Friday, March 25, 2022

विरोधी दल के नेता की चुनौती मुख्यमंत्री से कम नहीं

उत्तर प्रदेश में समय-समय पर सत्तारूढ़ दलों के विरुद्ध सक्रिय विरोधी दल के नेताओं की प्रभावशाली भूमिका का स्मरण करें तो राजनारायण सिंह, गेंदा सिंह, त्रिलोकी सिंह, चरण सिंह, सत्यप्रकाश मालवीय, गिरधारी लाल, कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव के नाम विशेष रूप से सामने आते हैं। ये नेता सदन में तो मान्यता प्राप्त विरोधी दल के नेता के रूप में सक्रिय रहते ही थे, जनता के मुद्दों पर सड़क पर भी जूझते रहते थे। वामपंथी नेता कभी यह संवैधानिक दर्ज़ा नहीं पा सके लेकिन जब तक उनकी साख जनता के बीच थी, उन्होंने सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध खूब आंदोलन किए। हाल के दशकों में मुलायम सिंह यादव के अलावा और कोई सशक्त विपक्षी नेता दिखाई नहीं देता जिसने सदन से लेकर सड़क तक प्रदर्शन किए, धरने दिए, लाठियां खाईं और जेल काटी।     

मुख्यमंत्रियों की सफलता-असफलता की चर्चाएं होती हैं लेकिन विपक्षी नेताओं की भूमिका का उल्लेख अक्सर नदारद रहता है। क्या अब राजनीति में प्रभावशाली विपक्षी नेता नहीं होते?  जो नेता मुख्यमंत्री के रूप में चर्चित या विवादित होता है, वह चुनाव हार जाने पर विरोधी दल के नेता के रूप में सक्रिय क्यों नहीं दिखाई देता? क्या सभी पार्टियां सरकार में आने के लिए चुनाव लड़ती हैं और हार जाने पर अगले चुनाव की प्रतीक्षा करने लगी हैं? मायावती और अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रूप की प्रशंशा या आलोचना अक्सर होती है लेकिन विपक्षी नेता के रूप में उनकी भूमिका कैसी रही? या, क्या वे इस रूप में सक्रिय दिखाई भी दिए?    

2022 में यह अच्छा संकेत है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोक सभा की सदस्यता छोड़कर अपने लिए उत्तर प्रदेश में विरोधी दल के नेता की भूमिका चुनी है। 2017 के विधान सभा चुनाव में पराजय के बाद,  हालांकि तब उन्होंने स्वयं विधान सभा चुनाव नहीं लड़ा था, वे प्रदेश में विपक्षी नेता के रूप में सक्रिय नहीं रहे। 2019 में लोक सभा चुनाव में पार्टी की बड़ी हार के बाद भी सिर्फ एक सांसद ही बने रहे और 2022 के विधान सभा चुनाव से चंद महीने पहले ही विपक्षी नेता के रूप में मैदान में उतरे थे।

भाजपा आज केंद्र और प्रदेश में भी मजबूत बहुमत वाली सत्तारूढ़ पार्टी है। ऐसे में मजबूत विपक्ष भी आवश्यक है। मतदाताओं ने भाजपा को भारी बहुमत से सत्ता में बैठाया है तो समाजवादी पार्टी को सशक्त विरोधी दल के रूप में विधान सभा में भेजा है। पिछली विधान सभा में सपा विधायकों की संख्या काफी कम थी, लेकिन वह मुख्य विरोधी दल के रूप में तो थी ही। सपा अपनी इस भूमिका में लगभग अनुपस्थित रही। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और कोरोना काल के हाहाकार में उसकी भूमिका, मीडिया को दिए गए बयानों के अलावा, याद करने पर भी दिखाई नहीं देती। अखिलेश यादव एक बार सड़क पर धरने पर बैठ गए थे उसके अलावा और किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन स्मरण में नहीं है।

सपा सरकार में आ जाती तो अखिलेश के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां होतीं लेकिन विपक्षी नेता के रूप में जिम्मेदारी कम बड़ी नहीं हैं। क्या वे योगी सरकार को उसके दूसरे कार्यकाल में प्रभावी ढंग से उन मुद्दों पर घेर सकेंगे जो समाज को सर्वाधिक प्रभावित कर रहे हैं? क्या वे सरकार की नीतियों-कार्यक्रमों-कार्यान्वयनों पर विभागवार नज़र रखने का तंत्र अपनी पार्टी के भीतर विकसित कर सकेंगे? ‘उनका बयान आया है कि वे ‘जनता के लिए संसद से सड़क तक’ लड़ेंगे। अगर मुख्य विरोधी दल के नेता की भूमिका वास्तव में निभा सके तो न केवल यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए मजबूत नींव का काम करेगा बल्कि लोकतंत्र के लिए भी शुभ होगा। देखते हैं।   

(सिटी तमाशा, नभाटा, 26 मार्च, 2022) 

                  

           

Friday, March 18, 2022

कहानी/ सहभोज

रामदेई के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। उड़ती-सी चल रही है। पहले वाली दबी-सकुची चाल में एक ठसक-सी आ गई है। चेहरे की झुर्रियां हंसती-सी मालूम पड़ती हैं। आंखों में गर्वीली चमक है। पिछले एक हफ्ते में उसने दो बार अपनी झोपड़ी की फर्श लीप दी है। फूस के छप्पर का वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। अपनी एक मात्र अच्छी धोती धोकर, सुखाकर, तह करके अपने बिछावन के नीचे दबा दी है। लाल छींट और काले बॉर्डर वाली चादर, जो कई साल हुए उसका बेटा सोनू मेले से खरीद लाया था, बक्से से निकाल कर, पूरी फैलाकर देखकर आश्वस्ति कर ली है। स्टील की थाली, गिलास और लोटा उसके सबसे अच्छे बर्तन हैं। संकोच हर बार सिर उठाता है लेकिन और क्या है उसके पास!

दिन में एक-दो बार वह ग्राम प्रधान की देहरी तक चली जाती है। वे घर के बाहर बैठे मिल गए तो पूछ बैठती है- ‘‘कछु पता लाग?”

‘‘प्रोगराम फाइनल होई तो आपै पता चलि जाई रामदेई, काहे हलकान होत हौ,” वे कभी हंसते हुए जवाब देते हैं। कभी चिढ़ जाते हैं और उसे दूर से देखते ही डांटने लगते हैं- ‘‘दिमाग फिरि गा तोहार। कहि दिया एक बार कि सरकार खुदै बताई। डीएम-वीएम, पूरा अमला दौड़ै अइहै। हमार खोपड़ी पै ना सवार हौ। गेहूं काटै काहै ना गई खेत परै?”

रामदेई क्या करे! काम में उसका मन ही नहीं लग रहा। गेहूं की फसल पककर तैयार है। कटाई चल रही है। बड़े चक में हार्वेस्टर मशीन लगी है। छोटे-छोटे खेतों में उसके जैसे खेतीहरों को मजूरी मिल जाती है। आजकल रोटी का यही सहारा है। परसों गई थी प्रधान के खेत में। ठीक से हाथ नहीं चले। बाकी कामगार उससे काफी आगे निकल गए थे और पीछे मुड़-मुड़कर हंस रहे थे। कुछ लोगों ने फब्तियां भी कसीं- ‘‘अब मजूरी मां जिया कइसन लागै! भाग जागे तौ रामदेई तनी!” वह कुढ़कर रह गई थी। क्या कहे। गांव भर को खबर है। सभी ताना मारते रहते हैं। वह भीतर से बहुत खुश और उत्तेजित है लेकिन बेकल भी कि कब आवेंगे? जने आवेंगे भी? प्रधान कुछ बताते नहीं।

हफ्ते भर पुरानी बात। वह दोपहर में रोटी खाकर छप्पर पिछवाड़े बासन मांज रही थी कि बाहर कई लोगों के बोलने की आवाजें सुनाई दीं।

‘‘रामदेई!” प्रधान जी की पुकार वह कैसे न पहचानती। जल्दी से बाल्टी में छल्ल-बल्ल हाथ धोकर बाहर आई। कई लोगों को देखकर वह डर गई। उसके दरवाजे पर इतने सारे और बड़े-बड़े लोग! प्रधान जी ही उसके द्वारे कब आए! आज सूट-बूट वाले साहब लोगों की टोली लेकर कैसे हाजिर हो गए? पुलिस वाले भी हैं। रामदेई का जिया धक्क-धक्क उछलने लगा, जैसे छाती फाड़कर बाहर निकल आएगा।

बरसों हुए, एक दोपहर इसी तरह उसके द्वारे भीड़ जुटी थी। तब के ग्राम प्रधान, सिपाहियों के साथ थानेदार और कुछ गांव वाले। पुलिस की जीप से उतार कर एक लाश उसके द्वारे धर दी थी। रामदेई को काटो तो खून नहीं!

