर लिया था, लेकिन भाव वही थे, तेवर वही थे, भंगिमाएं वही थीं। कुछ ने गीतों को गिर्दा की अपनी धुनों में गाने की कोशिश की, कुछ ने धुन बदलने के प्रयोग किए और कुछ आंतरिक जोश में बेसुरे भी गाते गए। सच बात यह है कि गिर्दा की स्मृतियों में उनके लिए संगीत महत्त्वपूर्ण नहीं था, सुर-ताल का अर्थ नहीं था , अर्थ था गिर्दा के होने और कई-कई पीढ़ियों के मानस में उसके रच-बस जाने का। यह बड़ी बात है।

हम जानते हैं कि गिर्दा की स्मृतियां और उसका लिखा-गाया-बोला लोगों को याद है और याद रखा जाता रहेगा लेकिन आज शाम की चर्चा ने साबित किया कि वह अपने शारीरिक रूप से न होने के इन बारह वर्षों में उत्तराखण्ड के जन-मानस में और गहरे जीवित हुआ है। उसकी स्मृतियां प्राणवान हैं और प्रेरित कर रही हैं। समाज के इस अंधेरे समय में यह एक मशाल की तरह है। यह सवाल अलबत्ता बना रहेगा कि गिर्दा की इन स्मृतियों के साथ क्या उसकी सामाजिक-राजनैतिक चेतना भी जन मानस में पैठ बना रही है जो "जैंता एक दिन त आलो उ दिन यो दुनी में" के लिए अत्यावश्यक है?
-न जो, 22 अगस्त, 2022, 21.53

Sunday, August 21, 2022

अगला आंदोलन अधिक परिपक्व साबित होगा- गिर्दा

‘यार पुष्कर, तू तो दूर देश का प्राणी जैसा हो गया,’ एक दिन गिर्दा का फोन आया - ‘आ जा, कोसी का घटवार के इलाके में चलेंगे, माठू-माठ।’

पुष्कर ‘नदी बचाओ आंदोलन’ में शामिल होने उत्साह से गया। सूखती कोसी नदी के किनारे-किनारे नदियों, झीलों और हिमालय को बचाने की अपील करती, जन जागरण करती, गीत गाती यात्रियों की टोली में शामिल होकर वह तरोताज़ा हो गया। गिर्दा का साथ उसे वैसे भी ऊर्जा से भर देता था। काफी समय से उनकी सेहत ठीक नहीं चल रही थी। फिर भी यात्रा में आए और सदा की तरह एक गीत के साथ- ‘मेरि कोसि हरै गे कोसि’ यानी 'मेरी कोसी खो गई है, कोसी!' यात्रा के दौरान गिर्दा से उसकी खूब बातें हुईं। उत्तराखण्ड के हालात से गिर्दा कम व्यथित नहीं थे लेकिन निराशा उनके पास फटक नहीं सकती थी।

आंदोलनकारी संगठनों के बिखराव, टूटन, अधकचरी राजनैतिक तैयारी, जन-विरोधी ताकतों के निरंतर मजबूत होने और जल-जंगल-जमीन की बढ़ती लूट पर पुष्कर की उदासी के संदर्भ में गिर्दा ने कहा- ‘हां भुला, संगठनों में भटकाव है, ठहराव है। बहुत सी धाराएं-उपधाराएं पैदा हो गई हैं। सही धारा को समझना-पकड़ना मुश्किल हो रहा है... लेकिन, एक बात बताऊं पुष्कर तुझे, एक और आंदोलन इस समय उत्तराखंड के गर्भ में पल रहा है। जो हालात हैं, पक्का है कि अगला आंदोलन अधिक परिपक्व साबित होगा। जनता एक कदम और आगे बढ़ेगी। अभी बड़े धैर्य की आवश्यकता है।’

पैदल चलते, थकते-हांफते गिर्दा के बीमार चेहरे पर उस भावी परिपक्व आंदोलन की चमक दिखाई दी।उसकी कौंध पुष्कर के भीतर भी पहुंची थी। 

(अपने ताज़ा उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' का एक अंश गिर्दा की याद में)  



Wednesday, July 27, 2022

कम से कम आदिवासियों के मुद्दे केंद्र में तो आए

 ओड़िसा के मयूरभंज जिले की संथाल (आदिवासी) महिला द्रौपदी मुर्मु भारतीय गणतंत्र की पंद्रहवी राष्ट्रपति बन गई हैं। इस सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठनेवाली वे पहली आदिवासी और दूसरी महिला हैं। उनके निर्वाचन को भारत के आदिवासियों की अस्मिता और मुख्यधारा में उनकी मान्यता से जोड़कर देखा जा रहा है। एनडीए ने भी उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाते समय उनकी आदिवासी पहचान को ही सामने रखा। उनके आदिवासी होने के कारण मध्य प्रदेश, ओड़िसा, महाराष्ट्र, झारखण्ड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों समेत कई अन्य प्रदेशों से भी विपक्ष के वोट उन्हें मिले। विपक्षी खेमा सतर्क था कि उनके विरोध को आदिवासियों के वीरोध के रूप में न देखा जाए। स्वयं द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद अपने संबोधन की शुरुआत ‘जोहार’  से की, जो कि आदिवासियों का स्वागत-सम्बोधन है। मूल रूप में आदिवासी, जिनका पूरा जीवन वनों पर निर्भर रहा है, जंगल में घास-लकड़ी, आदि काटते हुए ‘जोहार’ बोलते हैं। अब यह ‘प्रणाम’ के अर्थ में अधिक प्रयुक्त होता है, खैर।

द्रौपदी मुर्मु के राष्ट्रपति बनने के साथ ही देश के आदिवासियों और उनके हालात की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक ही है। मीडिया में नए राष्ट्रपति की आदिवासियों मूल की चर्चा खूब हो रही है। आदिवासियों के लिए भी यह गर्व की बात है। अपनी इस गर्वीली पहचान को स्वयं नई राष्ट्रपति ने भी स्वीकार किया और ‘जोहार’ से अपना भाषण शुरू करते हुए वे यह कहना नहीं भूलीं कि “मैं आदिवासी परिवार में पैदा हुई, जो कि हजारों साल से प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर जीवन यापन करते आए हैं। मैंने वनों और जल-संसाधनों का महत्व समझा है। हम (आदिवासी) प्रकृति से आवश्यक संसाधन जुटाते हैं और उतने ही सम्मान से प्रकृति की सेवा करते हैं। यह संवेदनशीलता आज पूरे विश्व के लिए आवश्यक हो गई है।” उन्होंने आदिवासी कवि भीम भोई की पंक्तियां भी उद्धृत कीं।

आदिवासी इस धरती के या क्षेत्र विशेष के मूल निवासी माने जाते हैं- जो ‘आदि’ यानी बिल्कुल शुरुआत से यहां रह रहे हैं। विडम्बना ही है कि पूरी दुनिया में आज वे वंचित समुदायों में शामिल हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों में आदिवासी निवास करते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत आदिवासी हैं। कुल संख्या 10 करोड़ 42 लाख 81 हजार चौंतीस है। जनगणना के अनुसार भारत में सबसे अधिक आदिवासी मध्य प्रदेश (14.7%) में हैं। उसके बाद ओड़िसा (9.2%), महाराष्ट्र (10.1%), राजस्थान (8.8%), गुजरात (8.5%), झारखण्ड (8.3%) और पश्चिम बंगाल (5.1%) का नम्बर है। बाकी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में इनकी संख्या पांच प्रतिशत से नीचे है। उत्तर प्रदेश में ये मात्र 1.1% और उत्तराखण्ड में केवल 0.3% प्रतिशत हैं। ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि यह संख्या वास्तविक अर्थों में ‘आदिवासियों’ की नहीं है। यह आंकड़े उनके हैं जिन्हें भारतीय संविधान ‘अनुसूचित जनजाति’ मानता है। इन सूचिबद्ध जनजातियों में ज़्यादातर वास्तविक आदिवासी ही हैं लेकिन सभी नहीं। कई राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक कारणों से ऐसी जातियों को भी अनुसूचित जनजाति में शामिल कर दिया गया है जो वास्तविक रूप में आदिवासी नहीं हैं, जबकि कुछ मूल आदिवासी इसमें शामिल होने से वंचित रह गए हैं।

