Friday, June 11, 2021

नेताओं के गोद लेने से सीएचसी सुधर जाएंगे?

इधर जाने-अनजाने अच्छी बात यह हुई मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अपने मंत्रियों-विधायकों से कहा है कि वे अपने-अपने इलाकों में सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) को ‘गोद’ लें। उन्होंने स्वयं भी गोरखपुर के चार सीएचसी को गोद ले लिया है। आशा है कि इससे इन स्वास्थ्य केंद्रों की हालत कुछ सुधरेगी। स्वास्थ्य विभाग पर दबाव पड़ा है कि वह सीएचसी में डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित करे। जिलों के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक सक्रिय हुए हैं।

प्रदेश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत किसी से छुपी नहीं है। कहीं इन केंद्रों पर ताला लटका रहता है  और  कहीं डॉक्टर या अन्य चिकित्सा कर्मी नहीं मिलते। बहुत दूर से चारपाई पर लादकर लाई गई महिला ताला बंद सीएचसी के बाहर प्रसव को विवश होती है या कोई बीमार बुजुर्ग इलाज के इंतज़ार में दम तोड़ देता है। कोविड महामारी ने इन स्वाथ्य केंद्रों की बदहाली और भी उजागर की। अगर वे प्राथमिक चिकित्सा दे पाने में भी सक्षम होते तो गांवों-कस्बों में कोविड मरीजों की मौतों का सिलसिला भयावह नहीं होता। बड़े शहरों के अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन के लिए मारामारी इसलिए भी मची कि आसपास के ग्रामीण इलाकों से मरीज निरंतर लाए जा रहे थे।

वैसे, यह ‘गोद लेना’ जनप्रतिनिधियों से अक्सर सुनाई देता है। कभी कोई किसी गांव को गोद लेता है कोई किसी संस्थान को और कोई किसी गरीब-लाचार बच्चे को। शुरुआती प्रचार और कुछ औपचारिकताओं के बाद धीरे-धीरे गोद लिए गए गांवों/संस्थानों/बच्चों को भुला दिया जाता है। हमारे जनप्रतिनिधियों की ‘व्यस्तता’ रचनात्मक कामों में कम, अन्यत्र अधिक होती है। यह ‘अन्यत्र’ ही उनकी राजनीति का आधार होता है। रचनात्मक काम थोड़ी प्रशंशा तो दिलाते है, चुनाव नहीं जिता पाते।

खैर, जिलों के सीएमओ पर स्वास्थ्य केद्रों में डॉक्टरों की तैनाती करने का दबाव बना है। प्रदेश में डॉक्टरों की वैसे ही बहुत कमी है और जो किसी स्वास्थ्य केंद्र में भेजे जाते हैं तो वे भी वहां से शहरों की ओर वापसी का राजनैतिक जुगाड़ भिड़ा लेते हैं। मानक तो यह है कि एक लाख की आबादी पर एक सीएचसी और तीस हजार की आबादी पर एक पीएचसी होने चाहिए लेकिन कई सीएचसी पर तीन से चार लाख तक की आबादी का दबाव है। यही हाल पीएचसी का है। एक सीएचसी में महिला रोग विशेषज्ञ और एक शल्य चिकित्सक समेत कम से कम पांच डॉक्टर होने चाहिए। उसमें तीस बेड और सभी उपकरणों से युक्त एक-दो ऑपरेशन कक्ष होने चाहिए। इमारतें तो यह तंत्र फटाफट खड़ी कर देता है लेकिन बाकी सुविधाएं देने में फिसड्डी साबित होता है।

गोद लेने का वास्तविक अर्थ क्या होगा? क्या सिर्फ उनकी निगरानी? कुछ जनप्रतिनिधियों ने सीएचसी गोद लेकर उनकी मॉनीटरिंग के लिए समिति बना दी हैं, जिनमें सीएमओ, एसडीएम से लेकर पार्टी के लोग भी शामिल हैं। यह समिति क्या कर पाएगी? प्रदेश में सबसे बड़ी कमी डॉक्टरों की है। सर्वोच्च प्राथमिकता यह देखने की होनी चाहिए कि प्रादेशिक चिकित्सा सेवा (पीएमएस) में डॉक्टर खुशी-खुशी आते क्यों नहीं और आ गए तो उससे निकलने का प्रयास क्यों करते रहते हैं। जिलों में तैनात सरकारी डॉक्टरों को एक एसडीएम भी जब चाहे तलब कर लेता है। उनका सम्मान और प्रतिष्ठा धीरे-धीरे मिटा दिए गए। बहरहाल, इस पर फिर कभी।

अभी तो यह पूछना है कि क्या गोद लेने से सीएचसी की ये समस्याएं दूर हो जाएंगी? स्वास्थ्य सेवाओं को दुरस्त करने के लिए समग्र स्वास्थ्य नीति और अच्छे बजट की आवश्यकता तो है ही, निजी क्षेत्र को सिर पर बैठाना भी बंद करना होगा। निजीकरण ने अत्यावश्यक सार्वजनिक सेवाओं को क्रमश: मारा है।        

(सिटी तमाशा, नभाटा, 12 जून, 2021)      

Saturday, June 05, 2021

शासकीय निर्देश और जमीनी हकीकत

एक मास के भीतर दूसरी बार एम्बुलेंस की ‘मनमानी’ दरों पर शासन-प्रशासन ने रोष प्रकट किया है। दरें भी निर्धारित की गई हैं। पिछले दिनों लखनऊ के जिलाधिकारी ने कोविड मरीजों को लाने-ले जाने के लिए एम्बुलेंस की दरें तय की थीं। अब शासन स्तर पर पूरे प्रदेश में ये दरें निश्चित की गई हैं। महामारी की दूसरी लहर के चरम दौर में चौतरफा शिकायतें मिलीं कि अस्पताल और निजी एम्बुलेंस वाले मरीजों से मनमानी रकम वसूल रहे हैं। मरीजों की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि एम्बुलेंस के लिए मारामारी मची थी। निजी एम्बुलेंस वालों ने इसका फायदा उठाकर मनमाना किराया वसूला। फायदा लूटने में सभी आगे थे।

शासन-प्रशासन की इस औपचारिक-सी शैली पर कभी-कभी आश्चर्य होता है। ऐसा नहीं है कि एम्बुलेंस की दरें निर्धारित न हों लेकिन शायद ही किसी को याद हो। जैसे, शहर में चलने वाले ऑटो-टेम्पो-टैक्सी आदि की दरें निर्धारित होती हैं। यह कागजी औपचारिकता ही होती है क्योंकि ऑटो-टेम्पो-टैक्सी वाले किराया अपनी ही दरों पर लेते हैं। शासन द्वारा तय दरें उनके वाहन में लिखी अवश्य होती हैं लेकिन वसूली उससे कहीं अधिक होती है। यह सबको पता होता है लेकिन चलता रहता है।

अत्यावश्यक सेवा मानी जाने के कारण एम्बुलेंस को परमिट नहीं लेना पड़ता लेकिन दरें उनकी भी तय रहती हैं। यह अलग बात है कि ये दरें मात्र दिखावे के लिए होती हैं। एम्बुलेंस ही क्यों, कोविड मरीजों-तीमारदारों से सभी ने मनमानी वसूली की। ऑक्सीजन और कुछ विशेष दवाओं के लिए कैसी भगदड़ मची थी! तीमारदार खाली सिलेण्डर लिए दौड़ रहे थे और कहीं मिल गई तो कई-कई गुना रकम चुकानी पड़ी। दवाओं की चोरबाजारी हुई।

निजी अस्पतालों की शिकायतें हो रही है कि उन्होंने इलाज और ऑक्सीजन आदि के नाम पर लाखों रु वसूले। जांच में ये शिकायतें सही भी पाई जा रही हैं लेकिन कार्रवाई के नाम कुछ अस्पतालों को नोटिस थमा दी जाती है। ऐसी शिकायतें सामान्य दिनों में भी आती थीं मगर कोविड-काल में ये बहुत बढ़ गईं, हालांकि हमारे यहां शिकायतें करने का चलन लगभग नहीं है। मरीज की जान बचाएं या शिकायत करते फिरें? फिर भी खूब शिकायतें आईं लेकिन कोई दंडात्मक कार्रवाई होती नहीं सुनाई दी जिससे कि वे आइंदा ऐसा नहीं करें।

मुख्यमंत्री से लेकर आला अधिकारी तक चेतावनी देते रहते हैं। इन चेतावनियों का कितना प्रभाव पड़ता है? शिकायत करने का कष्ट बहुत कम लोग उठाते हैं क्योंकि जनता की शिकायतें सहानुभूति से सुनना अपने यहां होता नहीं। शिकायतकर्ता को हतोत्साहित ही किया जाता है। फिर भी कुछ शिकायतें आती है तो इसका मतलब है कि मनमानी वसूली बहुत बड़े पैमाने पर हो रही है।

इसकी सबसे बुरी मार गरीब, सीधे-सरल लोगों पर पड़ती है। उनके मुंह में जैसे जुबान ही नहीं होती कि निर्धारित दर पूछ सकें या सवाल-जवाब कर सकें। वे हर जगह ठगे-लूटे जाते हैं। अस्पतालों के बाहर उन्हें दलाल लूटते हैं और भीतर अस्पताल वाले। और तो और, श्मशान घाट पर भी वे लूटे गए। यह अकारण नहीं है कि कई जगह गरीब-गुरबों ने लाशें नदियों में बहा दीं या रेत में दफ्न कर दीं। कोई अपनों को इस तरह विदा नहीं करता लेकिन जब विधिवत दाह-कर्म या दफनाने के लिए इतनी रकम मांगी जाए कि वे दे न सकें तो क्या चारा रह जाता है?