‘‘तेरा सोनू है रे, रामदेई। बाबू लोग स्साले गोली मार दिहिन,” गुस्से में कहते-कहते जीतू रो पड़ा था।

‘‘चुप बे,” थानेदार से उसे घुड़का। टोले की औरतों की सिसकियां तेज हो गई थीं। रामदेई की कुछ समझ में नहीं आया। उसने जैसे कुछ सुना ही नहीं। उसका सोनू तो कल बाराती बनकर गया था।

‘‘बरात में सोनू कुर्सी-मेज में बैठ के खावै लागा। बाबू लोग चिल्लावै लागे, चमरवे तेरी ये हिम्मत! नीचे बैठ। सोनू नहीं मानिस तो सीधे गोली मार दिहिन!” जीतू गुस्से में कांप रहा था। रामदेई का जेठ लगता है वह। वह भी बारात में गया था। थानेदार की घुड़की का उस पर कोई असर नहीं हुआ था। नीले झण्डे वालों के साथ घूमता है वह भी।   

‘‘भोसड़ी के, वहां फसाद खुद कराए और यहां भड़काने वाली कहानी बांच रहा है? क्या समझाए थे हम? अंदर कर साले को,” थानेदार ने एक तमाचा लगाया जीतू को। सिपाही उसे खींचकर ले गए। रामदेई सब देख रही थी लेकिन जैसे कुछ देख-सुन नहीं पा रही थी। दिमाग काम नहीं कर रहा था। उसका अकेला बेटा सोनू शहर में सफाई का काम करता है। कुछ साल से एक ठेकेदार के साथ लगा है। परसों ही तो गांव आया था। परले गांव के उसके दोस्त श्यामू की बारात थी। बड़े शौक से तैयार होकर कल सुबह बारात में गया था। जीतू क्या कह रहा है? ये कौन लेटा है नीचे? इतने सारे लोग मेरे द्वारे क्या कर रहे हैं?

किसी ने लाश के चेहरे से कपड़ा हटा दिया। लोगों ने अचानक एक हृदय विदारक चीख सुनी और दूसरे ही पल रामदेई जमीन पर थी। बेसुध। भीड़ में खलबली मच गई।

रामदेई को जब गांव के अस्पताल में होश आया, तब तक सब बराबर हो चुका था। पुलिस ने सोनू का अंतिम संस्कार कर दिया था। जीतू गिरफ्तार था। दक्खिन टोला के उसके पड़ोसी सहमे-डरे हुए थे। लोग खेतों में काम करते हुए कनबतिया कर रहे थे। पड़ोसी बच्चे उसे देखकर इधर-हो गए थे। सिर्फ जीतू की घरवाली उसके पास बैठी रोती रही थी।

रामदेई यंत्र चालित-सी प्रधान जी के घर गई थी। उन्होंने बिना किसी भूमिका के कहा था- ‘‘नीले झण्डे वालों के चक्कर में तुम्हारे लौंडों का दिमाग फिर गया है। वहां बारात में जरा-सी बात पर बावेला कर  दिए। सोनू की जान चली गई, बहुत बुरा हुआ। बड़ी मुश्किल से मामला निपटाया है वर्ना तुम्हारे सारे  लोग जेल जाते। जीतू को जल्दी छुड़ा लेंगे।” वे भीतर गए। लौटकर कुछ रुपए रामदेई के सामने धर दिए–  ‘‘सरकार दिहिस है।”

रामदेई कभी सामने पड़े नोट देखती, कभी प्रधान जी के चेहरे को। उसके बोल न फूटे लेकिन आंखों से धार बह चली। प्रधान जी ने अपने एक कारकुन को इशारा किया। उसने रामदेई का अंगूठा पकड़ा, स्याही वाले पैड पर उसे दबाया और एक कागज पर छाप ले लिए। उठते हुए उसने रुपए उठाए और रामदेई की हथेली में दबा दिए थे। कुछ दिन तक कभी-कभी नीले झण्डे वाले आते। वे भी रामदेई से कागज पर अंगूठा लगवाते। कभी रामदेई को लेकर थाने जाते। नारे-वारे लगाते। कुछ दिन बाद सब ठंडा पड़ गया था। रामदेई अकेली रह गई। उसका आदमी बरसों पहले हैजे से चल बसा था। 

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इतने बरस बाद आज फिर अपने द्वारे भीड़ देखकर रामदेई को सांप सूंघ गया। पुरानी स्मृतियों ने उस पर हल्ला बोल दिया। उछल-उछल कर बाहर आने को हो रहे कलेजे को थामे रखने के लिए उसने अपनी हथेली छाती पर कस ली। चेहरे की झुर्रियां सदमे के मारे गहरी हो आईं।

‘‘रामदेई नीक हौ?” प्रधान जी के स्वर में मिश्री-सी घुली थी- ‘‘डी यम सहिब आए हैं कछु बताने।”

डी यम साहेब! उसने नाम खूब सुना है डी यम साहिब का। कभी-कभार सरकारी कार्यक्रमों के मंच पर दूर से देखा भी है। बहुत बड़े हाकिम। सरकार बहादुर। उसके हाथ अपने आप जुड़ गए मगर भीतर का डर और जोर मारने लगा। आज क्या जुर्म हो गया उससे!

‘‘रामदेई,” साहब काला चश्मा उतारकर हंसते हुए कह रहे हैं- ‘‘खाना खिलाओगी?”

रामदेई को अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। वह शायद कुछ गलत सुन गई है।

‘‘हमको नहीं, मंत्री जी को,” साहब ने गम्भीर होते हुए बात साफ कर दी। ‘‘मंत्री जी तुम्हारे यहां भोजन करने आएंगे। जल्दी ही, ठीक है?”

रामदेई के साथ इससे तीखा मजाक क्या हो सकता है! लोग उसकी छाया से भी भागते हैं। मंत्री जी क्यों उसके घर खाना खाने आएंगे! उसका घबराया चेहरा और पीला पड़ गया।

‘‘घबराओ नहीं। तुमको परेशान नहीं होना है। सब इंतजाम हो जाएगा,” डी एम साहब ने उसकी घबराहट देखकर आश्वस्त किया।

‘‘बात ई है रामदेई,” प्रधान जी उसके करीब आ गए। “मंत्री जी और पार्टी तुम दलितन का खास ध्यान राखत है। छुआछूत नाहीं बरतत हैं। यहै खातिर तुमरे हियां खाना खहिहैं। अध्यच्छ जी भी अहिहैं।”

‘‘सरकार!” रामदेई के मुंह से बहुत धीरे से इतना ही निकला। वह तबसे लगातार हाथ जोड़े खड़ी है।

इस बीच डी एम रामदेई की देहरी से भीतर ताक-झांक करने लगे। उनके मातहत दो-तीन अफसर पूरी कोठरी देख आए। फिर पुलिस वालों ने बाहर-भीतर-पिछवाड़े, छप्पर के चारों ओर मुआयना किया। वहीं खड़े-खड़े डीएम ने सबको कुछ निर्देश दिए। इस बीच मजमा जुट गया है। दक्खिन टोला के अलावा बाकी गांव से भी लोग खबर सुनकर चले आए हैं। बच्चे खेलना और हल्ला करना छोड़कर चुपचाप खड़े कौतुक से डीएम और उनकी टोली को देख रहे हैं। महिलाएं रामदेई की तरफ देखकर हंस रही हैं और इशारे कर रही हैं। उसके टोले की महिलाओं की आंखों में ईर्ष्या भी है।

‘‘मन्तरी जी एस सी हैं का!” भीड़ में किसी ने जिज्ञासा की।

‘‘दुर, बांभन हुइहैं!”

‘‘भग बुड़बक! जनते नहीं तो काहे बोलत हौ? राजपूत न हैं! ठाकुर लोग मूंछें खाली-मूली नाहीं ऐंठत ना!”

‘‘भाग सब लोग इहां से!” प्रधान जी ने सबको घुड़का। दो-चार कदम पीछे हटकर मजमा जुटा रहा और अपने-अपने कयास लगाता रहा। बस, रामदेई को जैसे काठ मार गया हो। उसे आवाजें सुनाई दे रही हैं लेकिन दिमाग में कुछ दर्ज़ नहीं हो रहा है।

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अगले दो दिन में रामदेई की झुग्गी में बिजली का लट्टू चमकने लगा। गांव में बिजली पहले से थी लेकिन रामदेई को कभी उसकी जरूरत महसूस न हुई थी। न किसी ने पूछा-गाछा था। आनन-फानन में पास के खम्बे से तार खींच कर लाया गया। उसकी झुग्गी रोशनी से भर गई। सामने बह रही नाली को पाटकर झोपड़ी के पीछे निकाला गया। बस्ती को आने वाले रास्ते और खुली नालियों पर चूने का छिड़काव हो गया। तब रामदेई को विश्वास हुआ कि डी एम और प्रधान जो कह रहे थे, वह गलत नहीं है।

तब उसे गर्व हुआ। लगा कि यह बहुत बड़ी बात है। बड़े गौरव की बात। सोनू कहा करता था- ‘‘देखि लिहो माई, इक रोज बहुजन समाज राज करिहै। बड़का जात सब सीधा रस्ते पै आइ जाई। बहुत अनियाय किए हैं न, सब बराबर हुइ जाई।” वह अक्सर टोकती थी कि क्यों जीतू के साथ नीले झण्डे वालों के पीछे-पीछे भागा फिरता है। तब यही सब कहकर सोनू उसे चुप करा दिया करता था। आज उसे बेटे की बहुत याद आई। उसका गला भर गया। वह होता तो आंखें चमका कर कहता- ‘‘द्याखो, हम का कहिन रहे तोहसे!”  