सामान्य तौर पर यही माना जाता है कि उन्नत और प्रभावशाली आर्यों के भारत आने से पहले यही लोग यहां रहते थे। आम तौर पर इनका निवास जंगलों में था और भोजन (फल, कंदमूल, शिकार, आदि) तथा आवास (कंदराएं) के लिए ये जंगलों पर ही निर्भर थे। वनों के अलावा नदियां इनका मुख्य जीवन-आधार थीं। घुमंतू जीवन शैली वाले आदिवासियों ने बस्तियां बसाकर रहना और खेती करना बाद में सीखा। इनके धर्म, ईश्वर और संस्कृति बहुत भिन्न और मूलत: प्रकृति-आधारित रहे। आज भी ये प्रकृति-पूजक ही हैं। विभिन्न भागों के आदिवासी सब एक से नहीं हैं। उनकी बोलियां और रीति-रिवाज फर्क हैं लेकिन हैं वे सभी मूलत: प्रकृति पर निर्भर और उसे पूजने वाले समाज हैं। उनका समाज, या कबीले, एक परिवार की तरह रहते हैं। कबीले की अपनी शासन-व्यवस्था होती है और वे एक तरह से आत्मनिर्भर होते हैं। कबीले परिवार केंद्रित होने की बजाय समाज-केंद्रित होते हैं। मुखिया ही कबीले का पालनहार और रखवाला होता है। उनके जीवन में अर्थ यानी धन की कोई जगह नहीं होती। प्रकृति ही उनका धन-धान्य है। बाहर की दुनिया से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। उनके कबीलों में सभी बराबर होते हैं। हिंदू समाज की तरह कोई भेदभाव या जातीय छुआ-छूत नहीं बरती जाती। स्त्री का स्थान बहुत सम्मानजनक होता है। वह पुरुषों की दासी की तरह नहीं रहती। उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है और विवाह में भी उसकी मर्जी चलती है। कई आदिवासी समाज मातृसत्तात्मक होते थे, जहां स्त्री की सत्ता चला करती थी। समय के साथ उनमें बहुत बदलाव आए हैं लेकिन आज भी उनका समाज ह्मारे हिंदू समाज-व्यवस्था से बहुत भिन्न है। वे अपने को हिन्दू मानते भी नहीं। यह अलग बात है कि जैसे-जैसे आदिवासी मुख्य धारा में शामिल होते गए या उसके सम्पर्क में आते गए, उनमें उसके प्रभाव आते गए।  

आर्यों ने भारत में अपना प्रभुत्त्व जमाने के साथ ही भोले-भाले आदिवासियों को अपना दास बनाया, उन्हें उनके इलाकों से खदेड़ा और उन्हें शिक्षा तथा सनसाधनों से दूर ही रखा। अंग्रेजों के आगमन के बाद जब वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होने लगा तब आदिवासियों का जीवन-आधार तेजी से छिनता और सिकुड़ता गया। 1864, 1878 और 1927 के वन कानूनों ने उन्हें विभिन्न क्षेत्रों के वनों से उजाड़ दिया। कई इलाकों में आदिवासियों ने विद्रोह किया और अंग्रेजों से लड़े। मुण्डाओं, भीलों, गोंडों, संथालों, आदि आदिवासियों के कई लम्बे और उग्र विद्रोह इतिहास में दर्ज़ हैं।

देश की स्वतंत्रता के बाद यद्यपि संविधान और नई शासन व्यवस्था ने आदिवासियों का अस्तित्व स्वीकार किया और उन्हें कुछ रियायतें (जैसे आरक्षण) दीं लेकिन विकास योजनाओं के नाम पर उनके प्राकृतिक संसाधान लगातार छिनते रहे। कभी बड़े बांधों के लिए, कभी पर्यटन केंद्रों के विकास और वन-विहारों एवं अभयारण्यों के नाम पर उन्हें उनके परम्परागत इलाकों से खदेड़ा गया और कभी उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने के नाम पर। तमाम कीमती वन-सम्पदा और खनिज उन्हीं जंगलों, पहाड़ों और नदी घाटियों में हैं जहां आदिवासी रहते थे। ‘मायनॉरिटी ग्रुप इंटरनेशनल’ के एक अध्ययन के अनुसार भारत की 90 प्रतिशत कोयला खानें, 72 प्रतिशत वन और 80 प्रतिशत खनिज पदार्थ आदिवासी भूमि पर पाए जाते हैं। स्वाभाविक ही विकास परियोजनाओं की सर्वाधिक मार आदिवासियों पर पड़ी। खनन के नाम पर और शहरीकरण के लिए भी उनकी जमीनें छिनती गईं और आज भी छीनी जा रही हैं। विस्थापन तेज हुआ लेकिन पुनर्वास उपेक्षित रहा। नतीजा यह हुआ कि आदिवासी सिकुड़ते और सीमित होते गए। जनजातीय आरक्षण के सहारे कई आदिवासी समाज पढ़ाई-लिखाई और नौकरियों के रास्ते देश की मुख्य धारा में शामिल हुए लेकिन इस प्रक्रिया में अपनी पहचान और संस्कृति खोते गए। वनों और नदियों से दूर होते जाने के कारण उनकी पूरी जीवन शैली बदलती गई। कतिपय आदिवासी समाज आज भी बचे-खुचे जंगलों में अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश में लगे हैं लेकिन उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। जैसे, अंडमान निकोबार के जारवा आदिवासी, जिनकी संख्या अब दहाई में ही रह गई है। उत्तराखण्ड के वनराजि या वनरावत भी चंद सैकड़ा संख्या में रह गए हैं।

माना जाता है कि देश के उत्तर-पूर्व का क्षेत्र आर्यों के प्रभाव से मुक्त रहा, इसलिए वहां आदिवासी अधिक स्वतंत्र और शक्तिशाली बने रहे। आज भी असम, अरूणाचल, नगालैण्ड, मिजोरम समेत समस्त उत्तर-पूर्वी राज्यों में विभिन्न आदिवासी समूह राजनीतिक-आर्थिक रूप से काफी संगठित और प्रभावशाली हैं। इन राज्यों में उनकी पहचान कायम है, वे चुनाव परिणामों को भी प्रभावित करते हैं और कई बार अपनी ताकत के बल पर सरकारों से बातचीत और समझौता करने की स्थिति में होते हैं। इसीलिए यहां की मिजो, नगा, कुकी, गारो, खासी, बोडो, आदि कई जनजातियों की चर्चा न केवल आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए बल्कि, राजनीतिक कारणों से भी अक्सर सुनाई देती है।