जनता को, खासकर गरीब-गुरबों को क्या-कैसी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं या विभिन्न सेवाएं निर्धारित दरों पर चल रही हैं, इसे देखने की कोई चिंता शासन-प्रशासन नहीं करता। सिर्फ कड़े निर्देशों से व्यवस्था नहीं सुधरती।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 05 जून, 2021)       

          

Friday, June 04, 2021

शैलेश मटियानी को भुलाया नहीं जा सकता

 

                                                            17 फरवरी, 2021

प्रिय भाई प्रियंवद जी,

आज दोपहर को ‘अकार-56’ मिला। पहले तो ‘अकथ’ पढ़कर आपको फोन करने जा रहा था कि गिरिराज जी एवं अन्य लेखकों (फिलहाल ज्ञानरंजन) के पत्रों के बहाने हिंदी लेखकों के निजी और सार्वजनिक संसार पर नई और जरूरी रोशनी डालने का बड़ा काम उठाकर आपने बहुत सराहनीय काम किया है। फिर शैलेश मटियानी के पत्र और पूरा हिस्सा पढ़कर लगा कि आपको पत्र ही लिखूं। किसी को चिट्ठी लिखे अरसा भी हुआ। चाहता था कि कलम पकड़कर कागज पर लिखूं और लिफाफे पर टिकट लगाकर डाक-डिब्बे में डालूं लेकिन फिर लैपटॉप पर ही बैठ गया।

शैलेश मटियानी को याद करना, उनके रचे विपुल साहित्य के साथ-साथ उनके जीवन-संघर्षों, लेखकीय स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ी गई लम्बी लड़ाइयों, उनके साथ हुई साजिशों, उपेक्षाओं, आदि को सामने लाना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना बहुत आवश्यक है। उनके जैसे जीवनानुभवों और वंचितों पर अत्यंत मार्मिक एवं बेहतरीन कहानियां-उपन्यास लिखने वाले साहित्यकार को जो स्थान मिलना चाहिए था, वह तो नहीं ही मिला, उलटे उनकी जिस तरह उपेक्षा की गई, एक तरह से साहित्यिक हत्या, उस पर कोई बात भी नहीं करता। ‘अमेठी के दिन बहुरे’ और ‘धर्मयुग’ प्रकरण पर मटियानी जी ने लेखकीय स्वाभिमान की जो लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक अकेले लड़ी, उस प्रसंग पर जितने पत्र एवं लेख लिखे और स्वयं कोर्ट में जो बहसें की, उस पर हिंदी की पूरी लेखकीय जमात को गर्व करना चाहिए था, उसे पुस्तकाकार प्रकाशित कराकर सहेजना चाहिए था, बार-बार और जगह-जगह एक नज़ीर की तरह प्रस्तुत करना चाहिए था। लेकिन देखिए कि उनका मजाक उड़ाया गया, उनका अपमान किया गया और एक ‘संघी लेखक की सनक’ कहकर उसे खारिज किया गया। कैसे-कैसे ‘बड़े’ लेखक इस साजिश में शामिल थे! आज उनका बड़ा नाम लिया जाता है लेकिन कौन मटियानी जी को याद करता है?

घोर गरीबी एवं एकाकीपन में जीने और दर-दर की ठोकरें खाकर भी लेखक बने रहने की ज़िद ठानने और उसे सही साबित कर दिखाने वाला मटियानी जी जैसा और कौन लेखक हिंदी में हुआ? अग्रिम पारिश्रमिक लेकर और इसीलिए हड़बड़ी में लिखा गया उनका काफी कुछ खारिज करने लायक भी होगा लेकिन जो कुछ श्रेष्ठ कहानियां-उपन्यास उन्होंने हिंदी को दिए, उनकी बराबरी में कितनी रचनाएं हमारे ‘बड़े-बड़े’ लेखकों ने दीं? मटियानी जी की ‘दो दुखों का एक सुख,’ ‘मैमूद,’ ‘अर्द्धांगिनी’ जैसी कई कहानियों और कुछ उपन्यासों की क्या सिर्फ इसलिए उपेक्षा की जा सकती है कि विचारों से वे हिंदुत्ववादी थे और संघ व भाजपा के पाले में खड़े हो जाते थे? प्रगतिशील या जनवादी झण्डा उठाने के कारण ही बड़े लेखक कहाने वाले कितने लेखकों की रचनाएं उस टक्कर की हैं? यह क्यों नहीं देखा जाता कि अपनी रचनाओं में वे किसके साथ खड़े थे, किसके बारे में लिख रहे थे, संघ एवं भाजपा के बारे में या दीन-हीन, दलित, वंचित, शोषित जन के बारे में? हिंदू राष्ट्र की वकालत करने के लिए उनकी आलोचना कीजिए लेकिन उनके साहित्य के मूल्य, जनपक्षधरता, भाषा और लेखन कौशल को तो चर्चा कीजिए। उसे कैसे कूड़ेदान में डाला जा सकता है?

शायद 1997 या 1998 की बात है। मटियानी जी लखनऊ मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में भर्ती थे और पागलपन के दौरे से जूझ रहे थे। हमने ‘स्वतंत्र भारत’ में उनकी एक-दो पुरानी रचनाएं छापीं और पारिश्रमिक लेकर अस्पताल पहुंचे। एक रसीद बनाकर ले गए थे कि अगर वे कर सके हस्ताक्षर करा लेंगे। मटियानी जी ने पहचाना, अपनी मानसिक व्याधि की चर्चा की और कांपते हाथों से यह कहते हुए पावती पर हस्ताक्षर किए कि अब तो कलम का पकड़ना स्वप्न हो गया। फिर अपने हस्ताक्षर देखकर खुश हुए थे। अगली सुबह मेरे दफ्तर पहुंचने तक एक लड़का मटियानी जी का भेजा लिफाफा लिए खड़ा था। उसमें अखबार के लिए दो पेज का एक राजनैतिक लेख था और एक नोट कि ‘प्रिय नवीन, कल तुम्हारे सामने रसीद पर हस्ताक्षर बन पड़े तो लगा शायद फिर लिख सकता हूं। देखो, कोशिश की है...।’ कांपते हाथों की वह टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट हमें उनकी लेखकीय जीजीविषा से अचम्भित और प्रसन्न भी कर गई थी। और किस लेखक में रही ऐसी घनीभूत लेखकीय शक्ति? अस्पताल के मानसिक रोगी वार्ड में पागलपन के दौरे से तनिक राहत पाने पर भी लिखने बैठ जाना। ऐसी ही अवस्था में ही उन्होंने ‘नदी किनारे का गांव’ और ‘उपरांत’ जैसी कहानियां लिखी होंगी। ऐसे जीवट के लेखक को हिंदी जगत कैसे बिसार सकता है?

अपने अंतिम वर्षों में सत्ता-प्रतिष्ठान से ‘याचना’ करने वाले मटियानी जी पर हंसने वाली लेखक बिरादरी यह याद नहीं करती कि उन्होंने कैसे-कैसे दिन देखे और परिवार ने क्या-क्या भुगता। घर आए मेहमान के लिए चाय-पानी का जुगाड़ करने के लिए रद्दी बेचने भागने वाले मटियानी जी एक समय में सरकारी अनुदान ठुकरा देते थे। ठाकुर प्रसाद सिंह बताते थे कि हिंदी संस्थान का निदेशक रहते उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मटियानी जी को किसी बहाने पच्चीस हजार रु का चेक दिलवाया तो कैसे उन्होंने लेने से इनकार कर दिया था। कितने लेखक या लेखक संगठन उनकी सहायता को आगे आए? जब उनके मकान पर गुण्डे कब्जा कर रहे थे और वे अकेले लड़ रहे थे, कितने लेखकों-पत्रकारों ने उनका साथ दिया? संघ और भाजपा वालों ने ही उन्हें क्या दे दिया? बेटे की हत्या, बड़ी बेटी के अविवाहित रह जाने और परिवार की दुर्दशा ने अंतत: उन्हें तोड़ दिया, अत्यंत दयनीय और याचक बना दिया। यह उनकी कमजोरी थी कि वे टूट कर बुरी तरह बिखर गए। लेखक के रूप में उपेक्षा और अपमान ने उन्हें इस बिखराव की तरफ कम नहीं धकेला होगा।

हिंदुत्त्व की उनकी वकालत से किसी तरह की सहमति नहीं है, लेकिन उनके लेखकीय योगदान का मूल्यांकन होना चाहिए, विशेष रूप से इसलिए कि अपनी विचारधारा के बावजूद वे कहानी-उपन्यासों में समाज के सबसे उपेक्षित, दीन-हीन मानवों के साथ पूरी सम्वेदना और जुझारूपन के साथ खड़े दिखते हैं। उनके विचलनों और लेखन की भी खूब तीखी आलोचना हो लेकिन उनके लिखे को पूरी तरह भुला देना हिंदी साहित्य को गरीब बनाना ही है। वैसे, पाठकों में शैलेश मटियानी जितने लोकप्रिय रहे, उन्हें भुला पाना आसान नहीं होगा। घनघोर असहमतियों के बावजूद राजेंद्र यादव ने उन पर जिस दृष्टि से लिखा है, वह संतोष देता है।

आपने ‘अकार’ के इस अंक में गिरिराज किशोर जी से उनके पत्र-व्यवहार के बहाने यह विमर्श शुरू करके बहुत अच्छी पहल की है।   

-नवीन जोशी, लखनऊ

(अकार-57 में प्रकाशित सम्पादक प्रियंवद के नाम एक चिट्ठी)

        

  

      

        

 

  

 

Friday, May 28, 2021

कोरोना-काल में नदियों की तरफ कौन देख रहा है?