रामदेई की चाल में ठसक भर गई। गरदन तनिक तन गई। भीतर से खुशी की एक लहर उठी और उसके चेहरे को भिगो गई। सूखी, उदास आंखों में एक तरलता-सी आ गई। बदन उमगने लगा। जैसे, कुछ खास हुआ है, हो रहा है।

फिर उसे एक साथ कई चिन्ताओं ने घेर लिया। कहां बैठाएगी मंत्री जी को? क्या खिलाएगी? उसके पास न ठीक से बिछाने-बैठाने को है, न बर्तन-भांडे। अकेली प्राणी के लिए रोटी-भात का जुगाड़ हो जाता है। लेकिन मंत्री जी के सामने क्या परोसे? अपनी परेशानी लिए हुए वह प्रधान जी के यहां जाने को हुई। तभी भीतर से जैसे सोनू बोल उठा- हमारे यहां खुद से आ रहे हैं माई, छप्पन भोग लगाने थोड़ी न आ रहे। जो रूखा-सूखा होगा वही ठीक से धर देना सामने। वर्ना और कहीं जाते। वह कुछ आश्वस्त हुई। फिर भी कुछ तो व्यवस्था करनी होगी। मोटे-सूखे टिक्कड़ थोड़ी धर देगी उनके आगे! हैं तो पाहुन। कुछ तो करना होगा। छप्पर पर निनुआ की बेल चढ़ी है। तरकारी हो जाएगी। चार-छह पूड़ी तलने भर का तेल हो जाए तो उनका मान हो जाएगा। लाला उधार देने से रहा। दुकान के पास जाते ही दुरदुराने लगता है।

तब उसे अपने ‘खजाने’ की याद आई। दस-दस, बीस-बीस के चंद नोट और कुछ सिक्के उसने कभी एक हंडिया में रखकर कथरी के नीचे फर्श में गाड़ दिए थे। तब मन में क्या रहा होगा, पता नहीं। आज उस खजाने की याद कर वह उमंग से भर गई।

‘‘अच्छा, मंत्री जी की दावत का इंतजाम हो रहा!” सेर भर आटा और बोतल भर तेल देते हुए लाला हंसा- ‘‘तुम्हीं लोगों का जमाना है, रामदेई! चुनाव नजीकै है। हम ऊंची जात वालों को कौन पूछ रहा अब।” रामदेई सौदा लेकर चुपचाप चली आई। वोट पड़े वाले हैं, उसे भी पता है। इस बात का वोट से क्या मतलब। लाला को बर्दाश्त नहीं हो रहा कि कोई मेरे यहां आए!   

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रामदेई को रात ठीक से नींद नहीं आई। रोज से पहले उठकर वह तैयार हो गई। डी एम साहब ने खुशबूदार साबुन-तेल-पाउडर भिजवाया था। कचहरी का कारकुन कल प्रधान के साथ खबर देने आया था। वह कहती रही कि साहब, साबुन से नहाते हैं हम। साफ-सफाई से रहते हैं लेकिन माने नहीं। कहने लगे, मंत्री जी और अध्यक्ष जी का मामला है। नहाकर उसने वही तेल बालों में लगाया। पाउडर का डिब्बा हाथ में लेते ही वह अपने आप से लजा गई। ज़िंदगी में जो कभी हाथ भी लगाया हो! सो, वापस धर दिया। तेल से ही कैसी खशबू आ रही! काम में जुटना ज्यादा जरूरी था। कोठरी से अपनी कथरी उठाकर पिछवाड़े रख आई। बक्से से चादर निकाल कर दो तह करके दीवार के सहारे बिछाई। छप्पर से लटक रहे तरह-तरह के कपड़े-पन्नियां-गठरियां भी कोठरी के पीछे ले गई। स्टील की दो पुरानी थालियां थीं जो मांजने से चमक गईं। पिचका गिलास और लोटा भी साफ करके रख दिया। मटकी में पानी भर कर कटोरी से ढांप दिया।

वैशाख की धूप सुबह से ही कटखन्नी हो जाती है लेकिन रामदेई का पसीना गर्मी से नहीं, उन सिपाहियों को देखकर छूट रहा था जिन्होंने दक्खिन टोला को आने वाले रास्ते और उसकी कोठरी को चारों तरफ से घेर लिया है। रामदेई कोठरी के पिछवाड़े बने चूल्हे के पास बैठी आटा गूंथ रही थी कि धूल उड़ाती गाडियां आईं और देखते-देखते चप्पे-चप्पे पर अफसर और पुलिस वाले छा गए। काली वर्दी में बंदूकें लिए सिपाही उसने पहली बार देखे। काला चश्मा लगाए अफसरों की फौज उसकी कोठरी के बाहर-भीतर आ-जा रही थी। वह उठकर कोठरी में जाने लगी कि देखे, क्या माजरा है। दरवाजे पर तैनात काले चश्मे ने कहा- ‘‘वहीं बैठो अभी। बुला लिया जाएगा।” उसकी तरफ पीठ फेरकर वह प्रधान जी से बतियाने लगा।

रामदेई थोड़े गुस्से और ज़्यादा घबराहट में चूल्हा जलाने लगी। धुंए से उसकी आंखें पनीली हो आईं। बाहर हलचल बढ़ गई। पुलिस की सीटियां और गाड़ियों का ‘टिऊं-टिऊं-टिऊं’ सायरन सुनाई देने लगे। अफसरों की दौड़-भाग और बातचीत तेज हो गए। लगता है मंत्री जी आ रहे हैं। रामदेई की हिम्मत नहीं हुई कि बाहर निकलकर देखे। उसने कढ़ाई में तेल डाला और मंद आंच में चूल्हे पर रख दिया कि धीरे-धीरे गरम होता रहे। दूसरे चूल्हे पर निनुवा की सब्जी तैयार थी। नमक चख कर देख लिया था। उत्सुकता बहुत बढ़ गई तो वह उठी और चूल्हे की तरफ से कोठरी में जाने वाले दरवाजे पर जा खड़ी हुई। पल्ले बंद थे। झिर्री से देखने की कोशिश की तो उसे सिपाही की पीठ दिखाई दी। आवाजों से लगा कि कोठरी में कुछ लोग आ-जा रहे हैं, बोल रहे हैं।

‘‘ए भैया, जब कहें त बताय दिहो। गरम-गरम पूड़ी सेक देव,” उसने सिपाही की पीठ को सुनाया जिस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी। वह वापस चूल्हे के पास बैठकर लोई बनाने और पूड़ी बेलने लगी। बेली रखी रहेंगी तो जब कहेंगे फटाफट सेक देगी। दिल की धड़कन सम्भाले रखने में उसे मुश्किल हो रही थी। कोठरी के भीतर गहमाहमी तेज हो गई। लगता है मंत्री जी आ गए हैं। वह बैठी न रह सकी। उसने दरवाजे की झिर्री पर आंख लगा दी। सिपाही की पीठ के उस पार तेज रोशनी हो रही थी। रह-रहकर बिजली जैसी कौंध रही थी। हंसी-ठट्ठा भी सुनाई दे रहा था। वह समझ गई कि मंत्री जी आ गए हैं। फोटो खींची जा रही हैं। उसका दिल सुबह से ही अपनी जगह नहीं था। अब और कूदने लगा। उसने आंच तेज की और कांपते हाथों से पूड़ी सेकने बैठ गई।

‘‘चलो,” पिछवाड़े का एक पल्ला खोलकर काले चश्मे ने पुकारा। वह यंत्रवत आंचल से हाथ पोछती उसके पीछे चल पड़ी।

‘‘आइए,” दिपदिपाते भव्य चेहरे ने उसकी तरफ हाथ जोड़े। वह आंख न उठा सकी। अफसर ने उसे दो   श्वेत खद्दरधारियों के बीच खड़ा कर दिया। कैमरों के फ्लैश दनादन चमकने लगे।

‘‘मंत्री जी और अध्यक्ष जी आपके यहां खाना खाने आए हैं। आपको कैसा लग रहा है?” सवाल के साथ कई माइक उसके सामने आ गए। तेज रोशनी से उसकी आंखें मुंद गईं। गरदन और नीचे झुक आई।

‘‘आपका क्या नाम है?”

‘‘रामदेई बाल्मीकि,” प्रधान जी ने जोर से बताया।

‘‘बताइए, आपको कितनी खुशी हो रही है?” माइक मुंह के और करीब आ गए। उसका गला सूख गया।

‘‘प्लीज, इन्हें और तंग न किया जाए,” यह रोबीली आवाज मंत्री जी की है या अध्यक्ष जी की, रामदेई नहीं बता सकती। उसे इतना ही होश रहा कि काला चश्मे वाला उसे दोनों हाथों से पकड़कर वापस चूल्हे पर बैठा आया। उसने पूरा लोटा पानी एक सांस में गटका और चेहरे से चूता पसीना पोछने की चिन्ता किए बगैर पूड़ी तलने लगी।

पीछे कोठरी में जोर-शोर से बोलना और हंसी-ठट्ठा जारी रहा। खाना तैयार था। रामदेई सतर्क बैठी रही कि कब आदेश आए और वह थाली परोसे। उसकी घबराहट काबू में नहीं आ रही थी। वह मना रही थी कि सब कुछ जल्दी से निपट जाए तो उसकी सांस लौटे।

कोठरी में एकाएक फिर गहमागहमी बढ़ती सुनाई दी। एक साथ कई लोगों की आवत-जावत। बाहर दूर तक सीटियां बजने लगीं। गाड़ियों के स्टार्ट होने की आवाज आईं और सायरन गूंजने लगे। रामदेई चौंकी। क्या मंत्री जी जा रहे हैं? लेकिन खाना?