उत्तर प्रदेश में 1967 में सिर्फ थारू, बुक्सा, भोटिया-सौका, जौनसारी और वनराजियों को ही आदिवासी यानी जनजातियों में शामिल किया गया था। बाद में मिर्जापुर, चंदौली, कुशीनगर, संतकबीरनगर, भदोही और बुंदेलखण्ड की कुछ जातियों को भी यह दर्जा दिया गया। भोटिया-सौका, जौनसारी और वनराजि (वनरावत) अब उत्तराखण्ड में ही हैं। कई जातियां अपने को जनजाति घोषित करवाने के लिए लड़ रही हैं। ऐसा भी है कि कोई जनजाति जैसे, सहरिया, ललितपुर जिले में जनजाति में शामिल है तो दूसरे जिले में अनुसूचित जाति में। ऐसा ही गोंडों के साथ भी हुआ है। यह विसंगति कायम है और शुरू में ही लिख दिया गया है कि एस टी यानी अनुसूचित जनजातियों में शामिल सभी वास्तविक अर्थों में आदिवासी यानी मूल निवासियों में नहीं आते।      

भारत ने आदिवासियों के लिए कुछ संवैधानिक रियायतें तो दी हैं लेकिन उन्हें ‘मूल निवासी’ नहीं माना है। आदिवासियों या मूल निवासियों को अपने-अपने देश में मान्यता, सुरक्षा और अवसर प्रदान किए जाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने जो 107वां कंवेंशन (समझौता) तैयार किया, उस पर भारत ने  भी हस्ताक्षर तो किए हैं लेकिन आदिवासियों को मूल निवासी मानने से इनकार करते हुए यह तर्क रखा कि यहां रहने वाले सभी मूल निवासी हैं। इसके विपरीत दुनिया के कई देशों में, विशेषकर लातीनी अमेरिकी देशों में आदिवासियों को कानूनी रूप से मूल निवासी माना गया है। कई देशों के आदिवासी यह अधिकार पाने के लिए लड़ रहे हैं। भारत में भी कई प्रदेशों में आदिवासी अपने जल-जंगल-जमीन लगातार छीने जाने के विरोध में और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज उनमें सामाजिक-राजनैतिक चेतना का विकास हुआ है और वे अपनी पहचान को लेकर सतर्क व जागरूक हुए हैं।

द्रौपदी मुर्मु के राष्ट्रपति निर्वाचित होने से आदिवासी समुदायों में खुशी स्वाभाविक है। ऐसी ही प्रसन्नता दलितों को भी हुई थी जब उनके बीच जन्मा एक व्यक्ति पहली बार राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठा था। खुशी अपनी जगह है लेकिन यह मानना दिवास्वप्न देखना होगा कि एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति बन जाने से आदिवासियों के हालात सुधरेंगे, उनके जल-जंगल-जमीन पर अधिकार बहाल होंगे, विकास परियोजनाओं, खानों और बांधों के लिए आदिवासी अपनी भूमि से नहीं उजाड़े जाएंगे, और प्रकृति को बचाने और उसके सम्मान का वह जीवन-दर्शन लौटेगा जिसकी चर्चा नई राष्ट्रपति ने अपने पहले सम्बोधन में की है। इसके बावजूद यह उम्मीद बनी रहेगी कि समय-समय पर राष्ट्रपति आदिवासी समाजों की खूबियों, समस्याओं और अपेक्षाओं की चर्चा करेंगी। यह भी आशा की जानी चाहिए कि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के नाम पर विस्थापित किए गए आदिवासियों का बेहतर पुनर्वास होगा- नकद मुआवजे से नहीं, बल्कि जमीन व जंगल के बदले जमीन एवं जंगल देने वाला पुनर्वास।  

-न जो.

(दस्तक टाइम्स के लिए, 28-07-2022)

Saturday, July 16, 2022

सुंदर लाल बहुगुणा को याद रखने के कई आयाम हैं

पिछले वर्ष सुंदरलाल बहुगुणा के रूप में उत्तराखण्ड, हिमालय और देश-दुनिया ने एक दृढ़ संकल्पवान गांधीवादी पर्यावरण-योद्धा खो दिया था। उन्होंने अपनी यात्राओं, लेखों-भाषणों, अनशनों-आंदोलनों और जीवन-शैली से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनका न रहना एक ईमानदार एवं समर्पित हिमालय हितैषी का न रहना है। पिछले दिनों बहुगुणा जी की स्मृति में उनकी पत्नी विमला बहुगुणा एवं सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण संरक्षण एवं शोध संस्थान ने ‘संकल्प के हिमालय’ नाम से स्मृति-ग्रंथ प्रकाशित किया है। उनकी बेटी मधु पाठक के सम्पादन में प्रकाशित इस ग्रन्थ में उनके परिवारीजनों, सम्बंधियों, आंदोलन के सहयोगियों-कार्यकर्ताओं, शिष्यों, गांधीवादी संस्थाओं के प्रतिनिधियों और पर्यावरणविदों के स्मृति लेख हैं- 63 हिंदी में और 22 अंग्रेजी में।

इस ग्रंथ को पढ़ना बहुगुणा जी के ज्ञात-अल्पज्ञात जीवन-प्रसंगों, संकल्पों, आंदोलनों, प्रभाव-क्षेत्रों और प्रेरक व्यक्तित्व से प्रभावित होते चलना है। विमला बहुगुणा जी ने, जिन्होंने सुंदरलाल जी से विवाह ही इस शर्त पर किया था कि वे राजनीति (वे तब कांग्रेस में जिला स्तरीय पदाधिकारी थे) से सदा के लिए मुंह मोड़कर समाज सेवा में प्रवृत्त होंगे, उनके पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर बिना भावुक हुए गहरी अंतदृष्टि से लिखा है। सुंदरलाल बहुगुणा को दुनिया जिस रूप में जानती है या दुनिया के कम जानते हुए भी जो-जो जमीनी काम उन्होंने किए, उस व्यक्तित्व को गढ़ने में विमला जी का ही पूरा योगदान है। विमला जी ने यह संकल्प और जीवन-दृष्टि सरला बहन की शिष्या के रूप में लक्षी आश्रम, कौसानी में पढ़ते-रहते हुए पाई थी। फिलहाल उनका यह लेख श्रद्धाजंलि स्वरूप है, भविष्य में उनसे विस्तार से इस पर लिखने की अपेक्षा की जानी चाहिए, बल्कि आग्रह। सुंदरलाल जी ने भी विमला जी के इस योगदान को स्वीकार किया था, जैसा कि राधा भट्ट दीदी ने अपने लेख में उनको उद्धृत किया है- “मैं विमला के बल पर खड़ा हूं। मैं झण्डा हूं, सबको दिखाई देता हूं पर झण्डे को फहराने वाला डंडा तो विमला का है।”