 गोमती नदी के जलकुम्भी से भर जाने की खबरें कई दिन से आ रही थीं। अब वाराणसी में गंगा नदी की सतह शैवाल से हरी हो जाने की खबर सुर्खी में हैं। गोमती में जलकुम्भी इतनी अधिक हो गई है कि काफी हो हल्ले के बाद लखनऊ नगर निगम ने पांच जेसीबी, पांच पोक्लेन मशीनें और सत्ताईस नावें उसे साफ करने के लिए मंगाई हैं। वाराणसी में गंगा का हाल देखकर उत्तर प्रदेश और केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड सक्रिय हुए हैं। विष अनुसंधान संस्थान से सहायता मांगी गई है कि गंगा के पानी की गुणवत्ता की जांच करके बताएं कि उसकी सेहत को क्या रोग लगा है।

नदियों का रोग पहचानना कठिन नहीं है। हमारी विकास योजनाएं और जीवन पद्धति नदियों के लिए जानलेवा रही है। धीरे-धीरे वे मरती आई हैं। उन्हें बचाने-निर्मल बनाने के दावे और अरबों रु जाने किस गटर में बह गए। गर्मियों के इन दिनों में नदियों में पानी वैसे ही कम हो जाता है। गोमती में तो कई बार शारदा नहर से पानी छोड़ना पड़ता है। पानी कम हो जाने से जलापूर्ति के लिए नदी का प्रवाह रोकना पड़ता है। प्रवाह लगभग समाप्त हो जाने से जलकुम्भी, शैवाल, आदि उग आते हैं। शहरी नालों का उत्प्रवाह नदियों में गिरना जारी रहता है। नदी ऑक्सीजन के लिए तरसती है। जीवन दायिनी नदियों को यह हमारी देन है।

पिछले डेढ़ साल के कोरोना काल में नदियों पर और कहर टूटा है। नदियों में लाशें बहाए जाने या उसके किनारे रेत में शव दफनाए जाने के समाचार तो हाल में मीडिया की सुर्खियां बने लेकिन दूसरे कई प्रकार के अत्याचार इस बीच नदियों पर लगातार होते रहे। अब यह भी सूचनाएं मिल रही हैं कि पीपीई किट, दस्ताने, मास्क और कोरोना से बचाव के लिए प्रयुक्त होने वाली दूसरी चीजें, जिन्हें बहुत सुरक्षित ढंग से नष्ट किया जाना चाहिए था, नदियों में बहा दिए गए। जब लाशें बहाई जा रही हों तो इन संक्रमित वस्तुओं को नदियों में फेंके जाने पर क्या आश्चर्य करना।

यह अकारण नहीं है कि नदियों के पानी में कोरोना वायरस पाए जाने की चौंकाने वाली सूचना जारी हुई जिसे तुरंत ही ‘अभी जांच जारी है’ कहकर वापस ले लिया गया। इसकी पुष्टि भले नहीं हुई हो, कई जगहों से पानी के नमूने लेकर जांच किए जाने से यह तो पता चलता ही है कि पानी के भी संक्रमित होने की आशंका बनी हुई है। प्रयागराज से भी पानी के नमूने लाकर जांचे जा रहे हैं। अभी तक हवा में और वह भी कुछ सीमा तक प्रसारित कोरोना वायरस अगर पानी में फैल गया तो क्या हाल होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। क्या तीसरी-चौथी लहर पानी के रास्ते आएगी?

नदियों में सीधे लाशें और मेडिकल उच्छिष्ट फेंके जाने के मामले कम हो सकते हैं या काफी हो-हल्ला मच जाने के बाद बंद करा दिए गए हों, लेकिन नदियों में गिरने वाले नालों में तो अस्पताली कचरा खुले आम फेंका जाता है। अब कोविड संक्रमित कचरा भी फेंका ही जा रहा होगा। न अस्पताल इसके खतरे की चिंता करते हैं न जिम्मेदार संस्थाएं और अधिकारी। गोमती नदी में अकेले लखनऊ शहर के अस्सी नाले गिरते हैं जिनके लिए सीवेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्ट लगाए जाने की चर्चाएं हम दशकों से सुनते आए हैं। जो संयंत्र लगे वे आधे-अधूरे उया बंद पड़े हैं। नालों के मुंह पर लगी जालियां तक साफ नहीं की जातीं। अक्सर वे फटी अथवा गायब पाई जाती हैं। ये नाले गोमती में क्या-कैसा कचरा उड़ेल रहे हैं, इसे कौन देख रहा है?

(सिटी तमाशा, नभाटा, 29 मई, 2021)

   

 

 

 

 

    

Friday, May 21, 2021

घोर संकट का समय और नेताओं की भूमिका

केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा की इन दिनों खूब चर्चा है। पिछली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहते शैलजा ने केरल में कोविड नियंत्रण, जन-जागरूकता और पीड़ितों के इलाज में उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। उसी कारण वे इतनी लोकप्रिय हुईं कि हाल में सम्पन्न चुनाव में उन्होंने जीत के अंतर का नया कीर्तिमान बना डाला। शैलजा को नई सरकार में शामिल नहीं किया गया है। इसके लिए मुख्यमंत्री और वाम मोर्चे के नेतृत्व की कड़ी आलोचना हो रही है।

हम यहां शैलजा की चर्चा दूसरे कारण से करना चाहते हैं। पूरे उत्तर भारत में एक भी मंत्री ऐसा क्यों नहीं है जिसकी तुलना शैलजा के कोविड-नियंत्रण-योगदान से की जा सके?  कोविड की दूसरी लहर से देश हलकान है। जिस तरह बिना अस्पताल, बिना ऑक्सीजन और बिना जांच के लोग मरे, उसका बार-बार उल्लेख दहलाता है लेकिन यह पूछने का मन होता है कि इस पूरे दौर में एक भी सांसद, एक भी मंत्री, एक भी विधायक ‘अपनी’ जनता के साथ खड़ा क्यों नहीं हुआ?

उत्तर प्रदेश के एक सांसद, एक कैबिनेट मंत्री और एक-दो विधायकों ने जांच, इलाज और अस्पतालों की व्यवस्था पर असंतोष व्यक्त किया। कुछेक ने अपनी तरफ से दवाएं वितरित कराईं लेकिन सबसे बुरी मुसीबत के इस दौर में एक भी जन-प्रतिनिधि त्राहि-त्राहि करती जनता के साथ नहीं रहा। न ही सत्ता पक्ष से और न ही विपक्ष से कोई ऐसा उदाहरण सामने आया जिसे जनता कह सके कि हां, हमारे नेता ने हमारे कष्ट कम करने में मदद की।

कुछ ग्राम प्रधानों ने अवश्य अपने क्षेत्र में मरीजों के एकांतवास और इलाज कराने में बड़ी भूमिका निभाई। जैसे, लखनऊ के समीपवर्ती गांव कबीरपुर की युवा प्रधान रीता वर्मा ने बीमारों को अलग रखकर और मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था करके अपने इलाके में संक्रमण काफी हद तक रोक दिया। ऐसे और भी कुछ उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन हमारे माननीय मंत्री, सांसद और विधायक सरकार का गुणगान करने, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की तारीफ में बयान देने के अलावा और क्या कर रहे थे?

यह सवाल विपक्षी दलों के नेताओं और विधायकों से भी है? जन-प्रतिनिधि होने के नाते उनकी भूमिका क्या रही? पंचायत चुनाव में वोट मांगने के लिए तो वे अपने क्षेत्रों में बड़े सक्रिय रहे लेकिन कोविड से त्राहिमाम कर रही जनता के प्राण बचाने के लिए उन्होंने क्या किया? कितने विधायक हैं जो अपने क्षेत्र में डटे रहे और व्यवस्था को चुस्त बनाने का दबाव बनाते रहे? क्या वे क्षेत्र की जनता को भौतिक दूरी बनाए रखने, मास्क पहनने, पीड़ितों को अलग रखने और त्योहारों-समारोहों में भीड़ न जुटाने के लिए तैयार नहीं कर सकते थे? उलटे, इन सावधानियों का उल्लंघन स्वयं उन्होंने खूब किया।

देश भर में गुरद्वारों ने हर संकट के समय की तरह इस बार भी खूब शाबाशी का काम किया और कर रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संगठनों, संस्कृति कर्मियों, रचनाधर्मियों, चिकित्सकों, आदि ने ऑक्सीजन दिलाने से लेकर, दवाएं, खाना, डॉक्टरी सलाह, आदि उपलब्ध कराईं। एक अकेली लड़की लावारिश लाशें श्मशान पहुंचाने में लगी रही। चिताओं के लिए कम पड़ गई लकड़ियां जुटाने में युवाओं के दल जुटे रहे। क्या मंत्री-सांसद-विधायक यह सब आसानी से नहीं करा सकते थे? क्या किसी ने सुना कि अमुक नेता ने कुछ ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, बेड, कुछ वेंटीलेटर, आदि अपने क्षेत्र में उपलब्ध कराए?