उसने एक पल्ले को हलके से धकेल कर देखा। उस तरफ तैनात सिपाही नहीं था। बाहर कुछ लोगों के  बतियाने की आवाजें आ रही थीं लेकिन कोठरी में कोई नहीं था। दीवार के सहारे बिछाई उसकी चादर गायब थी। उसकी जगह साफ-सुथरे गद्दीदार आसन धरे थे जिनके नीचे दरी बिछी थी। आसनों के सामने पत्तलों पर अधखाया खाना और पानी के कुज्जे रखे थे।

रामदेई को अपनी आंखों पर उसी तरह भरोसा नहीं हुआ जैसे उस दिन अपने कानों पर भी नहीं हुआ था कि मंत्री जी तुम्हारे यहां खाना खाएंगे। एकाएक उसकी आंखों के सामने सोनू की लाश घूम गई। सोनू के सीने में गोली मार दी थी बाबू साहब लोगों ने। रामदेई का हाथ अपने सीने पर चला गया। वैसी ही गोली आज उसे भी लगी है।

--नवीन जोशी

('अक्सर' का समकालीन हिंदी कहानी विशेषांक, जनवरी-मार्च 2022)        

 

        

 

 

         

                    

          

                      

          

Friday, March 11, 2022

सशक्त विपक्ष की आमद भी एक उम्मीद

तो, चुनाव तमाशा पूरा हुआ। यूं, राजनीति आज वहां पहुंच गई है जहां लगता है कि सतत चुनाव हो रहे हैं। यह पांच साला लोकतांत्रिक उत्सव नहीं रह गया। संसद के चुनाव हों, विधानसभाओं के या नगर एवं ग्राम पंचायतों के, पार्टियां हर हमेशा चुनावी मोड में दिखाई देती हैं। सबसे अच्छा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है। पांच राज्य विधानसभाओं के परिणाम आने के अगले ही दिन वे गुजरात में रैली करने पहुंच गए। वहां जल्दी ही चुनाव होने हैं। मोदी जी चुनाव जिताने वाला सबसे कामयाब चेहरा जो बन गए हैं।

वर्षों, बल्कि दशकों बाद भाजपा की रिकॉर्ड विजय के अलावा उत्तर प्रदेश के चुनाव ने एक और काम किया है। इस राज्य की चौकोणीय चुनावी लड़ाई सीधे-सीधे दो पार्टियों के संग्राम में बदल गई। भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिला और समाजवादी पार्टी ताकतवर विपक्ष के रूप में उभरी है। यह दृश्य दशकों बाद दिख रहा है। अब तक यहां चार प्रमुख दल सता के दावेदार होते थे। तीस साल से अधिक समय से सत्ता से बाहर रहने के बावजूद राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण कांग्रेस की ठीक-ठाक उपस्थिति रहती थी। सपा, बसपा और भाजपा बाकी तीन मजबूत दावेदार थे। अधिकतर सीटों पर तिकोना संघर्ष तो होता ही था। इस बार भाजपा और सपा की सीधी लड़ाई हुई।

कांग्रेस के हालात पर वर्षों से कहा जा रहा है इसलिए दोहराने की आवश्यकता नहीं। मगर बसपा का सीटों के मामले में कांग्रेस से भी पिछड़ जाना चौंकाता है। वोट प्रतिशत उसका कांग्रेस से बहुत अधिक है लेकिन सीट वह एक ही जीत पाई। चुनाव प्रचार में मायावती के बहुत देर से उतरने पर पहले भी सवाल खड़े किए जा रहे थे लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि उनके समर्पित मतदाताओं में भी उनकी अपील बहुत कमजोर हुई है। सभी राजनैतिक विश्लेषक बार-बार यह चेता रहे थे कि मायावती को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनके दलित मतदाता कहीं नहीं गए हैं। उनको मिला वोट प्रतिशत पिछली बार से भी दस प्रतिशत कम हो गया। राजनीति में मायावती और बसपा की भावी जगह पर लम्बे समय तक चर्चा की जाएगी।

एक और बात जो बहुत साफ है और स्वीकार की जानी चाहिए कि हमारा समाज आज बहुत बंटा हुआ है। चुनाव के समय जिस ध्रुवीकरण की कोशिश राजनैतिक दल करते हैं, वह अब स्थाई हो गया है। हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन और विरोध जन मानस में घर कर गया है। जो लोग यह कह रहे थे कि इस चुनाव में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण नहीं हो पाया, वे नतीजों में उसे देख सकते हैं। ध्रुवीकरण अब सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं रह गया। वह घर की बैठकों, दावतों, चाय अड्डों, खेत-खलिहानों और सोशल मीडिया में हर वक्त की बहस और विवादों का मुद्दा है।

और किस तरह व्याख्यायित किया जा सकता है कि जनता के बड़े-बड़े, ज्वलंत मुद्दे मतदाता के मानस को प्रभावित नहीं कर रहे! जीवन की रोजाना की जद्दोजहद पर समाज का यही बंटवारा हावी है। अन्यथा, एक साल से अधिक चला किसानों का आंदोलन, लखीमपुर कांड, कोरोना की दूसरी लहर का हाहाकार, वगैरह को भुला देने वाली आखिर वह कौन सी बात थी? बड़े-बड़े दावों के साथ दलबदल करने वाले क्यों चुनाव हार गए? और क्यों, भाजपा विरोधी वोट लगभग एकमुश्त समाजवादी पार्टी के साथ हो गए? समाज के इस विभाजन को अनदेखा करना हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती की उपेक्षा करना होगा।

फिलहाल, यह देखना सुखद है कि आज जब विपक्ष छीझ रहा है तब दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार के सामने विधान सभा में विरोधी दल की सशक्त उपस्थिति होगी। विरोधी दल के नेता के रूप में अखिलेश यादव को अपने पिता की इसी भूमिका का इतिहास याद रखना होगा।

(चुनाव तमाशा, नभाटा, 12 मार्च, 2022)                     

Friday, March 04, 2022

ईवीएम की सुरक्षा और पुराने दिनों की याद

रमाबाई रैली स्थल पर स्ट्रॉन्ग रूम बनाकर ईवीएम रखी गई हैं। स्ट्रॉन्ग रूम सील किया गया है। मतगणना के दिन तक उसकी सुरक्षा के पूरे बंदोबस्त किए गए हैं। फिर भी सपा, बसपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता उसके बाहर टेंट डालकर दिन-रात निगरानी के लिए तैनात हैं। सपा कार्यकर्ता विशेष रूप से चौकस हैं। किसी भी सरकारी अधिकारी के उस तरफ जा निकलने पर वे हंगामा मचा देते हैं। उन्हें आशंका है कि सत्तारूढ़ दल के इशारे पर अधिकारी गड़बड़ कर सकते हैं। भाजपा सत्ता में हैं। उसे ऐसी कोई आशंका नहीं है। इसलिए भाजपा के कार्यकर्ता स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर डटे हुए नहीं हैं।

यह देखकर 1977 के चुनाव की याद आती है। वह अलग ही जमाना था। मतपेटियां होती थीं जिन्हें सीलबंद करके कलेक्ट्रेट के कमरों में सुरक्षित रखा जाता था। मतदान के दिन मतपेटियों की लूट के किस्से बहुत होते थे। हिंसा और खून-खराबे खूब होते थे। गोलियां चलाते हुए गुण्डे मतदाताओं और मतदान कर्मियों को भगा देते और फर्जी मतदान करते थे। सफल नहीं होने पर मतपेटियां उठा ले जाते थे। कोई मतपेटियों में पानी डाल देता था। मतपेटियों को रात में चुपचाप बदल देने की शिकायतें भी की जाती थीं। उन दिनों परिणाम को इस तरह प्रभावित कर सकना अपेक्षाकृत आसान था।

आपातकाल की अतियों के कारण 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के विरुद्ध बहुत आक्रोश था। मतदान के लिए लम्बी-लम्बी लाइनें लगीं थीं। कई दलों को मिलाकर बनी जनता के पार्टी के कार्यकर्ता ही नहीं, जनता भी बड़े जोश में थी। पहले मतदान करके और फिर दिन-रात मतपेटियों की सुरक्षा के लिए तैनात होकर आपातकाल की ज्यादतियों का बदला लेने के लिए जनता उमड़ी पड़ी थी। हमें याद है कि हम कुछ युवकों का दल मतदान के बाद अपने बूथ से मतपेटियों का पीछा करते हुए कलेक्ट्रेट तक गया था। वहां पहले से पहरा देते कार्यक्र्ता और आम जनता मौजूद थी। प्रशासन कभी भी मतपेटियां बदल सकता है, ऐसी हवा उड़ती और चारों तरफ शोर मच जाता था। वैसे, उस समय शासन-प्रशासन के अधिकसंख्य अधिकारी-कर्मचारी सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध हो गए थे। बदलाव की बड़ी लहर थी। लोकतंत्र में जनता की असली ताकत का वह प्रदर्शन अद्भुत था।

लगभग तभी से मतदान के बाद मतपेटियों और अब ईवीएम की सुरक्षा के लिए विपक्षी दलों के कार्यकर्ता स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर तैनात होने लगे हैं। बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में टी एन शेषन की सख्त व्यवस्थाओं और फिर ईवीएम से मतदान के कारण स्थितियां काफी बदल गईं। ईवीएम की लूट या उनमें पानी डाल देने जैसी हरकतें अब नहीं होतीं। विपक्ष की आशंकाओं में हालांकि कमी नहीं आई है। पहले तो ईवीएम ही संदिग्ध बना दी गईं कि उन्हें ‘हैक’ किया जा सकता है, कि बटन कहीं और दबाओं तो वोट किसी और को जाता है, आदि-आदि। इनमें कोई भी संदेह साबित नहीं हुआ है। मतदान के दौरान ईवीएम में गड‌बड़ी की शिकायतें अवश्य होती हैं लेकिन वह मशीन की खराबी होती है और शीघ्र दूर कर दी जाती हैं। ईवीएम से चुनाव परिणाम बदल देने की आशंकाएं धीरे-धीरे कम होती गई हैं, हालंकि पराजित विपक्ष ऐसे आरोप अब भी लगाता ही है।

इस बार उत्तर प्रदेश में कड़ा मुकाबला दिखाई दे रहा है। भाजपा मजबूत है लेकिन उसको कड़ी चुनौती मिल रही है। कम से कम माहौल ऐसा बना है कि उसकी सरकार जा भी सकती है। इसी माहौल के कारण विपक्ष, विशेष रूप से सपा में उत्साह है। इसी कारण उसके कार्यकर्ता एवं प्रत्याशी ईवीएम की सुरक्षा के लिए अधिक ही सतर्क हैं। दस मार्च आने में अधिक समय नहीं है।    

(चुनावी तमाशा, नभाटा, 05 मार्च, 2022)   

             

Saturday, February 26, 2022

चुनाव नहीं, पाइथागोरस की प्रमेय भए!