मेधा पाटकर ने बहुगुणा जी को बड़े बांधों के विरोध और नर्मदा आंदोलन में उनकी भागीदारी के संदर्भ में दिल से याद किया है। लम्बे समय तक बहुगुणा जी के सहयोगी रहे धूम सिंह नेगी, प्रसिद्ध लेखक और बहुगुणा जी के निकट सम्बंधी विद्यासागर नौटियाल, सुशीलचंद्र डोभाल, सदन मिश्र, कुंवर प्रसून,  भतीजी डॉ प्रज्ञा पाठक और आंदोलनकारी समीर रतूड़ी के लेख सुंदरलाल जी के विचार, व्यवहार और  योगदान पर गहरी नजर डालते हैं। 13 साल की उम्र में श्रीदेव सुमन से प्रभावित होकर टिहरी राजशाही के विरुद्ध बगावती तेवर अपनाने से लेकर बाद के सर्वोदयी-गांधीवादी नेता के रूप में उनके विविध सामाजिक एवं निजी प्रयोगों, विचार-व्यवहार और आंदोलनों के बारे में बहुत-सी जानकारियां सामने आती हैं। उनके शिष्यों अथवा उनके सहयोग से जीवन में ऊंचे मुकाम हासिल करने वालों में चंद्र सिंह का लेख बहुगुणा जी के बहुत कम जाने गए पक्ष पर प्रेरक रोशनी डालता है। एक दर्जी-बाजगी परिवार में जन्मे चंद्र सिंह को बहुगुणा जी ने कैसे 25 किमी पैदल जाकर, उनके गांव से लाकर टिहरी के ठक्कर बापा छात्रावास में डाला और आगे तक ऐसी राह दिखाई कि एक दिन चंद्र सिंह प्रशासनिक सेवा में पहुंचकर टिहरी नरेश की उस कुर्सी पर जिलाधिकारी की हैसियत से बैठे, जिस पर बैठे राजा ने एक दिन उनके पिता को दुत्कार दिया था जो अपने एक बेटे को स्कूल में भर्ती करा देने के लिए दरबार में गिड़गिड़ा रहा था। यह विडम्बना ही है कि चंद्र सिंह बाद में उस टिहरी बांध के परियोजना निदेशक बने जिसके विरोध में बहुगुणा जी ने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। अपने जीवन में उनके योगदान से विनत चंद्र सिंह यही कर सके कि डूब गए ठक्कर बापा छात्रावास के लिए नई टिहरी में ठीक से जमीन और मुआवजा दिलवा गए। बहुगुणा जी के भक्त रहे प्रशासनिक अधिकारी डॉ प्रदीप कुमार भी टिहरी प्रशासन में दुविधाग्रस्त हो तैनात रहे, जिनके हिस्से टिहरी खाली करवाकर बांध जल्दी बनवाने की जिम्मेदारी आई थी।  

बीज बचाओ आंदोलन को समर्पित विजय जड़धारी ने 1979 के बडियारगढ़ के चिपको आंदोलन का विस्तार से जिक्र करते हुए बहुगुणा जी को आत्मीयता के साथ याद किया है। उनके लेख में कुंवर प्रसून की निर्भीकता और धूम सिंह नेगी के जुझारूपन का भी अच्छा विवरण है। कुंवर प्रसून का एक पुराना लेख चिपको के इतिहास पर है। राजीव लोचन साह ने उन्हें ‘नैनीताल समाचार’ के एक प्रेरणा-स्रोत और पत्रकार के रूप में पेश किया है। कुछ लेख मात्र श्रद्धांजलि स्वरूप हैं। सभी लेखों की चर्चा यहां की भी नहीं जा सकती। अंग्रेजी लेखों को फिलहाल पढ़ा नहीं जा सका है।  

सुंदरलाल जी से असहमतियां और उनसे जुड़े विवाद भी कम नहीं हैं लेकिन सम्पादक मधु पाठक ने लिखा ही है- “कुछ ऐसे भी लेख मिले जो आलोचनात्मक रूप से लिखे गए थे। यह उनके लिए उपयुक्त मंच नहीं था। इसलिए मैं उनको शामिल नहीं कर सकी।” इस स्मृति ग्रंथ में शेखर पाठक के लेख की अनुपस्थिति उल्लेखनीय है। आखिर वह बहुगुणा जी ही थे जिन्होंने इस पीढ़ी को सर्वाधिक उप्रेरित किया। ‘अस्कोट-आराकोट’ यात्रा का विचार उनका ही दिया हुआ है, जिसने उत्तराखण्ड को देखने की नई दृष्टि दी और उस टोली के प्रारम्भिक चार युवकों में आज शेखर पाठक ही हमारे बीच हैं और बहुगुणा जी के अत्यंत प्रिय भी रहे हैं। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाली अनुपस्थिति चंडी प्रसाद भट्ट जी की है, जो प्रारम्भ में बहुगुणा जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले-लड़े, हालांकि बाद में उनमें विवाद हुए और राहें भी अलग गईं।

जैसे, सुंदर लाल जी जैसे व्यक्तित्वों के होने से गांधी जी की प्रासंगिकता आज तक बनी आई है, वैसे ही सुंदरलाल जी की प्रासंगिकता उनके रोपे पौधों और उनसे प्रेरित पीढ़ियों की सक्रियता से बनी रहेगी।

- न जो, 14 जुलाई, 2022 (नैनीताल समाचार के लिए) 

                        

Friday, July 15, 2022

संस्कृत में डॉन क्विग्जोट!

सन 1935 की एक दोपहर जब धनवान अमेरिकी व्यापारी कार्ल टेल्डिन केलर किताबों के अपने संग्रह को गर्व से निहार रहा था तो उसकी नजर दुनिया का पहला आधुनिक उपन्यास मानी जाने वाली सर्वांतीस की बहु-प्रसिद्ध रचना ‘डॉन क्विग्जोट’ पर पड़ी। इस उपन्यास के मूल स्पेनी संस्करण के अलावा उसके संग्रह में विश्व की कई भाषाओं में अनूदित प्रतियां थीं। अचानक उसे सूझा ‘डॉन क्विकजोट’ का संस्कृत अनुवाद भी उसके पास होना चाहिए। उसने सुन रखा था कि संस्कृत दुनिया की प्राचीन भाषाओं में एक है।

केलर को दुनिया की बेहतरीन पुस्तकें एकत्र करने का जुनून था। श्रेष्ठ साहित्यिक पुस्तकों के विभिन्न भाषाओं में अनूदित संस्करणों के संग्रह का जुनून। बस, वह जुट गया अपना ख्वाब पूरा करने की कोशिश में। उसने अपने दोस्त सर मार्क ऑरेल स्टाइन से सम्पर्क किया जो कि अच्छे प्राच्य भाषाविद, पुरातत्वविद, अन्वेषी और भारत के जानकार थे। केलर ने स्टाइन को लिखे पत्र में स्वीकार किया कि “मैं अपनी इस ख़्वाहिश के बचकानेपन को समझ रहा हूं लेकिन फिर भी मैं अपनी इस इच्छा को पूरी करने के लिए बहुत उतावला हूं। भले ही कुछ अंश हों, लेकिन संस्कृत में हों।” केलर को भरोसा था कि उसका दोस्त इस काम के लिए सही आदमी की तलाश कर देगा।

स्टाइन ने केलर को निराश नहीं किया। उसने अपने कश्मीरी मित्र, संस्कृत विद्वान नित्यानंद शास्त्री से सम्पर्क किया और केलर की इच्छा पूरी कर देने का अनुरोध भी। शास्त्री जी उन दिनों पक्षाघात के कारण बिस्तर तक सीमित थे लेकिन स्टाइन के आग्रह और इस काम के रोमांच को देखते हुए राजी हो गए। अपनी सहायता के लिए उन्होंने दूसरे कश्मीरी पण्डित और संस्कृत विद्वान जगाधर जदू को रख लिया। दोनों कश्मीरी पण्डितों को स्पेनी भाषा तो आती नहीं थी, सो उन्होंने ‘डॉन क्विग्जोट’ के अंग्रेजी अनुवाद से संस्कृत अनुवाद करना तय किया और अठारहवीं सदी के चार्ल्स जार्विस के मूल स्पेनी से अंग्रेजी अनुवाद को इसके लिए छांटा।

केलर के मन में ‘डॉन क्विकजोट’ का संस्कृत अनुवाद हासिल करने की इच्छा अंकुरित होने करीब दो साल बाद कश्मीरी पंडितों की मेहनत रंग लाई और इस उपन्यास के आठ अध्याय प्रांजल संस्कृत में केलर के संग्रह की शोभा बढ़ा रहे थे। लेकिन यह इतनी आसानी से नहीं हुआ था। केलर और स्टाइन के बीच इस दौरान जो चिट्ठी-पत्री चली, उससे पता चलता है कि इस काम पर विश्व युद्ध और हिटलर के आतंक का साया भी मंडराया था। स्टाइन यहूदी मूल के थे और अपनी यात्राओं में देख-समझ रहे थे कि नाजी क्या करने वाले हैं। स्टाइन तो बच गए लेकिन उनके परिवार को यहूदी होने की कीमत चुकानी पड़ी। इस भयावह दौर में भी केलर का जुनून और स्टाइन का प्राच्य भाषा-प्रेम कायम रहा था।    