नेता वह है जो संकट के समय अपनी जनता के साथ खड़ा रहे। उसके दुख कम करने का जतन करे। सांसदों-विधायकों-मंत्रियों की सक्रियता ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रमण-विस्फोट को काफी सीमा तक रोक सकती थी। अफसोस कि हमारे पास ऐसी सक्रियता का एक भी उदाहरण नहीं है।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 22 मई, 2021)

Monday, May 17, 2021

महामारी के सबक और सीखने वाले समाज

 

सीखने वाले देशों और सरकारों के लिए कोविड महामारी बड़े सबक भी दे जा रही है। हमारे देश के लिए जहां स्वास्थ्य सुविधाएं अत्यंत उपेक्षित हैं  और जहां इसीलिए महामारी का प्रकोप बहुत भयानक रूप ले चुका है, ये सबक बड़े और महत्त्वपूर्ण हैं। इतनी विकराल महामारी का मुकाबला करने के लिए तो बहुत सारी तैयारियां और संसाधन चाहिए लेकिन यदि ग्रामीण एवं कस्बा स्तर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का पहले से मौजूद संजाल तनिक भी दुरुस्त होता तो गांव देहातों से आ रही रोंगटे खड़ी करने वाली खबरें काफी कम हो सकती थीं।

स्वास्थ्य सुविधाओं को ग्रामीण स्तर तक पहुंचाने के लिए इन स्वास्थ्य केंद्रों का संजाल तैयार किया गया। किसी भी जिले के कस्बों-गांवों की तरफ चले जाएं, प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के भवन मिल जाएंगे। विकास योजनाओं के नाम पर हमारा तंत्र भवन बनाकर खड़ा कर देने में अत्यंत सक्षम और चुस्त है। इमारतें फौरन खड़ी कर दी जाती है लेकिन जो सुविधाएं इनमें प्राण भ्ररती हैं, वे सर्वथा उपेक्षित रहती हैं। सामान्य दिनों में भी हम पाते हैं कि इन स्वास्थ्य केंद्रों में ताले लटके हैं, डॉक्टर नहीं हैं, स्वास्थ्यकर्मी तैनात हैं लेकिन आते नहीं, दवाओं, आदि का तो पूछना ही क्या।

यदि स्वास्थ्य क्षेत्र इतना उपेक्षित न रखा गया होता और इन स्वास्थ्य केंद्रों को न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं से लैस किया गया होता तो नदियों में बहती आती लाशों के वीभत्स दृश्य देखने को क्यों मिलते। महामारी की पहचान कर त्वरित एवं आकस्मिक चिकित्सा तो ये केंद्र शुरू कर ही सकते थे। इतने भर से मरीजों की हालत बिगड़ने से पहले सम्भाली जा सकती थी। क्या आज भी हमारी सरकारें यह तैयारी कर रही हैं कि आने वाली लहर से निपटने के लिए गांवों तक स्वास्थ्य केंद्रों को यथासम्भव सक्रिय किया जाए? वहां चिकित्साकर्मी तैनात हों और दवाएं, ऑक्सीजन सिलेण्डर, आदि भी हर समय उपलब्ध हों? गुरुद्वारे यह काम कर सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं कर सकती?

महंगे और बेहतरीन निजी अस्पतालों के लिए हमारा देश चर्चित है। ऐसे-ऐसे अस्पताल हैं जिनकी कल्पना करना भी सामान्य जनता के लिए मुश्किल है। इस देश के चंद प्रतिशत लोग और विदेशी भी इन अस्पतालों पर गर्व करते थे। उन्हें लगता था कि इनके रहते उन पर कोई खतरा नहीं है। कोविड महामारी ने इन विशिष्ट अस्पतालों को भी लाचार बना दिया। वे अमीर जो सरकारी अस्तपालों को घृणा की दृष्टि से देखते थे, वहीं शरण लेने को विवश हुए। एक बार फिर यह साबित हुआ कि इस देश की विशाल आबादी को समय पर आवश्यक इलाज देने में सरकारी चिकित्सा संस्थानों एवं छोटे अस्पतालों की बड़ी भूमिका है। उन्हें व्यस्थित और सुचारू बनाया जा सके तो महामारी का प्रकोप नियंत्रित किया जा सकता है।

महामारी ने हमारे तंत्र की बहुत सारी कमियों पर से पर्दा उठा दिया है। कमियों, लापरवाहियों और उपेक्षाओं का मंजर सामने है। इसे छुपाने–दबाने के प्रयास करने की बजाय उन्हें दूर करने के प्रयास युद्ध स्तर पर किए जाने चाहिए। कमियों को स्वीकार करना उन्हें दूर करने की दिशा में पहला बड़ा कदम है। छुपाने का सीधा अर्थ है कि हम उन कमियों की भरपाई करना नहीं चाहते।

शहरी निकायों और ग्रामीण पंचायतों के व्यापक संजाल को थोड़ी बहुत तैयारी और प्रशिक्षण से इतना सक्षम बनाया जा सकता है कि वे दूरस्थ इलाकों तक महामारी को नियत्रित करने के आवश्यक उपाय कर सकें। इसके लिए संसाधनों से अधिक इच्छा शक्ति चाहिए, पारदर्शिता चाहिए और वह साहस एवं दृष्टि चाहिए जो किसी विजेता फौज के सेनापति में होती है। समस्या है कि ऐसे नाजुक अवसरों पर हमारा राजनैतिक नेतृत्व इस दृष्टि से अत्यंत गरीब साबित होता है। 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 17 मई 2021)           

Friday, May 07, 2021

हां, फिर भी आकाश बादलों से बड़ा है!


इन दिनों मन बहुत बुझा-बुझा और भारी रहता है। कोई बड़ा-सा बोझ बैठा हो जैसे। उदासी
, एकाकीपन, डर, अजीबोगरीब ख्याल, किया-न किया, जिया-क्या जिया, जैसे विचार उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। बीमारी के अलावा दवाओं ने भी तन-मन को चौतरफा घायल किया है। डॉक्टर कहते हैं कि आठ घण्टे की नींद लीजिए। यहां लगभग पूरी रात आंखों में कट जाती है।

प्रतिदिन मिलने वाली बुरी खबरें दिल-दिमाग को और भारी बना रही हैं। दुनिया में दुख पहले कम न था। दहला देने वाली खबरें भी आती ही थीं। व्यवस्था-जनित लापरवाहियां, उपेक्षा, निष्क्रियता, चालाकियां और झूठ इस कष्ट को कई गुणा बढ़ा रहे हैं। वे साथी भी भीतर से हिले हुए दिखते हैं जिनके होने और जीने से ताकत मिलती थी। कोई लिख रहा है कि क्या संसार में अब दुख ही बचा है? कोई निश्चित मत बना बैठा है कि जीवन में अच्छा कुछ बचा ही नहीं।

दार्शंनिकों, रचनाकारों, संतों, आदि ने जीवन में दुख और संसार की निस्सारता पर खूब विचार किया है। ‘दुख ही जीवन की कथा रही,’ जैसे वाक्य लेखन और प्रवचन में छाए रहे हैं। बुद्ध ने शोक-विह्वल एक मां को कितनी आसानी से समझा दिया था कि यह संसार दुखों से भरा है। जे कृष्णमूर्ति मृत्यु पर इतनी शांति, गहराई और व्यापकता के साथ विचार करते हैं कि उसे जीवन का ही हिस्सा बना देते हैं, दुख का विषय नहीं।

किशोरावस्था से निकलते ही अपने से काफी बड़ी एक लड़की के आकर्षण में पड़कर उसकी दी हुई जो किताब पढ़ी थी, वह मेरे लिए पहले अंग्रेजी उपन्यास का पढ़ना भी हुआ। टॉमस हार्डी के उपन्यास ‘मेयर ऑफ कास्टरब्रिज’ की अंतिम लाइनें आज भी दिमाग में शब्दश: दर्ज हैं- ‘हैप्पीनेस इज बट एन ऑकेजनल एपीसोड इन द जनरल ड्रामा ऑफ पेन।’ दुख भरे जीवन-नाटक में खुशी बस अचानक आ पड़ने वाला कोई प्रसंग है। मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा ‘दोस्ती’ का वह गाना याद करिए- ‘सुख तो एक छांव ढलती, आती है-जाती है। दुख तो अपना साथी है,’ गुनगुनाते हुए हम उस टीस को क्यों भुलाना नहीं चाहते? दुखांत क्या स्थाई भाव है?