चुनाव अब गणित का जटिल सवाल हो गए। गणित भी सीधा नहीं, पहेली-सा कठिन और उलझाऊ। उसे जीतने का मतलब कठिन समीकरण हल करना होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरुआती चुनाव शायद मुख्यत: इस आधार लड़े लाते जाते हों कि किस पार्टी ने क्या किया, देश और समाज के लिए उसका क्या योगदान है, उसकी क्या योजनाएं हैं, उसके नेताओं का जनता से कैसा व्यवहार है और वे क्या कहते-करते हैं, इत्यादि। जाति-धर्म के आधार पर भी थोड़ा-बहुत वोट पड़ते होंगे लेकिन वह एकमात्र आधार नहीं होता होगा। अब चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया कहने को है। लड़ा तो वह गणित के समीकरणों और शतरंजी चालों से है।

हर क्षेत्र की चुनावी बाजी लैपटॉप पर बिछती है। ‘एक्सल शीट’ पर जातियों-उपजातियों और धर्म के विविध जोड़-घटाव-संयोग रखे जाते हैं। सभी पार्टियों के विशेषज्ञ लैपटॉप पर ही सिर खपाए रहते हैं। किस पार्टी के किस प्रत्याशी को पिछली बार किस जाति-उपजाति का कितने वोट मिले थे, किसने किस आधार पर किसके वोट काटे, विपक्षी अगर इस जाति का या उस उपजाति का हुआ तो कितने वोट किधर जा सकते हैं, कौन प्रत्याशी विपक्षी के वोट काट सकता है और कितने, वगैरह-वगैरह।

दिन-रात लगाया जाने वाला यह गणित इतना जटिल, अनिश्चित फॉर्मूले वाला और चालों भरा है कि इसके विशेषज्ञ तैयार हो गए हैं। प्रशांत किशोर आखिर क्यों बारी-बारी सभी दलों के रणनीतिकार बनने में कामयाब हो जाते हैं? उनका कौशल जमीन पर जनता के बीच नहीं, गणित के इन्हीं सवालों, समीकरणों और जटिल पहेलियों को समझाने-समझाने और हल करने में है। इसी आधार पर उन्हें चुनाव जिताऊ रणनीतिकार माना जाता है। वे मोदी से लेकर ममता तक को चुनाव जिताने का श्रेय ले चुके हैं लेकिन आम मतदाता को उनका नाम भी मालूम न होगा। एक चतुर खिलाड़ी मतदाताओं के वोटों का खेल कर जाता है। क्या पता आने समय में प्रशांत किशोर जैसे हिसाब-किताबियों की जगह ‘आर्टिफीशियल इण्टेलीजेंस’ (कम्प्यूटरी दिमाग) ले ले!

सात-सात चरणों में मतदान ने चुनावी गणित के खेल को फॉर्मूलों में बांध दिया है। पश्चिम में जाट और मुसलमान हैं, रुहेलखण्ड मुस्लिम बहुल है, एक ‘यादव लैण्ड’ है, एक ‘दलित लैण्ड’ है, फिर शहरी मध्य वर्ग का इलाका है और उसके बाद पूर्वांचल के ‘अन्य पिछड़ा’ और ‘अन्य दलित’ इलाके हैं। इसी हिसाब से प्रत्याशियों का चयन होता है और उन्हें दूसरे दलों से तोड़ कर लाया जाता है। नेताओं के भाषण भी इसी हिसाब से तय होते हैं। जो पश्चिम में बोला गया, वह बुंदेलखण्ड में नहीं चलता। यादव बहुल क्षेत्र के मतदाताओं को लुभाने के लिए जो कहा जाता है वह मध्य उत्तर प्रदेश में काम नहीं आता। किसी भी दल के नेताओं के भाषण सुन लीजिए, वे इलाकावार गणित के हिसाब से जुमले गढ़ते और आरोप लगाते हैं। ‘सर्वज्ञाता’ पत्रकार भी इसी गणित में उलझे रहते हैं।

गणित ही तय करता है कि किस जगह किस जाति के वोट काटने के लिए ‘डमी’ खड़ा किया जाए। तीन-चार कोणीय मुकाबला हो तो उसी में ‘वोट कटवा’ ढूंढना आसान हो जाता है। तीसरा और चौथा कोण का चुनावी समीकरण समझना और उसके मुताबिक चाल चलना ‘पाइथागोरस प्रमेय’ की तरह कठिन है और उलझा हुआ। अनेक बार इसकी कोशिश उलटी पड़ जाती है। अब तो पार्टियों में इसके विशेषज्ञ तैयार हो गए हैं। ‘डेटा अनालिस्ट’ नियुक्त किए जाते हैं। वे पिछले कई चुनावों में मतदाताओं के रुख का विश्लेषण करके फॉर्मूला बना देते हैं।

इतना सब करने के बाद भी सवाल गलत होने की पूरी सम्भावना रहती है। ‘इति सिद्धम’ लिख देने से कागज पर सवाल हल हुआ दिखाई दे सकता है लेकिन जमीन पर मतदाता इन विशेषज्ञों से भी चालाक साबित हो सकता है।        

(चुनाव तमाशा, नभाटा, 26 फरवरी, 2022)  

Friday, February 18, 2022

एक ही बड़े नेता पर दारोमदार है दलों का

चुनाव प्रचार का स्वरूप बता रहा है प्रत्याशी महत्त्वपूर्ण नहीं रह गए हैं, पार्टियां और शीर्ष नेता ही सब कुछ हैं। बड़े नेताओं पर ही जीत-हार का दारोमदार रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। वे विधान सभा चुनावों में ही नहीं, उपचुनावों में भी प्रचार करने निकलते हैं। विधान सभा चुनावों में भी लोक सभा चुनाव की तरह प्रचार में उतरते हैं। पार्टी उन्हीं पर निर्भर है।

पहले किसी प्रधानमंत्री को तो क्या, मुख्यमंत्री को भी उप-चुनावों का प्रचार करते नहीं देखा जाता था। अब दृश्य उलट गया है। भाजपा की चुनाव रणनीति पंचायत स्तर के चुनावों को भी हर हाल में जीतने की होती है। यह नई आक्रामक चुनाव रणनीति है। भाजपा की पहचान मोदी से ही है। पहले उनके साथ अमित शाह का भी नाम लिया जाता था। अमित शाह को चुनाव जिताने में माहिर घोषित किया जाता था। अब यह श्रेय भी पूरी तरह मोदी के हिस्से जा पड़ा है। शाह और योगी भी अपने भाषणों में मोदी का नाम बार-बार लेना नहीं भूलते। मोदी युग से पहले भाजपा के पास कम से कम चार-पांच बड़े और बराबर के चेहरे होते थे।  

उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी सिर्फ अखिलेश यादव पर निर्भर है। मुलायम सिंह यादव के स्वास्थ्य कारणों से घर बैठ जाने के बाद कोई दूसरा चेहरा सपा के पास नहीं है। मुलायम के समय सपा में कुछ बड़े नाम होते थे। अब आजम खान ही नहीं शिवपाल भी नेपथ्य में चले गए हैं। कांशीराम के बाद बसपा में मायावती के अलावा कोई दूसरा नेता हुआ ही नहीं या कहिए कि होने ही नहीं दिया गया। कांग्रेस, जो कभी बड़े-बड़े नामी नेताओं के लिए जानी जाती थी, आज राहुल और प्रियंका के भरोसे ही है। सोनिया सक्रिय नहीं हैं।

इसका असर यह है कि अनेक क्षेत्रों में जनता अपने प्रत्याशी को नहीं जानती। कई बार तो उसका नाम भी उनकी जुबान पर नहीं आता। वे पार्टी का चिह्न पहचानते हैं या भी ‘मोदी’ अथवा ‘अखिलेश भैया’ या ‘बहन जी’ को। कौन स्थानीय नेता किस पार्टी से चुनाव मैदान में है, इसका भी बहुत असर इसीलिए नहीं दिखता। ऐसे कई दर्जन प्रत्याशी होंगे जो पिछली बार किसी और दल से चुनाव लड़ रहे थे और इस बार दूसरे दल से मैदान में हैं। चुनाव इतना व्यक्ति या धर्म-जाति केंद्रित हो गया है कि प्रत्याशी गौण हो गया है। अंगुलियों में गिने जाने लायक प्रत्याशी होंगे जिनको जनता उनके काम या व्यक्तिगत छवि से जानती-मानती और जिताती हो।

नेता के बाद मतदाता जिसे पहचानते हैं वह जाति-उपजाति है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद से चुनावी राजनीति में सामाजिक न्याय का जो बिगुल बजा उसने भी प्रत्याशी पर उसकी जातीय पहचान को महत्वपूर्ण बनाया। प्रत्याशी को जानें या न जानें, वह कल ही राजनीति में आया नौसिखिया हो, जाति के आधार पर चुनाव में सशक्त दावेदार हो जाता है। सामाजिक न्याय का मुद्दा ही वैचारिक राजनीति को भी संचालित करता है। वैसे, विचार और सिद्धांत आधारित राजनीति थोड़ा-बहुत वामपंथियों के हिस्से रह गई लेकिन उनकी जगह चुनावी राजनीति में सिकुड़ती गई है।

इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस पार्टी के अन्य बड़े नेताओं के पर कतरने की जो प्रवृत्ति शुरू हुई थी, वह अब सभी पार्टियों ने अपना ली है। प्रतिफल सामने है। हर पार्टी में एक ही बड़ा नेता है। दूसरा जो भी उसके बराबर होने की कोशिश करता है, उसका कद छोटा कर दिया जाता है। चुनावी जीत उसी नेता के सिर पर सेहरा बांधती है। वह इतना ताकवर होता है कि पराजय का चोला दूसरे को पहना देता है। 

(चुनावी तमाशा, नभाटा, 19 फरवरी, 2022)      

   

       

Tuesday, February 15, 2022

लोक गाथाएं खोलती हैं समाज, संस्कृति और इतिहास की परतें

प्रयाग जोशी उत्तराखण्ड के विरले लोक-अध्येता हैं। विरले इसलिए कि उन्होंने ‘लोक’ का अध्ययन लोक के बीच जाकर और जीकर किया है। 1966 में एम ए करने के बाद जब वे पुरौला (उत्तरकाशी) इण्टर कॉलेज में अस्थाई अध्यापक नियुक्त हुए, तभी से वे अपनी जिज्ञासाएं लेकर गांव-गांव भटकने लगे थे। वहीं से लोक जीवन को समझने यानी कि लोक गीतों, होलियों, लोक कथाओं और लोक गाथाओं को सुनने-संकलित करने की शुरुआत हुई। बाद में पहाड़ के कुछ कॉलेजों में अध्यापन करने, पीएचडी करने के दौरान और फिर रायबरेली के एक डिग्री कॉलेज में 28 साल अध्यापन करते हुए भी वे एक नियमितता से उत्तराखण्ड के सुदूर अंचलों में घूमते रहे। वनराजियों के जीवन का अध्ययन करने का उनका बड़ा काम भी इसी लोक-यात्रा से निकला। इस श्रम-साध्य अध्ययन-संकलन के परिणाम स्वरूप कई मूल्यवान संग्रह हमें उनकी किताबों के रूप में मिलते रहे हैं। आज 79 वर्ष की आयु में भी वे अपने देखे-जाने-सुने का विवेचन-विश्लेषण करने में लगे हुए हैं।

पिछले वर्ष प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘उत्तराखण्ड की लोक गाथाएं-एक विवेचन’ उनके अध्ययन-संकलन की व्यापकता और गहराई का सुंदर उदाहरण है। हालांकि यह पूर्व में प्रकाशित उनकी दो पुस्तकों का  परिवर्धित संस्करण है, लेकिन दोनों को समेटने और नया जोड़ने से यह काफी कुछ नई बन गई है। अपनी लोक थात के संग्रह में उनका एक अद्वितीय काम सुदूर क्षेत्रों के लोक गायकों, वादकों, नर्तकों से सुन-सुनकर लोक गाथाओं के विविध रूपों का अंकन, उनका अध्ययन और विश्लेषण है। वे सीधे लोक से सुनी गाथाओं में उस समाज की संस्कृति की जड़ें तलाश करते हैं। इस तलाश में इतिहास, जीवन-पद्धति, राज व्यवस्था, राजनय, युद्ध, कृषि, वन्यता, जाति व्यवस्था, स्त्रियों का हाल और देवी-देवताओं की मान्यताएं और पूजा पद्धतियां सभी शामिल हैं। इस तरह सम्पूर्ण उत्तराखण्डी समाज का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्वरूप वे सामने लाते हैं।

शुरू में ही प्रयाग जोशी का ध्यान इस ओर गया था कि उत्तराखण्ड की लोक सांस्कृतिक और भाषाई विशेषता पर तो काफी कुछ लिखा गया है लेकिन “सबसे ज्यादा अनखोजी और अप्रकाशित रह गई हैं लोक गाथाएं।” गढ़वाल में अवश्य डॉ गोविंद चातक ने लोक गाथाओं के संकलन का कुछ काम किया था जबकि “कुमाऊं अंचल ने कहावतों और मुहावरों पर ही ध्यान केंद्रित कर रखा था।” तब प्रयाग जी ने ठानी कि डॉ चातक की ही तरह वे भी लोकगाथाओं पर काम करेंगे। वास्तव में प्रयाग जी ने डॉ चातक से आगे कदम बढ़ाए। उन्होंने पूरे उत्तराखण्ड को अपने अध्ययन-संकलन का केंद्र बनाया।  

प्रयाग जोशी जब ‘लोक गाथा’ की बात करते हैं तो उनका एक विशिष्ट मंतव्य होता है। वे गाथाओं को  लोक कथाओं या लोक काव्य में अंतर्निहित कथाओं से अलग करते हैं। जिन अध्येताओं ने लोक गाथाओं से कहानियां निकाल कर पेश कीं, उसे भी प्रयाग जी वस्तुत: लोक गाथाओं का अत्यंत सीमित अध्ययन मानते हैं। उनका मानना है और सही मानना है कि लोक गाथाएं निरी कहानियां न होकर कथ्य-काव्य-गायन-अभिनय-नर्तन-वर्णन का सम्मिलित रूप हैं। इसीलिए लोक गाथाओं का वास्तविक अध्ययन उन्हें सीधे प्रस्तोताओं के मुंह से सुनकर, देखकर, अनुभवकर, गुणकर और उन्हीं से उनमें प्रयुक्त शब्दों, शैलियों, आदि को समझकर ही किया जा सकता है। जिन अध्ययेताओं ने गाथाएं गायकों से सुनकर ही लिपिबद्ध कर लीं हैं, वे इसी कारण अपनी सम्पूर्णता नहीं व्यक्त नहीं हो सकतीं। फिर, एक ही लोक गाथा के कई-कई रूप हो सकते हैं। यह गाथा के प्रस्तोताओं के निजी कौशल पर निर्भर है। इसलिए एक गाथा की एकाधिक श्रुतियां दर्ज करके उनका अध्ययन-विश्लेषण करना होता है। अपने पूर्ववर्ती और समकालीन अध्येताओं (डॉ गोविंद चातक, डॉ कृष्णानंद जोशी, डॉ उर्वादत्त उपाध्याय, आदि) को श्रेय देते हुए भी प्रयाग जी उनकी ऐसी कमियों को इंगित करते हैं। वे ‘हिमालयन फोकलोर’ के संकलनकर्ताओं, ओकले और गैरोला के लिए भी कहते हैं कि “कथा और गाथा को एक ही चीज समझा जाता रहा।” बल्कि, “ओकले को कथा और गाथा का भेद मालूम था पर जो चीज दिमाग में थी वह कृति में झलकी नहीं।”

तो, समझा जा सकता है कि प्रयाग जी लोक गाथाओं को कितनी गहराई से और अभिव्यक्ति के कितने रूपों में देखते हैं। उनका यह कथन देखिए- “सम्पूर्ण लोकगाथा भाषा में नहीं अंटती। स्वर लिपि में उसके संगीत को लिखना पड़ता है। वाद्यों में बजाना पड़ता है। वह मुक्ताकाशी मंच पर लोक के सम्मुख उतरती है।” इतना ही नहीं, “चरम क्षणों में गाथा, कथानक को छोड़ देती है और वह लय व ध्वनि की अनुगामी मात्र रह जाती है। उस समय केवल वाद्य बजते हैं। आलाप, टेक व नाच ही मुख्य हो जाते हैं।” और यह भी कि “अमूर्त प्रकृति के भीतर से भी संवाद फूटते दिखते हैं। आकाश बोलता है। दिशाएं बोलती हैं। हवाएं और भूत-प्रेत बोलते हैं। यह लोकगाथा में ही सम्भव है कि आकाश प्रश्न उछाल दे और गाथा प्रस्तोता के सामने उसका उत्तर देने की विवशता खड़ी हो जाए।” इतनी गहराई तक जाकर लोकगाथा को नहीं समझेंगे तो क्या नतीजा निकलेगा? “सामान्य संग्राहक या ले उड़ने वाला शोधार्थी, गाथा प्रस्तोता से आधा-अधूरा जैसा भी सुनता जाता है, वैसा ही लिख मारने की जल्दबाजी में कथ्य या वस्तु की कथन चारुता तक पहुंच ही नहीं पाता। यही वजह है कि लोक संवादों में निहित अर्थ-विदग्धता संकलित किताबों में देखने को नहीं मिलती।”

प्रयाग जी लोक गाथाओं में इतने गहरे उतरते हैं तो उन्हें वहां समाज की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक जड़ें दिखाई देती हैं। वे गाथाओं में इतिहास के सूत्र खोज लाते हैं और इतिहास के उद्धरणों से उनका मोटा-माटी मिलान करते हैं। रंवाईं के ‘बरमौ’ एवं ‘हारुलों’ में या जोहार के ‘गरखा’ या कत्यूरियों की ‘भिवाई’ में राज परिवारों की वंशावली ही नहीं मिलती, उस सदी के ऐतिहासिक सूत्र, युद्धों या रणनीतियों के संकेत भी प्रयाग जी देख लेते हैं। “14वीं सदी से लेकर 16वीं सदी तक के कत्यूरी खानदान से जुड़ी लोक वार्ताओं में इतिहास और गाथा तत्वों का जितना ही घालमेल देखने को मिलता है, जौनसारी हारुलों में  उतने ही निखालिस इतिहास के वाकए उपलब्ध होते हैं। उनमें इस्तेमाल होने वाले ‘मोगल’ और ‘पठान’ जैसे शब्दों से निस्सन्देह कहा जा सकता है कि 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 17वीं सदी के पूर्वार्द्ध में घटित हुई घटनाओं की सूचना दे रहे हैं।” इस पुस्तक के ‘मौखिक परम्पराओं में इतिहास के खोज’ शीर्षक अध्याय में लोकगाथाओं के ऐसे कितने ही प्रसंग और सम्बद्ध ऐतिहासिक घटनाओं के उद्धरण दिए गए हैं। यहां ‘खोज’ का अर्थ आविष्कार नहीं, ‘चिह्न’ है।