1955 में केलर की मौत हो गई। उसकी वसीयत के मुताबिक पुस्तकों का उसका दुर्लभ और विशाल संग्रह हार्वर्ड विश्वविद्यालय को सौंप दिया गया। नित्यानंद और जगाधर जी की वह संस्कृत पांडुलिपि भी उनमें थी जिस पर अगले 57 साल तक किसी की नजर नहीं पड़ने वाली थी।

सन 2002 में नित्यानंद शास्त्री जी के पोते सुरिंदर नाथ पण्डित ने एक लेख में अपने दादा जी के इस अनुवाद का उल्लेख किया था जिस पर 2012 में बिल्कुल अचानक ही डॉ द्रागोमीर दिमित्रोव की नजर पड़ी। डॉ दिमित्रोव मारबर्ग, जर्मनी के फिलिप्स विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और भारत एवं तिब्बत के विशेषज्ञ होने के साथ ही संस्कृत में उनकी बड़ी रुचि है। वे इस पांडुलिपि की खोज में जुट गए। हार्वर्ड विवि के हाउटन पुस्तकालय की एक शेल्फ में उन्हें यह भुरभुरी और नाजुक पड़ चुकी पाण्डुलिपि हाथ लग गई। मधुर, प्रांजल संस्कृत में ‘डॉन क्विग्जोट’ के पृष्ठ देखकर डॉ दिमित्रोव चमत्कृत रह गए। तभी उनके मन में एक नई ख्वाहिश ने अंगड़ाई ली। स्पेन, भारत और जर्मनी के बीच सांस्कृतिक सहयोग की एक परियोजना शुरू हुई कि ‘डॉन क्विग्जोट’ का ऐसा अभिनव द्वि-भाषी संस्करण प्रकाशित किया जाए जिसमें एक पेज पर अंग्रेजी और दूसरे पेज पर संस्कृत अनुवाद छपा हो। इसके लिए डॉ दिमित्रोव उपन्यास का चार्ल्स जार्विस का किया वही अंग्रेजी अनुवाद भी खोज लाए, जिससे नित्यानंद और जगाधर जी ने 1935-36 में संस्कृत अनुवाद किया था।

डॉ दिमित्रोव के सम्पादन में पुणे विश्वविद्यालय ने इसे प्रकाशित करने की जिम्मेदारी ली और अंतत: 07 जुलाई, 2022 को दिल्ली में हुए एक समारोह में ‘डॉन क्विग्जोट’ के अंग्रेजी-संस्कृत अनुवाद का यह अभिनव संस्करण जारी किया गया, जिसमें शास्त्री जी के पोते सुरिंदर नाथ पंडित, स्पेनी राजदूत और पुणे विश्वविद्यालय के सम्पादक समेत कई विद्वान उपस्थित थे। किताब के साथ संस्कृत में एक ऑडियो बुक भी जारी की गई है। सुरिंदर नाथ पंडित के लिए स्वाभाविक ही यह बहुत भावुक लेकिन गर्वीला क्षण था।

एक अमेरिकी धनवान संग्रहकर्ता की 1935 की एक ‘बचकानी ख्वाहिश’ सन 2022 में दिल्ली में एक अनोखी धरोहर, भाषा-प्रेम और अन्तर्राष्ट्रीय सहकार का शानदार प्रतीक बनी। (The Guardian में प्रकाशित लेख पर आधारित)           

 - नवीन जोशी, 15 जुलाई, 2022  

         

Wednesday, July 13, 2022

वे लड़ते रहे हैं इसलिए बचे हुए हैं

लम्बे और व्यापक जन भागीदारी वाले आंदोलन के बावजूद सरदार सरोवर बांध बन गया लेकिन नर्मदा घाटी के लोग हारे नहीं। बांध बन गया, इसलिए आंदोलन असफल हो गया- इसे वे नहीं मानते और कहते हैं कि "आंदोलन ने विकास के मापदण्डों को नया आयाम दिया है। अब यह सिर्फ बांध विरोधी संघर्ष नहीं है, बल्कि अब यह सामाजिक परिवर्तन का संघर्ष है।" इसलिए वे आज भी लड़ रहे हैं। गांव डूबे हैं, विस्थापन हुआ है लेकिन ‘जमीन के बदले जमीन’ वाले पुनर्वास और नदी तथा जंगल के लिए आंदोलन जारी है। नर्मदा आंदोलन की बहुपक्षीय आंशिक एवं दीर्घकालिक सफलताएं हैं। जिन ग्रामीणों ने मुआवजा ले लिया और अन्यत्र बस गए वे भी आंदोलन में भाग लेते हैं।

'नर्मदा घाटी से बहुजन गाथाएं' (नवारुण प्रकाशन) शीर्षक किताब नर्मदा घाटी के उन सीधे, सरल किंतु जीवट वाले ग्रामीणों और वनवासियों की जुबानी कहे गए, अपने हक के लिए लड़ने के अनुभवों और उसकी जय-पराजयों के बारे में है। ये वही आदिवासी हैं, वनवासी और आम ग्रामीण हैं, जिन्हें पता नहीं था कि सरकारी विकास क्या होता है, बांध क्या होता है, वह उनका क्या-क्या छीन लेगा, और जिन्हें ‘मेधा ताई’ या ‘मेधा दीदी’ और उनके साथियों ने धीरे-धीरे समझाया और एक बार जब वे समझ गए तो ऐसे गांधीवादी लड़ाका बन गए कि उनकी आवाज राष्ट्रीय सीमाएं पार कर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कही-सुनी गई, उसका असर हुआ जिसके कारण बांध बनने के बावजूद वे अपना अधिकार जताने और अपने विरोध को जायज ठहरा पाने में काफी हद तक कामयाब हुए। यह वनों पर, नदियों पर, जमीनों पर आम ग्रामीणों के अधिकार की चेतना और उसे बचाने के लिए लड़ने का संकल्प ही है, जो पीढ़ी-दर पीढी वे लड़ पा रहे हैं।      

‘नर्मदा घाटी से बहुजन कथाएं’ सामान्य लेकिन संघर्ष की चेतना से भरे चौदह ग्रामीणों की कहानी है जिसे तीनों राज्यों की बांध प्रभावित नर्मदा घाटी में घूम-घूम कर उन्हीं की भाषा में एकत्र किया गया, अंग्रेजी में उसे सम्पादकों की एक टीम (ओजस एस वी, मधुरेश कुमार, एम जे विजयन और जो अत्यालि) ने लिखा-सम्पादित किया और फिर चिन्मय मिश्र ने हिंदी में अनुवाद करके प्रस्तुत किया। इसीलिए यह सामान्य किताब नहीं है। यह इस देश के अत्यंत साधारण लोगों के मुंह से निकली वह आवाज है जो पूरी ताकत से कहती है कि अपने पानी, अपने जंगल, अपनी जमीन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक हमारा है और विकास के नाम पर हमें अपनी जड़ों से बेदखल करना वास्तव में पूरी सभ्यता, संस्कृति और जीवन-शैली को नष्ट करना है और हमें ज़िंदा रहने के लिए उससे लड़ना है।