नहीं। अमेरिकी लेखक-पत्रकार मिच अल्बॉम की अद्भुत किताब ‘ट्यूजडेज विद मोरी’ असाध्य रोग से क्रमश: मर रहे अपने पुराने अध्यापक मोरी श्वार्ज से मुलाकातों की संस्मरणात्मक कथा है। मोरी आती हुई मौत की तैयारी करते हैं और जीवन में जो कुछ अमूल्य रहा, उसका उत्सव मनाते हैं। अल्बॉम हर मंगलवार को मोरी से मिलने जाता है और उदास होने की बजाय जीवनी-शक्ति से भर कर लौटता है। मोरी मुस्कराते हुए कहते हैं- ‘मेरे चारों तरफ ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि वे सदा जीवित रहेंगे और बीमार भी न पड़ेंगे!’ निकोलाई ऑस्त्रोवस्की का आत्मकथात्मक उपन्यास ‘हाउ द स्टील वाज टेम्पर्ड’ (हिंदी में अग्नि दीक्षा) सारे जीवन के दुखों, संघर्षों और नाउम्मीदी के बाद अंतत: अंधेरा छंटने और जीवन के सम्पूर्ण सार्थक हो जाने की विश्व प्रसिद्द्ध कहानी है।

फिर ऐसे कई प्रसंग याद आने लगते हैं। 1978 के जाड़ों की भोपाल की एक शाम, जब नाट्य-प्रदर्शन के बाद अनौपचारिक कवि-गोष्ठी हुई थी। उन कवि का नाम आज तैतालीस वर्ष बाद याद नहीं आ रहा, जिन्होंने उस शाम एक-एक, दो-दो पंक्तियों की कुछ कविताएं सुनाई थीं। उनकी दो कविताएं हर कठिन मौके पर स्मरण हो आती हैं। एक है- ‘मेरी सुंदर-सी डायरी में तीन सौ पैंसठ पृष्ठ दुख!’ क्या बात है! सारे के सारे पृष्ठ दुख से भरे हैं लेकिन डायरी ‘सुंदर-सी’ है! दूसरी कविता कहती है –‘आकाश बादलों से घिरा है। फिर भी आकाश बादलों से बड़ा है!’

कोई शक? फिर दिल-दिमाग पर छाए भारीपन को लेकर इतना क्यों हाय-तौबा की जाए! तो, थोड़ा नींद आए। एक सांस सुकून की लेकर हालात से लड़ने को अपने को तैयार किया जाए क्योंकि उसके बिना तो मानव-जीवन ही नहीं। 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 8 मई, 2021)   

        

Friday, April 30, 2021

बुरी खबरें, अच्छी दुनिया और चंद ज़रूरी सवाल

 

दुनिया में अच्छी खबरें भी हैं लेकिन यह समय बुरी खबरों के छाए रहने का है। हर तरफ से हाहाकार सुनने में आ रहा है। सोशल मीडिया, खबरिया चैनल, अखबार डरावने समाचारों से भरे हैं। ‘नभाटा’ जैसे पत्र अपवाद स्वरूप उम्मीद से भरे कुछ समाचार भी दे रहे हैं। कुछ चैनलों ने तो हद कर रखी है। वे लाशों का उत्सव-सा मना रहे हैं। फेसबुक खोलिए तो मित्रों-परिचितों और इसके-उसके कोविड से हार जाने की सूचनाओं, शोक गीतों, श्रद्धाजंलियों, भावुक स्मृति-लेखों का सिलसिला दूर तक चला जाता है। कोई किसी को जन्मदिन की शुभकानाएं देने के लिए फोटो लगा रहा है तो पहली दृष्टि में दिल कांप जा रहा है। दिल-दिमाग को दुरस्त रखने की बहुत जरूरत पड़ रही है।

मन दूसरी तरफ ले जाने का जतन करता हूं। बाहर दूसरी आवाजें भी तो होंगी। हां, वह सुनिए, कोयल कूक रही है। कूकता वैसे नर कोयल है, खैर। यह उनके कूकने का ही मौसम है। वह लम्बी कूक लगाए हुए है। कोई बच्चा-बड़ा उसकी नकल नहीं कर रहा। उसकी आतुर पुकार को सिर्फ एम्बुलेंस की डरावनी ‘टुईं-टुईं’ बाधित कर रही है। सुबह-दोपहर-शाम और रातों को भी सड़क से गुजरती एम्बुलेंस की चीख सुनाई देती है। कोयल कम, एम्बुलेंस अधिक बोल रहे हैं। महामारी के कहर में कोयल भी सहम गए हैं। अरे कोयल, कूके जाओ। एम्बुलेंस की चीख को दबा दो।

मोबाइल उठाता हूं। फेसबुक के लिए नहीं। वहां डर है। व्हाट्सऐप पर परिवार का ग्रुप है। उस पर रोज एक प्यारी सी फोटो आती है। एक नन्हीं परी का परिवार में आगमन हुआ है। उसे देखने हम जा नहीं पाए लेकिन वह दुनिया की सारी खुशियां हमारे लिए अपनी मासूम अदाओं में भेज देती है। उसकी बंद मुट्ठियों में एक खूबसूरत दुनिया का सपना बंद है। ये मुट्ठियां बाद में खुलेंगी, धीरे-धीरे। अभी वह अपने नन्हे-नन्हे पैरों से इस संसार की सारी अलाय-बलाय को लतियाने में लगी है। अपनी पूरी क्षमता से वह हम सबके लिए लड़ रही है। कभी-कभी गूं-गूं, आं-क्वां जैसी ध्वनियां निकालती है, रोने के अलावा। उसकी ध्वनियों में हमारे लिए कितने संदेश हैं? नरेश जी की ‘शिशु’ कविता याद आती है- ‘उसी है जो है आशा।’

कई दिन से छत पर जाना नहीं हुआ। जाड़ों के फूल कबके सूख गए थे। गर्मी में खिलने वाला जीनिया इस बार लगा नहीं पाया लेकिन ‘नौ बजिया’ की सूखी जड़ों से नया जीवन पनपने लगा था। जरा-सी सहेज मिलते ही तीनों गमले हरे-भरे हो गए थे। पता चला, अब फूल आने लगे हैं। यह कितनी खुशी देने वाली सूचना है। आम के बौरों की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिलाया। मेरे पड़ोसी के आम के पेड़ में टिकोले चुपके से बड़े हो गए हैं। पार्क का गुलमोहर इस बार पेड़ों की छंटाई के नाम पर जाने क्यों बिल्कुल मुण्डा कर दिया गया। वर्ना वह फूलने की तैयारी कर होता। दूसरे तमाम गुलमोहर अब फूलने लगे होंगे। अमलतास भी अपनी सुनहरे आभा बिखेरने वाला होगा।

लाख कोशिश करता हूं लेकिन ध्यान इन सुंदर चीजों से हटकर महामारी के कहर की ओर लौट जाता है। थोड़ा भूलता हूं तो एम्बुलेंस की चीख याद दिला देती है। कौन जा रहे हैं इन एम्बुलेंस में? अस्पताल में उन्हें जगह मिलेगी? ऑक्सीजन मिलेगी? कोई उन्हें वहां देखने वाला होगा? सब कह रहे हैं, अस्पताल जाने से हर हाल में बचे रहना है लेकिन कैसे?

सोचता हूं, इस हाहाकारी समय में तो देश की बहुसंख्यक जनता को यह पूछने की अक्ल आ रही होगी कि सरकारों की प्राथमिकता के काम क्या होने चाहिए। मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान, छद्म राष्ट्रवाद और थोथा देश-प्रेम चुनावी मुद्दे होने चाहिए या अच्छे अस्पताल, आवश्यक और पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं जिसके बिना लोग बेमौत मर रहे हैं? क्या होने चाहिए हमारे मूल सवाल और उन्हें किससे पूछा जाना चाहिए? क्या लोग ऐसा सोच रहे हैं?   

(सिटी तमाशा, नभाटा, 01 मई, 2021)  

 

Friday, April 23, 2021

जनता सरकारों पर भरोसा क्यों नहीं करती?

जैसी आपात स्थितियां चल रही हैं और चारों तरफ जैसा हाहाकार मचा हुआ है, ऐसे संकट काल में राजनैतिक नेतृत्व का दायित्व है कि वह जनता को भरोसा दिलाए कि प्राण रक्षा के लिए आवश्यक सुविधाओं, दवाओं, ऑक्सीजन आदि की कमी नहीं होगी। प्रधानमंत्री से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके आला अफसर तक ऐसे आश्वासन वाले बयान दे रहे हैं। जनता ही उन बयानों पर भरोसा नहीं कर रही। वह पैरासिटामॉल जैसी सामान्य दवा से लेकर ऑक्सीजन के सिलेण्डर तक घर में रख लेने के लिए पूरी जान लगा दे रही है। जिन्हें अभी आवश्यकता नहीं है या जो कोविड संक्रमण से अभी बचे हुए हैं, वे भी दवाएं और ऑक्सीजन सिलेण्डर का जुगाड़ लगाने के लिए भाग-दौड़ में लगे हैं। अगर हमें हो गया तो क्या करेंगे? उन्हें भरोसा ही नहीं है। सब इसी भय से त्रस्त हैं कि आने वाले दिनों में स्थिति और विकट हो जाएगी।

उत्तर प्रदेश का उदाहरण लें तो यहां लोक सभा से लेकर विधान सभा चुनाव तक भाजपा को जबर्दस्त बहुमत मिला था। भाजपा ने ऐसी चुनावी सफलता पहले कभी नहीं देखी थी। यह उस पर जनता के अपार विश्वास के कारण ही सम्भव हुआ होगा। जनता ने दूसरे दलों की तुलना में भाजपा पर खूब भरोसा किया। और, भरोसा यह था कि भाजपा नेतृत्व देश और उत्तर प्रदेश को बेहतर शासन दे सकता है।

अब जबकि देश और प्रदेश कोविड संक्रमण के तूफान से बेहाल है और अस्पतालों से लेकर दवाइयों-उपकरणों और अत्यावश्यक प्राण वायु के लिए मरीज और तीमारदार त्रस्त है, तब वही जनता बड़े विश्वास से चुनी अपनी सरकार पर भरोसा क्यों नहीं कर रही कि संकट अवश्य है लेकिन हमारी सरकार इससे निपट लेगी? हमें बिना जरूरत दवा, ऑक्सीमीटर, ऑक्सीजन, आदि खरीदकर जमा करने की अवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमने भरोसे वाली सरकार चुनी है। यह आश्वस्ति-भाव जनता में क्यों नहीं जागता?