पूजा पद्धतियों, अनुष्ठानों, पर्वों, आदि से जुड़ी लोक गाथाओं में रामायण, महाभारत, स्थानीय देवी-देवताओं के किस्सों के अलावा स्थानीय जनजीवन के विविध रूप, जैसे फसलें, नदी, पर्वत, पशु-पक्षी और मानव जीवन के तत्कालीन रूप दिखते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति से मनुष्य के तादात्म्य और संवाद के रोचक वर्णन आते हैं। प्रकृति का मनोहारी वर्णन करता है गाथा सुनाने वाला। “संज्या’ (संध्या) गाय की पूंछ में बैठकर आती है। वह दिन के कामों से थकी स्त्री के आंचल में दुबकी है।” उधर, किसान की समस्याएं भी बोलती हैं- “जोड़ी का एक बैल बूढ़ा हो गया है। गोठ में बहड़ा है, पर हल में जुतना सिखाने वाला हलवाहा नहीं मिल रहा। खेती के उपकरण, पथरीली सारियों में टूट जाते हैं। कुदाली, हंसिया, दरांती, आंसी, कसी-खंते तरेरने होते हैं। लोहार दूर घने जंगल के करीब बसते हैं। यत्र-तत्र बिखरे खेतों की किसानी की दिक्कतों को कई गुना बढ़ा देने वाली हू-ब-हू तस्वीरें रमौल गाथाएं पेश करती हैं।”

लोक गाथाओं में समाज का जातीय वर्गीकरण भी खूब दिखाई देता है- “जाति, वर्ण और समुदायों के बंटवारे में परम्परा के भी हिस्से हुए।... पहले उसमें सारा स्त्री समुदाय साझीदार था। गाथा गीतों में बामन स्त्रियों का कब्जा हो जाने से उनमें व्रत, अनुष्ठान, कथा श्रवण, प्रचारार्थ फलश्रुति जैसी पौराणिकता का चस्पा हुआ है। परंतु ‘अठवाली’ के उत्तरार्द्ध के गाथा गीतों में सनातन स्त्री विद्यमान है। वह जाति, वर्ण, धर्म, संस्कृतियों के भी दायरे से ऊपर है।”

प्रयाग जी का अध्ययन-संकलन गहरा ही नहीं, व्यापक है। वे पूरे उत्तराखण्ड की विविध लोक गाथाओं का अनेक प्रकार से विश्लेषण करते हैं और देश के विविध अंचलों में व्याप्त समानधर्मा परम्पराओं से उनका जोड़ भी बैठाते हैं। पता चलता है कि समाज, प्रकृति और जीवन-व्यापार की प्रवृत्तियां अनेक बार एक जैसी होती हैं- “मणिपुर के अंचलों का वसंतरास, गुजरात का गरबा डांडिया और जौनसार का तांडिया रास किसी न किसी स्तर पर अंतर्सूत्र के सम्बंध का सुराग देते हैं। … दादरा, नागर हवेली का ‘चाला’ कुमाऊनी ठुलखेत की ‘चाली’ से केवल नाम-लिंग में ही अलग है।”

‘लोकगाथाओं की सांस्कृतिक शब्दावली’, ‘शब्दावली के ऐतिहासिक सत्यापन’, और ‘लोकगाथाओं के एकाभिनय’ सम्बंधी अध्याय अत्यंत रोचक हैं। लोक गाथा सुनाने वाला ऐसे-ऐसे शब्द कहता है जिन्हें समझना या उसके संदर्भ तलाशना आसान नहीं होता। प्रयाग जी ने ‘जैसा सुनाया वैसा ही लिख दिया’ नहीं माना, बल्कि गायक से उसके अर्थ और संदर्भ भी पूछे और उन्हें तत्कालीन सामाजिक संदर्भों से मिलाकर उनके अर्थ लगाए। “अचकनुं, छ्यालनुं, बिसूण, पैर-पाड्., ठ्यापा जैसे शब्दों का दूसरा ही सौंदर्य है। वे या तो ध्वन्यर्थक हैं या हरकतों के व्यंजक। मानसिक स्थितियों को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल हुए शब्द रंड़क, दणमण, मणसेण, अल्पण-कल्पण, रंगतालो-भंगतालो जैसे शब्दों से विशेषण, साभिप्राय विशेषण शब्द गाथाओं के गायन में बनते चले जाते हैं। ‘रुड़क्योलि’ सांझ आसमान से उतरती है। ‘सुड़सुड़ी’ धाद लगती है। ‘भौंर्याली आंखें’ घूमती हैं। ‘लुपलुपिया’ कोहरा घिरता है। फूलों की ‘ढकमक’ होती है। ‘झुमझुमियां’ वर्षा होती है। प्रकृति चारों ओर ‘रोश्यार-पोश्यार’ बिखेरती है। बादलों के छंटने के बाद ‘झुमक्याला’ घाम आता है।” किताब के दो अध्यायों में प्रयाग जी हमें गाथाओं में प्रयुक्त ऐसी अद्भुत शब्दावली से परिचित कराते हैं तो मन ‘रंगतुंगा’ जाता है। एक कसक भी उठती है कि अपनी कथित ‘विकास यात्रा’ में हमारे समाज ने कैसी सशक्त शब्दावली खोई है। क्या ही अच्छा हो कि प्रयाग जी ऐसा शब्द कोश ही बना दें।

एक महत्त्वपूर्ण अध्याय लोक गाथाओं के पारम्परिक गायकों और उनकी जातियों पर भी है। एक अन्य अध्याय में प्रयाग जी की सतर्क दृष्टि कहती है- “घुटनों तक खिंची हुई मिर्जई, चूड़ीदार पायजामा, सिर पर पगड़ी बांधे दरबारी जैसा दिखने वाला व्यक्ति, हाथ में पकड़े हुए हुड़ुके की थाप पर गाथा गायन के कारण ही ‘हुड़क्या’ कहा जाने लगा होगा। हुड़क्या उसकी जाति नहीं थी।... कालांतर में यह शब्द व्यावसायिक जाति-विशेष का सूचक बन गया।” गायकों, उनकी जातियों और उनके संरक्षण वाले अध्याय में वे विस्तार से गाथा प्रस्तोताओं की जातियों-उपजातियों की इलाकेवार चर्चा करते हैं। बाजित्री या बाजगी या औजी या ढोली या झुमर्या या दमाई मूलत: लोक वाद्यों के शिल्पी और कलाकार हैं लेकिन हैं वे अस्पर्श्य। डोलियां ढोने वाले कोलटा या कोली असवर्णों में सबसे छोटी मानी जाती है। ‘दास’ भी असवर्णों में गिने जाते हैं। हुड़क्या या बाद्दी या मिरासी मूलत: गाने वाले हैं। क्या त्रासदी और विडम्बना है या कहिए कि साजिश है कि उत्तराखण्डी समाज की पूरी संस्कृति का वाहक और रक्षक समाज अछूत बनाकर रखा गया। नाम उन्हें ‘शिल्पकार’ का दिया गया लेकिन कलाकार का सम्मान और ओहदा नहीं। वे सवर्ण समाज की दया और दान पर ही बसर करते रहे। प्रयाग जी उन्हें लोक गाथाओं के ‘पारम्परिक प्रकाशक’ कहते हुए दर्ज करते हैं कि “वे हमसे अच्छे संग्रहकर्ता हैं क्योंकि उन्हें विरासत से इसका (मौखिक) अभ्यास है।”

उनकी यह टिप्पणी शोध-अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण है कि “लोक कवि, लोक आख्यान, लोक प्रबंध जैसे शब्दों का प्रयोग करके बैठ-बैठे दूसरों द्वारा संकलित किए गए पाठों का विश्लेषण करके होशियारी दिखाने वालों को लोक गायक जातियों से सीधा परिचय बढ़ाना चाहिए।” उनकी यह पीड़ा किताब में कई जगह व्यक्त हुई है कि ‘लोक’ के नाम पर रोजगार चलाने वाले लोक गाथा गायकों और ग्रामीण जन से प्रत्यक्ष सम्वाद करते ही नहीं।

इस पुस्तक में प्रयाग जी ने गंवरा-महेसर वाली ‘आठूं’ की लोक गाथा का गाथा-रूपक भी रचा है जिसे मय संगीत मंच पर अभिनीत भी किया जा सकता है।  

प्रयाग जोशी चुपचाप यह महत्त्वपूर्ण काम करते आए हैं। लोक के गम्भीर और जमीनी अध्ययन की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। स्व-प्रचार और नकल का हल्ला है। इसलिए भी उनके मौलिक काम की ओर कम ध्यान गया है। लगभग गुमनाम प्रकाशकों से प्रकाशित उनकी पुस्तकें अचर्चित ही रह गईं। कम से कम ‘लोक अध्येता’ कहाने वालों को तो उनका काम देखना-गुनना चाहिए। और, उनके काम को देखने-समझने की कुंजी भी वे बता देते हैं- “मैंने लोक विधाओं को उनमें ही मौजूद मानकों से समझने की कोशिश की है। मेरी क्रियाशीलता किताब की शैली के निर्माण में नहीं रही है। मैं लोकावलोकन में ही सक्रिय हूं।”

देहरादून के ‘समय साक्ष्य’ प्रकाशक ने प्रयाग जी की यह पुस्तक छाप तो दी लेकिन प्रूफ संशोधन पर कतई ध्यान नहीं दिया। एक शानदार किताब में अनगिन अशुद्धियां सुस्वादु भोजन में मिट्टी की तरह किरकिराती हैं।

-न जो, 14 फरवरी, 2022      

Friday, February 11, 2022

असफलताओं पर पर्दा हैं ‘फ्री’ वाले वादे

 