जिस अंदाज और शैली में ये बातें कही गई हैं, उन्हें कोई पर्यावरणविद, कोई समाजशास्त्री, कोई जन नेता या विशेषज्ञ नहीं कह सकता क्योंकि ग्रामीणों की आवाज प्रकृति के साथ सदियों के तादात्म्य से उपजी मौलिक भाषा में निकली है। उदाहरण के लिए, डोमखेड़ी, महाराष्ट्र की अत्यंत जुझारू आंदोलनकारी डेडली बाई वसावे ने बांध बनाने वालों से पूछा- “हमारे पास पूरी नदी है और बदले में तुम हमें हैंडपम्प दे रहे हो?” यह बात उन लोगों के अलावा और कौन कह सकता है जिन्होंने पीढ़ियों से नदियों, जंगलों और जमीनों के साथ आत्मीय रिश्ता बनाकर जीवन जीया है? सम्पादकीय में ठीक ही कहा गया है कि “यह पुस्तक नर्मदा आंदोलन के सरदार सरोवर परियोजना प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले कार्यकर्ताओं की ढेर सारी आवाजों को एक साथ रखने का प्रयास है जो काफी हद तक परिष्कार रहित है और जटिलताओं को आपस में जोड़ने में उतनी महारत शायद नहीं रखतीं। परंतु उनके पास उनके और हमारे आसपास मौजूद भिन्न-भिन्न सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों को लेकर एक स्पष्ट और मजबूत नजरिया मौजूद है।”

बामनी, महाराष्ट्र के पुण्या वसावे ने पुनर्वास स्वीकर कर लिया और सोमवाल जाकर बस गए लेकिन वे मूल गांव एवं आंदोलन से जुड़े हुए हैं और नियमित भागीदारी करते हैं। वे कहते हैं- “विस्थापन और पुनर्वास के अनुभव से हमें यह समझ में आया कि सरकार इसे लेकर जो तमाम कानून और नीतियां बनाती है, वह न सिर्फ बेकार हैं, बल्कि विनाशकारी भी हैं। सरकार बजाय छोटी योजनाएं बनाने के अनावश्यक रूप से बड़ी परियोजनाओं में धन बर्बाद कर रही है। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बिलगांव में एक छोटी परियोजना बनाकर दिखाई है जो कि पूरे गांव के लिए बिजली पैदा कर सकती है। लेकिन इस बड़े बांध ने बहुत सारी उपजाऊ जमीन और जंगल डुबो दिए हैं और अनेक समुदायों को विस्थापित भी किया है।” खार्या भादल, मध्य प्रदेश के गोखरू मण्डल ने गांव उजाड़ने आए अफसरों, पुलिस वालों से पूछा- “आपका काम तो गांव की रक्षा करना है और इसके बजाय आप गांव को नष्ट कर रहे हो। तो, अपराधी कौन है?” इस तरह वे समझ गए कि “यदि हम नहीं लड़ेंगे तो भी हर हाल में अपने अधिकारों को खो देंगे। यह तो मौत से भी बदतर है।”

सभी आंदोलन कमजोर पड़ते हैं लेकिन उसका क्या असर होता है? गोखरू कहते हैं- “बहुत से लोगों ने हमारा साथ छोड़ दिया है और राज्य के दलाल बन गए हैं। नदी पार करते ही ककराना गांव में शराब की दुकानें फिर दिखाई देने लगी हैं। दुकानदारों और पुलिस की मिली भगत है। लोगों की अधिक मात्रा में धन कमाने की आकांक्षा की वजह से हमारी एकता नष्ट हो गई है। शराब दुकानें उन लोगों की हैं जिन्हें जमीन मिल गई है और वे पुनर्वास स्थल पर चले गए हैं।”

शिक्षक की नौकरी छोड़कर आंदोलन में शामिल हुए भीलखेड़ा, मध्य प्रदेश के कैलाश अवास्या आन्दोलन द्वारा संचालित ‘जीवनशालाओं’ के बारे में बताते हैं- “जीवनशालाएं आंदोलन के ‘नवनिर्माण’ से सम्बंधित प्रयासों का हिस्सा हैं। दीर्घकालिक संघर्ष से कई बार लोग थकान महसूस करने लगते हैं। अतएव नवनिर्माण या रचनात्मक कार्य करने की आवश्यकता होती है।” जीवनशाला वास्तव में वे स्कूल हैं जो सरकारी स्कूलों की बदहाली और उपेक्षा से खिन्न होकर ग्रामीणों ने खुद बनाई और चलाईं, क्योंकि बच्चों के लिए पढ़ना जरूरी है। जीवनशालाओं ने नई पीढ़ी को न केवल स्कूली शिक्षा दी बल्कि सामाजिक, राजनीतिक चेतना भी दी जिससे आंदोलन को नई पीढ़ी का साथ मिलता गया। इतना लम्बा आंदोलन एक ही पीढ़ी नहीं चला सकती थी। बकौल रहमत- “मुख्य धारा की शिक्षा बच्चों को गांव के नजरिए से कुछ भी नहीं पढ़ाती। तो बच्चे पढ़ने के बाद गांव छोड़ देते हैं। इसके बजाय जीवनशाला ने श्रम की गरिमा और गांधी जी की नई तालीम पर जोर दिया जिससे उस नजरिए से एक शिक्षित आदिवासी पीढ़ी तैयार हुई।” जातीय भेदभाव भी इससे काफी हद तक दूर हुआ। कैलाश से यह सुनना भी महत्त्वपूर्ण है कि “हमें भी चुनाव लड़ना चाहिए क्योंकि वर्तमान परिस्थितियां हमारे पक्ष में नहीं हैं। हमारे कार्यकर्ता बिखरे हुए हैं और इसलिए हमारे पास इतनी ताकत नहीं है कि चुनाव लड़ें और जीत सकें परंतु पंचायत स्तर पर हमारे लोग लड़ते हैं और जीतते हैं तथा वे हमारे मुद्दे उठाते हैं।”

बांध को वे नहीं रोक पाए लेकिन इसे आंदोलन की असफलता नहीं मानते। कड़माल, मध्य प्रदेश के देवराम भाई कनेरा से सुनिए- “आन्दोलन ने कई क्षेत्रों में अपना प्रभाव छोड़ा है। लोगों में आए परिवर्तन, उनकी सोच, नजरिए और जागरूकता में आए परिवर्तन बहुत-बहुत उल्लेखनीय हैं। हमारे परिप्रेक्ष्य से देखें तो महिलाओं और आदिवासियों का सशक्तीकरण, जन आंदोलनों की ताकत का प्रदर्शन और दलितों, कमजोरों और गरीबों को आवाज देना सम्भवत: अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।” और, चिखल्दा, मध्य प्रदेश के रेहमत इसी बात को और साफ करते हैं- “कई बार लोग पूछते हैं- संघर्ष से क्या हासिल हुआ, बांध तो बन गया? हमारा विश्लेषण इतना सामान्यीकरण वाला भी नहीं होना चाहिए कि चूंकि बांध बन गया, इसलिए आंदोलन असफल हो गया। आंदोलन ने विकास के मापदण्डों को नया आयाम दिया है। अब यह सिर्फ बांध विरोधी संघर्ष नहीं है, बल्कि अब यह सामाजिक परिवर्तन का संघर्ष है। इसने तमाम छोटे संघर्षों जैसे महिलाओं और किसानों के मुद्दों के संघर्षों को प्रेरणा दी है।”