सिर्फ इस सरकार की बात नहीं है, स्वास्थ्य सुविधाओं का संक्ट हो या दूसरी आवश्यक चीजों की कमी, जनता आम तौर पर सरकारों के आश्वासनों पर भरोसा नहीं करती। आजादी के बाद से ही उसे कटु अनुभव हुए हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि स्वतंत्रता के पश्चात शुरुआती सरकारों में शामिल लोग जनता का थोड़ा-बहुत ख्याल कर लेते थे। समय के साथ यह गुण गायब होता गया। आज का दौर इस मामले में बहुत निर्मम है।

बीते बुधवार को एक मित्र खाली ऑक्सीजन सिलेण्डर भराने के लिए एक ऑक्सीजन सयंत्र पहुंचे। भारी भीड़ थी। बेहाल लोग तड़के से लाइन लगाए खड़े थे। भीड़ को अनुशासित करने के नाम पर पुलिस बल आया। उसने आनन-फानन लाठियां चलाईं और कुछ समय बाद फैक्ट्री से अपने साहबों के लिए सिलेण्डर भरवा ले गए। यह सिर्फ एक वाकया है। जनता देखती आई है कि जब भी किसी वस्तु का संकट पैदा हो जाता है, तो सबसे पहले यह तंत्र अपने आकाओं की सेवा में जुट जाता है। पेट्रोल-डीजल की हड़ताल ही हो जाए तो रातों रात जरकिन भर-भर कर अफसरों-नेताओं के यहां पहुंचने लगते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इस समय भी बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों के यहां हर वह चीज उपलब्ध हो, जिसके बिना जनता मर रही है। वैसे भी, यह व्यवस्था जनता के लिए कम, नेताओं-अफसरों के लिए अधिक काम करती है। जनता जानती है कि अस्पताल हो या ऑक्सीजन, नेताओं-अफसरों को हर हाल में मिल जाएंगे लेकिन उसे तरसना-मरना होगा।

जब मुद्दा धर्म, राजनीति, पाखण्ड और भावनात्मक मुद्दों पर यही जनता अपने नेताओं के पीछे लहालोट होती रहती है। इसीलिए लोकतंत्र का वर्त्मान विद्रूप हमारे यहां बना है। सरकारों का चुनावी निर्णय उनके काम-काज पर नहीं ही होता।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 24 अप्रैल, 2021)

 

       

Friday, April 16, 2021

याद रखा जाएगा कि इस दौर से हम कैसे निपटे

यूँ तो दैनंदिन काम-काज में सरकारों और प्रशासन की परीक्षा होती रहती है लेकिन कभी-कभी ही ऐसा वक्त आता है जब उनकी दूरदृष्टि, विवेक, जनहित में त्वरित निर्णय करने की कसौटी पर वे कसे जाते हैं। यह ऐसा ही बहुत बुरा वक्त है जब शासन-प्रशासन का असली इम्तहान होना है। कहना नहीं होगा कि पिछले चंद दिनों में ही उसके दावों, प्रचारों और व्यवस्थाओं की पोल खुल चुकी है। अब जाकर सरकार को गम्भीरता का अनुभव हुआ है। अस्थाई अस्पताल बनाने और दूसरी सुविधाएं बढ़ाने के फैसले किए जा रहे हैं। यह पहले क्यों नहीं हो सकता था?

हम चुनाव दर चुनाव सरकारें इसलिए चुनते और उन पर भरोसा भी जताते आए कि वह अपने सामान्य काम-काज में तो स्वभावत: कल्याणकारी रहेंगी ही, आपात समय में जनता के साथ खड़ी रहेंगी। हमने सरकारें इसलिए नहीं चुनीं कि जब सबसे बुरा वक्त आएगा तो आम आदमी ही नहीं, प्रभावशाली तबके वाले भी अपने मरीज को अस्पताल में भर्ती कराने में लाचार हो जाएंगे। घर पर मरीज को प्राणरक्षक ऑक्सीजन का सिलेण्डर लाख कोशिश के बाद भी नहीं मिल पाएगा। डॉक्टर और अस्पताल के कर्मचारी लाचार हो जाएंगे। ऐसी स्थितियां पैदा कर दी जाएंगी कि निजी लैब कोरोना जांच करने को मना करने लगेंगी या उन्हें मना कर दिया जाएगा।

कोरोना का पहला दौर चीन से शुरू होकर बरास्ता यूरोप अपने मुल्क में कुछ देर से हाहाकार मचाने आया था। तब भी हम कमर कस नहीं सके थे। देशबंदी ने हर स्तर पर तबाही ही मचाई थी। स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल वैसे भी खुलती रहती थी लेकिन कोरोना के पहले दौर ने साबित कर दिया था कि हमारा तंत्र इससे निपटने में कितना अक्षम है। महामारी का दूसरा दौर भी अपने देश में सबसे बाद में आया। पूरे एक साल बाद। क्या यह पूछना गलत होगा कि हमने दूसरे दौर से निपटने के लिए इस दौरान क्या तैयारियां कीं जबकि भुक्तभोगी देश बता रहे थे कि दूसरा दौर और भी भयावह है एवं वायरस रूप बदल चुका है?

क्या सोचा था कि यह वायरस भारत पर मेहरबान रहेगा, कि यज्ञ-हवन, विशालकाय मूर्तियों, चुनाव रैलियों और कुम्भ में डुबकियों से वह डर जाएगा? अगर एक कैबिनेट मंत्री और सत्तारूढ़ दल के ही कुछ विधायक लाचारी और असंतोष जता रहे हैं तो स्पष्ट है कि दावों के अनुरूप तैयारियां नहीं की गईं। अस्थाई ही सही, कितने अतिरिक्त अस्पताल, कितने बेड, कितने वेण्टीलेटर, कितने ऑक्सीजन प्लाण्ट और सिलेण्डरों की व्यवस्था इस बीच की गई? अगर छोटे घरेलू ऑक्सीजन सिलेण्डर पर्याप्त संख्या में इस समय उपलब्ध होते तो अस्पतालों में भर्ती होने की ऐसी मारामारी नहीं मचती। अगर हर वार्ड में सौ-डेढ़ेक स्वयंसेवकों को भी सामान्य नर्सिंग प्रशिक्षण दे दिया होता और ऑक्सीजन सुलभ होती तो क्या ऐसा चौतरफा रुदन मचा होता?

श्मशान में लकड़ी कम पड़ सकती है लेकिन हमें सैकड़ों शव रोज जलाने-दफनाने की व्यवस्था नहीं चाहिए। हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए कि जीवित इंसानों को शव में बदलने से रोका जा सके। जीना-मरना अपने हाथ में नहीं, लेकिन मरीज की जांच तो समय पर हो, उसे बचाने की कोशिश तो हो। इतने इंतजाम हमने समय रहते क्यों नहीं किए? हम टीका बनाने वाले देशों में अग्रणी होने का ढिंढोरा पीट रहे हैं, लेकिन कोविड की जांच करा पाने में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। निजी लैब तीन-तीन, चार-चार दिन में नमूना ले पा रहे हैं या साफ मना कर दे रहे हैं। इतने ही दिन रिपोर्ट आने में लग रहे हैं। आखिर क्यों? सरकारी अस्पतालों में जांच के लिए लम्बी कतारें संक्रमण बढ़ाने का काम कर रही हैं। टीकाकरण और कोविड जांच की कतारें अगल-बगल क्यों हैं? इसके लिए कौन सी विशेषज्ञता चाहिए?

देर से ही सही, सरकार में हलचल है। कुछ सकारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। आशा है स्थिति में सुधार दिखाई देगा। जनता से भी अपील है कि वे पूरी गम्भीरता से सभी सुरक्षात्मक कदम उठाएं।

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Friday, April 09, 2021

फिर वह दारुण दौर

हम फिर उसी दारुण दौर में बहुत तेजी से लौट आए हैं जब बीमारों के इलाज और उन्हें बचाने की सुविधाओं की कौन कहे, श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार की भी व्यवस्था नहीं हो पा रही। यह देखना-सुनना हृदय विदारक है कि लाशें खड़ी हैं और उनके परिवारीजनों को टोकन बांटे जा रहे हैं। पंद्रह घण्टे तक प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। और, इस पूरे दौर में वह जो प्लास्टिक में लिपटा बण्डल पड़ा है, उसके भीतर अपने किसी प्रियजन के होने की प्रतीति भर है। छूने का तो सवाल ही नहीं, उसे दूर से देखा तक नहीं जा सकता।

बार-बार चेतावनियां दी जा रही थीं, टीके लगाने वालों को भी पूरी-पूरी सावधानी बरतने को कहा जा रहा था लेकिन अधिसंख्य जनता ने मान लिया था कि कुछ नहीं है कोरोना या वह उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा। ‘यहां नहीं है कोरोना,’ कई लोगों ने साफ-साफ कहना शुरू कर दिया था। इसमें दिहाड़ी के लिए मजबूर आबादी ही नहीं, अघाए-खाए-मुटाए लोगों की भी खूब संख्या है जिन्हें पार्टी और हंगामा किए बिना नींद ही नहीं आती। नतीजा सामने है। इस बार कोरोना का जो विस्फोट हुआ है, वह पहले से कहीं अधिक रफ्तार से बेकाबू दौड़ने लगा है।