चुनावी रैलियों-भाषणों में अमर्यादित भाषा और आरोप छाए हुए हैं तो पार्टियों के चुनाव घोषणापत्रों में  लुभावने वादों की बहार है। 300 यूनिट तक फ्री बिजली देने की बात पहले एक दल ने की। अब एक से अधिक दलों ने यह वादा दोहरा दिया है। किसानों को लुभाने में सभी लगे हैं। सो, उन्हें ऋण माफी से लेकर फ्री बिजली देने के वादे हो रहे हैं। फ्री लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और सायकिल पुरानी बातें हो गईं। अब स्कूटी का जमाना है। लड़कियों को फ्री स्कूटी बांटने का वादा पहले कांग्रेस लाई। फिर भाजपा ने भी दोहरा दिया यही वादा। अब दोनों इस बात पर भिड़े हुए हैं कि किसने किसका वादा चुरा लिया।

तमिलनाडु से सम्भवत: इसकी शुरुआत हुई थी। द्रविड़ दलों की चुनावी लड़ाई इतनी तीखी हुई कि फ्री रंगीन टीवी तक बांटे गए। धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति पूरे देश में फैल गई और राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने भी इसे अपनाना शुरू किया। शुरू में इसकी बड़ी निंदा होती थी। समाज का सचेत वर्ग और कुछ राजनैतिक दल भी इसे मतदातों को रिश्वत देने जैसा मानते थे। चुनाव के समय नकद बांटना अपराध है तो चुनाव के समय वादा करके बाद में बांटना क्या कहा जाएगा?

एक बार चुनाव से कुछ पहले अटल जी के जन्म दिन पर लाजजी टंडन ने लखनऊ में एक समारोह करके महिलाओं को साड़ियां बांटी थी। उस समारोह में मची भगदड़ में कई मौतें हुई थीं। इस हादसे के लिए ही नहीं, मुफ्त साड़ियां बांटे जाने की बड़ी निंदा हुई थी, हालांकि तब तक चुनाव आचार संहिता लागू नहीं हुई थी। अब तो चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद भी मतदाताओं को खुले आम ऐसे लालच दिए जाते हैं, जिन पर निर्वाचन आयोग की नज़र जानी चाहिए लेकिन जाती नहीं। अब सब चलने लगा है।

हमारे यहां चूंकि राज्य की अवधारणा ‘कल्याणकारी’ की है, इसलिए यह माना जाता है कि सरकारें गरीब-गुरबों, निराश्रितों, बेघरों, आदि की मदद करेंगी। यह सरकार का दायित्व माना गया है कि कोई भी भूखा और बेघर न रहे, कोई शीत से प्राण न गंवाए। सस्ती दरों पर राशन और इलाज उपलब्ध कराने की योजनाएं इसी दर्शन के अनुसार बनाई जाती रहीं। वे चुनावी लालच का हिस्सा नहीं थीं।

अब तो बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा भी चुनावी होकर रह गया है। घोषणाएं होती हैं कि सरकार में आने पर दो करोड़ नौकरियां देंगे। रोजगार सृजित करना सरकारों का दायित्व है। जो दायित्व है, उसे लुभावना वादा क्यों बना दिया गया? यह अलग बात है कि सरकारें रोजगार देने में विफल होती हैं। सरकारी यानी जनता का धन ऐए-ऐसे कार्यों में व्यय किया जाता है जो उत्पादक नहीं होता यानी जिनसे रोजगार सृजन नहीं होता। इसीलिए बेरोजगारी बढ़ती है और फिर चुनाव जीतने के लिए फ्री चीजों का लालच दिया जाता है।

जनता के बड़े वर्ग को फ्री चीजों की ऐसी लत लगा दी गई है कि वे चुनावों का इंतज़ार करने लगे हैं। यह एक तरह से अपनी विफलताएं छुपाने की चाल है। इस आड़ में जनता को निकम्मा बनाने का काम भी हो रहा है। जनता सरकार से सवाल पूछने की बजाय फ्री वस्तुओं का इंतज़ार करती है। यह बहुत खतरनाक है। हमारे एक बैंक कर्मी मित्र बताते हैं कि अधिकतर किसान बैंकों से ऋण लेकर उसकी अदायगी जान-बूझकर नहीं करते। कारण यह कि चुनाव के समय सभी दल ऋण माफी के वादे करते हैं और जीतने पर कर भी देते हैं। ऐसे ही, लोगों को फ्री गैस कनेक्शन, फ्री आवास, फ्री राशन और नकदी का भी इंतज़ार रहने लगा है।                         

जितनी अधिक विफलताएं, उतने अधिक फ्री वादे।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 12 फरवरी, 2022) 

     

Friday, February 04, 2022

राजनैतिक जिह्वा पर चढ़ी कैसी शब्दावली!

भाषा पर गौर कीजिए। शब्द चयन देखिए। हाथों के इशारे, चेहरे की भंगिमा और आंखों का घूरना देखिए। तेवर देखिए और गर्जना सुनिए। लग रहा है कि चुनाव लड़ा जा रहा है? मतदाताओं को लुभाने, समझाने की कोशिश हो रही है या दुश्मनी निभाई जा रही है? विरोधी की कमियां और अपनी अच्छाइयां बताई जा रही हैं कि मार-काट का ऐलान हो रहा है? चुनाव मैदान में प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी हैं या पुरानी रंजिशों के खूंख्वार वारिस?

साल-दर-साल राजनैतिक शब्दावली ऐसा रूप लेती जा रही है कि लगता है, अपने यहां लोकतंत्र नहीं गुण्डागर्दी है। चुनाव क्या लड़ा जाता है, महाभारत का युद्ध हो जाता है जहां मर्यादाओं को तार-तार हुए भी युग बीत गए। अब तो लगता है बस, प्रतिदवंद्वी को ज़िंदा ही खा जाने वाले हैं। ‘देख लेंगे’, ‘औकात बता देंगे’, ‘गर्मी निकाल देंगे’, ‘बदला लेंगे’, और भी जाने क्या-क्या! सुनते ही कान में गरम सीसा-सा पड़ने लगता है। बोलने वाले जन-प्रतिनिधि हैं या होने वाले हैं, वे देश-प्रदेश की नीतियां और समाज का भविष्य निर्धारित करने वाले हैं। छोटे-बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे या उसके दावेदार नेताओं की भाषा हमारे संविधान, लोकतंत्र और राजनैतिक व्यवस्था के संदर्भ में कैसी ठहरती है?

चुनाव सभाओं के मंच या डिजिटल रैलियों में ही नहीं, प्रसार माध्यमों के लेखों, भाषणों, बातचीत और प्रसारणों की भाषा भी मर्यादा, नैतिकता और मानकों का खुलकर उल्लंघन करने लगी है। चुनाव प्रचार में निष्पक्षता और सभी दलों को बराबर अवसर देने के लिए आकाशवाणी और दूरदर्शन पर सभी राजनैतिक दलों को जनता के सामने अपनी बात रखने के लिए एक निश्चित समय दिया जाता है। राजनैतिक दलों से लिखित भाषण मांगे जाते हैं जिन्हें एक तटस्थ समिति चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार जांचती और स्वीकृत करती है। पिछले कई चुनावों से इस समिति का सदस्य बनने का अवसर मिलता रहा है।

कुछ वर्ष पहले तक राजनितिक दलों की प्रचार सामग्री में शालीनता होती थी। मंच पर नेता चाहे जितने अनर्गल और अपुष्ट आरोप लगाएं, लिखित भाषणों में संयम दिखाई देता था। अब ऐसा नहीं है। प्रसारण के लिए प्रस्तुत इन भाषणों में में भी आपत्तिजनक शब्दावली खुलकर प्रयोग की जाने लगी है। एक-दो चुनाव पहले तक ऐसे शब्दों या वाक्यांशों को काटे जाने पर वे मान भी जाते थे लेकिन अब उसे सही ठहराने के लिए तर्क-कुतर्क करने लगे हैं। इसे भी कटु और व्यकतिगत होती राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता का प्रमाण माना जा सकता है।

निर्वाचन आयोग ने भी शायद इस बदलते महौल को स्वीकार कर लिया है। सार्वजनिक मंचों पर राजनैतिक दलों के बड़े नेता भी जिस भाषा का प्रयोग करने लगे हैं, उस पर उसका ध्यान नहीं के बराबर है। पिछले लोक सभा चुनाव में भी आपत्तिजनक शब्दावली खूब सुनने को मिली थी और आयोग से शिकायतें भी की गई थीं। कुछ शिकायतों पर उसने ध्यान ही नहीं दिया था और कुछ को अस्वीकार कर दिया था। जिन कुछ शिकायतों पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, उसमें ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई जिससे कि नेताओं की जुबान पर लगाम लग सके।  

चुनावी जय-पराजय चूंकि धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण पर अधिकाधिक निर्भर होती गई है, इसलिए इसी आधार पर वैमनस्य फैलाने वाली भाषा का अधिकाधिक उपयोग होने लगा है। रैलियों-सभाओं में जातीय समूहों और धार्मिक गुटों को ललकारते हुए नेता सुने जा सकते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल ऑडियो-वीडियो तो अत्यंत भड़काऊ हैं। इन दिनों वैसे भी चुनाव प्रचार डिजिटल हो गया है, ये आपत्तिजनक ऑडियो-वीडियो संदेश निर्बाध फॉर्वर्ड किए जा रहे हैं। इन पर प्रतिद्वंद्वी समूहों में गाली-गलौज भी होती रहती है।

शायद अब यही ‘न्यू-नॉर्मल’ है!

(चुनावी तमाशा, नभाटा, 5 फरवरी, 2022)