पुनर्वास कैसा हो, आदिवासी राण्या गोंज्या पडवी की जुबानी सुनिए- “पुनर्वास स्थल की स्थिति ऐसी है कि खेती से चाहे हम जितना उपजा लें, पूरा ही नहीं पड़ता। 30 लोग केवल पांच एकड़ जमीन पर आश्रित हैं। शहरों में इतनी कम जमीन के साथ जी पाना सम्भव नहीं है। यहां न तो वृक्ष हैं और न ही पेड़-पौधे। यदि हमें अधिक जमीन मिल भी जाती है तो शहरों में ज़िंदा रह पाना कमोबेस असम्भव है। हम सिर्फ जमीन के सहारे नहीं रह सकते। हमें पेड़ों और जंगलों की आवश्यकता भी है।” नदी कहना शायद उनसे छूट गया होगा।

सभी चौदह लोगों के पास वे अनुभव हैं जो जन-आंदोलन के नेताओं के पास भी शायद ही होते हों, समाजविज्ञानियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की तो छोड़ ही दीजिए। इतनी लम्बी लड़ाई के बाद जो निष्कर्ष उनके हैं, वह गौर करने लायक हैं। चिमलखेड़ी, महाराष्ट्र के विज्या जुगल वसावे कहते हैं- “किसी दिन हम भी पुनर्वास स्थल पर चले जाएंगे परंतु हम जानते हैं कि यदि हमें नई जमीन मिल भी जाती है तो भी हमें संघर्ष को ज़िंदा रखना है। आज देश के सभी हिस्सों के आदिवासियों एवं गरीबों के पास गरिमामय जीवन जीने के लिए संघर्ष के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है।” संघर्ष और संकल्प के इन जमीनी बयानों को पढ़ना, प्रकृति और उसके संसाधनों का पूरा सम्मान करते हुए इस दुनिया को बेहतर एवं गरिमापूर्ण बनाने की लड़ाई को जारी रखने का नर्मदा घाटी के लोगों का हौसला समझना है।

अंत में बात मेधा पाटकर की। इन बयानों में मेधा पाटकर किसी शीर्ष नेता की तरह नहीं, ‘दीदी’, ‘जीजी’ और ‘ताई’ के आत्मीय रूप में उपस्थित हैं। मीडिया ने उन्हें नर्मदा बचाओं आंदोलन की शीर्ष नेता के रूप में पेश किया और आम तौर पर वे जानी भी इसी तरह जाती हैं लेकिन ये किस्से बताते हैं कि मेधा पाटकर ने नेता की तरह नहीं, ग्रामीणों-वनवासियों के बीच उन्हीं की तरह रहते-जीते एक प्रेरक सहयोगी के रूप में काम किया। उनकी कोशिश रही कि हर कार्यकर्ता नेता की तरह विकसित हो और आंदोलन उन्हीं पर निर्भर हो। जन-आंदोलनों के नेताओं और मेधा में यही फर्क है जो इस किताब से बहुत साफ-साफ उजागर होता है। देखिए- “ताई यह सुनिश्चित करती थीं कि बैठक में आए प्रत्येक व्य्यक्ति, जिनमें बच्चे, वृद्ध और महिलाएं तक शामिल थे, को भागीदारी का मौका मिले” (पुण्या वसावे), “जब संघर्ष के लिए इकट्ठा होते तो दीदी जानबूझकर हरिजन या आदिवासी के यहां खाना खाती थीं” (देवराम भाई कनेरा), “ताई, डॉ बरंठ और हम कुछ सौ लोग 14 दिन के लिए धुले जेल में बंद थे। मेरे बच्चे भी जेल में थे। कोर्ट ने हमें 300 रु की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। हमने आपस में बातचीत की और ताई ने मुझसे पूछा- डेडली बाई, हम क्या करें? हम सबको इस काम के लिए तीन-चार लाख रु लगेंगे। मैंने जमा करने से मना कर दिया... ताई हमेशा हमारा हौसला बढ़ाते हुए कहती थीं कि हम एक अच्छे मकसद के लिए संघर्ष कर रहे हैं, हमें कुछ नहीं होगा।” (डेडली बाई वसावे), “पत्रकारों ने मेधा दीदी से पूछा- आपने न्यायालय के सामने बहुत अच्छे सवाल खड़े किए लेकिन यदि सरकार आपकी नहीं सुनती तो क्या होगा? उन्होंने कहा- मुझसे यह मत पूछो, उनसे पूछो जो प्रभावित हैं। सरकार ये सब गरीबों के नाम पर कर रही है। तब मैंने कहा- हमारी जीवन शैली में बिजली की कोई जरूरत नहीं है। इसके बावजूद सरकार हम सबको भूमिहीन बनाकर बिजली उत्पादन के लिए विशाल बांध बना रही है। दिल्ली में भी यमुना नदी है। आप बिजली उत्पादन के लिए इस पर बांध क्यों नहीं बनाते और दिल्ली को क्यों नहीं डुबोते? क्या हमारे अधिकार दिल्ली के लोगों से अलग हैं?” (बाबा महरिया, जलसिंघी, मध्य प्रदेश)।

इस तरक प्रत्येक कार्यकर्ता ने मेधा पाटकर की जो तस्वीर पेश की है, वह नेता की नहीं, जरूरी सहयोगी की है, जो अपने को और अपने फैसलों को आगे रखने की बजाय हर कार्यकर्ता को आगे करती हैं और उनके बराबर खड़ी रहती हैं। उनमें वह ‘व्यक्तिगत नायकत्व’ की चाह नहीं है, जो हम अन्यत्र आंदोलनों के नेताओं में पाते हैं। 

नर्मदा घाटी के इन सामान्य लेकिन संकल्पबद्ध लोगों की संघर्ष कथाएं पढ़ते हुए बार-बार टिहरी बांध विरोधी आंदोलन की याद आती है। उस आंदोलन की भी दुनिया भर में चर्चा हुई थी लेकिन भिलंगना और भागीरथी घाटियों के लोग टूट गए, हार गए। अपने अधिकारों के लिए लड़ने की बजाय वे अधिक से अधिक आर्थिक मुआवजा पाने में लग गए और शायद अब भी लगे हैं। अपने गहन शोध-अध्ययन 'हरी-भरी उम्मीद' (पृष्ठ 384-85, वाणी प्रकाशन) में शेखर पाठक लिखते हैं-

“नर्मदा घाटी के लोग नष्ट नहीं होना चाहते थे और अब तक लड़ रहे हैं। उत्तराखण्ड में पिछली डेढ सदी की पलायन की प्रक्रिया ने अपनी जड़ों से कटने के मनोविज्ञान को एक सीमा तक उचित मान लिया था। अत: सबसे बेहतरीन जमीन को बचाने की लड़ाई वे शुरू ही नहीं कर सके।... सुंदर लाल बहुगुणा और मेधा पाटकर के फर्क को समझना भी जरूरी है...। आज टिहरी से गए विस्थापित और यहां शेष रह गए लोग आवाज विहीन हैं।”

'नर्मदा घाटी से बहुजन गाथाएं' टिहरी बांध और सुंदरलाल बहुगुणा का जिक्र किए बुना मेधा पाटकर और बहुगुणा जी का फर्क साफ समझा देती है। 

पुस्तक की प्रस्तावना में अरुणा राय लिखती हैं कि “यह संकलन हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो भारतीय लोकतंत्र के सबसे कमजोर और सबसे अरुचिकर हिस्से को समझना चाहते हैं।” इसके साथ ही मैं कहूंगा कि देश में जहां-जहां जनता के आंदोलन चल रहे हैं, विशेष रूप से उत्तराखण्ड के उन सब कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए जो जानना चाहते हैं कि ‘ऐतिहासिक जन-आंदोलनों’ के बाद भी उनके समाज में बदलाव की राजनैतिक चेतना क्यों विकसित नहीं हुई।