अपेक्षाकृत सावधान रहे लोगों ने भी कम लापरवाहियां नहीं कीं। ये मेरे पक्के दोस्त हैं या ये मेरे बहुत करीबी रिश्तेदार हैं, इनसे मिलने में कुछ नहीं होगा, ऐसा भाव भी खूब रहा। होली खेली और मिली गई। इस सबके पीछे सबसे बड़ा योगदान सत्तारूढ पार्टी समेत उन दलीय नेताओं का रहा जो चुनाव जीतने के लिए रैली पर रैली और विशाल सभाएं करते रहे। ‘दो गज की दूरी है जरूरी’ कहने के बाद इस नारे का सबसे अधिक मखौल नेताओं ने ही उड़ाया। चुनाव जीतने के लिए सारे घोड़े खोल देने वाले जिम्मेदार नेताओं ने भी चुनावी रैलियां, सभाएं, पदयात्राएं करके यही संदेश दिया कि कोरोना का कोई डर नहीं है। उनकी बातों और करनी में जमीन-आसमान का असर यहां भी खूब दिखा।

कोरोना अमीर-गरीब में अंतर नहीं करता लेकिन जितनी त्वरित जांच और चिकित्सा सुविधा नेताओं को मिल जाती है उसकी कल्पना भी सामान्य जन नहीं कर सकते। वे जांच कराने के लिए भटक रहे हैं, रोगी पाए जाने पर अस्पताल, डॉक्टर और दवा के लिए दर-दर मारे फिर रहे हैं। उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है। थोड़ा-सा बोझ बढ़ते ही स्वास्थ्य तंत्र चरमरा उठता है। नेताओं, आदि के लिए कोई कमी नहीं होती। यह पूरी व्यवस्था उन ही के लिए काम करती है।

पिछले साल कोरोना फैलाने के लिए कभी तब्लीगियों को जी भर कोसा-गरियाया गया, कभी दिहाड़ी कामगारों की झुण्ड के झुण्ड गांव वापसी को और कभी रोजी-रोटी के लिए जूझते गरीबों-लाचारों को। क्या आज कोई अंगुली इन नेताओं की ओर भी उठेगी जो कोरोना नियंत्रण के लिए आवश्यक सभी निर्देशों की धज्जियां उड़ाते फिर रहे हैं?

अब आश्चर्य नहीं होता कि कोरोना की भयावहता के बाद दूसरी सबसे बड़ी खबर अपराध सरगना मुख्तार अंसारी बना हुआ है। वह किस गाड़ी से कैसे आया, कैसी ह्वील चेयर थी और बांदा जेल में आते ही वह कैसे व्हील चेयर छोड़कर आराम से चलने लगा। उसके साथ कौन-कौन आया और किस जेल अधिकारी ने कैसे आंखों-आंखों में रात काटी। उसकी बैरक में क्या-क्या है और कौन उसे कैसे देख रहा है। आने वाले दिनों में हम मुख्तार की जेल कोठरी की और भी कई खबरें पढ़ेंगे। पिछले किस्से भी दोहराए जाएंगे।

कोरोना अपनी निर्मम, दारुण कथाएं कहता रहेगा। एक अदृश्य सूक्ष्म वायरस गर्वीले, हठी, पथभ्रष्ट और सृष्टि-विरोधी मानव को उसकी औकात बताने निकल पड़ा है।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 10 अप्रैल, 2021)          

Friday, April 02, 2021

हमारे बुजुर्ग, पुरानी कारें और अर्थव्यव्स्था

तीन-चार दिन पहले वर्मा जी बहुत परेशान मिले। घर के पोर्टिको में खड़ी अपनी पुरानी मारुति कार को उदासी से सहला रहे थे। यह कार उन्होंने कोई पच्चीस वर्ष पहले बड़े शौक से खरीदी थी। जब उनके किसी रिश्तेदार के पास कार नहीं थी तब वे सपत्नीक कार से उनके घर जाते थे। गाहे-बगाहे किसी को अस्पताल ले जाना हो या और कोई आपात आवश्यकता आ पड़े तो कार लेकर उपस्थित हो जाते थे। फिर वे रिटायर हो गए। बेटा नौकरी में चला गया। बेटी की शादी कर दी। पति-पत्नी अकेले रहते हैं लेकिन इस उम्र में पुरानी कार का बड़ा सहारा है। बाजार आना-जाना, डॉक्टर के यहां या किसी जरूरत के समय ही निकलना होता है। वे रोज सुबह उसे झाड़ते-पोछते–धोते हैं, साल में समय पर सर्विस कराते हैं और अपने से अधिक उसका ध्यान रखते हैं।

‘अब यह कार भी हम नहीं रख सकते,’ वर्मा जी सचमुच उदास थे- ‘सरकार ने बीस साल से अधिक पुरानी गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन समाप्त करने का फैसला किया है। हम बूढ़े-बुढ़िया क्या करेंगे?’

‘सरकार चाहती है कि पुराना सब खारिज कर दिया जाए और आप नई कार खरीदें,’ हमने उन्हें हलका करने की कोशिश की।

‘नई कार का हम बूड्ढे-बुढ़िया क्या करेंगे? और, क्यों खरीदें? कहां से पैसे लाएं? छोटी-मोटी जरूरत इससे पूरी हो जाती है।‘

वर्मा जी अकेले इस तकलीफ में नहीं हैं। अकेले लखनऊ में कोई सवा तीन लाख निजी कारें बीस साल से पुरानी चिह्नित की जा चुकी हैं। निर्णय हुआ है कि इन कारों का निबंधन स्वत: समाप्त कर दिया जाएगा। यानी इन्हें चलाने की अनुमति रद्द। इन्हें कबाड़ करार दिया जा चुका है किंतु वर्मा जी जैसे बहुत सारे लोगों के लिए ऐसी पुरानी गाड़ियां कबाड़ नहीं, बहुत उपयोगी और सहारा बनी हुई हैं। वे क्या करें?

इन गाड़ियों से प्रदूषण फैलने का तरक बचकाना है। इनसे कहीं अधिक प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियां और दूसरी चीजें धड़ल्ले से चल रही हैं। वास्तव में यह नव उदार व्यवस्था का जबड़ा है जिसमें हर पुरानी चीज ‘स्क्रेप’ कहकर डाल दी जाएगी ताकि जनता नित नया सामान खरीदती रहे और इस उपभोक्ता-अर्थव्यवस्था को धक्का देती रहे। जनता नई-नई कारें नहीं खरीदएगी तो वाहन उद्योग को गति कैसे मिलेगी? इस निर्मम व्यवस्था को वर्मा जी जैसे बुजुर्गों या गरीबों से कोई वास्ता नहीं रह गया है।

हमने रिटायर होने से पहले नई कार खरीदी थी। एजेंसी मालिक ने पूछा था- ‘सिर, कितने साल तक रखने का इरादा है?’ हमने कहा था- ‘जब तक चल जाए।’ उन्होंने हंसते हुए बताया था- ‘अब तीन साल में गाड़ी बदल देने का चलन है।’ हमारी कार सात साल बाद आज भी नई-नवेली-सी चल रही है। वाहन उद्योग को तेजी दिलाने के लिए मुझे अब तक कम से कम दो नई कारें खरीद लेनी चाहिए थी। कार की बात जाने दीजिए, बाइक, टीवी, मिक्सी, घरेलू आवश्यकता के बहुत सारे उपकरण ज़ल्दी-ज़ल्दी बदलने का दबाव तरह-तरह से बाजार बनाता है। ‘एक्सचेंज स्कीम’ साल भर चालू इसीलिए रहती है कि आप पुराना खारिज कर नया-नया सामान घर लाते रहें। दो खरीदिए तो एक मुफ्त! जरूरत एक भी नहीं लेकिन लालच में खरीदिए। हम कबाड़ और कचरा पैदा करने वाले नागरिक बना दिए गए हैं। यहां उपयोगिता की कोई बात नहीं करता।

नौकरियां जाने और वेतन कटौती के इस दौर में नई पीढ़ी भी इतना खर्च कर पाने की सामर्थ्य नहीं रखती लेकिन सरकार है कि उद्योगों को ‘इंसेण्टिव पैकेज’ और कर्मचारियों को नकद अग्रिम देकर अधिक से अधिक खरीदारी के लिए उकसा रही है। ऐसे में वर्मा जी जैसों की पीड़ा कौन सुने?

(सिटी तमाशा, नभाटा, 3 अप्रैल, 2021)    

 

Saturday, March 27, 2021

चलो, अब स्कूल बंद करें हम!

 हमारी सरकारों की शिक्षा नीतियों के अलावा और किसका असर हो सकता है कि उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में सरकारी प्राथमिक स्कूल या तो बंद होते जा रहे हैं या आस-पास के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में उनका विलय करना पड़ रहा है। कई जिलों में सैकड़ों की संख्या में परिषदीय स्कूल बंद कर दिए गए हैं। सरकारें ‘चलो स्कूल’ का नारा देती हैं। बच्चों को ‘स्कूलों की तरफ खींचने के लिए’ तरह-तरह के अभियान चलाती हैं लेकिन वे यह देख पाने में असमर्थ हैं या देखना ही नहीं चाहतीं कि जो प्राथमिक विद्यालय पहले सैकड़ों विद्यार्थियों से गुलजार रहते थे, उनमें अब बीस-पच्चीस बच्चे मुश्किल से क्यों आ रहे हैं।

स्वतंत्रता के पश्चात कई दशकों तक राजनीति, प्रशासन, विज्ञान, टेक्नॉलजी, आदि विभिन्न क्षेत्रों में छाई रही प्रतिभाएं सरकारी स्कूलों की देन थीं। आज भी उच्च सरकारी पदों से लेकर विभिन्न शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों में सरकारी स्कूलों का नाम रोशन करने वाले मिल जाते हैं। वहां न केवल ऐसे अध्यापक होते थे जो अपने विद्यार्थियों की प्रतिभा को तराशते-निखारते थे, बल्कि जीवन के कई मूल्यवान मूल्य भी उनमें भर देते थे। अपने समाज और समय को देखने की खरी दृष्टि उनमें विकसित होती थी।

पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक में सरकारी स्कूलों ने अपनी चमक खोनी शुरू की और निजीकरण का दौर आते-आते वे बुरी तरह पिछड़ने लगे। न वहां समर्पित अध्यापकों की कमी थी (उनकी संख्या अवश्य कम होती जा रही थी) और न उनकी खण्डहर इमारत की प्रतिभा-चमक धूमिल पड़ी थी लेकिन मध्य वर्ग के आर्थिक उन्नयन और बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव ने उनके विद्यार्थियों-अभिभावकों में हीनता बोध भरना शुरू कर दिया था। यह वही समय था जब ‘अंग्रेजी स्कूलों’ की बाढ़ आ रही थी और गली मुहल्लों में भी ‘कांवेण्ट’ एवं ‘मॉण्टेसरी’ स्कूल खुलते जा रहे थे। उनकी ‘टाई’ वाली भौंडी ड्रेस सरकारी स्कूलों के साधन विहीन छात्रों में कुण्ठा भर रही थी। सरकारी स्कूलों में पढ़ना अपराध-बोध बन रहा था। सरकार की शिक्षा नीति सिर्फ कागजों में करामात कर रही थी। नए हालात के लिए उसे तैयार नहीं किया गया।

अब वह ऐसा वक्त आ गया है कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों को विद्यार्थी मिल नहीं रहे। ‘मिड डे मील’ योजना गरीबी के कारण स्कूलों से वंचित रहे बच्चों को स्कूल लाने के लिए बनी थी लेकिन ग्रामीण इलाकों के अधिकसंख्य स्कूलों में जो कुछेक बच्चे अब भी आ रहे हैं, उसका बड़ा कारण दोपहर के इसी भोजन का आकर्षण है। दो जून रोटी के लिए जूझ रहे परिवारों के लिए वह पढ़ाई से बड़ा है।

यह मानते हुए कि अंग्रेजी पढ़ने के लिए ही बच्चे निजी विद्यालयों का रुख कर रहे हैं, सरकार ने कुछ वर्ष पहले अपने कई प्राथमिक विद्यालयों को ‘इंगलिश मीडियम’ घोषित कर दिया। फिर भी बच्चे नहीं बढ़े तो उन्हें बंद करने का निर्णय किया गया। दूसरी तरफ निजी विद्यालयों में प्रवेश के लिए मारामारी मची है। ऐसा नहीं है कि निजी विद्यालय बहुत अच्छी शिक्षा देते हैं। उन्हें शिक्षा की महंगी दुकानें कहना उपयुक्त होगा लेकिन दौड़ उसी तरफ मची हुई है। सरकारें बेहतर विकल्प दे नहीं पाईं।  

कोई दस वर्ष पहले एक कानून बनाकर हमें शिक्षा का अधिकार दिया गया था। यह अच्छा फैसला था लेकिन इस पर सरकारों ने विचार ही नहीं किया कि वह कैसी शिक्षा होगी और किस तरह दी जाएगी। वह शिक्षा कैसा नागरिक गढ़ेगी और क्या अमीर-गरीब विद्यार्थी के लिए अलग-अलग होगी? ‘अ’ से अमीर और ‘ग’ से गरीब जिस शिक्षा-व्यवस्था की आत्मा बन गया हो, वहां नव-उदारीकरण के इस दौर में सरकारों का रहा-बचा जन-कल्याणकारी स्वरूप भी बिला ही जाना है। 

(सिटी तमाशा, नभाटा, 27 मार्च, 2021)            

Saturday, March 13, 2021

लड़कियों का पहनावा और समाज का दिमाग

इन दिनों मेरठ-मुज़फ्फरनगर की किसान पंचायतें चर्चा में हैं। किसानों की गर्जना खबरों में सुनाई देती है। तीन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर शुरू हुआ आंदोलन अब भी जोर-शोर से जारी है। किसान संगठन ही नहीं,  विपक्षी राजनैतिक दल भी किसान पंचायतें लगा रहे हैं। केंद्र सरकार के विरुद्ध हाल के वर्षों का यह सबसे बड़ा और लम्बा आंदोलन है।

ऐसे में मुज़फ्फरनगर से आई एक खबर चौंकाती कम और अफसोस से ज़्यादा भर देती है। जिले के चरथावल थाने के तहत आने वाले पीपलशाह गांव के राजपूत समाज की पंचायत ने फरमान जारी किया है कि गांव के लड़के हाफ पैण्ट और लड़कियां जींस नहीं पहनेंगी। खबर के अनुसार पंचायत में कहा गया कि गांव में लड़के हाफ पैण्ट पहन कर घूमते हैं जो आम लोगों को अच्छा नहीं लगता। इसलिए उस पर रोक लगा दी गई। फिर लड़कियों का जींस पहनना क्यों अच्छा लगता! इसलिए उन्हें खबरदार कर दिया गया। साथ ही उन स्कूलों का बहिष्कार करने का फैसला भी किया गया है जहां भारतीय परिधान पहनने की व्यवस्था नहीं है। ‘भारतीय परिधान’ की परिभाषा क्या है, यह समाचार में नहीं बताया गया है, लेकिन समझना मुश्किल नहीं है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही नहीं, देश के विभिन्न कोनों से ऐसे समाचार अक्सर आते रहे हैं। कभी खाप पंचायतें और कभी कॉलेज ऐसे फरमान सुनाते हैं। वक्त तेज़ी से बदला है लेकिन समाज का दिमाग नहीं बदल रहा। गांवों से निकल कर लड़के-लड़कियां दिल्ली-बंगलूर-मुम्बई तक जाकर पढ़ रहे हैं। गांवों में भी अब सभी मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा हासिल करें। कई माता-पिता खेत बेचकर भी बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों की तरफ भेजते हैं। बड़े शहरों में कई कॉलेज और उनके आस-पास के आवासीय परिसर ऐसे बच्चों से भरे पड़े हैं। वे हॉस्टल या किराए के मकानों में रहते हैं। उनके लिए हाफ-पैण्ट और जींस पहनना आम बात है।

गांव भी अब वैसे कहां रहे। गांवों के बाजार नए जमाने के पहनावों से भरे पड़े हैं। शहरों की हवा गांव पहुंचने में अब अधिक समय नहीं लेती। गांवों का पहनावा ही नहीं, खान-पान तक बहुत तेजी से बदला है। हाट-बाजार में चाऊमिन-मोमो-बर्गर के ठेले खूब भीड़ खींचते हैं। बच्चों के ‘बर्डे’ या शादी-बारात ‘चायनीज’ के बिना अधूरे माने जाते हैं। यह बदलाव बहुत सहज ढंग से आया है।

लड़कों के हाफ-पैण्ट पहनने पर रोक आश्चर्यजनक है। आम तौर पर लड़कों पर ऐसी रोक नहीं लगती। लड़कों को पूरी आज़ादी रहती है। रोक-टोक लड़कियों के साथ ही अधिक होती है। उनके जींस पहनने पर आपत्तियां गांवों ही नहीं, शहरों में भी होती रही हैं। कई खाप पंचायतें ऐसे फरमान सुना चुकी हैं। कुछ वर्ष पहले मुजफ्फरनगर की गुर्जर पंचायत ने लड़कियों के मोबाइल रखने पर भी रोक लगा दी थी। पिछले साल पंजाब के एक कॉलेज ने लड़के-लड़कियों, दोनों के जींस पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उनसे सलवार-कुर्ता पहनने को कहा गया था।

जींस आज बहुत सुविधाजनक पहनावा है और दशकों से खूब चलन में है। कोई भी काम करने, दौड़-भाग करने, उठने-बैठने, सायकल-कार-बाइक चलाने में जींस इतनी आराम दायक है कि पुरानी पीढ़ी के महिला-पुरुषों ने भी उसे अपना लिया है। युवा पीढ़ी का तो वह पसंदीदा पहनावा है ही। उस पर रोक लगाने की मानसिकता बीमार ही कही जाएगी। हमारे समाज में वैसे भी वैज्ञानिक सोच का अभाव है। हाल के वर्षों में दकियानूसी सोच को और बढ़ावा मिला है। अवैज्ञानिक-अतार्किक बातों और अंधविश्वास को ‘महान भारतीय ज्ञान’ बताया जा रहा है। दु:ख तब बढ़ जाता है जब ऐसे विचारों और फैसलों के विरुद्ध आवाज नहीं उठती।

(सिटी तमाशा, नभाटा, 13 मार्च 2021)