‘नवारुण प्रकाशन’ ने यह पुस्तक प्रकाशित करके अत्यंत महत्त्वपूर्ण काम किया है।

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पुस्तक- ‘नर्मदा घाटी से बहुजन गाथाएं। सम्पादक—ओजस एस वी, मधुरेश कुमार, विजयन एम जे, जो अत्यालि। अनुवादक- चिन्मय मिश्र। प्रकाशक- नवारुण प्रकाशन। मूल्य- रु 350/- सम्पर्क- 9811577426         

               

Saturday, July 09, 2022

हमारे 'दाज्यू' और सबके ‘उस्ताद’ को बधाई

जाने-माने वयोवृद्ध कथाकार शेखर जोशी को ‘अमर उजाला’ समूह का ‘आकाशदीप’ सम्मान देने की घोषणा हुई है। यह सम्मान समग्र साहित्यिक योगदान के लिए दिया जाता है। आने वाली 10 सितम्बर को नब्बे साल पूरे करने जा रहे शेखर जोशी आज भी लेखन में सक्रिय हैं यद्यपि आंखों की असाध्य बीमारी ने यह काम बहुत मुश्किल कर दिया है। एक विशेष आकारवर्धक शीशे से वे नया लेखन पढ़ने की कोशिश करते हैं और इसी तरह थोड़ा-थोड़ा लिख भी लेते हैं। इन दिनों मुख्य रूप से कुमाऊंनी में लिख रहे हैं। साहित्यिक लेखन से उनके अद्यतन रहने का ताजा उदाहरण यह है कि अंतराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से समानित गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ का अंग्रेजी संस्करण (जो उनकी पोती ले आई थी) न केवल ‘उलटा-पुलटा’ एवं उसका क्थासार जाना है, बल्कि गीतांजलि श्री और डेजी रॉकवेल के बारे में जानकारी भी हासिल कर ली है। गीतांजलि श्री को बधाई देते हुए वे यह भी पूछते हैं कि जब डेजी रॉकवेल ने वर्षों पहले भीष्म साहनी के ‘तमस’ का अंग्रेजी अनुवाद किया था, तो वह पुरस्कार समिति के संज्ञान में क्यों नहीं आया?     

बहरहाल, शेखर दाज्यू ने पहली कहानी ‘राजे खत्म हो गए’ नाम से 1952 या 53 में लिखी थी। दूसरे विश्व युद्ध में हमारे पहाड़ों से हजारों युवा फौज में गए थे। उन दिनों कुमाऊं मोटर ओनर्स यूनियन की मोटरें फौजियों से इतनी भरी रहती थीं कि आम सवारियों को जगह नहीं मिल पाती थी। जब उनकी उम्र करीब दस साल रही होगी तो एक दिन गांव से पैदल अल्मोड़ा जाते हुए उन्होंने जगह-जगह मोटर के इंतजार में फौजियों को खड़े देखा। उनको विदा देने के लिए उनके परिवार की बहुत सी महिलाएं भी वहां थीं। पुरुष कम दिखाई देते थे। जैसे ही गाड़ी आती, फौजी बक्सा पकड़कर चट से गाड़ी के अंदर बैठ जाते लेकिन जैसे ही गाड़ी चलती थी, तो पीछे जो रुलाई फूतती थी, वह इतनी दर्दनाक होती थी कि उनके बाल मन में वह अमिट रह गई। गांवों में बहुत-सी विधवाएं भी वे देखते थे। उस कहानी में एक बुढ़िया है  जो अपने बेटे का इंतजार कर रही है। वह इस भ्रम में है कि बेटा ज़िंदा है और आएगा लेकिन बेटा पता नहीं कब शहीद हो चुका है। गांव में एक मंत्री जी आए हुए हैं। उन्होंने दही खाने की इच्छा व्यक्त की। लोग दही लेने के लिए बुढ़िया के पास पहुंचे। बुढ़िया ने बड़ी खुशी से दही की हाँडी उनको दे दी और कहा- अच्छा, राजे आए हैं!  कभी मेरा राजा भी आएगा। नैरेटर कहता है कि मैंने उससे कहा नहीं लेकिन राजे तो खत्म हो गए हैं। शेखर जी की यह कहानी तब ‘समास’ पत्रिका में छपी थी लेकिन उनके किसी संग्रह में शामिल नहीं है। वे इस पहली कहानी को अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘कोसी का घटवार का बीज मानते हैं। उनकी दूसरी कहानी ‘आदमी और कीड़े’ को धर्मयुग की कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला था। वह भी किसी संग्रह में नहीं है। 

तीसरी कहानी ‘दाज्यू’ ने शेखर जोशी को कहानीकार के रूप में बड़ी प्रसिद्धि दिलाई। आज भी उसकी चर्चा होती है। उसे लिखे जाने का भी रोचक किस्सा है। 1951 से 1955 तक वे दिल्ली में आयुध कारखाने की ट्रेनिंग के दौरान रहे। पहाड़ी की नराई लगती थी। एक इतवार को अखबार में ‘पर्वतीय जन विकास समिति’ की बैठक की सूचना छपी थी। वे साइकिल लेकर वहां पहुंच गए। वहां होटलों में काम करने वाले पहाड़ी लड़कों की बैठक चल रही थी। हुआ ये था कि कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी सी जोशी को पता चला था कि ये पहाड़ी लड़के दिन में होटलों में काम करने के बाद शाम को सस्ते होटलों में जाकर बिगड़ रहे हैं, जबकि बड़े प्रतिभावान हैं। कामरेड जोशी ने इन लड़कों को एकजुट करने और उनकी रुचि का परिष्कार करने के लिए ‘पर्वतीय जन विकास समिति’ नाम से सांस्कृतिक संस्था बनवा  दी। बाद में ब्लिट्ज के सम्पादक हुए नंद किशोर नौटियाल उस समिति के एक मासिक बुलेटिन का  सम्पादन करते थे। शेखर जोशी भी उससे जुड़ गए और टिप्पणियां लिखने लगे। जब उसका वार्षिकांक  निकालने की योजना बनी तो नौटियाल जी ने शेखर जोशी से एक ऐसी कहानी लिखने को कहा, जिसमें  पात्र होटल वर्कर हों। तब ‘दाज्यू’ कहानी लिखी गई। पी सी जोशी ने वह कहानी पढ़ी और प्रभावित हुए। बाद में 1955 में इलाहाबाद जाने पर वहां के साहित्यकारों के बीच उन्होंने ‘दाज्यू’ पढ़ी जिसे खूब सराहना मिली। तभी उपेंद्र नाथ अश्क ने ‘दाज्यू’ कहानी अपने ‘संकेत’ संकलन में प्रकाशित की। फिर तो उनकी ख्याति फैलती गई और उन्होंने एक से एक कहानियां हिंदी साहित्य को दीं, जिनमें मजदूरों और कारखानों के जीवन पर ‘उस्ताद’, ‘बदबू,’ ‘मेण्टल’, ‘नौरंगी बीमार है’, ‘आशीर्वचन’, ‘हेड मासिंजर मंटू’ उनकी प्रसिद्ध कहानियां भी हैं। श्रमिकों पर यादगार कहानियां लिखने वाले वे अकेले हैं। साथ-पैंसठ साल पहले लिखी गई उनकी कहानियां आज भी जगह-जगह उद्धृत की जाती हैं। यह उपलब्धि विरल है। ‘कोसी का घटवार’ तो गुलेरी जी की जग प्रसिद्ध कथा ‘उसने कहा था’ के समकक्ष ठहराई जाती है।

शेखर दाज्यू को इस सम्मान के लिए बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं कि उनके रचनातरत रहते हम उनकी जन्म शताब्दी मनाएं।  

 - न जो, 09 जुलाई, 2022